Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

शादी की पहली रात और जबरदस्ती की शुरुआत और रागिनी का बदला

📝 Story Preview:

कहानी का टाइटल: Payback Time

राजस्थान के जोधपुर से कुछ दूर, राठौड़ परिवार की पुरानी हवेली थी। ऊँची दीवारें, मेहराबदार दरवाजे, आँगन में पीपल का पुराना पेड़ और चारों तरफ सख्त परंपराओं की दीवारें। यहाँ समय रुक-सा गया था।

यहाँ पुरुषों का राज था। महिलाएँ घूँघट के पीछे, सिर झुकाए, चुपचाप। घर की हर औरत को बचपन से सिखाया जाता था — “पुरुष देवता है, उसकी इच्छा ही भगवान की इच्छा है।”

सुबह के 7 बजे का वक्त था।

आँगन में सुनीता सिंह (कुलदीप की माँ) चाय बना रही थीं। उनके घूँघट इतने घने थे कि चेहरा मुश्किल से दिखता था। पास ही निकिता चौहान (शेर सिंह की पत्नी) बैठी चावल छाँट रही थी। दोनों औरतें चुपचाप काम कर रही थीं।

तभी ओम सिंह राठौड़ (घर के मुखिया) अपनी मूँछों पर ताव देते हुए आए।

ओम सिंह: (गहरी आवाज़ में)

“सुनीता! चाय कहाँ है? और रागिनी को बुला, कुलदीप के लिए नाश्ता तैयार करे। मर्द को भूख लगी है तो औरत को तुरंत काम पर लगना चाहिए।”

सुनीता ने तुरंत घूँघट संभाला और झुककर बोलीं,

सुनीता: “जी हुजूर… अभी लाती हूँ।”

निकिता चुपचाप मुस्कुराई, लेकिन कुछ नहीं बोली।

इतने में शेर सिंह राठौड़ भी आ गया — कुलदीप का छोटा भाई।

शेर सिंह: (हँसते हुए)

“भैया अभी भी सो रहा है क्या? कल रात तो रागिनी की चीखें पूरे आँगन में गूँज रही थीं। लगता है भैया ने रात भर अच्छी ‘ट्रेनिंग’ दी है।”

ओम सिंह जोर से हँसे।

ओम सिंह: “मर्द को अपनी औरत को संभालना आना चाहिए। औरतें रोती हैं तो समझो काम ठीक चल रहा है। हमारी परंपरा यही है।”

तभी रागिनी घूँघट निकालकर चाय का ट्रे लेकर आई। उसकी चाल में हल्का दर्द साफ दिख रहा था। कल रात कुलदीप ने फिर से उसे बेरहमी से इस्तेमाल किया था। रागिनी की आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन वो सिर झुकाए खड़ी थी।

रागिनी: (बहुत धीमी आवाज़ में)

“सासू माँ… चाय…”

सुनीता ने बिना घूँघट हटाए ही ट्रे ले लिया और फुसफुसाकर कहा,

सुनीता: “बेटी, आज रात फिर वही होगा… सह लेना। पुरुष की इच्छा के आगे औरत का दर्द कुछ नहीं।”

रागिनी ने सिर्फ सिर हिलाया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन घूँघट की वजह से कोई नहीं देख पाया।

इतने में कुलदीप सिंह राठौड़ भी आ गया — लंबा, मूँछों वाला, गर्व भरी चाल। उसने रागिनी की तरफ देखा भी नहीं। सीधे पिता के पास बैठ गया।

कुलदीप: (गर्व से)

“पापा, कल रात रागिनी ने अच्छा संघर्ष किया। रोई बहुत, लेकिन मैंने नहीं छोड़ा। राजपूत मर्द को अपनी बीवी को वश में रखना आना चाहिए।”

ओम सिंह ने पीठ थपथपाई,

ओम सिंह: “बहुत अच्छा। औरत को रोना सिखाना ही उसका असली काम है।”

निकिता (जेठानी) चुपचाप सब सुन रही थी। उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी। वो जानती थी कि रागिनी कितनी तकलीफ में है, लेकिन वो भी इसी घर की बहू थी — चुप रहना ही उसकी मजबूरी थी।

रागिनी चाय परोसकर पीछे हट गई। उसके मन में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था —

“क्या मेरी जिंदगी हमेशा ऐसे ही गुजरेगी? सिर्फ दर्द और शर्म में?”

लेकिन उस वक्त उसे पता नहीं था कि आने वाले दिनों में किस्मत का खेल उलटने वाला है।

जिस मर्द ने उसे हर रात चीखने पर मजबूर किया, उसी को एक दिन उसी दर्द और शर्म से गुजरना पड़ेगा।

Payback Time की शुरुआत हो चुकी थी… बस अभी कोई नहीं जानता था।

Chapter 1: शादी की पहली रात और जबरदस्ती की शुरुआत

रागिनी कंवर का जन्म एक साधारण लेकिन खुशहाल परिवार में हुआ था। वो बचपन से ही बहुत चुलबुली, हँसमुख और पढ़ाई में तेज लड़की थी। स्कूल में टीचर उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। उसकी लंबी काली लटें, पतली कमर, गोरापन और चमकती आँखें देखकर लोग कहते थे — “ये तो साक्षात देवी लगती है।”

जब वो साड़ी पहनकर बाजार जाती, तो लोग मुड़-मुड़कर देखते। लड़के उसकी एक झलक पाने को तरसते। लेकिन खूबसूरती की अपनी कीमत होती है। रिश्ते बहुत जल्दी आने लगे। रागिनी के माता-पिता ने सोचा — “हमारी लड़की इतनी सुंदर है, अमीर घर में ब्याह दें तो उसका भला हो जाएगा।”

और ऐसा ही हुआ।

कुलदीप सिंह राठौड़ — जोधपुर के पास राठौड़ परिवार का सबसे बड़ा बेटा। अमीर, हट्टा-कट्टा, मूँछों वाला, पुरानी सोच वाला। उसका परिवार सच्चा राजपूत था। वहाँ औरतों को घूँघट के पीछे रहना, पुरुषों की सेवा करना और चुप रहना सिखाया जाता था। कुलदीप के माता-पिता ने रागिनी का रिश्ता देखा तो तुरंत हाँ कर दी। रागिनी की इच्छा पूछी भी नहीं गई। बस एक दिन उसके पिता ने आकर कहा — “बेटी, तुम्हारी शादी तय हो गई है। राठौड़ परिवार बहुत बड़ा और सम्मानित है।”

रागिनी चुप रही। उसके मन में डर था, लेकिन परिवार की इज्जत के आगे वो कुछ बोल नहीं पाई।

शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। हल्दी, मेहंदी, सांगरी — सब कुछ धूमधाम से हुआ। रागिनी की सहेलियाँ उसे चिढ़ाती रहती थीं।

सहेली 1: “रागिनी, तेरे पति तो बहुत मर्द लगते हैं। पहली रात में तुझे रुला देंगे!”

सहेली 2: (हँसते हुए उसके स्तनों को हल्के से दबाकर)

“ये छोटे-छोटे अंगूर देख रही है? तेरे पति इन्हें संतरे बना देंगे… एकदम नारंगी! तेरी इतनी घिसाई करेंगे कि तेरी चूत पर बाल कभी उगेंगे ही नहीं!”

सब जोर-जोर से हँस पड़ीं। रागिनी शर्मा गई, लाल हो गई और बोली,

रागिनी: “तुम लोग भी ना… बहुत नालायक हो!”

मेहंदी की रात में भी वही मस्ती चली। रागिनी की भाभियाँ और चाचियाँ उसे चिढ़ा रही थीं — “सुहागरात में सावधान रहना बेटी, राजपूत मर्द बहुत जोरदार होते हैं।”

रागिनी बस मुस्कुरा देती। उसे नहीं पता था कि उसकी जिंदगी का सबसे डरावना सपना सच होने वाला है।

शादी हो गई। रागिनी राठौड़ हवेली में आ गई। दो दिन तक रस्में चलीं — पगफेरा, मोहरे, विदाई। फिर आ गई वो रात — सुहागरात

रागिनी ने सोचा था कि कुलदीप से बातें होंगी, एक-दूसरे को जानेंगे, फिर धीरे-धीरे प्यार से सुहागरात मनाएंगे। उसने सुंदर लाल साड़ी पहनी, हल्का मेकअप किया, लंबा घूँघट निकाला और बेड पर बैठ गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

लेकिन कुलदीप दोस्तों के साथ शराब पीकर आया। कमरे में घुसते ही उसने बिना एक शब्द बोले रागिनी का घूँघट खींचकर फेंक दिया। रागिनी चौंक गई।

रागिनी: (डरते हुए) “कुलदीप जी… धीरे…”

कुलदीप ने कुछ नहीं सुना। उसने रागिनी की साड़ी एक झटके में खींच ली। ब्लाउज के हुक तोड़े, पेटीकोट उतारा और रागिनी को पूरी तरह नंगा कर दिया। रागिनी डर से काँप रही थी।

रागिनी: “प्लीज… धीरे… मुझे डर लग रहा है…”

लेकिन कुलदीप ने कोई ध्यान नहीं दिया। वो रागिनी पर टूट पड़ा। बहुत क्रूरता से, बिना किसी प्यार के, बिना किसी तैयारी के उसने रागिनी के साथ सेक्स किया। रागिनी दर्द से चीख उठी। उसकी चीखें पूरे कमरे में गूँज रही थीं।

हर राउंड 30-35 मिनट तक चलता। कुलदीप रुकता नहीं था। रागिनी के शरीर के हर छेद का इस्तेमाल किया — चूत, गांड, मुँह। रागिनी रोती रही, भीख माँगती रही, लेकिन कुलदीप नहीं रुका।

रात भर रागिनी को सोने नहीं दिया। हर 10 मिनट के ब्रेक के बाद फिर शुरू। सुबह होने पर भी कुलदीप ने उसे तब छोड़ा जब उसकी ताकत खत्म हो गई।

रागिनी की हालत खराब हो गई थी। उसका पूरा शरीर दर्द कर रहा था। नीचे से खून निकल रहा था। वो रात भर रोती रही।

सुबह रागिनी किसी तरह उठी। नहाई, मेकअप किया, जेवर पहने, मारवाड़ी पोशाक पहनी और लंबा घूँघट निकाल लिया। उसके पैर अभी भी काँप रहे थे। वो हल्की-हल्की लंगड़ाती हुई बाहर आई।

निकिता (जेठानी) और कोमल (ननद) कमरे में आईं। दोनों ने रागिनी की हालत देखी और हल्के से मुस्कुराए। निकिता ने कहा,

निकिता: “चलो भाभी, सासू माँ के पैर छूने चलें।”

रागिनी चुपचाप उनके साथ चली गई। उसके मन में सिर्फ शर्म और डर था। वो सोच रही थी — “ये मेरी जिंदगी है? रोज यही होगा?”


Chapter 2: रोज़ की क्रूरता और घर की परंपरा

सब मंदिर गए और रस्म-रिवाजों में रागिनी का दिन कट गया। लेकिन जैसे-जैसे शाम ढल रही थी, रागिनी के मन में कल रात का बुरा सपना फिर से घूमने लगा। “ये जल्लाद फिर आएगा… आज फिर मुझे नोचेगा…”

उसके पास कोई विकल्प नहीं था।

रात हुई। रागिनी फिर से लंबा घूँघट निकालकर बेड पर बैठ गई। हाथ काँप रहे थे। दिल में बस एक ही प्रार्थना थी — “भगवान, आज थोड़ी दया कर दो…”

थोड़ी देर बाद बाहर से पैरों की आहट आई। रागिनी समझ गई — जल्लाद आ रहा है। कुलदीप फिर शराब पीकर आ रहा था। उसकी चाल लड़खड़ा रही थी, लेकिन आवाज़ में वही पुराना गर्व था।

रागिनी ने तुरंत सने का नाटक किया। जैसे बहुत बुखार और थकान हो। जब कुलदीप कमरे में घुसा, तो रागिनी काँपते हुए बोली,

रागिनी: (बहुत डरते हुए, रोते हुए)

“कुलदीप जी… आज प्लीज… मुझे बहुत थकान लग रही है… सिर में तेज दर्द है… माँ की कसम… आज मत कीजिए… बस आज की रात छोड़ दीजिए…”

कुलदीप रुक गया। उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं।

कुलदीप: (गुस्से में)

“कसम? तू मुझे अपनी माँ की कसम दे रही है? तू मेरी बीवी है और मुझे कसम दे रही है?”

उसने रागिनी को जोर से बालों से पकड़ा और घसीटते हुए बेड के पाये के पास ले गया। रागिनी चीखी, लेकिन कुलदीप ने एक झटके से उसके कपड़े फाड़ दिए। रागिनी फिर से पूरी तरह नंगी खड़ी थी।

फिर कुलदीप ने उसकी आँखों पर एक मोटी काली पट्टी कसकर बाँध दी। अब रागिनी कुछ भी देख नहीं पा रही थी। अंधेरा छा गया था।

रागिनी: (रोते हुए) “नहीं… प्लीज… मुझे मत बाँधिए… बहुत डर लग रहा है…”

लेकिन कुलदीप ने कोई सुनने की इच्छा नहीं की। उसने रागिनी को बिस्तर पर पटक दिया और उसके दोनों हाथों को बेड के ऊपरी सिरहाने से रस्सी से कसकर बाँध दिया। फिर दोनों पैरों को बेड के नीचे वाले पायों से फैलाकर बाँध दिया।

रागिनी अब पूरी तरह बंधी हुई थी — नंगी, अंधी, हाथ-पैर फैले हुए, और बेबस। उसका शरीर बुरी तरह काँप रहा था। आँसू पट्टी के अंदर बह रहे थे।

कुलदीप ने उसके आँसू देखे, एक-एक करके पोंछे, और फिर मुस्कुराते हुए एक और दुपट्टा लिया। रागिनी के मुँह पर भी कसकर बाँध दिया। अब न उसकी चीखें बाहर जा सकती थीं, न आँसू दिख सकते थे।

कुलदीप: (ठंडी, क्रूर आवाज़ में)

“तूने कसम नहीं देनी चाहिए थी। तूने कहा था कि तेरी आँखों के सामने कपड़े न उतारूँ… देख, अब तुझे कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा है। अब तू बस महसूस कर… मैं क्या करता हूँ।”

और फिर शुरू हुई रागिनी की रगड़ाई — पलंगतोड़ चुदाई।

इस बार राउंड और भी लंबे और बेरहम थे। कल के 30 मिनट के राउंड आज 1 घंटे के बिना रुके चल रहे थे। कुलदीप रुकता ही नहीं था। रागिनी की साँसें फूल रही थीं। उसका शरीर बार-बार झड़ रहा था, लेकिन कुलदीप की ताकत खत्म नहीं हो रही थी।

रागिनी की दबी हुई चीखें दुपट्टे में दब रही थीं, लेकिन महल के अंदरूनी हिस्से में अभी भी गूँज रही थीं। उसका गला सूख गया था। वो पानी-पानी कर रही थी, लेकिन कुलदीप नहीं रुक रहा था।

पूरी रात रागिनी की दबी चीखें हवेली में गूँजती रहीं।

सुबह हुई। कुलदीप ने आखिरकार रागिनी के हाथ-पैर खोले। आँखों की पट्टी और मुँह का दुपट्टा अभी भी बँधा था। कुलदीप उसके बगल में गिरकर सो गया।

रागिनी किसी तरह उठी। आँखें खोलीं। शरीर में इतना दर्द था कि चलना भी मुश्किल हो रहा था। वो नहाई, कपड़े बदले, मेकअप किया, जेवर पहने और लंबा घूँघट निकाल लिया।

वो थोड़ी देर आराम करने के लिए लेटी ही थी कि निकिता (जेठानी) कमरे में आ गई।

निकिता: (हल्के से मुस्कुराते हुए)

“भाभी, बिंदी सती ही रहेगी क्या? चल जaldi, आज तू सबको चाय पिलाएगी।”

रागिनी आधी नींद में, थकी हुई, सिर घूम रहा था। फिर भी घूँघट की आड़ लेकर कमरे से बाहर आई। सास, जेठानी, ससुर — सबके पैर छुए। फिर रसोई में चाय बनाने लगी।

तभी कुलदीप भी मूँछों पर ताव देते हुए आया और बोला,

कुलदीप: “चाय मिल जाएगी क्या?”

वो अपने पिता ओम सिंह के पास बैठ गया। ओम सिंह ने हँसते हुए कहा,

ओम सिंह: “तू जaldi उठ गया? सुबह तक तो तेरे कमरे की चीखें आती रही थीं। थोड़ी बहुत आराम भी कर लिया कर। एक काम कर — आज दिन में आराम कर, काम पर मत जा।”

दोनों बाप-बेटे जोर से हँस पड़े।

रागिनी हल्की लंगड़ाती हुई चाय दे रही थी। सुनीता और निकिता एक-दूसरे को देखकर धीरे से बोलीं,

सुनीता: (धीमी आवाज़ में)

“ये कुलदीप तो बिल्कुल जल्लाद है… मासूम सी बिंदी की जान ले रखी है। इसे कुछ दिन मायके भेज देते हैं।”

निकिता ने सिर हिलाया और फुसफुसाकर कहा,

निकिता: “हाँ सासू माँ… बेचारी की हालत देखिए… चल नहीं पा रही है।”

रागिनी ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप चाय परोसती रही। उसके मन में सिर्फ एक ही सवाल बार-बार घूम रहा था —

“क्या मेरी जिंदगी हमेशा यही दर्द, यही शर्म और यही चीखें लेकर गुजरेगी?”

Chapter 3: बीमारी का आगमन और डॉक्टर का फैसला

रागिनी को कुछ दिन के लिए मायके भेज दिया गया। सुनीता ने कहा था, “बिंदी को थोड़ा आराम की जरूरत है।” रागिनी अपनी माँ के घर पहुँची तो सहेलियाँ चारों तरफ से घेरकर बैठ गईं।

**सहेली 1:** (हँसते हुए)  

“अरे रागिनी! सुहागरात में क्या-क्या हुआ? बताना तो!” 

**सहेली 2:** (उसके स्तनों को हल्के से दबाकर)  

“देखो तो, कुलदीप ने तो कुछ ही दिनों में अंगूर को संतरे बना दिया! लगता है अगली बार आने पर संतरे तरबूज बन जाएंगे!”


जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है!
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