📝 Story Preview:
मुंबई के बादलों ने सुबह से ही इशारा कर दिया था कि आज कुछ अलग होने वाला है। TechVision Solutions के ग्लास केबिन में बैठा दीपक कपूर अपनी लैपटॉप स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए हुए था। 32 साल का ये शख्स, जिसकी सख्ती से पूरा ऑफिस वाकिफ था, आज भी अपने उसी अंदाज़ में था - काली शर्ट, स्लीव्स कोहनी तक मुड़ी हुई, चेहरे पर वो गंभीरता जो किसी को भी नर्वस कर दे।
ऑफिस में लड़कियों की एक अलग ही दुनिया थी - स्किनी जींस, टॉप्स, स्कर्ट्स, कुछ तो इतनी बोल्ड कि दीपक को कभी-कभी अजीब भी लगता। पर उन सबके बीच एक चेहरा था जो हमेशा अलग रहता - डिंपल शर्मा।
हमेशा सलवार-कमीज़, दुपट्टा इतनी अच्छी तरह पिन किया हुआ जैसे कोई स्कूल की लड़की करती है। हाथों में महेंदी, कलाइयों में चूड़ियाँ, और वो शर्मीली सी मुस्कान जो शायद ही कभी किसी को नसीब होती। दीपक ने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया था - वो "बहनजी टाइप" थी उसकी नज़र में, बाकी लड़कों की तरह।
दोपहर बाद, जब बारिश की बूंदें खिड़की से टकराने लगीं, दीपक ने अपना डैशबोर्ड खोला। डिंपल के नंबर्स... शून्य। एक भी सेल नहीं। उसकी भौंहें तनीं।
"डिंपल! मीटिंग रूम, अभी!"
मीटिंग रूम में डिंपल की आँखें झुकी हुई थीं। दीपक की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी।
"ये क्या है डिंपल? पूरे दिन में एक भी सेल नहीं? तुम यहाँ पिकनिक मनाने आई हो क्या? बार-बार ब्रेक... ये ऑफिस है, कोई पार्क नहीं!"
डिंपल के होंठ काँपे। उसकी आँखों में आँसू तैरने लगे पर उसने खुद को संभाला। बस सिर हिलाया और धीरे से बोली, "सॉरी सर... कल से... ठीक हो जाएगा।"
दीपक ने एक लंबी साँस ली। "देखो, मैं तुम्हारी काबिलियत जानता हूँ। पर ये लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। कल बेहतर परफॉर्मेंस चाहिए।"
डिंपल चुपचाप बाहर निकल गई। उसकी आँखों में वो नमी थी जो शायद घर पहुँचते-पहुँचते आँसुओं में बदल जाएगी।
शाम सात बजे ऑफिस से निकलते वक्त बारिश ने अपना असली रूप दिखाया। दीपक अपनी बाइक पर था, पर तेज़ हवाओं और मूसलाधार बारिश में रास्ता साफ नहीं दिख रहा था। सड़कों पर पानी भरने लगा था, और ठंडी हवाएं उसकी हड्डियों तक को कंपा रही थीं।
एक बड़े से घर के सामने उसने बाइक रोकी। गेट के पास खड़े होकर बारिश से बचने की कोशिश की, पर कपड़े तो पहले ही भीग चुके थे। ठंड इतनी बढ़ गई कि उसके दाँत बजने लगे।
"शायद... शायद कोई अंदर रहने दे... थोड़ी देर के लिए," उसने सोचा और हिम्मत करके डोरबेल बजाई।
गेट खुला और दीपक का दिल धक से रह गया।
सामने डिंपल खड़ी थी - पर ये वो डिंपल नहीं थी जिसे वो जानता था।
बॉडी-फिटिंग ब्लैक टॉप, जिसमें उसकी कमर की लाइन साफ दिख रही थी। शॉर्ट डेनिम स्कर्ट, जो घुटनों से ऊपर थी। और वो हाथ... वो खूबसूरत हाथ जिन पर कंधों तक महेंदी का जादू बिखरा हुआ था - फूल, बेलें, पैटर्न्स जो इतने खूबसूरत थे कि दीपक की नज़र वहीं अटक गई। पैरों में भी, स्कर्ट से जितना दिख रहा था, वहाँ तक महेंदी की डिज़ाइन थी। स्टाइलिश हील्स में वो और भी लंबी लग रही थी। बाल हाफ-अप स्टाइल में, दोनों साइड से छोटे-छोटे बन बने हुए।
"दीपक सर?!" डिंपल की आवाज़ में हैरानी थी।
दीपक का मुँह खुला का खुला रह गया। वो ऑफिस की "बहनजी" जिसका दुपट्टा कभी कंधे से नहीं हटता था, घर पर इतनी... इतनी अलग थी? इतनी खूबसूरत?
"मैं... मैं..." दीपक ने खुद को संभाला, "सॉरी डिंपल, मुझे नहीं पता था ये तुम्हारा घर है। बारिश बहुत तेज़ हो गई है और... मैं पूरी तरह भीग गया हूँ। क्या मैं... क्या मैं थोड़ी देर अंदर रुक सकता हूँ? बस जब तक बारिश कम हो जाए..."
डिंपल ने एक पल के लिए सोचा - सुबह की वो डांट, और अब ये। पर उसकी आँखों में दीपक की हालत देख ली।
"आइए सर, अंदर आइए।" उसने दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
घर अंदर से उतना ही सुंदर था जितना बाहर से। दीपक अंदर आया तो उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था।
"एक मिनट," डिंपल भागकर तौलिया लेकर आई। "ये लीजिए। वॉशरूम वो रहा सामने। आप... आप फ्रेश हो लीजिए।"
दीपक ने तौलिया लिया। उसकी नज़र फिर डिंपल के हाथों पर गई - महेंदी की वो बारीक डिज़ाइन, जो उंगलियों से शुरू होकर कोहनी पार करती हुई कंधों तक जा रही थी।
"वैसे... तुम्हारे हाथों पर ये महेंदी... बहुत खूबसूरत है," उसके मुँह से निकल गया।
डिंपल के गालों पर हल्की लालिमा आई। "थैंक यू सर। अब आप जाइए, ठंड लग जाएगी।"
वॉशरूम में दीपक ने खुद को आईने में देखा। भीगे कपड़े, उलझे बाल... "क्या हाल बना रखा है," उसने खुद से कहा।
पर असली मुसीबत तब आई जब वो बाहर आया।
"सर... वो..." डिंपल थोड़ी असहज लग रही थी, "मेरे पास कोई मेन्स क्लॉथ नहीं हैं। मैं अकेली रहती हूँ तो... पर आप इन गीले कपड़ों में नहीं रह सकते। मैं... मैं आपको कुछ दे सकती हूँ पहनने के लिए, बस..."
"कुछ मतलब?" दीपक ने पूछा।
डिंपल अपने कमरे से एक सेट लेकर आई। हाथ में था एक पिंक और व्हाइट का सलवार-कमीज़ सेट, साथ में ब्रा और पैंटी।
दीपक की आँखें फटी की फटी रह गईं। "ये... ये क्या है?"
"सर, I know ये अजीब है," डिंपल ने कहा, "पर बारिश देखिए बाहर। आप जा नहीं सकते। और इन भीगे कपड़ों में बीमार पड़ जाएंगे। Please... बस आज की रात के लिए।"
दीपक ने बाहर देखा। बारिश का तांडव जारी था। हवा की आवाज़ें डरावनी लग रही थीं।
"पर... पर मैं..."
"सर, यहाँ कोई देखने वाला नहीं है। सिर्फ मैं हूँ। और मैं किसी को नहीं बताऊँगी। प्रॉमिस।" डिंपल की आँखों में एक अजीब सी चमक थी - शरारत की या कुछ और।
दीपक ने एक गहरी साँस ली। "ठीक है... पर... ब्रा-पैंटी?"
"अंडरगारमेंट्स तो चाहिए ही ना सर। वैसे भी सलवार-कमीज़ ब्रा के बिना अजीब लगेगा।"
दीपक के पास कोई चारा नहीं था।
वॉशरूम में दीपक ने कपड़ों को देखा। उसके हाथ काँप रहे थे। "ये मैं क्या करने जा रहा हूँ..."
पहले पैंटी। सॉफ्ट, सिल्की फैब्रिक। जब उसने पहनी तो एक अजीब सी फीलिंग आई - हल्की, चिकनी, बिल्कुल अलग। फिर ब्रा। कप्स को सही जगह सेट करना, हुक लगाना... तीन-चार कोशिशों के बाद हो पाया।
जब उसने आईने में खुद को देखा - चेस्ट पर ब्रा का आउटलाइन, पैंटी की फिटिंग - एक अजीब सा रोमांच हुआ। डर भी था, शर्म भी, पर... कुछ और भी।
सलवार पहनी - नीचे तक लंबी, टखनों तक। फिर कमीज़ - पिंक, हल्के काम वाली। और फिर वो दुपट्टा।
जब वो बाहर आया, डिंपल हँस पड़ी।
"अरे वाह सर! आप तो... खूबसूरत लग रहे हैं!"
"बहुत मज़ाक उड़ा लो," दीपक ने शर्माते हुए कहा। उसने दुपट्टे को गले में डाला हुआ था।
"रुकिए सर, दुपट्टा तो ढंग से पहनिए," डिंपल पास आई और दुपट्टे को कंधों पर सेट करने लगी। फिर उसने उसे पिन से फिक्स किया - दोनों कंधों पर, बिल्कुल स्कूल की लड़कियों की तरह।
दीपक ने दुपट्टे को छुआ। "ये... ये पिन... ये तो... बचपन में मेरी बहन जब स्कूल जाती थी तो इसी तरह दुपट्टा पिन करती थी। आजकल तो कोई लड़की ऐसे नहीं करती।"
"हाँ सर," डिंपल मुस्कुराई, "पुरानी बात हो गई। पर मुझे ये स्टाइल पसंद है।"
"तुमने तो मुझे अपने स्कूल के दिन याद दिला दिए।"
डिंपल की आँखों में शरारत चमकी। "बस एक चीज़ मिसिंग है सर..."
"क्या?"
"आपके लंबे बालों में दो खूबसूरत चोटियाँ!"
दोनों हँस पड़े। पर डिंपल ने हाथ जोड़े। "सर प्लीज़... बस मज़े के लिए। प्लीज़?"
"नहीं नहीं डिंपल, बहुत हो गया..."
"अरे सर, यहाँ कौन देख रहा है? और वैसे भी आपके बाल इतने लंबे हैं... प्लीज़ ना!"
दीपक के बाल सच में लंबे थे - कंधों तक। वो कभी-कभी मैन बन में बाँध लेता था।
"ठीक है... पर सिर्फ आज।"
डिंपल खुशी से उछल पड़ी। उसने दीपक को सोफे पर बैठाया और उसके बालों में कंघी करने लगी। उंगलियाँ जब बालों से गुज़रीं, दीपक को एक अजीब सुकून मिला।
धीरे-धीरे दो चोटियाँ बन गईं - बिल्कुल टाइट, साफ-सुथरी। आखिर में डिंपल ने दो पिंक रबर बैंड्स लगाए।
"हो गया सर! अब आप परफेक्ट स्कूल गर्ल लग रही हैं!"
दीपक ने आईने में खुद को देखा।
सलवार-कमीज़, पिन किया दुपट्टा, और दो चोटियाँ।
कुछ पल के लिए वो खुद को नहीं पहचान पाया।
ये वो था? दीपक कपूर? वो सख्त मैनेजर?
पर सबसे अजीब बात - उसे अच्छा लग रहा था।
डिनर टेबल पर दोनों बैठे थे। डिंपल ने खिचड़ी बनाई थी - गरम, मसालेदार।
"सर, आपको गुस्सा तो नहीं आया ना सुबह की बात पर?" डिंपल ने धीरे से पूछा।
दीपक ने चम्मच रोक दी। "नहीं डिंपल... मुझे गुस्सा नहीं आया। पर हाँ, मैं थोड़ा सख्त हो गया था। सॉरी अगर तुम्हें बुरा लगा।"
"नहीं सर, आप सही थे। मेरा दिमाग सच में काम में नहीं लग रहा था।"
"क्या हुआ था? कुछ प्रॉब्लम?"
डिंपल ने प्लेट में देखा। "बस... कभी-कभी अकेलापन... बहुत भारी लगता है सर। ऑफिस में भी कोई दोस्त नहीं। सब लोग मुझे 'बहनजी' समझते हैं। कोई बात नहीं करता ढंग से।"
दीपक को अपराध बोध हुआ। "मुझे नहीं पता था डिंपल..."
"कैसे पता होता सर? मैं भी तो कभी किसी से बात नहीं करती। पर आज... आज आप यहाँ आए, इस अवतार में..." वो मुस्कुराई, "शायद भगवान ने मेरी सुन ली।"
"तुम घर पर इतनी अलग क्यों हो? मेरा मतलब... ऑफिस में तो..."
"ऑफिस में लोग जज करते हैं सर। अगर मैं वैसे कपड़े पहनूँ तो सब कहेंगे 'देखो, बहनजी ने रंग बदला'। फिर भद्दे कमेंट्स, गंदी नज़रें... मुझे वो सब नहीं चाहिए। तो मैंने अपनी असली ज़िंदगी यहाँ रख ली, अपने घर में।"
दीपक ने पहली बार डिंपल को समझा। "तुम बहुत स्ट्रॉन्ग हो डिंपल।"
"और आप सर?" डिंपल ने पलटकर पूछा, "आपको कैसा लग रहा है... इन कपड़ों में?"
दीपक ने चोटी को छुआ। "अजीब... पर... अच्छा भी। सच कहूँ तो... कुछ अलग सा एहसास है।"
"गुड! तो फिर कल सुबह तक आप मेरी गेस्ट रहिए। और हाँ, ये अवतार बनाए रखिए।" डिंपल ने आँख मारी।
दीपक हँसा। पहली बार उसे डिंपल की ये शरारती साइड दिखी थी।
बारिश खिड़की पर दस्तक दे रही थी। पर अंदर, एक अजीब सी गर्माहट थी।
अगली सुबह जब दीपक उठा, उसे अहसास हुआ कि बारिश थमी नहीं थी। बल्कि और तेज़ हो गई थी। न्यूज़ चैनल्स पर अलर्ट आ रहे थे - "मुंबई में भारी बारिश, कई इलाकों में जलभराव"।
"सर! उठ गए आप?" डिंपल कॉफी लेकर आई। वो फिर से सलवार-कमीज़ में थी, पर आज का सेट ऑरेंज था।
"हाँ... पर ये बारिश..." दीपक ने चिंता से कहा।
"न्यूज़ में बोल रहे हैं अगले 3-4 दिन तक तेज़ बारिश रहेगी। और आपका एरिया तो कंप्लीटली फ्लडेड है। मैंने चेक किया।"
दीपक का दिल बैठ गया। "मतलब...?"
"मतलब आप यहीं रुकिए कुछ दिन। कोई ऑप्शन नहीं है। वैसे भी ऑफिस तो बंद है अगले 5 दिन के लिए।"
"पर डिंपल... मेरे कपड़े... मेरा..."
"आपके कपड़े?" डिंपल ने शैतानी से कहा, "वो तो अभी भी गीले हैं। और मेरे पास तो..." उसने अपनी अलमारी की तरफ इशारा किया, "सिर्फ ये हैं।"
दीपक ने अलमारी देखी - साड़ियाँ, सूट्स, स्कर्ट्स, टॉप्स, नाइटीज़... सब कुछ।
"तुम्हारा मतलब..."
"जी हाँ सर। अगर आप यहाँ रहेंगे तो... मेरे कपड़ों में ही रहेंगे।" डिंपल ने कॉफी का कप आगे बढ़ाया। "अब फैसला आपका है - बाहर बारिश में बीमार पड़ना, या यहाँ आराम से रहना।"
दीपक ने कॉफी का घूँट लिया। "तुम जानती हो ना ये कितना... कितना अजीब है?"
"पता है सर। पर मज़ेदार भी तो है!" डिंपल की आँखों में वो चमक फिर आ गई। "और वैसे भी, कल रात आप कितने क्यूट लग रहे थे उन चोटियों में!"
दीपक के गाल गरम हो गए।
"ठीक है... पर सिर्फ घर के अंदर। और किसी को पता नहीं चलना चाहिए।"
"डील!" डिंपल ने हाथ आगे बढ़ाया।
दीपक ने हाथ मिलाया। पर जैसे ही उसने डिंपल का हाथ छुआ, उसकी नज़र फिर महेंदी पर गई। वो बारीक डिज़ाइन, वो कला...
"तुमने ये महेंदी खुद लगाई?"
"हाँ सर। मेरा हॉबी है।"
"ये तो... बहुत खूबसूरत है।"
डिंपल मुस्कुराई। "थैंक यू। और सर... अगर आप चाहें तो..."
"तो?"
"मैं आपके हाथों में भी लगा सकती हूँ।"
दीपक की साँस रुक गई।
दोपहर का वक्त था। बारिश की आवाज़ें पूरे घर में गूंज रही थीं। दीपक और डिंपल बालकनी में बैठे थे।
"सर, हाथ आगे कीजिए," डिंपल ने महेंदी की कोन हाथ में ली।
"डिंपल, मुझे नहीं पता ये सही है या गलत..."
"सर, कुछ भी सही-गलत नहीं है। बस... एक एक्सपीरियंस है। लाइफ में कुछ नया ट्राई करना बुरा नहीं है।"
दीपक ने हाथ आगे किया। डिंपल ने उसकी हथेली पर कोन रखी और पहली लाइन खींची।
ठंडी महेंदी जब स्किन पर लगी, दीपक को झुरझुरी हुई।
"टिकल हो रहा है?"
"हाँ... थोड़ा।"
डिंपल धीरे-धीरे डिज़ाइन बनाने लगी। फूल, पत्तियाँ, जालियाँ... उसकी उंगलियाँ इतनी कुशलता से चल रही थीं जैसे कोई आर्टिस्ट कैनवास पर पेंटिंग बना रहा हो।
"तुमने ये कहाँ सीखा?" दीपक ने पूछा।
"मेरी दादी से। वो कहती थीं - महेंदी सिर्फ डेकोरेशन नहीं है, ये एक्सप्रेशन है। जो भी तुम महसूस करते हो, उसे महेंदी में उतार दो।"
"तो अभी तुम क्या फील कर रही हो?"
डिंपल ने एक पल के लिए रुककर दीपक की आँखों में देखा। "खुशी... थोड़ी एक्साइटमेंट... और शायद... कनेक्शन।"
"कनेक्शन?"
"हाँ सर। आप पहले इंसान हैं जिसके साथ मैं इतनी फ्री फील कर रही हूँ।"
दीपक के दिल में कुछ हिला।
एक घंटे बाद, दोनों हाथ पूरी तरह महेंदी से ढके थे। कलाई तक, नाज़ुक डिज़ाइन्स।
"अब पैर?" डिंपल ने शरारत से पूछा।
"नहीं नहीं, बहुत हो गया..."
"अरे सर, अधूरा काम अच्छा नहीं लगता। और पैरों में महेंदी का अपना ही मज़ा है।"
दीपक ने सोचा। "ठीक है... पर सिर्फ थोड़ी सी।"
"डील!"
जब डिंपल पैरों में महेंदी लगाने लगी, तो दीपक को अजीब सा एहसास हुआ। उसकी उंगलियाँ जब पैरों को छूतीं, एक अलग ही सनसनी होती। महेंदी टखनों क फैल गई - फूलों की बेलें, मंडल, नाज़ुक पैटर्न्स।
"हो गया सर! अब आप परफेक्ट हैं!"
दीपक ने अपने हाथों और पैरों को देखा। महेंदी की खुशबू, वो गहरा हरा रंग...
"ये कितने दिन रहेगी?"
"10-12 दिन। पर रंग 2-3 दिन बाद अच्छा आएगा।"
दीपक को अजीब सी घबराहट हुई। "10 दिन? पर ऑफिस..."
"ऑफिस 5 दिन बाद खुलेगा। तब तक थोड़ा हल्का हो जाएगा। और आप चाहें तो ग्लव्स पहन सकते हैं।" डिंपल ने आश्वासन दिया।
पर दीपक के दिल में कुछ और ही चल रहा था। वो इस एक्सपीरियंस में इतना डूब गया था कि ऑफिस की चिंता पीछे छूट रही थी।
तीसरे दिन सुबह, दीपक जब उठा तो महेंदी का रंग गहरा लाल हो चुका था। उसने अपने हाथों को घूर-घूरकर देखा।
"खूबसूरत ना?" डिंपल ने पीछे से आकर कहा।
"हाँ... मुझे यकीन नहीं हो रहा ये मेरे हाथ हैं।"
"आज मैं आपको कुछ नया सिखाऊँगी।"
"अब क्या?"
डिंपल ने बेड पर एक साड़ी फैला दी - लाइट ग्रीन, गोल्डन बॉर्डर के साथ।
दीपक की आँखें फटी। "साड़ी? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?"
"बिल्कुल ठीक है सर। देखिए, आप यहाँ 10 दिन रहने वाले हैं। रोज़-रोज़ सलवार-कमीज़ बोरिंग हो जाएगा। थोड़ी वैरायटी होनी चाहिए ना!"
"पर साड़ी... मुझे नहीं आती पहनना।"
"तो मैं सिखा दूँगी। आइए!"
आधे घंटे की मशक्कत के बाद, दीपक साड़ी में खड़ा था। पेटीकोट, ब्लाउज़, और फिर छह गज का सफर। प्लीट्स बनाना, पल्लू सेट करना - डिंपल ने हर स्टेप समझाया।
"अब देखिए आईने में," डिंपल ने उसे आईने के सामने खड़ा किया।
दीपक ने खुद को देखा।
साड़ी में, महेंदी लगे हाथों के साथ, बाल खुले छोड़े हुए - वो एक अलग ही इंसान लग रहा था। स्त्रीत्व की एक अजीब सी झलक, जो उसने कभी खुद में नहीं देखी थी।
"कैसा लग रहा हूँ?" उसने धीरे से पूछा।
"ईमानदारी से सर? बहुत ख़ूबसूरत।" डिंपल की आवाज़ में सच्चाई थी।
"पर... पर मैं तो..."
"आप एक इंसान हैं सर। और खूबसूरती किसी जेंडर की मोहताज नहीं होती। आपके अंदर ये फेमिनाइन साइड है, और उसे एक्सप्लोर करना कोई गुनाह नहीं।"
दीपक की आँखें नम हो गईं। "तुम... तुम समझ रही हो ना मैं क्या फील कर रहा हूँ?"
"बिल्कुल सर। मुझे पता है ये एक्साइटिंग भी है और स्केरी भी। पर आप सेफ हैं यहाँ। मेरे साथ।"
दीपक ने डिंपल को गले लगा लिया। वो पहला टच था जो इतना प्योर, इतना इमोशनल था।
"सर, साड़ी के साथ बिना मेकअप के अधूरा लगता है," पाँचवें दिन डिंपल ने कहा।
जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है!
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