Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

Crossdressing Story Ankit To Ankita : Husband s Transformation by wife | Beingfaltu Anita

📝 Story Preview:

🔸 क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी ने आपकी पहचान ही छीन ली… तो आप क्या करेंगे?


🔸 क्या बदला लेने के लिए किसी की ज़िंदगी पूरी तरह बदल देना सही है?


🔸 क्या प्यार में धोखा खाने के बाद… क्या कोई इंसान इतना बदल सकता है कि वो खुद एक तूफ़ान बन जाए?


🔸 और सबसे बड़ा सवाल — क्या एक लड़का, लड़की बनकर अपनी असली पहचान खो सकता है?

अगर जानना चाहते हैं इन सवालों के जवाब…

तो बने रहिए मेरे साथ, अनीता के साथ!


नमस्ते दोस्तों… मैं हूँ अनीता!यह कहानी है — प्यार, अपमान, बदला… और पहचान की।


कॉलेज का वह बरस, जब हर कोने में नई कहानियाँ जन्म लेती थीं—किसी की किताबों में, किसी की मुस्कान में, किसी की आँखों की शरारत में। उसी बरस के बीचोंबीच, अं‍कित मेहरा नाम का लड़का पूरे कैंपस की धड़कन था।


लंबा कद, बेपरवाह चाल, और चेहरे पर वह मुस्कान जो हर दूसरी नज़र को ठहर जाने पर मजबूर कर दे। उसके लिए ज़िंदगी किसी रोम-कॉम फिल्म जैसी थी—जो आज है, वही असली है; कल कौन देखे!

क्लास में नोट्स से ज़्यादा दोस्ती, और गंभीर विषयों की जगह मज़ाक का साम्राज्य। हर कोई जानता था कि अंकित किसी से भी बात कर सकता है, किसी को भी हँसा सकता है, और हाँ—किसी पर भी फ्लर्ट कर सकता है।


दूसरी ओर थी अनिता शर्मा—एकदम उलट किरदार।

पढ़ाई में तेज़, भाषा में सधी हुई, और अनुशासन में सख्त। दो चोटी, चश्मा, सलवार-कमीज़ के दुपट्टे में पिन लगी हुई सादगी—लोग उसे “टॉपर टाइप” कहकर पुकारते थे। वह बोलती कम थी, पर जब बोलती थी, तो सामने वाले को सोचने पर मजबूर कर देती थी।


उस दिन की दोपहर में कैंपस की सबसे शांत जगह—कॉलेज लाइब्रेरी—जहाँ हवा भी धीरे बहती थी, अचानक शोर से भर गई।

अंकित अपने दोस्तों के साथ धड़धड़ाते हुए अंदर आया, “अरे यार वो इकोनॉमिक्स की किताब कौन सी थी, जो शर्मा सर ने कही थी?”

दोस्त हँसते-फुसफुसाते, एक शेल्फ से दूसरी शेल्फ तक किताबों की ढेर में कोलाहल मचा रहे थे।

किताबें, जो अब तक पन्नों की सरसराहट से गुनगुना रही थीं, शोर में चुप हो गईं।


उसी टेबल पर, खिड़की के पास, अनिता बैठी थी—पलकों पर घनी तल्लीनता, पन्नों में डूबी हुई। अंकित की निगाहें फिसल गईं उसकी ओर।

“वाह, स्कूल की याद आ गई!” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “दो चोटियाँ, सलवार-कमीज़... ये कॉलेज है या फिर ट्यूशन क्लास?”

दोस्त ठहाके लगाने लगे। अंकित को यह छोटी-सी टिप्पणी एक न harmless मज़ाक लगी।


लेकिन अगले ही पल एक तेज़ आवाज़ गूंजी—

थम्!

पूरा हॉल जैसे जम गया।

अंकित के गाल पर अनिता का वह थप्पड़ बज चुका था—नाप-तौल कर, बिना डर, बिना हिचक।


“शोर मचाने आए हो तो बाहर चले जाओ,” वह बोली, स्वर में ऐसी दृढ़ता कि जैसे वह खुद लाइब्रेरी की मर्यादा हो।


अंकित के लिए यह एक अनसोचा पल था। जिसने अब तक हर बातचीत में खुद को ‘विजेता’ माना हो, उसके लिए यह एक झटका था—ego पर सीधा वार।


लाइब्रेरियन दौड़ी चली आईं, सबकी नज़रे अंकित पर थीं। दोस्त भी सन्न।

“बाहर जाओ सब! अभी!”

अंकित दबे पाँव बाहर निकल गया, चेहरे पर अब भी थप्पड़ की गर्मी और भीतर आग की लपटें।


उस रात उसने दोस्तों से कहा, “देख लेना, इस लड़की को मैं उसकी औक़ात याद दिला दूँगा।”


अगले दिन सुबह, लाइब्रेरी के बाहर वही अंकित खड़ा था—पर इस बार चेहरे पर हँसी नहीं थी, बल्कि एक तरह की हैरान कर देने वाली शांति।

जब अनिता बाहर निकली, तो उसने धीरे से कहा,

“सॉरी, कल बहुत बुरा बोल गया था।”


अनिता कुछ पल तक उसे देखती रही—शायद उसे शक था कि यह कोई नया नाटक है।

पर अंकित के स्वर में कोई बनावट नहीं थी।

“ठीक है,” उसने छोटा-सा जवाब दिया, और चली गई।


दिन बीतने लगे। अंकित अब वही नहीं रहा। उसने धीरे-धीरे दोस्तों का संग छोड़ दिया। वही जो लाइब्रेरी में कभी शोर मचाता था, अब सुबह-सुबह वहाँ चुपचाप किताबें खोजता मिला करता।

अनिता ने भी एक दिन पूछा, “तुम सच में पढ़ने लगे हो या ये कोई नया ड्रामा है?”

अंकित हँसा, “शायद अब मुझे किताबों की असली ताकत समझ में आने लगी है।”


धीरे-धीरे दोनों की बातों का सिलसिला शुरु हुआ—पहले नोट्स का आदान-प्रदान, फिर हल्की-फुल्की बातचीत।

एक दिन अनिता ने ही कहा, “चाय पी लोगे?”

उस दिन से लाइब्रेरी के बाद चाय का छोटा-सा ठेला उनकी मुलाकातों का नया ठिकाना बन गया।


फिर एक दिन नंबर एक्सचेंज हुए।

दोस्ती का सफ़र शुरू हो गया—धीमा, सधा हुआ, पर कुछ ऐसा जो दोनों को भीतर से बदलने लगा।


कहते हैं, हर रिश्ता किसी न किसी परीक्षा से होकर गुजरता है।

अंकित और अनिता की कहानी में परीक्षा तो शुरू से थी—बस अनिता को खबर नहीं थी कि वह इम्तिहान किसी और ने तय किया है।


दोनों की दोस्ती अब मीठी आदत बन चुकी थी। लाइब्रेरी के कोने से शुरू हुई बातें अब कैंपस की हर गली में गूंजने लगी थीं।

कॉफी कपों के बीच हँसी, क्लास बंक कर फिल्मों की बातें, और कभी–कभार एक-दूसरे पर हँसी-मज़ाक—इन सबमें अनिता का वो गंभीर और सधा हुआ स्वभाव धीरे–धीरे पिघलने लगा।


अनिता जो पहले हर बात सोच–समझकर करती थी, अब अंकित की मुस्कान देखते ही निर्णय बदल देती।

पढ़ाई, जो कभी उसकी पहली प्राथमिकता थी, अब पीछे छूटने लगी।

वह अपने नोट्स से ज़्यादा अब अंकित के मूड पढ़ने लगी थी।


और अंकित?

वह भीतर ही भीतर एक अजीब-सी संतुष्टि महसूस करने लगा—मानो वो ताश के पत्ते जिस तरह चाह रहा था, वैसा ही बिछ रहा था।


शुरुआत में उसने बस हँसी–मज़ाक में अनिता से कहा था, “तुम्हें थोड़ा अपडेट होना चाहिए।”

“क्या मतलब?”

“मतलब ये सलवार–कमीज़ से बाहर भी एक दुनिया है, जो तुम्हारे लिए ही बनी है।”


अनिता ने मुस्कुरा कर टाल दिया, मगर कुछ दिनों बाद अंकित ने उसे एक गिफ़्ट पैक दिया।

अंदर एक खूबसूरत लेकिन बेहद मॉडर्न पार्टीवियर सलवार–कमीज़ थी।

“प्लीज़, कल ये पहन कर आना। कस्म है मेरी,” अंकित बोला।


अनिता झिझकी, “नहीं, लोग क्या कहेंगे?”

“लोग तो कुछ भी कहेंगे, मुझे तो बस तुम अलग दिखो,” अंकित ने हल्का-सा मज़ाकिया अंदाज़ अपनाया, पर उसकी आँखों में जिद थी।


अगले दिन अनिता कॉलेज पहुँची तो सबकी निगाहें उसी पर ठिठक गईं।

उसके चेहरे पर झेंप थी, पर अंकित की मुस्कान में जीत।


धीरे–धीरे यही “फैशन प्रयोग” एक नियमित खेल बन गया।

हर कुछ दिन में नया कपड़ा, नया स्टाइल, नया रूप।

पहले सलवार–कमीज़, फिर पलाज़ो, फिर जीन्स, और आख़िर में स्कर्टें।

अनिता के सादे बाल अब हाईलाइटेड कर्ल में बदल चुके थे।

सरल चप्पल अब ऊँची हील्स में, हल्का काजल अब पूरे मेकअप किट में।


वह खुद को पहचानना बंद करने लगी थी—पर प्यार के नाम पर हर विरोध उसकी ज़ुबां तक आने से पहले ही रुक जाता।


घर पर उसे डाँट पड़ती—

“ये क्या पहनावा है?”

“अब हमारे संस्कार ऐसे दिखेंगे?”

पर वह बस मुस्कुराती और कहती, “अगली बार सब ठीक रहेगा।”

हालाँकि, अगली बार कभी ठीक नहीं हुआ।


फिर एक दिन, जब उसके पास कहने को बाकी कुछ न रहा, उसने आँसुओं के साथ अंकित से कहा—

“आई लव यू।”


अंकित चुप रहा।

थोड़ी देर बाद उसके होंठों पर वही पुरानी, ठंडी मुस्कान आई।

“याद है वो थप्पड़?” उसने धीरे से कहा।

अनिता सन्न रह गई।


अंकित ने कहा—

“आज जो कुछ हुआ, वो प्यार नहीं था, बदला था। वो थप्पड़... अब चुका दिया।”


वह मुड़ गया।

अनिता की दुनिया वहीं रुक गई।


उस रात उसने आईने में खुद को देखा—

उन कर्ल वाले सुनहरे बालों में वो सादगी नहीं थी, आँखों में वो आत्मविश्वास नहीं था।

उसने अपने आँसू पोंछे और पहली बार अपने आप से कहा—

“अब बस।”


प्यार के दर्द ने उसे तोड़ा नहीं, गढ़ दिया।

उसने खुद को फिर से समेटा, अपने अंदर की वही दृढ़ विद्यार्थी को जगाया।

दिन रात मेहनत की।

और एक दिन—वो सारे इंटरव्यू पार कर एक MNC में मैनेजर बन गई।


ये जीत सिर्फ़ करियर की नहीं थी, आत्म-सम्मान की भी थी।


लेकिन ज़िंदगी जब सोचती है कि कहानी ख़त्म हो गई, तभी एक नया अध्याय खोल देती है।


पहले दिन ऑफिस में फाइलें देखती अनिता ने मीटिंग कॉल पर नज़र डाली—

“जूनियर प्रोजेक्ट असिस्टेंट : Ankit Mehra.”


उसे लगा जैसे वक़्त ने पुराने पन्ने फिर से उसके सामने रख दिए हों।

वो दरवाज़ा खुला, और सामने वही चेहरा था—कभी उसका दुनिया लूट चुका, अब उसके अधीनस्थ कर्मचारी की तरह खड़ा।


अंकित की आँखों में अब वही आत्मविश्वास नहीं था।

वक्त ने भूमिकाएँ बदल दी थीं—

अब अंकिता बॉस थी, और अंकित जवाब देने वाला।


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ऑफिस की काँच की दीवारों के उस पार दिन की व्यस्तता चल रही थी—लैपटॉप क्लिक कर रहे थे, प्रोजेक्ट रिपोर्टें खुलतीं, और कॉफी मशीन लगातार भनभना रही थी।

उसी रूटीन में, सोमवार की सुबह पहली मीटिंग के बाद अनिता ने दरवाज़े पर खड़ा एचआर असिस्टेंट बुलाया।

“मिस्टर अंकित मेहरा को कहना, मीटिंग के बाद मेरे केबिन में आएं।”


दरवाज़ा बंद होता है।

अंकित अंदर आता है—काला फॉर्मल सूट, टाइम से न आ सकने वाली ढीली टाई, और आँखों में वो हल्की-सी बेचैनी जो पुराने परिचय का बोझ लिए हुई थी।


अनिता ने बिना देर किए कहा,

“आराम से बैठिए।”

उसका स्वर ठंडा नहीं था, लेकिन बेहद नियंत्रित।


कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद उसने सीधा कहा—

“अंकित, मुझे पता है तुम मुझे पहचान गए हो। और मैं भी तुम्हे। लेकिन अब हम दोनों यहाँ प्रोफेशनली जुड़े हैं। जो हुआ, वो बीत चुका है।”

वह थोड़ी देर रुकी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली,

“कभी सोचा नहीं था कि वही अतीत जो मुझे तोड़ गया, वही आज मुझे इतना मज़बूत बना देगा। सच कहूँ तो, मुझे तुम्हारा शुक्रिया अदा करना चाहिए। तुमने उस ‘गाँव की बहनजी’ को, जिसे मज़ाक उड़ाने का सामान समझा था, एक आत्मनिर्भर महिला बना दिया। आज मेरे पास सब कुछ है—अपनी पहचान, अपना घर, अपनी कार, और शायद सबसे अहम, निर्णय लेने की हिम्मत।”

वह फाइल बंद करती है, “तो अब बस इतना तय मानो—हम दोनों अपने-अपने काम पर ध्यान देंगे और आगे बढ़ेंगे। यही मेरी expectation है।”


अंकित सिर्फ “जी, मैम” बोल सका।


दिन बीतने लगे।

अनिता अब वही सधी हुई, सख्त पर निष्पक्ष मैनेजर थी।

वह अपनी टीम के काम पर शार्प नजर रखती। गलती पर डांटती तो थी, लेकिन सही काम पर खुले दिल से तारीफ़ भी कर देती।

टीम उसे कभी “सख्त बॉस” कहती, कभी “परफ़ेक्ट प्रोफेशनल।”

वो सबकी नज़रों में आदर्श थी—सिवाय अंकित के।


अंकित के अंदर का वही बेपरवाह कॉलेज वाला लहजा अब भी नहीं मरा था।

फाइलें देर से जमा करना, मीटिंग में मज़ाक करना, किसी से भी हल्के-फुल्के कमेंट्स कर देना—ये सब उसकी पुरानी आदतें थीं जो नौकरी की दीवारों से टकरा रही थीं।


और एक दिन वही हुआ जिसका डर सबको था।


एक नए प्रोजेक्ट पर, टीम की एक लड़की ने अचानक सबके सामने अंकित को एक थप्पड़ मार दिया।

वजह—उसकी अनुचित टिप्पणी।


ऑफिस में सन्नाटा छा गया। सारे चेहरे अनिता की तरफ़ मुड़े—अब क्या होगा?

कुछ घंटों बाद एचआर के साथ अनिता ने फाइनल डिसीजन लिया।

“अनुशासन तोड़ने की कोई जगह नहीं है—न दोस्ती, न पहचान।”

और उसी वक़्त अंकित की termination letter जारी कर दी गई।


अंकित के लिए यह झटका केवल नौकरी का नहीं, आत्मसम्मान का भी था।

जिस औरत को कभी वो हल्के में लेता था, आज वही उसके भविष्य का फैसला कर रही थी।


वो ऑफिस से निकला, सिर झुकाए, पर मन में पुराने समय का सैलाब उमड़ रहा था।


कुछ ही हफ्ते बीते थे।

कंपनी के गलियारों में एक दिन खबर फैल गई—

“मैम शादी कर रही हैं... और दूल्हा... अंकित मेहरा!”


सब अवाक् रह गए।

जिस इंसान को हाल ही में उन्होंने ऑफिस से निकाला था, वही अब उनकी बॉस का जीवनसाथी बनने जा रहा था।


लोग अटकलें लगाने लगे—

क्या यह माफ़ी थी?

या दया?

या शायद एक और प्लान?


लेकिन सच्चाई किसी को नहीं पता थी।


असल में, नौकरी से निकालने के बाद अंकित कुछ समय तक भटका, फिर खुद को बदला—वाकई बदला।

उसने वह ग़लतियाँ सुधारीं जो कभी उसकी शान थीं, अब शर्म लगने लगीं।

उसी बीच उसने अनिता से मुलाकात की—ना ग़ुस्से से, ना अहम से, केवल सच्चे पछतावे और आदर से।

और शायद अनिता ने उसी जुनून के पीछे वह इंसान देखा, जिसे वह कभी प्यार करती थी—

अब वही भाव, लेकिन पूरी समझदारी और बराबरी के साथ।


उन दोनों ने जब शादी की, तो अंकित को लगा के यह कहानी का अंत है 

लेकिन शायद यह तो असल शुरुआत थी—जहाँ  नफरत बदला और ताकत और जोर आजमाइश अभी बाकी थी और अनीता का असली रूप अंकित को देखना बाकी था 


रात शांति में डूबी हुई थी—मंद रोशनी वाले कमरे में फूलों की हल्की खुशबू फैल रही थी, और बाहर कहीं दूर बारात के ढोल की थकी हुई प्रतिध्वनि अब भी गूंज रही थी।

यह उनकी शादी की पहली रात थी।


अनिता लाल जोड़े में सजी, सजग और संयत बैठी थी। उसका चेहरा पट की तरह शांत था, पर उसकी आंखों में जैसे कोई रणनीति टिकी हो—वह अब वह मासूम कॉलेज वाली लड़की नहीं थी।


अंकित दरवाज़े से भीतर आया। महंगे सूट की सिलवटें बता रही थीं कि वह इस रात की तैयारी में नहीं, उलझन में था। हाथ में दूध का गिलास और चेहरे पर झूठी मुस्कराहट।


अनिता ने धीमे स्वर में कहा,

“रसमों के हिसाब से पहले मुंह दिखाई होती है, फिर दूध।”


अंकित ने सिर झुका लिया।

“गिफ़्ट... हाँ, वो मैं लाना भूल गया,” उसने बेमन से कहा।

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने जैसे दर्द और हताशा को हँसी में बदलने की कोशिश की—

“क्या बताऊँ, तुम्हारी वजह से नौकरी गई, बचत भी खत्म हो गई, और अब तुम्हारे स्तर तक पहुँचने के लिए कर्ज़ में डूब गया हूँ। तो फिलहाल, कोई तोहफ़ा नहीं है।”


अनिता ने बिना भाव बदले कहा,

“अच्छा... तो कर्ज़ कितना है?”


अंकित ने चौंक कर देखा।

“दस लाख,” वह बुदबुदाया।

अनिता ने धीरे-धीरे अपना घूंघट थोड़ा पीछे किया।

“तो फिर एक काम करो, मेरी जगह ये घूंघट तुम ओढ़ लो। शायद मुंह दिखाई में मैं ही तुम्हें दे दूँ।”


अंकित पहले तो हँस पड़ा, फिर उसके शब्दों का अर्थ उसके भीतर उतर गया।

“क्या मतलब?”


अनिता की आंखों में चमक कौंधी—वह वही टोन था जो वह ऑफिस में इस्तेमाल करती थी, जब किसी डील को अपनी शर्तों पर मोड़ती थी।

“मतलब सीधा है, अंकित। अगर तुम पति की जिम्मेदारी नहीं निभा सकते, तो जीवनसाथी की निभाओ। रिश्ते में ऊँच–नीच नहीं, बराबरी होती है। मैं बाहर कमाऊँगी, तो घर में कुछ जिम्मेदारी तुम्हें उठानी होगी। और अगर कभी रोल बदलने की ज़रूरत पड़े—तो हिचकना मत। जीवनसाथी वही जो निभा सके।”


कमरे में भारी ख़ामोशी छा गई।

अंकित के माथे पर हल्की पसीने की नमी थी।

उसके मन में विचारों का तूफ़ान चल रहा था—क्या यह बस एक व्यंग्य था, या कोई प्रस्ताव?


वह बोला, “क्या सचमुच तुम ऐसा सोचती हो?”


अनिता ने शांत स्वर में जवाब दिया,

“मैं बस इतना सोचती हूँ कि अब कोई भी रिश्ता एकतरफा नहीं होगा। मैं साझेदारी चाहती हूँ—किस काम में कौन आगे या पीछे, वो वक्त तय करेगा, अहंकार नहीं।”


अंकित कुछ देर तक खामोश बैठा रहा।

शायद पहली बार उसे समझ आ रहा था कि यह लड़की अभी भी वही अनिता है—लेकिन अब उसके पास दिल के साथ दिमाग भी है, और संतुलन की अद्भुत क्षमता भी।


“मुझे सोचने का समय दो,” उसने धीरे से कहा।


अनिता ने सिर हिलाया, “ले लो। जब तक सोच लो, तब तक नियम simple है—honeymoon बाद में, सोच पहले। और आज रात तुम ज़मीन पर लेटोगे, क्योंकि जगह तय करनी है—समानता की।”


उसने अलमारी से एक तकिया और चादर निकालकर उसकी ओर बढ़ा दी।

खुद बिस्तर पर जा कर शांत लेट गई, बिना किसी तना–तनी के, जैसे हर भाव पहले से नियंत्रित हो।


अंकित ने आख़िरी बार उसकी तरफ़ देखा—वह वही लड़की थी, जिसे वह कभी बदल देने का दावा करता था, और जो अब उसे बदलने पर मजबूर कर रही थी।


लाइट बंद हुई, कमरे में अंधेरा फैला, और पंखे की आवाज़ में सिर्फ़ एक बात गूंज रही थी—

कुछ कर्ज़ पैसे के नहीं होते, कुछ आत्मसम्मान के भी चुकाने पड़ते हैं।


और उस रात अंकित पहली बार सचमुच सोचने लगा।


रोज़ का वही क्रम बन गया था—अंकित ज़मीन पर, अनिता बिस्तर पर।

शादी के उत्सव मिट चुके थे, घर की दीवारों पर लगे फूल सूख गए थे, और अब बस सन्नाटा था—घड़ी की टिक‑टिक और टीवी की आवाज़।


अनिता हर सुबह अपने व्यवस्थित ऑफिस वाले अंदाज़ में निकल जाती—साड़ी के पल्लू की सटी हुई प्लेटें, फाइलों का थैला, और समय के प्रति वही अटल अनुशासन।

अंकित, जिसका कभी सुबहें कॉफी और गपशप से शुरू होती थीं, अब आधा दिन टीवी के चैनल बदलते हुए गुज़ार देता था। जिन हाथों से वह कभी लोगों को हँसाता था, अब वही हाथ धीरे‑धीरे थकने लगे थे।


कुछ हफ्तों बाद, वह खबर लेकर घर आया—

“फिर से नौकरी चली गई।”

वह कहने की कोशिश कर रहा था कि परिस्थिति उससे बाहर है, लेकिन अनिता ने बस सिर हिलाया, कोई टिप्पणी नहीं।


धीरे‑धीरे घर के भीतर हवा भारी होती गई।

अंकित के माँ‑बाप गाँव लौट गए, और अब इन दीवारों के बीच बस दो लोग रह गए—एक जो स्थिर था, एक जो बिखर रहा था।


एक दिन जब अनिता ऑफिस से लौटी, दरवाज़े पर उसे डर का गंध मिला—पट्टियाँ, बिखरे हुए बाल, और फटी हुई शर्ट।

अंकित घायल था।

उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में शर्म, और स्वर में टूटन।

“...उसी ग़ुंडे के आदमियों ने मारा। पैसे नहीं दे पाया समय पर...।”

वह किसी राहत की उम्मीद में अनिता को देख रहा था—शायद वो कहेगी ‘कितना चाहिए, मैं चुका देती हूँ’, लेकिन उसने बस टेबल से पानी का ग्लास उठाकर उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।


“पानी पी लो, और आराम करो।”

बस इतना कहा, और लैपटॉप पर अपनी मीटिंग शुरू कर दी।


अगले दिनों में अंकित के मन में दर का बीज गहराता गया। बाहर की आहट उसे आतंकित करती। हर खटखटाहट पर उसे लगता कि वही लोग लौट आए हैं। धीरे‑धीरे वह बाहर निकलना बंद कर बैठ गया—लाइटें बंद, पर्दे खींचे हुए, फोन स्विच ऑफ़।


अनिता सब देखती रही—बेहद शांत, जैसे किसी केस‑स्टडी को देख रही हो।

वह जानती थी कि यह डर केवल ग़ुंडों का नहीं, बल्कि ज़िंदगी का था—उस ज़िंदगी का जो पहले कभी उसके लिए खिलौना मात्र थी।


और फिर भय ने स्वरूप बदला।

एक शाम खिड़की पर पत्थर गिरा—काग़ज़ बंधा हुआ था: “पैसे दे, वक़्त निकल रहा है।”

अंकित के हाथ काँप गए। उसने दरवाज़े बन्द कर लिए।

फिर कुछ दिनों पश्चात वे लोग वास्तव में दरवाज़ा खटखटाने लगे।


उस दिन अनिता घर पर थी।

“कौन है?” उसने दृढ़ आवाज़ में पूछा।

दरवाज़ा खुलते ही तीन आदमी भीतर आ गए।

उन्होंने बिना किसी भूमिका के अंकित को पकड़ लिया, गालियाँ दीं, थप्पड़ मारे।

“एक हफ़्ता और—वरना अंजाम तुम जानते हो,” कहकर चले गए।


अनिता पूरे समय चुप रही।

अंकित ज़मीन पर बैठा हाँफ रहा था, और अनिता बस फाइल सँवारते हुए बोली,

“थोड़ा पानी पी लो।”


वह न शिकायत करती, न दया दिखाती—जैसे किसी अदृश्य परीक्षा का समय तय हो।


कई दिन बाद, जब अंकित का डर चरम पर पहुँच गया, वह मुश्किल से मोहल्ले की दुकान गया था। रास्ते में वही लोग फिर प्रकट हुए। इस बार बीच सड़क पर उसकी पिटाई हुई। वह किसी तरह भाग कर घर आया। उसके चेहरे पर खून और आत्मसम्मान दोनों एक साथ बह रहे थे।


इसके बाद उसने बाहर जाना स्थायी रूप से छोड़ दिया।

दिन भर खिड़कियाँ बन्द, रोशनी बन्द; और अनिता उसी नियमित ताल में ऑफिस, डिनर, नींद।


आख़िर एक सुबह, जब वह सब कुछ खो चुका था—नौकरी, आत्मविश्वास, हिम्मत—वह अनिता के पास आया।

घुटनों के बल बैठकर बोला, “मुझसे गलती हुई अनिता, बहुत बड़ी गलती। मुझे बचा लो। मैं सब मानता हूँ... जो कहोगी वही करूँगा, बस इन हालात से निकाल दो।”


अनिता ने उसकी तरफ़ देखा, और बिना बोले अपना बैग उठाया—

“मैं देर कर रही हूँ, मीटिंग है।”

वह निकल गई।


अंकित अवाक् खड़ा रह गया।


उसी दिन दोपहर में दरवाज़े की घंटी बजी।

वह समझा शायद अनिता लौटी है।

दरवाज़ा खोला—भिखारी था।

लेकिन अगले ही पल वह भिखारी नहीं, वही ग़ुंडे थे।

वे भीतर घुसे और उसे इतना मारा कि शब्द भी टूट गए।


शाम को, जब अनिता लौटी, कमरे में पड़ी टूटी हुई कुर्सियाँ देखीं और धीरे से उसके पास पहुँची।

अंकित फर्श पर बैठा, कपड़ों में धूल, आँखों में आतंक।

उसने बढ़ते ही अनिता के पैर पकड़ लिए—

“अब नहीं सह सकता... बचा लो मुझे... कृपया...”


अनिता धीरे से सोफ़े पर बैठ गई।

उसकी आवाज़ में न गुस्सा था, न दया—बस असाधारण स्थिरता।


अंकित फूट‑फूट कर रो रहा था।

वह जान गया था कि अब यह वही औरत नहीं जो कभी उसके इशारों पर बदला करने निकली थी,

वह अब दर्पण बन चुकी थी—जिसमें उसे खुद का सारा दोष नंगा दिखाई दे रहा था।


उस रात अनिता ने बस इतना कहा था—

“कल ऑफिस आकर पैसे ले जाना।”

जैसे किसी बैंक का क्लर्क हो, जिसने समाज या रिश्ते का कोई बोझ महसूस न किया हो।


अंकित ने अगले कई घंटों तक वही वाक्य मन में दोहराया।

अब बस एक ही काम बचा था—सुबह जाकर पैसे लेना, और फिर उसकी सारी मुसीबत खत्म।

कितने दिनों बाद उसे चैन से नींद आई थी—नींद जो उम्मीद से भरी थी।


सुबह की धूप खिड़कियों पर चढ़ चुकी थी, लेकिन आज वह समय से नहीं जागा।

जब आँख खुली, अनिता जा चुकी थी।

तन में हल्कापन था, पर मन में चिंता—अब उसे खुद अकेले जाना होगा।

वो रास्ता जो पहले भी उसके लिए डर का पर्याय बन चुका था।


हिम्मत जुटाकर वह घर से निकला, लेकिन डर अब भी पीछा कर रहा था।

सामने कुछ जाने‑पहचाने चेहरे—उन्हीं लोगों के।

उन्होंने बिना कोई सवाल किए उसे पटक दिया, कुछ वार किए।

अंकित बस इतना ही बोल पाया, “मैं पैसे लेने जा रहा हूँ… आज ही मिल जाएँगे।”


उनमें से एक ने हँसते हुए कहा, “ठीक है, आज जा—but याद रखना, अगली बार नहीं छोड़ेंगे।”

पर जाते‑जाते उसकी जेबें खाली कर दीं—पर्स, मोबाइल, सब।

सड़क पर नंगे पैरों चलना अब मजबूरी था।


वह किसी तरह अनिता के ऑफिस तक पहुँचा—धूप, धूल और अपमान के बीच।

गेट पर गार्ड ने उसे रोका।

“मैडम मीटिंग में हैं, बिना पास भीतर नहीं जा सकते।”


अंकित ने बहुत विनती की, पर हर शब्द दीवार से टकरा कर लौटता रहा।

दोपहर से शाम तक वह वहीं बैठा इंतज़ार करता रहा—पथरीले फर्श पर, बदन में दर्द और मन में राहत की कल्पना।

जब शाम हुई, अनिता गाड़ी में निकल गई—सीधी, दृढ़, जैसे कुछ भी असामान्य न हो।

गाड़ी के शीशे से उसकी नज़र भी नहीं पड़ी।


अंकित वहीँ खड़ा रह गया—सड़क की लाइट आंखों में चुभ रही थी, और आशा का आखिरी धागा भी कहीं पीछे टूट गया था।

थका‑हारा वो घर पहुँचा, देखा—अनिता पहले ही लौट आई थी और चैन से सो रही थी।

उसे जगाने की हिम्मत नहीं हुई। पेट में भूख थी, पर नींद भारी।

ज़मीन पर लेटते ही सो गया।


अगली सुबह—अनिता फिर ऑफिस जा चुकी थी।

अब न मोबाइल, न पैसे, न हिम्मत… पर गली के मोड़ पर छिपा डर अब भी वही था।

उसने एक फोन बूथ से कॉल किया, “अनिता, गार्ड से कह दो कि मैं आने वाला हूँ।”

और जैसे ही रिसीवर रखा, डर सच हो गया—वही चेहरे, वही वार।


अबकी बार अपमान ने हदें पार कर दी थीं।

सड़क पर गिरा अंकित अब किसी पहचान के लायक नहीं लगा।

कपड़े फटे, बदन घायल, आत्मा थकी—वह किसी तरह ऑफिस पहुँचा, पर वहाँ खबर मिली—

“मैडम आज घर पर हैं, तबियत ठीक नहीं।”


वह डगमगाता हुआ घर की ओर लौटा।

दरवाज़े पर वही स्थिर दृश्य—टीवी पर कोई सीरियल चल रहा था, अनिता सोफ़े पर आराम से बैठी थी।

अंकित की हालत देखकर उसने बस इतना कहा,

“क्या भीख माँगना शुरू कर दिया है? ये क्या हाल बना रखा है?

पहले जाकर नहा लो, कपड़े बदलो, फिर बात करना। बहुत बदबू आ रही है।”


उसकी आवाज़ सपाट थी—न गुस्सा, न हैरानी, बस आदेश‑सी।


अंकित कुछ पल उसे देखता रहा।

उसकी आँखों में अब शर्म नहीं रह गई थी, न तर्क।

वह दरवाज़े के पास टिक गया—थका, टूटा, और भीतर से खाली।


अंकित नहा-धोकर कमरे से निकला तो बदन पर ताज़गी थी, लेकिन मन पर भारीपन। कपड़े बदलते हुए उसने आईने में खुद को देखा—आँखों के नीचे थकान, चेहरे पर अनकही डर की लकीरें। वह आकर अनिता के सामने सोफ़े पर बैठ गया।

अनिता लैपटॉप खोले बैठी थी। बिना नज़र उठाए उसने संक्षेप में कहा, “मेरी ऑफिस की मीटिंग है,” और फिर अपने काम में डूब गई।


कमरे में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई। मिनट बीतते रहे। मीटिंग खत्म हुई तो अंकित कुछ कहने को हुआ, पर अनिता ने हाथ के इशारे से उसे चुप करा दिया।

अंकित का दम घुटने लगा। अंदर का डर, अपमान और बेबसी मिलकर उसे खा रहे थे। जब और बर्दाश्त न हुआ, तो वह लगभग टूटते हुए बोला,

“प्लीज़… मेरी मदद कर दो। मैं सब कुछ करूँगा, जो तुम कहोगी।”


अनिता ने पहली बार उसकी तरफ देखा। न आँखों में नरमी थी, न जल्दबाज़ी। “ठीक है,” उसने बस इतना कहा—और फिर खामोश हो गई।

अंकित उसकी शक्ल पढ़ने की कोशिश करता रहा। पैसे कब मिलेंगे, कितने मिलेंगे, शर्त क्या होगी—कुछ भी साफ़ नहीं था। आज उसे हर हाल में पैसे चाहिए थे। ऑफिस जाना अब मुमकिन नहीं था; डर था कि इस बार अगर गुंडों ने पकड़ लिया, तो इज़्ज़त ही नहीं, कपड़े तक न बचें।


वह हिम्मत जुटाकर बोला, “बताओ… बदले में मुझे क्या करना होगा?”

अनिता की आवाज़ सपाट थी, “कुछ नहीं। बस तुम्हें मेरी ‘बीबी’ बनकर रहना पड़ेगा।”


अंकित चौंक गया। “मतलब?”

“मतलब,” अनिता ने ठंडे लहज़े में कहा, “जो एक पत्नी करती है—घर, आदतें, तौर-तरीके—सब। बदले में मैं तुम्हारी एक महीने की किस्त चुका दूँगी।”


“लेकिन तुमने वादा किया था कि सारा पैसा चुकाओगी,” अंकित की आवाज़ काँप गई।

अनिता हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली, “चुका दूँगी—जब तुम पूरी तरह अच्छी बीबी बन जाओगे। क्या पता कर्ज उतरते ही तुम फिर बदल जाओ। वैसे भी… गिरगिट की तरह रंग बदलना तुम्हारे इतिहास में रहा है।”


उसकी तिरछी, तंज़भरी नज़र ने अंकित को सालों पीछे धकेल दिया। कॉलेज का वो दिन—जब अनिता सबके सामने घुटनों पर बैठकर प्रपोज़ कर रही थी, और उसने हँसते हुए कहा था, ये उसका बदला है, और उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गया था।


“ठीक है,” अंकित ने सिर झुका लिया। “जैसा चाहो परख लो। मैं सब करूँगा। बस एक किस्त दे दो… मुझे इन गुंडों से बचा लो।”


अनिता उठी, अलमारी की तरफ गई। “मेरी साड़ी का जोड़ा रखा है,” उसने बिना पीछे देखे कहा। “अभी जाओ। लहंगा-चोली पहनकर बिस्तर पर घूँघट करके बैठो। जब मैं कमरे में आऊँगी, तुम्हारी ‘मुंह-दिखाई’ करूँगी। उसी में एक महीने की किस्त दूँगी—जैसा मैंने पहले दिन कहा था। उसके बाद तुम मेरे पैर छुओगे और दूध का गिलास दोगे।”


अंकित के मुँह से निकल पड़ा, “ये कैसे… मैं तुम्हारे कपड़े—”

अनिता पलटी। “तो पैसे कमा कर चुका दो। अगर पैसे चाहिए, तो जो कहा है, वही करो।”


बेबस अंकित बेडरूम में चला गया। हाथ काँपते रहे। जैसे-तैसे उसने लहंगा-चोली पहनी, दुपट्टा सिर पर रखा और घूँघट का साया चेहरे पर गिरा लिया। बिस्तर पर बैठा तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था—डर, शर्म और मजबूरी एक साथ।


कुछ देर बाद अनिता कमरे में आई। उसने पास आकर धीरे से घूँघट उठाया। एक पल को उनकी नज़रें मिलीं। अनिता ने मुंह-दिखाई में लिफ़ाफ़ा उसके हाथ में रख दिया—एक महीने की किस्त।

अंकित ने झुककर उसके पैर छुए—वैसे ही, जैसे नई बहू छूती है। फिर वह रसोई से दूध का गिलास लेकर आया। अनिता ने थोड़ा-सा पिया और बिना कुछ कहे गिलास उसकी तरफ बढ़ा दिया।


कमरे में फिर वही खामोशी थी—लेकिन अब उसकी आवाज़ बहुत भारी थी।


कुछ पल की चुप्पी के बाद अंकित ने हिम्मत जुटाई।

“क्या… क्या मैं अभी जाकर पैसे की किस्त लौटा आऊँ?” उसकी आवाज़ में उम्मीद भी थी और डर भी।


अनिता ने बिना सोचे जवाब दिया, “अभी नहीं।”


वह उसके पास आई। अंकित कुछ समझ पाता, उससे पहले ही अनिता ने अपने गले से मंगलसूत्र उतारा। पल भर को वह चेन हवा में झूलती रही—फिर उसने उसे अंकित के गले में पहना दिया।

“अब से,” अनिता ने साफ़ और ठंडे लहज़े में कहा, “एक अच्छी पत्नी की तरह इसे हमेशा अपने गले में पहन कर रखना।”


अंकित का शरीर सिहर उठा। वह कुछ कह पाता, उससे पहले ही अनिता ने अलमारी से एक पैकेट निकाला और उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“ये पहनकर आओ,” उसने संक्षेप में कहा।


कमरे में लौटते हुए अंकित के कदम लड़खड़ा रहे थे। जब उसने ब्रा और पैंटी पहनी, तो आईने में खुद को पहचानना मुश्किल हो गया। कपड़े सिर्फ शरीर पर नहीं थे—वे उसकी सोच, उसकी पहचान को भी जकड़ रहे थे।


अनिता ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“अब इसके ऊपर अपनी शर्ट और पैंट पहनो,” उसने आदेश दिया।


अंकित ने अपने रोज़मर्रा के कपड़े पहने। बाहर से वह वही पुराना अंकित दिख रहा था, लेकिन भीतर कुछ टूट चुका था। अनिता ने पैसे उसके हाथ में रखे।

“जाओ,” उसने कहा।


दरवाज़ा बंद करते वक्त अंकित के भीतर अजीब-सा आत्मविश्वास उभरा—जैसे डर को पीछे छोड़कर वह बाहर निकल रहा हो। गली, सड़क, लोग—सब सामान्य थे। लेकिन कुछ ही देर में उसे एहसास होने लगा कि यह सब कितना मुश्किल है।


गर्मी बढ़ रही थी। पसीना बह रहा था। शरीर असहज था—हर कदम के साथ कपड़े चुभते से लग रहे थे। तभी उसकी नज़र शर्ट पर पड़ी। पसीने की वजह से ब्रा की हल्की-सी रेखाएँ उभर आई थीं।

उसका दिल बैठ गया।


शर्म ने उसे भीतर तक जकड़ लिया। उसने शर्ट को खींचकर ठीक करने की कोशिश की, कंधे झुकाए, चाल बदली—लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हर नज़र उसे बेनकाब करती-सी लग रही थी।


इसी उधेड़बुन में वह गुंडों के अड्डे पर पहुँचा। दिल ज़ोर से धड़क रहा था। उसने चुपचाप पैसे बॉस के सामने रख दिए।

बॉस ने ठंडी नज़र से उसे देखा। “अगली किस्त समय से चाहिए,” वह धमकाया, “वरना हमें खुद आना पड़ेगा।”


अंकित ने सिर हिलाकर वादा किया और वहाँ से निकल आया।


घर लौटते वक्त उसके कदम भारी थे। उसे नहीं पता था कि आज दी गई ये किस्त उसकी ज़िंदगी में किस तरह का तूफ़ान लाने वाली है।

उसे यह भी अंदाज़ा नहीं था कि अनिता के दिमाग़ में अब कौन-कौन से नए नियम, नई परीक्षाएँ और नए खेल आकार ले चुके हैं।


और यही अनजानेपन की सबसे डरावनी बात थी।


अंकित जब घर पहुँचा, तो चेहरे पर एक अजीब-सी राहत और आत्मसम्मान की चमक थी। कम से कम आज—वह घर से बाहर जा पाया था। उसे लगा जैसे ज़िंदगी ने एक छोटी-सी सांस लेने की जगह दी हो।

लेकिन पूरे रास्ते उसकी देह उसे धोखा देती रही। ब्रा की स्ट्रिप्स कंधों पर चुभती रहीं, पीछे का हुक बार-बार ध्यान खींच लेता रहा। हर कदम के साथ असहजता बढ़ती गई—जैसे कपड़े नहीं, कोई अनकहा नियम उसे जकड़े हुए हो।


अनिता सोफ़े पर बैठी अपने काम में लगी थी। उसने नज़र उठाकर देखा।

“पैसे लौटा दिए?”

अंकित ने हल्की मुस्कान के साथ हाँ में सिर हिला दिया।

“Good,” अनिता ने बस इतना कहा—और फिर स्क्रीन में डूब गई।


कुछ देर बाद उसकी आवाज़ आई, “अंकित… मेरे लिए चाय बना कर लाओ।”

शादी के बाद यह पहली बार था जब अनिता ने उसे चाय बनाने को कहा था। अंकित एक पल ठिठका, फिर रसोई की तरफ बढ़ गया। चाय बनाकर कप में डालकर ले आया।


अनिता ने एक घूंट लिया। चेहरा सपाट रहा।

“Sweety,” उसने बिना नज़र उठाए कहा, “मेरी चाय में चीनी कम और चाय-पत्ती ज़्यादा होनी चाहिए। दुबारा बना कर लाओ।”


बेचारा अंकित लौट गया। फिर से चाय।

एक और घूंट—“मज़ा नहीं आया। फिर से ट्राय करो।”


पाँचवीं बार के बाद जाकर अनिता ने सिर हिलाया।

“अब ठीक है। आगे से यही टेस्ट रखना है।”


थोड़ी देर बाद अंकित ने हिम्मत करके पूछा, “क्या अब… मैं ब्रा-पैंटी उतार दूँ?”

अनिता ने तुरंत जवाब दिया, “सोचना भी मत। ये किस्त तुम्हें इन्हें पहनने के लिए दी गई है। अगर मुझे तुम एक मिनट के लिए भी बिना ब्रा, पैंटी या मंगलसूत्र के दिखे—तो उतने दिनों की रकम अगली किस्त से काट ली जाएगी।”


अंकित ने चुपचाप सिर झुका दिया।


जब अनिता की चाय खत्म हुई, उसने फिर आवाज़ दी,

“Sweety, एक काम करो—कप किचन में रख दो, और मेरे पैरों से ये हील्स उतार दो। घर की चप्पल ले आओ।”


अंकित को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या चाहती है, लेकिन सवाल करने की गुंजाइश भी नहीं थी। उसने कप लिया, किचन में रखा और वापस आ गया।

वह अपने काम में लगने ही वाला था कि अनिता की आवाज़ फिर आई,

“अंकित… मैंने दो काम बोले थे।”


डरते हुए वह लौटा। धीरे से नीचे बैठा। हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने सावधानी से अनिता के पैरों से हाई हील्स निकालीं—एक-एक करके। उन्हें उसके हील्स के कलेक्शन में सलीके से रखा। फिर घर की साधारण चप्पलें लाकर उसके पैरों के पास रख दीं।


अनिता ने चप्पलें पहन लीं।

“अब,” उसने कहा, “मेरी अलमारी से दो टॉप और स्कर्ट ले आओ।”


अंकित अलमारी से दो सेट ले आया। अनिता ने उनमें से एक—सिंपल डेनिम स्कर्ट और सफ़ेद टॉप—अपने लिए चुन लिया। दूसरा, फूलों वाला स्कर्ट-टॉप, उसने अंकित की तरफ बढ़ा दिया।

“जाकर ये पहन लो,” वह बोली। “ब्रा-पैंटी में एडजस्ट होने में मदद मिलेगी।”


और उस दिन, पहली बार, अंकित ने ब्रा और पैंटी के ऊपर फूलों वाला, हल्का-सा टॉप और मैचिंग स्कर्ट पहनी।

आईने में खड़ा वह खुद को देखता रहा—बाहर से वही घर, वही शाम—लेकिन भीतर कुछ बदल चुका था, चुपचाप, स्थायी तौर पर।


उस रात अंकित उसी स्कर्ट और टॉप में सोया। हैरानी की बात यह थी कि उसे काफ़ी आराम महसूस हो रहा था—जैसे शरीर ने हालात से समझौता कर लिया हो।

सुबह अनिता जल्दी उठी। बाथरूम की तरफ़ जाते हुए उसने आवाज़ दी,

“मैं नहाने जा रही हूँ। जब तक मैं रेडी होऊँ, घर में झाड़ू लगा देना और चाय बना कर रख देना।”


अंकित अनमने मन से उठा। झाड़ू लगाई, चाय बनाई और कप में डालकर अनिता के सामने रख दी।

अनिता ने जैसे ही चाय उठाई, उसकी नज़र कप पर गई—एक बाल तैर रहा था। वह तमतमा गई।

“ये क्या है?” उसकी आँखें ग़ुस्से से सिकुड़ गईं।


अंकित को तभी एहसास हुआ—कई महीनों से वह घर में बंद-सा था। बालों पर ध्यान ही नहीं गया; वे काफ़ी लंबे हो चुके थे।

“सॉरी,” वह जल्दी से बोला, “मैं अभी दुबारा बना कर लाता हूँ।”


वह भागकर रसोई में गया, नई चाय बनाई और ले आया। अनिता ने घूंट लिया, फिर शांत स्वर में बोली,

“बाल काफ़ी लंबे हो गए हैं।”


“शाम को कटवा लूँगा,” अंकित ने कहा—फिर खुद ही रुक गया। “लेकिन… मेरे पास पैसे नहीं हैं।”


अनिता ने सहजता से कहा, “कोई बात नहीं। मुझे बालों से कोई एलर्जी नहीं है। और मेरी पत्नी के बाल लंबे ही होने चाहिए।”

फिर उसकी आवाज़ सख़्त हो गई, “लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मेरे खाने या चाय में आएँ। आगे से इन्हें बाँध कर रखना।”


इतना कहकर वह ऑफिस के लिए निकल गई।


दरवाज़ा बंद होते ही अंकित के दिमाग़ में एक ही बात गूँजती रही—बाँध कर रखना… कैसे?

उसे कुछ आता नहीं था। घर में रबर बैंड तक नहीं था। और अनिता को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि वह बिना पूछे उसकी चीज़ों को छुए—देखना तो दूर की बात थी।

दिन यूँ ही निकल गया—कभी टीवी, कभी ऊँघना, और ज़्यादातर समय सोचते रहना।


शाम को अनिता लौटी। उसने ऑफिस बैग से एक पैकेट निकाला और टेबल पर रख दिया। फिर इशारे से बोली,

“हील्स उतार कर ठीक से रखो। घर की चप्पल ले आओ। और पानी।”


अंकित ने वही किया। धीरे-धीरे उसके पेडिक्योर किए पैरों से हील्स उतारीं, सलीके से कलेक्शन में रखीं। आरामदायक चप्पलें लाकर दीं। हाथ धोकर पानी का गिलास दिया।

पानी खत्म होते ही उसने चाय बनाई और झुककर कप बढ़ाया। तभी उसके गले का मंगलसूत्र—जो उसने टॉप के अंदर छिपा रखा था—बाहर झूल गया।


अंकित ने घबराकर उसे अंदर करने की कोशिश की।

“बाहर रहने दो,” अनिता ने कहा। “ये सुहाग की निशानी है। इसे पहनकर औरतें गर्व महसूस करती हैं—शर्म नहीं।”


अब मंगलसूत्र उसकी टॉप के बाहर साफ़ दिख रहा था।


थोड़ी देर बाद अनिता फ्रेश होकर कपड़े बदल आई।

“आज नहाए नहीं?” उसने पूछा।

“नहाया था,” अंकित बोला, “पर वही टॉप-स्कर्ट फिर पहन ली। लगा कहीं तुम नाराज़ न हो जाओ।”


अनिता हँस पड़ी। “मैं कोई हिटलर नहीं हूँ।”


उसने अलमारी से क्रीम रंग की सलवार-कमीज़ और मैचिंग दुपट्टा निकाला और उसकी तरफ़ बढ़ाया।

“ये पहन लो।”


फिर उसने एक और पैकेट दिया। “ये तुम्हारे बालों के लिए।”


पैकेट खुलते ही अंदर हेयर-बैंड, रबर-बैंड, पिन, क्लचर और रिबन थे। रिबन देखते ही अंकित को कॉलेज के दिन याद आ गए—लाइब्रेरी में पहली मुलाक़ात, अनिता सलवार-कमीज़ में, दोनों कंधों पर पिन किया दुपट्टा, और बालों में दो चोटियाँ।


“खड़े क्या हो?” अनिता बोली। “जाकर बदलो।”


फिर उसने बैग से एक और पैकेट निकाला—सात जोड़ियाँ।

“हर दिन एक ही नहीं पहनोगे,” उसने सामान्य-सी बात की तरह कहा। “बदलकर आओ। फिर मैं तुम्हारे बाल बाँध दूँगी, ताकि बार-बार सेट न करने पड़ें।”


अंकित बाथरूम गया। स्कर्ट-टॉप उतारे, कल वाले कपड़े बदले। आज के सेट में से क्रीम रंग की जोड़ी चुनी—सलवार-कमीज़ से मेल खाती हुई। पहली बार उसने सलवार-कमीज़ पहनी। दुपट्टा जैसे-तैसे कंधों पर रखा और बाहर आ गया।


अनिता ने ऊपर से नीचे तक देखा। फिर शांत मुस्कान के साथ बोली, “Not bad.”


उसने दुपट्टा पिन से ठीक किया। कंघी उठाई—और ठीक वैसे ही, जैसे बड़ी बहन छोटी बहन के बाल सँवारती है—धैर्य से बाल सुलझाए। माथे पर हल्की-सी चंपी, और फिर दो सुंदर चोटियाँ। सिरों पर रिबन बाँध दिए—छोटे-से फूल की तरह, जो उस पर अजीब-सी क्यूटनेस ले आए।


“अब बाल अपनी जगह पर रहेंगे,” अनिता ने कहा। कुछ हेयर-क्लिप्स और लगा दीं।

“अब जाओ, खाना बनाओ।”


रसोई में काम करते हुए अंकित की नज़र खिड़की के काँच में अपनी परछाईं पर पड़ी—कपड़े, दुपट्टा, और दो चोटियाँ।

कल तक वह दिन में लड़कों के कपड़े पहन लेता था। सलवार-कमीज़ भी अनिता के जाने के बाद बदली जा सकती थी।

लेकिन ये चोटियाँ…?


अगर उसने खोल दीं और फिर खुद से बाँध न पाया? अगर अनिता को पता चल गया?

एक दिन की रकम कट गई तो अगली किस्त कैसे देगा?


इन्हीं ख़यालों में उसके माथे पर पसीना छलक आया—और उसे समझ आ गया कि असली बाँध सिर्फ़ बालों का नहीं था।


अगला पूरा दिन अंकित ने उसी सलवार-कमीज़ और दो चोटियों में बिताया। डर उसके साथ-साथ चलता रहा—डर कि कहीं उसकी चीटिंग पकड़ न ली जाए, कहीं कोई एक छोटी-सी चूक भारी न पड़ जाए।

वह बार-बार दुपट्टे की पिन टटोल लेता, चोटियों को छूकर देखता—सब वैसा ही था, जैसा अनिता ने कल सहेज दिया था। और यही बात उसे सबसे ज़्यादा डराती थी।


शाम को अनिता घर लौटी। नज़र पड़ते ही उसने देख लिया—बाल वही स्टाइल, सलवार-कमीज़ वही, दुपट्टा आज भी ठीक उसी जगह पिन किया हुआ।

अजीब बात यह थी कि आज अंकित उस पहनावे में… अच्छा लग रहा था। अनिता ने कुछ नहीं कहा, बस एक पल ठहरकर देखा।


अंकित ने बिना कहे उसके पैरों से हील्स उतारीं, उन्हें उनकी जगह रख दिया। हाथ धोकर पानी दिया। फिर चाय बनाकर ले आया।

आज अनिता का मूड हल्का था।

“आज काफ़ी रिलैक्स डे है,” उसने कहा। “और कल ऑफिस की छुट्टी भी है। सोच रही हूँ—ब्यूटी पार्लर चलें। मुझे नेल्स और आइब्रो सेट करवानी हैं।”


थोड़ी देर बाद वह तैयार होकर आई। अंकित को देखा और बोली,

“खड़े-खड़े क्या कर रहे हो? मुँह धोकर आओ। तुम्हें भी मेरे साथ पार्लर चलना है।”

उसने अपना पर्स अंकित के हाथ में थमा दिया।


अंकित घबरा गया। “अनिता… लेकिन इन कपड़ों और इस हेयर-स्टाइल में… पार्लर?”

अनिता ने बात काट दी।

“मुझे ये सब बकवास नहीं सुननी। जो कहा है, वही करो। समस्या क्या है इन कपड़ों में? पत्नी बनने की बात की थी न? दुनिया की कौन-सी पत्नी इन कपड़ों में शर्माती है?”

उसकी आवाज़ सख़्त थी। “चुपचाप गाड़ी में बैठो। समझे?”


अंकित जल्दबाज़ी में घर की चप्पलों में ही गाड़ी में बैठ गया। रास्ते भर एक शब्द नहीं बोला गया।

पार्लर पहुँचते ही उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। गाड़ी से पहला कदम बाहर रखते ही लगा—जैसे पूरी दुनिया उसे ही देख रही हो। यह मार्केट का बीच था। सामने पार्लर की बड़ी शीशे वाली खिड़की।


अनिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“खुद को इतना इम्पॉर्टेंट मत समझो,” उसने शांत स्वर में कहा। “दुनिया को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम कौन हो, क्या हो। अपने दिमाग़ और ख़यालों को कंट्रोल करो। और चलो।”


रास्ते में अनिता ने नीचे देखा।

“ये कैसी चप्पलें पहन रखी हैं? ज़रा भी समझ नहीं है कि इस सलवार-कमीज़ के साथ क्या पहनना चाहिए।”


अंकित की नज़र अपने पैरों पर टिक गई। शर्म से गर्दन झुक गई।


पार्लर के अंदर अनिता ने पूरा पैकेज लिया—मैनिक्योर, पेडिक्योर, फ़ेशियल, आइब्रो, मेकअप, हेयर हाइलाइट्स।

और… वही सब अंकित के लिए भी।


जब दोनों बाहर निकले, तो अंकित खुद को पहचान नहीं पा रहा था।

उसका चेहरा चमक रहा था—लगभग अनिता जितना। आइब्रो अब वैसी ही आर्च्ड थीं। मेकअप ने पहली बार उसे एहसास कराया कि चेहरा कैसे बदल सकता है।

वह… एक खूबसूरत औरत लग रहा था।


उसकी चोटियाँ खोल दी गई थीं। लंबे बालों पर पता नहीं कौन-कौन से ट्रीटमेंट हुए थे—वे एकदम स्ट्रेट, सॉफ्ट और शाइनी थे। हाइलाइट्स ने उन्हें मॉडल-सा लुक दे दिया था।


अनिता ने गाड़ी सीधे मॉल में रोकी।

वह उसे हील्स सेक्शन में ले गई। लड़कियों के कम्फ़र्टेबल सेक्शन से उसके लिए हील्स खरीदीं।

फिर—बिना एक पल रुके—अंकित की चप्पलें डस्टबिन में डाल दीं।


उसके पैरों में हील्स पहनाईं।

“चलकर दिखाओ।”


हर कदम अंकित के लिए जंग था। संतुलन, डर, नज़रें—सब एक साथ। उसकी अजीब चाल लोगों के लिए हँसी का कारण थी।

लेकिन अनिता ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।

“हील्स में खड़ा रहना ही बड़ा टास्क है,” उसने समझाया। “हर लड़की ऐसे ही सीखती है। पहली बार सबके साथ ऐसा ही होता है। घबराओ मत। भरोसा रखो—तुम कर पाओगे।”


मॉल से बाहर निकलकर जब अंकित गाड़ी में बैठा, उसने अपने हाथों को देखा।

लंबे ऐक्रेलिक नेल्स—उन पर बेहद खूबसूरत नेल पेंट। पैरों के नाख़ून भी रंगे हुए थे।

अनिता ने उस पर परफ़्यूम स्प्रे किया। अब वह भी… उसी की तरह महक रहा था।


थोड़ी देर बाद अनिता ने गाड़ी रुकवाई।

एक मेहंदी वाला बैठा था।


अंकित कुछ बोल पाता, उससे पहले ही अनिता बोली,

“मना करने के बारे में सोचना भी मत।”


बेचारा अंकित—न चाहते हुए भी—पेड़ के नीचे बैठ गया। मेहंदी वाले ने उसके हाथ पकड़ लिए।

अनिता ने डिज़ाइन पसंद की।

और देखते-देखते, बीच बाज़ार, दोनों हाथों में मेहंदी लगने लगी।


लोग रुक-रुककर देखने लगे।

अंकित की साँसें तेज़ थीं। शर्म, डर, बेबसी—सब एक साथ।


तभी अनिता बोली,

“मैं अभी आती हूँ,”

और वह उसे वहीं अकेला छोड़कर कहीं चली गई।


अंकित ने नज़र उठाई—

सामने से वही लड़की आ रही थी…

अनिता के ऑफिस की।

वही, जिसने उसे थप्पड़ मारा था।

वही, जिसकी वजह से उसकी नौकरी गई थी।


वह अपने बॉयफ्रेंड के साथ उसी मेहंदी वाले के पास आकर रुकी।


और अंकित—बीच बाज़ार, सलवार-कमीज़ में, मेहंदी लगे हाथों के साथ—जड़ होकर बैठा रह गया।


अब भागने की कोई जगह नहीं थी।

अंकित के दोनों हाथों पर मेहंदी लग चुकी थी। उँगलियाँ फैली हुई थीं, हथेलियाँ हवा में—जैसे किसी अनदेखी सज़ा की मुद्रा में।

अनिता कहीं चली गई थी, और वह हिल भी नहीं सकता था। पैरों में ऊँची हील्स थीं—जिनमें खड़ा रहना ही उसके लिए जंग जैसा था। भागने का तो सवाल ही नहीं था।


डर और शर्म से उसका चेहरा तप रहा था। मन कर रहा था कि गले में पड़े दुपट्टे से मुँह ढक ले—लेकिन मेहंदी की वजह से वह यह भी नहीं कर सकता था।

वह वहीं खड़ा था… पूरी तरह बेबस।


उसी समय दूसरी तरफ़ वही लड़की—रोशनी—अपनी जगह बैठकर मेहंदी लगवाने लगी। उसने एक बार भी अंकित की तरफ़ नहीं देखा।

अंकित एक ओर खड़ा हो गया, दोनों हाथ आगे किए—सिर्फ़ इस डर से कि कहीं मेहंदी खराब न हो जाए।


तभी रोशनी का बॉयफ्रेंड, जो अंकित के बिल्कुल पास खड़ा था, सिगरेट सुलगा बैठा।


कई दिनों से अंकित ने सिगरेट नहीं पी थी। खाली खड़े रहना, घबराहट, और पास में जलती सिगरेट—उसके अंदर की तलब चरम पर पहुँच गई।

शर्म भी थी। डर भी।

फिर भी उसने पूरी कोशिश की कि आवाज़ जितनी हो सके उतनी धीमी और पतली लगे।


“हाय…”


लड़के ने पलटकर देखा।

“हाय,” उसने भी धीमे से जवाब दिया—क्योंकि रोशनी मेहंदी में व्यस्त थी।


अंकित ने हिम्मत जुटाई।

“अगर… अगर आपको बुरा न लगे,” वह फुसफुसाया, “तो क्या आप मुझे एक कश पिला सकते हैं? सॉरी… मेरे हाथों में मेहंदी लगी है।”


लड़के को पहले अजीब लगा। उसने रोशनी की तरफ़ देखा—वह ध्यान नहीं दे रही थी।

उसने सिगरेट आगे बढ़ाई… और हल्के से अंकित के होंठों के पास कर दी।


अंकित ने दो गहरे कश खींचे।


यह सब करना उसके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था—संतुलन, आवाज़, नज़रें—लेकिन वह सफल रहा।

लड़के ने मुस्कराकर कहा, “वैसे मेरा नाम रोहन है।”


“अ…अंकिता,” जवाब उसके मुँह से अपने आप निकल गया।


रोहन ने मुस्कराकर कहा, “आपके हाथों की मेहंदी बहुत सुंदर है।”

अंकित के पास “थैंक यू” के अलावा कुछ नहीं था।


तभी रोशनी की नज़र उन दोनों पर पड़ गई।

माहौल हल्का करने के लिए रोहन बोला,

“हाय रोशनी, ये अंकिता जी हैं। अपने किसी रिलेटिव का इंतज़ार कर रही हैं। इन्होंने बहुत अच्छी मेहंदी लगवाई है—क्यों न तुम भी यही डिज़ाइन लगवा लो?”


रोशनी ने ध्यान से अंकित की हथेलियाँ देखीं।

“हाँ, सच में… बहुत यूनिक डिज़ाइन है।”


मेहंदी वाले ने कहा, “मैडम, एक हाथ तो लग चुका है। अगर चाहें तो दूसरे हाथ पर भी यही डिज़ाइन बना दूँ।”


और यहीं… अंकित को रोशनी के पास बैठना पड़ा।


हर पल उसका दिल काँप रहा था—कि कहीं वह पहचान न ली जाए।

लेकिन किस्मत ने साथ दिया। रोशनी को कुछ शक नहीं हुआ। डिज़ाइन देख-देखकर मेहंदी पूरी हो गई।


रोहन ने बाइक स्टार्ट की। रोशनी पीछे बैठी। जाने ही वाले थे कि अचानक रोशनी बोली,

“रोहन, बाइक रोको।”


अंकित का दिल बैठ गया।


“अरे,” रोशनी ने कहा, “मेरी बॉस—अनिता मैम। आओ, मैं तुम्हें उनसे मिलवाती हूँ।”


तीनों वहीं रुक गए।


कुछ ही देर में अनिता सामने आ गई।

“हाय मैम,” रोशनी ने कहा।

“हाय,” अनिता ने मुस्कराकर जवाब दिया।


रोशनी ने रोहन से परिचय कराया, अपनी शादी का ज़िक्र किया, और उन्हें इनवाइट किया। कार्ड व्हाट्सऐप कर दिया गया।


तभी रोहन ने अंकित की तरफ़ देखकर कहा,

“वैसे अंकिता जी, आप भी ज़रूर आइएगा हमारी शादी में।”


“अंकिता” नाम सुनकर अनिता एक पल को चौंकी।

उसने अंकित की तरफ़ देखा—हल्की-सी मुस्कान आई… लेकिन कुछ कहा नहीं।


रोहन और रोशनी ने थोड़ी और बातें कीं, फिर बाय कहकर चले गए।


अनिता धीरे से अंकित के पास आई।

“ओहो… अंकिता,” उसने तंज़ और मज़ाक के बीच कहा, “ये क्या था?”


गाड़ी में बैठते ही अंकित ने सारी कहानी सुना दी—सिगरेट से लेकर नाम तक।

अनिता हँस पड़ी।

“चलो अच्छा है,” उसने कहा, “तुमने खुद ही अपना नाम चुन लिया। वैसे भी इस लुक के साथ ‘अंकित’ सूट नहीं करता।”


उसने मज़ाकिया संतोष से जोड़ा,

“मेरी मेहनत बचा दी तुमने।”


गाड़ी आगे बढ़ गई।


और अंकित—नहीं, अंकिता—खिड़की से बाहर देखते हुए सोचता रहा…

यह सब अचानक नहीं था।

यह एक रास्ता था—जिस पर अब वह आधा नहीं, पूरा चल चुका था।


**नॉवेल स्टाइल में पुनर्लेखन — भावनाओं, विस्तार और मानवीय गहराई के साथ**


---


### **अध्याय: शादी का दिन — जब एक पुरुष ने दुल्हन का वेश धारण किया**


घर पहुँचते ही अनीता ने व्हाट्सएप पर आई हुई इनविटेशन कार्ड पर नज़र डाली।  

*“शादी — कल।”*


उसकी आँखों में एक चमक आई। बिना किसी झिझक के, उसने फोन उठाया और अंकित की तरफ देखा — “देखो, कल छुट्टी भी है। तो कल जा सकते हैं।”  

फिर, एक छोटी सी चुटकी लेते हुए, मुस्कुराई — “चल सकते हो न, *अंकिता जी?*”


अंकित शर्म से झुक गया। उसका दिल धड़क रहा था — न तो खुशी से, न गुस्से से… बल्कि एक अजीब सी बेचैनी से। वह जानता था — अब विरोध करना बेकार था।


अनीता ने तुरंत एक ब्यूटीशियन बुक कर दी — जो अगली सुबह सात बजे घर आ जाएगी। ताकि शाम तक अंकिता… *तैयार* हो सके।


“रोशनी की शादी है,” अनीता ने आईने के सामने खड़े होकर कहा, “और तुम्हें साड़ी ही पहननी चाहिए। ब्रिडल लुक में।”  

थोड़ी देर चुप रहकर, उसने मुस्कुराते हुए जोड़ा — “कल *अंकिता जी* भी साड़ी में ही आएंगी। बिल्कुल दुल्हन की तरह।”


उस रात, दोनों अपने-अपने बिस्तर पर लेट गए। लेकिन नींद नहीं आई।  

कुछ देर बाद, अनीता ने धीमे स्वर में पुकारा — “अंकिता… मेरे बेड पर आ जाओ। पैर दबा दो… बहुत दर्द हो रहा है।”


अंकित ने कोई जवाब नहीं दिया। बस उठा, और अनीता के पैरों पर हाथ रख दिए।  

धीरे-धीरे, नरम हाथों से दबाना शुरू किया।


उसकी नज़र बार-बार अपने हाथों पर पड़ रही थी — *क्या ये सच में मेरे हाथ हैं?*  

वे नाज़ुक, लंबे, महीन… लड़कियों जैसे।  

उसने बाल स्ट्रेट करवाए थे — अब वे बार-बार चेहरे और आँखों पर आ गिरते थे।  

एक बार, उसने आईने में झाँका — और ठहर गया।


*“ये कौन है?”*


आईने में एक खूबसूरत लड़की थी — नाजुक गाल, लंबी पलकें, चमकती आँखें… और वो मुस्कान — जो अब उसकी अपनी थी।  

अनीता सो चुकी थी।  

अंकित धीरे-धीरे पैर दबाता रहा… फिर उसी के बगल में लेट गया।


रात भर, उसका हाथ अनीता के शरीर से टकराता रहा — हर बार वह जाग जाता।  

लेकिन इस बार… वह उसे शांति से देख रहा था।


*“ये लड़की… कहाँ से कहाँ तक पहुँच गई है…”*


उसके मन में एक अजीब सी पीड़ा उठी — नफ़रत नहीं, बल्कि *पछतावा*।  

अनीता — जो दिन-रात मेहनत करती है, कभी शिकायत नहीं करती, जिसकी आँखों में सपने हैं, जो हर मोड़ पर खड़ी रही…  

और उसने — अंकित ने — उसके साथ क्या किया था?


*“मैं कितना भाग्यशाली हूँ… जिसे ऐसी बीवी मिली…”*


ये सोचते हुए, वह भी सो गया।


---


### **सुबह — जब बदलाव की शुरुआत हुई**


सुबह का आगाज़ सामान्य था — अगर उस ‘क्रॉप टॉप’ और ‘स्कर्ट’ को छोड़ दिया जाए, जो अनीता ने अंकित को पहनने के लिए दिए।


“ये क्या है?” अंकित ने आँखें फैलाईं।


“तैयारी का हिस्सा है,” अनीता ने बिना मुड़े कहा, “वैसे भी… तुम्हारे पास ऑप्शन है?”


उसे जवाब देने का मौका ही नहीं मिला — क्योंकि दरवाज़े पर ब्यूटीशियन आ चुकी थी।


पहले अनीता की टर्न — हाथ, पैर, अंडरआर्म… सब वैक्स किए गए।  

फिर… *अंकित की बारी।*


अनीता ने गुस्से में कहा — “मुझे कोई शिकायत नहीं सुननी।”


अंकित क्या करता? वह तो बेचारा बैठा था — एक ऐसे शरीर में, जिसे वह अब भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया था।


वैक्सिंग शुरू हुई —  

हाथ…  

पैर…  

पेट…  

पीठ…  

अंडरआर्म…  

ऊपरी होंठ…  

आईब्रो…  


हर झटके के साथ उसकी आँखों में आँसू आ गए।  

ये उसका पहला वैक्सिंग अनुभव था — और वह *भयानक* था।


फिर… पियर्सिंग।


कान…  

नाक…  

और आखिर में — *नेवल*।


अंकित जानता था — ये सब बदलाव *परमानेंट* हैं।  

लेकिन… ऑप्शन? उसके पास क्या ऑप्शन था?


अनीता ने उसे भारी सोने के झुमके, नथ और नेवल स्टड पहनाए — जैसे कोई अपनी दुल्हन को सजा रहा हो।


फिर… *मेकअप*।


भारतीय दुल्हन का मेकअप — जो केवल रंग-रोगन नहीं, बल्कि *कला* है।  

चेहरे की गहरी क्लींजिंग…  

HD बेस…  

कंटूरिंग… हाइलाइटिंग…  

स्मोकी आइज़… गोल्डन ग्लिटर…  

विंग्ड आईलाइनर… घनी फॉल्सी लैशेज़…  

माथे पर बिंदी…  

होंठों पर गहरा लाल रंग…  

और अंत में — चमेली के गजरे…


फिर… *ज्वेलरी*।


रानी हार… चोकर… मांग टीका… झुमके… नथ… चूड़ियाँ… कलीरें… कमरबंद… पायल… बिछिया…  

हर एक टुकड़ा उसे *एक अलौकिक सुंदरी* में ढाल रहा था।


जब आखिरी गजरा उसके बालों में लगा, तो अंकित ने आईने में देखा —  

*“क्या ये रोशनी की शादी है… या मेरी?”*


उसके पास जवाब नहीं था।  

बस एक सवाल — “मेरा मेकअप… ज्वेलरी… कुछ ज्यादा तो नहीं हो गया?”


अनीता ने उसका हाथ पकड़ा — आँखों में एक अजीब सी कोमलता थी।  

“तुम अनीता की बीवी हो… रॉयल लुक तो बनता ही है।”


अंकित ने धीरे से उसके पैर छुए — जैसे कोई नई दुल्हन अपने पति के चरण स्पर्श करती है।


अनीता की आँखें नम हो गईं।  

उसने कभी सोचा नहीं था — कि वह अंकित को *ऐसा* देखेगी… और *ऐसा* महसूस करेगी।


“हाँ… माँगो। क्या चाहिए?” उसने पूछा।


अंकित ने काँपते हुए कहा — “मैं चाहता हूँ… कि तुम इस शादी में अकेले जाओ।  

तुम्हारे ऑफिस के सभी लोग मुझे जानते हैं…  

और मैं… *इस लुक* में… उनके सामने नहीं जा सकता।  

मेरी हिम्मत नहीं हो रही…”


अनीता ने उसकी ओर देखा — लंबे, गहरे पल…  

फिर बोली — “माफ़ करना… इसके अलावा, जो कुछ भी चाहोगे — वो तुम्हें मिलेगा।  

लेकिन अब हम लेट हो रहे हैं।”


अनीता के साथ कार में बैठते समय, अंकित काँप रहा था — डर और शर्म से।  

अनीता ने उसका हाथ थामा — “डरो मत। मैं तुम्हारा इंट्रो नहीं कराऊँगी।  

तुम अलग… हम अलग।  

रोहन ने तुम्हें इनवाइट किया है — तो तुम जा रहे हो।  

खुश रहो। कोई तुम्हें नहीं पहचानेगा।  

मैं अपनी टीम के साथ फोटो खिंचवाऊँगी — तुम एक कोने में बैठकर खाना-पीना करते रहना।  

वापसी में साथ आ जाना।  

उम्मीद है… कोई परेशानी नहीं होगी?”


अंकित अब भी डरा हुआ था… लेकिन थोड़ा *रिलैक्स* हो गया था।


---


### **शादी में — जब अंकिता ने अपनी पहचान खो दी**


शादी सज-धजकर सजी थी।  

अंकित ने पहले रोहन और रोशनी को गिफ्ट दिया।  

फिर अनीता गिफ्ट देने गई — रोशनी ने उससे पूछा — “हस्बैंड कहाँ हैं? आप अकेले आईं?”


अनीता ने मुस्कुराकर कहा — “उन्हें कुछ काम था।”


उधर, अंकित एक कोने में बैठा था — घबराया हुआ, असहज।  

तभी रोहन का एक दोस्त आया — “रोहन ने भेजा है। कहा — धन्यवाद कहना, कि आप आए।  

उन्हें पता है — आपको सिगरेट पसंद है… और आप यहाँ बोर हो रहे हैं।  

तो उन्होंने मुझे भेजा — आपको सिगरेट पीने के लिए बाहर ले जाने के लिए।”


अंकित ने रोहन की ओर देखा — रोहन ने हाथ जोड़कर धन्यवाद का इशारा किया।  

उनकी नज़रें मिलीं… और अंकित के चेहरे पर *हँसी* आ गई।


वह रोहन के दोस्त के साथ बाहर निकला —  

जहाँ उसने जी भरकर सिगरेट पी — और थोड़ी-थोड़ी करके… पीना भी शुरू किया।  

पता नहीं कब… *बहुत ज्यादा* हो गया।


अनीता ने उसके लिए अलग कैब बुक करवा दी।  

खुद गाड़ी से घर लौटी।


अंकित घर पहुँचते ही सो गया — थका हुआ, बेहोश सा।  

लेकिन अनीता की नींद उड़ चुकी थी।


उसने अंकित को देखा — उसके चेहरे पर *मासूमियत* थी।  

वह अपने पहले प्यार की भावना महसूस कर रही थी — जो उस समय भी सच थी… और आज भी सच थी।


लेकिन…  

*जो सच नहीं था — वो थी बदला लेने की तड़प।*


अनीता गंभीर हो गई।  

उसने धीरे से कहा — “क्या मेरा बदला पूरा हो गया है?  

या… अभी बहुत कुछ बाकी है?”


क्योंकि —  

*रोशनी से मिलकर उसने ही अंकित को कंपनी से निकालवाया था।*  

*शादी से ठीक पहले, दूसरी कंपनी से भी — अपनी जान-पहचान लगाकर — उसे बाहर किया था।*  

*जानबूझकर शादी की डिमांड्स बढ़ाई थीं — ताकि अंकित फँसे।*  

*उसी ने स्थानीय गुंडे से साजिश की — कम ब्याज पर पैसे दिलवाए… फिर भुगतान न होने पर — पिटाई, घर में पिटाई, ऑफिस जाते रास्ते में पिटाई… सब कुछ!*  


और आज —  

*अंकित अपनी असली पहचान खोकर — एक खूबसूरत लड़की के गेट पर — अनीता के सामने — बेहोश पड़ा था।*


अनीता ने एक लंबी साँस ली —  

“नहीं… अभी बदला पूरा नहीं हुआ है।  

अभी अंकित को बहुत कुछ झेलना बाकी है।  

अभी तो मुझे उसे सिखाना बाकी है —  

*बेइज्जत होना क्या होता है…*  

*घर में घुट-घुटकर रहना क्या होता है…*  

*कमरे में भूखा-प्यासा बंद कर दिया जाना क्या होता है…*  

और मैं उसे अपने से दूर नहीं जाने दूँगी —  

*चाहे इसके लिए मुझे उसे हमेशा के लिए लड़की ही क्यों न बनाना पड़े।*  

*इसके लिए… मैं किसी भी हद तक जाऊँगी।”*


अनीता ने एक लंबी साँस ली —

"नहीं… अभी बदला पूरा नहीं हुआ है।

अभी अंकित को बहुत कुछ झेलना बाकी है।

अभी तो मुझे उसे सिखाना बाकी है —

बेइज्जत होना क्या होता है…

घर में घुट-घुटकर रहना क्या होता है…

कमरे में भूखा-प्यासा बंद कर दिया जाना क्या होता है…

और मैं उसे अपने से दूर नहीं जाने दूँगी —

चाहे इसके लिए मुझे उसे हमेशा के लिए लड़की ही क्यों न बनाना पड़े।

इसके लिए… मैं किसी भी हद तक जाऊँगी।"


वह उठी — और अपने बैग से एक छोटा सा लिफाफा निकाला।

उसमें कुछ दस्तावेज़ थे — जिन्हें उसने बड़ी सावधानी से छुपाकर रखा था।


उसने उन्हें खोला — और एक बार फिर पढ़ा:


"Gender Reassignment Surgery — Consent Form"

"Legal Name Change Application — Ankit Sharma to Ankita Sharma"

"Permanent Feminization Procedure — Hormonal Treatment Agreement"


अनीता की उँगलियाँ काँप रहीं थीं — लेकिन चेहरे पर एक ठंडी, गहरी मुस्कान थी।


"अंकित… तुमने मुझे तोड़ा था… अपमानित किया था… मेरी ज़िंदगी बर्बाद की थी।

अब… मैं तुम्हारी पहचान ही मिटा दूँगी।

तुम मुझसे दूर भागना चाहोगे… लेकिन तुम भाग नहीं पाओगे।

क्योंकि जल्द ही… तुम अंकित नहीं रहोगे।

तुम अंकिता बन जाओगे — हमेशा के लिए।"


उसने उन कागज़ात को वापस लिफाफे में रखा… और अंकित की ओर देखा।


वह अभी भी सोया हुआ था — बेहोश… थका हुआ… दुल्हन के वेश में।


अनीता ने धीरे से उसके माथे पर हाथ फेरा — और फुसफुसाई:


"सो जाओ, अंकिता… क्योंकि जब तुम उठोगे… तब तक बहुत कुछ बदल चुका होगा।"


अगली सुबह — जब सब कुछ बदल गया

सुबह की पहली किरण के साथ — अंकित की आँख खुली।


सिर में दर्द… शरीर में थकान… और एक अजीब सी बेचैनी।


वह उठा — और आईने में देखा।


दुल्हन का पूरा श्रृंगार अब भी वैसे का वैसा था।


लेकिन कुछ अलग था।


उसने अपने हाथों को देखा — कलीरें अब भी पहनी हुई थीं।

उसने अपनी उँगलियाँ देखीं — बिछिया अब भी थीं।

उसने अपने पैर देखे — पायल अब भी छनछना रही थीं।


"अनीता?" उसने पुकारा — लेकिन घर में सन्नाटा था।


तभी — उसकी नज़र टेबल पर पड़ी।


वहाँ एक लिफाफा रखा था — और उस पर लिखा था:


"अंकिता के नाम"


उसके हाथ काँप गए।


उसने लिफाफा खोला — और अंदर एक चिट्ठी थी:


चिट्ठी — जो सब कुछ बदल देगी

"प्रिय अंकिता,


जब तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे होगे — तब तक मैं घर से जा चुकी होऊँगी।

लेकिन घबराओ मत — मैं वापस आऊँगी।

बस… कुछ काम निपटाने जा रही हूँ।

कुछ ऐसा काम… जो तुम्हारी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगा।


तुमने मुझे तोड़ा था… अपमानित किया था… मेरी पहचान मिटा दी थी।

अब मैं वही करूँगी — तुम्हारे साथ।


मैंने तुम्हारे सारे दस्तावेज़ों में बदलाव करवा दिए हैं।

तुम्हारा आधार कार्ड… पैन कार्ड… बैंक अकाउंट… सब कुछ।

अब तुम कानूनी रूप से "अंकित" नहीं… बल्कि "अंकिता" हो।


और हाँ… एक बात और।

मैंने एक डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया है।

जल्द ही… तुम्हारा हार्मोनल ट्रीटमेंट शुरू होगा।

फिर… सर्जरी।


अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं:

या तो… तुम मेरे साथ रहो — अंकिता बनकर।

या फिर… तुम भाग जाओ — और दुनिया को बताओ कि तुम अंकित हो।

लेकिन जानते हो?

कोई तुम्हारा यकीन नहीं करेगा।

क्योंकि तुम्हारे सारे कागज़ात… तुम्हारी पहचान… तुम्हारा चेहरा… सब कुछ "अंकिता" है।


तो सोच लो — क्या करना है।

मैं शाम तक वापस आऊँगी।

तब तक… आराम करो, अंकिता।

तुम्हारी… अनीता।"


अंकित का दिल बैठ गया।

उसके हाथ से चिट्ठी गिर गई।


वह दौड़कर दरवाज़े की तरफ गया — लेकिन दरवाज़ा बाहर से बंद था।


उसने ज़ोर से धक्का दिया — लेकिन कुछ नहीं हुआ।


वह चीखा — "अनीता! दरवाज़ा खोलो! ये क्या मज़ाक है?!"


लेकिन कोई जवाब नहीं आया।


वह वापस कमरे में आया — और आईने के सामने खड़ा हो गया।


उसने अपने चेहरे को देखा — दुल्हन जैसा श्रृंगार… भारी ज्वेलरी… लाल साड़ी… मेहंदी… चूड़ियाँ…


और फिर — उसने अपने हाथों को देखा।


उँगलियों पर बिछिया — जो सुहागन की निशानी होती है।

माथे पर सिंदूर — जो पत्नी का प्रतीक है।

गले में मंगलसूत्र — जो बंधन का प्रमाण है।


उसकी आँखों में आँसू आ गए।


"मैं… अंकित हूँ… या अंकिता?"


तभी — उसके फोन पर एक मैसेज आया:

"तुम्हारे पास 24 घंटे हैं।

या तो तुम स्वीकार करो — कि तुम अंकिता हो।

या फिर… मैं तुम्हारी सारी तस्वीरें… वीडियो… सबूत… सबके सामने लीक कर दूँगी।

तुम्हारे दोस्त… तुम्हारे रिश्तेदार… तुम्हारा परिवार… सब जान जाएंगे।

फैसला तुम्हारा है।

— अनीता"


अंकित का दिमाग सुन्न हो गया।

वह धम्म से ज़मीन पर बैठ गया — हाथों में सिर लेकर।


"मैं क्या करूँ…?"


सस्पेंसफुल एंडिंग — जो दर्शकों को बेचैन कर दे:

और फिर — उसके फोन पर एक और मैसेज आया।


"P.S. — तुम्हारे माता-पिता आ रहे हैं।

कल शाम तक।

अब तुम्हें तय करना है —

उनके सामने तुम अंकित बनकर जाओगे… या अंकिता बनकर?

क्योंकि अगर तुमने अंकित बनने की कोशिश की…

तो मैं उन्हें सब कुछ बता दूँगी।

सब कुछ।

— तुम्हारी प्यारी पत्नी, अनीता।"


अंकित की आँखें फैल गईं।


उसके चेहरे पर दहशत… बेबसी… और गुस्सा — सब कुछ एक साथ था।


वह उठा — और आईने के सामने खड़ा हो गया।


उसने अपने चेहरे को देखा — और फिर धीरे से… बहुत धीरे से… मुस्कुराया।


लेकिन वो मुस्कान… डरावनी थी।



"क्या अंकित हार मान लेगा… और अंकिता बन जाएगा?"

"या फिर… वह अनीता के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाएगा?"

"और जब उसके माता-पिता आएंगे… तब क्या होगा?"

"क्या अनीता का बदला पूरा होगा… या कहानी में एक नया ट्विस्ट आने वाला है?"


आखिरी लाइन — जो दर्शकों को कमेंट करने पर मजबूर कर दे:

अंकित ने आईने में अपनी तस्वीर देखी — और धीरे से बोला:


"ठीक है, अनीता… तुमने खेल शुरू किया है।

अब मैं तुम्हें दिखाऊँगा — कि अंकिता बनना… कितना आसान है।

लेकिन… तुम्हें पता नहीं —

कि मैंने भी एक प्लान बना लिया है।

और जब वो प्लान सामने आएगा…

तब तुम्हें पता चलेगा — कि असली खेल… अभी शुरू हुआ है।"


वह मुस्कुराया — और स्क्रीन ब्लैक हो गई।


स्क्रीन पर लिखा आता है:

"क्या अंकित के पास कोई प्लान है?"

"या फिर वह सिर्फ ब्लफ कर रहा है?"

"और अनीता का अगला कदम क्या होगा?"

"जानने के लिए… अगला वीडियो देखें।"

"और कमेंट में बताएं —"

"क्या अंकित को अंकिता बन जाना चाहिए?"

"या फिर उसे अनीता के खिलाफ लड़ना चाहिए?"

"आपकी राय से… अगली कहानी का रुख तय होगा!"


कहानी अभी खत्म नहीं हुई है यह से कहानी शुरू हुई है क्यूँ के अब अनीता अंकिता को पूरी तरह से लड़की बनाएगी उसक ऑपरेशन करवा कर उसे सिर्फ बाहर से नहीं अंदर से भी एक लड़की बनाएगी 


लड़की बना कर उसके साथ सुहागरात पर अनीता अंकित के दोनों हाथ और पैर बेड से बांध देगी और फिर मोमबत्ती से टॉर्चर करेगी उसे एक घरेलू बहु बना कर दिन भर घर के काम कराएगी और रात मे उसे डॉगी के पोज मे बांध कर खुद एक मॉडर्न और क्रूर  वाइफ बन कर लैटेक्स के टाइट फिटिंग कपड़े पहेन कर हाई बूट पहेन कर हाथों मे हंटर लेकर अंकित को याद दिलाएगी के असली दर्द क्या होता है क्या होता है एक औरत का दर्द , 

ये तो बस एक झलक है असली मजा तो बाकी है , पूरी कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गेट पासवर्ड पर क्लिक करके फोरम  भरे और पासवर्ड आपके ईमेल id  पर भेज दिया जाएगा। 


जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है!
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