Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

Crossdressing Hindi Story | गोपाल जांभुलकर बना शीतल इंगले की गंगू

📝 Story Preview:

🔥 यार, ये कहानी पढ़कर तुम्हारा खड़ा हो जाएगा और दिमाग में तूफान आ जाएगा! 🔥

मेरा नाम गोपाल जांभुलकर है… एक साधारण, सीधा-सादा लड़का।

लेकिन एक रात… मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

कॉलेज की पहली रैगिंग में शितल इंगले और उसकी ६ सहेलियों ने मुझे मुर्गा बनाया, नंगा किया, वैक्सिंग करवाई, चोली-चुननी पहनाई, ब्रेस्ट्स चिपकाए, लिंग पर टाइटेनियम चेस्टिटी केज चढ़ा दिया… और मुझे गंगू बना दिया।

फिर शुरू हुआ वो नरक… जिसे कोई सपने में भी नहीं सोच सकता।

घर पर 24x7 CCTV, रोज़ सुबह टॉयलेट हाथ से साफ़ करना, डायपर पहनना, दूध की बोतल चूसना, साड़ी-चोली-नथनी-मेहंदी में दुल्हन बनकर खड़े रहना, पेंसिल हील्स में घंटों चलना, vibrating plug से तड़पना, थप्पड़, चाबुक, pegging… और सबसे भयानक — public humiliation

शितल ने मेरे सारे सोशल मीडिया अकाउंट्स हैक कर लिए। लड़की वाला नाम, लड़की वाली फोटोज़, लड़की वाली बायो… और मैं कुछ भी बदल नहीं पाया।

जब भी मैंने बदलने की कोशिश की… OTP उसके फोन पर गया।

अब मैं पूरी तरह उसका हूँ

पर आखिर में… जब अनीता मुझे दुल्हन बनकर खड़े देखकर रो पड़ी… और शितल दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी… तब पता चला —

ये सिर्फ़ शुरुआत थी।

अब सच्ची सजा शुरू हो रही है।

परमानेंट।

बेरहम।

बिना किसी सीमा के।

ये वो कहानी है जिसे पढ़कर तुम रात भर सो नहीं पाओगे…

क्योंकि गोपाल अब हमेशा के लिए गंगू बन चुका है

पढ़ोगे तो छोड़ नहीं पाओगे।


मेरा नाम गोपाल जांभुलकर है।  


आज भी जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, तो सीने में एक अजीब-सी हलचल सी होने लगती है। जैसे कोई पुराना घाव फिर से हरा हो गया हो। दोस्तों, मैं एक साधारण-सा लड़का हूँ। मध्यमवर्गीय परिवार से। लेकिन मेरे सपने बड़े-बड़े हैं। और सबसे बड़ी बात – मैं गलत को गलत कहने वाला हूँ। चुप रहने वाला नहीं। शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी भी है।  


उस दिन सुबह घर का माहौल वैसा ही था, जैसा हर रोज होता है – हँसी-खुशी भरा, गर्म चाय की महक और माँ की आवाज़ में प्यार।  


“देवर जी, चाय ठंडी हो रही है, जल्दी पी लो,” भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा। वो हमेशा मुझे चिढ़ाती रहती थीं, लेकिन चिढ़ाने में भी ममता छुपी होती थी।  


मैंने चाय का कप हाथ में लिया। पिता जी अखबार पढ़ रहे थे, भैया ऑफिस के लिए तैयार हो रहे थे, माँ रसोई में कुछ गुनगुना रही थीं।  


भाभी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोलीं, “सुनो देवर जी… स्कूल और कॉलेज दो अलग चीजें हैं। स्कूल में टीचर का डर, प्रिंसिपल का रौब। लेकिन कॉलेज… वहाँ दुनिया अलग है। लड़के-लड़कियाँ फिल्मों की दुनिया में जीते हैं। जब तक जरूरी न हो, किसी के झगड़े में मत पड़ना। वरना किसी और की मुसीबत तुम्हारे गले पड़ जाएगी। समझे?”  


मैंने हँसकर कहा, “भाभी, आप चिंता मत करो। मैं पढ़ने जा रहा हूँ, लड़ाई करने नहीं।”  


लेकिन अंदर ही अंदर मैं जानता था – मैं झूठ बोल रहा था। क्योंकि गलत देखकर चुप रहना मेरे बस का नहीं।  


घर से निकलते वक्त माँ ने मेरे माथे पर तिलक लगाया, पिता जी ने कंधा थपथपाया। भाभी ने आखिरी बार चेतावनी भरी नजर से देखा। मैंने बैग कंधे पर डाला और बाहर निकल गया।  


सुबह की धूप में पूरा मोहल्ला जगमगा रहा था। नागपुर का वो गर्मी भरा जून का दिन। हवा में मिट्टी और आम की महक थी। मैं बस स्टॉप की तरफ बढ़ा। मन में हजारों सपने थे।  


“मैं एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाऊँगा जो देश की सुरक्षा में मदद करे। साइबर अटैक रोकने वाला, सीमा पर नजर रखने वाला… कुछ ऐसा जो सच में देश के काम आए।”  


पहली बार कॉलेज का गेट देखा। हार्टबीट तेज हो गई। स्कूल तो हमेशा टीचर की respect और प्रिंसिपल के डर से भरा था। लेकिन यहाँ… यहाँ सब कुछ अलग था। लड़के लूखे बनने की कोशिश कर रहे थे, लड़कियाँ चमक-दमक वाली दुनिया में जी रही थीं।  


मैं गेट के अंदर घुसा ही था कि…  


एक दृश्य ने मेरे पैर जमा दिए।  


सामने, कॉलेज के मुख्य गलियारे के पास, गर्मी की तपती धूप में एक लड़की “मुर्गा” बनी खड़ी थी। उसके घुटने मुड़े हुए, हाथों को कान पर लगाए, सिर नीचे। पूरा शरीर काँप रहा था। उसका नाम बाद में पता चला – अनीता।  


साधारण-सी लड़की। दो चोटी में बंधे बाल, सफेद शर्ट और नीली लेंगिंग – स्कूल ड्रेस जैसी। चेहरा लाल, पसीने से तर। आँखों में शर्म, गुस्सा और बेबसी का मिश्रण। वो हिल भी नहीं पा रही थी।  


और उसे घेरकर खड़ी थीं सात लड़कियाँ।  


सबकी उम्र करीब १९-२०। लेकिन लग रही थीं किसी फिल्म की हीरोइन की तरह।  


सबके बाल बहुत लंबे – घुटनों के नीचे तक। अलग-अलग स्टाइल: एक की पॉनीटेल, एक के खुले घने बाल हवा में लहरा रहे, एक ने बड़ा-सा हेयर बन बनाया, एक ने लंबी चोटी…  


और कपड़े?  


शितल इंगले – सबसे आगे खड़ी, हल्टर नेक बैकलेस सिल्की साटन ड्रेस पहने, जो धूप में चमक रही थी। उसके साथ शिवानी देशमुख (पॉनीटेल, मरमेड गाउन), नंदिनी छोटमल (खुले बाल, हल्टर नेक लेस वाली नाइट ड्रेस), अंजलि राउत (बड़ा हेयर बन, बैकलेस गाउन), रीना आमभोरे (लंबी चोटी, शाइनी सिल्की ड्रेस), आश्विनी वानखेड़े (पॉनीटेल, बल गाउन) और प्रतिक्षा डोंगरे (खुले बाल, लेस वाली मरमेड स्टाइल)।  


सब हँस रही थीं। जोर-जोर से।  


“अरे अनीता… थक गई क्या? और जोर से मुर्गा बना ना!” शितल ने हँसते हुए कहा।  


अनीता के होंठ काँप रहे थे। आँखों से आँसू टपक रहे थे, लेकिन वो चुप थी।  


मेरा खून खौल गया।  


मैं आगे बढ़ा। आवाज़ में गुस्सा और अधिकार था।  


“ये क्या बकवास है?!” मैं चिल्लाया। “रैगिंग गैरकानूनी है! तुम सबको पता नहीं? मैं अभी प्रिंसिपल के पास जा रहा हूँ!”  


सातों लड़कियाँ एकदम चुप हो गईं।  


शितल ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में पहले हैबाई , फिर क्रोध।  


“तुम कौन हो बे? नया आया है ना? पहले दिन से ही हीरो बनने चला है?” उसने तीखे स्वर में कहा।  


“हीरो नहीं, इंसान हूँ,” मैंने जवाब दिया। “और इंसानियत सिखाने आया हूँ। इसे छोड़ो। अभी।”  


शिवानी ने हँसकर कहा, “अरे वाह… प्रिंसिपल को शिकायत करेगा? बहुत बहादुर है रे तू।”  


नंदिनी ने मेरी तरफ एक कटाक्ष किया, “इस गलती की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, नये भाई। याद रखना।”  


शितल ने अंत में मुझे घूरा। उसकी आँखों में एक चेतावनी थी – जैसे कह रही हो, “तुमने आज बहुत बड़ी गलती कर दी है।”  


फिर सब हँसते-हँसते चली गईं। अनीता को अभी भी मुर्गा बनाए छोड़कर।  


मैं तुरंत उसके पास गया।  


“बहन… उठो।”  


मेरा हाथ बढ़ाया। उसने काँपते हाथ से पकड़ा। उसके पैर लडखड़ा रहे थे। पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ। चेहरे पर शर्म के निशान।  


मैंने पानी की बोतल निकाली, “पी लो।”  


वो चुपचाप पीने लगी। आँखें नीचे थीं।  


“धन्यवाद…” उसने फुसफुसाकर कहा।  


“नाम क्या है तुम्हारा?” मैंने पूछा।  


“अनीता…”  


“मेरा गोपाल।”  


हम दोनों एक पल के लिए चुप रहे। हवा में सिर्फ उसकी तेज साँसें सुनाई दे रही थीं।  


फिर मैंने कहा, “तुम्हें किसी ने कुछ नहीं कहा। मैं हूँ ना।”  


अनीता ने सिर्फ सिर हिलाया। फिर हम दोनों अलग-अलग रास्ते चल पड़े।  


लेकिन मैं जानता था…  


ये मेरा कॉलेज का पहला दिन था।  


और ये सिर्फ शुरुआत थी।  


एक ऐसी शुरुआत, जिसने मेरी पूरी जिंदगी बदल देने वाली थी।  


क्योंकि शितल इंगले और उसकी सहेलियों ने मुझे कभी नहीं भुलाया।  


और ना ही मैं उन्हें।  




गोपाल और अनीता की दोस्ती 

अगला दिन…

कॉलेज का गेट अभी खुला ही था कि मैंने देखा — अनीता गेट के पास खड़ी थी।


सुबह की नरम धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसने आज हल्का सा सफेद सलवार कमीज पहनी थी, बालों में दो छोटी-छोटी चोटियाँ। हाथ में एक गुलाबी गुलाब का फूल और एक छोटी-सी चॉकलेट।

जैसे ही मैं पास पहुँचा, उसने झिझकते हुए मुझे गुलाब थमा दिया।

“कल… तुमने मेरी वजह से बहुत रिस्क लिया था,” उसकी आवाज़ बहुत धीमी और मुलायम थी। “थैंक यू, गोपाल।”

मैंने गुलाब को सूँघा। उसकी महक अभी भी मेरे दिल में है।

“कुछ नहीं अनीता। कोई भी इंसान होता तो यही करता,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

फिर हम दोनों ने अपना परिचय पूरा किया।

वो भी मेरा ही सपना रखती थी — साइबर सिक्योरिटी। वो चाहती थी कि हमारा देश इस मामले में दुनिया में नंबर वन बने। हम दोनों घंटों तक बातें करते रहे। एक-दूसरे की बात सुनते हुए आँखें चमक रही थीं।

धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं।

कभी कॉलेज के कैंटीन में चाय, कभी बाहर की छोटी वाली कॉफी शॉप में “कॉफी डेट”। वो शर्माती थी, मैं चुपचाप उसे देखता रहता। उसके हँसने में कुछ ऐसा था जो मेरे सारे दर्द भुला देता। धीरे-धीरे वो प्यार… बहुत प्यार… होने लगा।

घर पर भाभी को शक हो गया था।

“देवर जी, आजकल चेहरा चमक रहा है। कोई लड़की तो नहीं?” वो मुस्कुराते हुए चिढ़ातीं।

“अरे भाभी, कुछ नहीं,” मैं हँसकर टाल जाता। लेकिन अंदर से डर भी लगता — अगर घरवालों को पता चल गया तो?


फिर वो दिन आया…

मैं जानबूझकर जल्दी पहुँच गया था। आज अनीता के साथ पहली मूवी देखने जाना था। मन में उत्साह था, लेकिन दिन कुछ खराब चल रहा था।

कॉलेज गेट के अंदर घुसते ही…

शितल और उसकी पूरी गैंग। सातों।

शितल ने मुझे देखते ही अपनी लंबी चोटी को एक झटके से पीछे किया। आज वो काली हल्टर नेक सिल्की ड्रेस पहने थी, जो उसकी कमर तक चिपकी हुई थी। बाकी सहेलियाँ भी आज और ज्यादा स्टाइलिश लग रही थीं।

शितल आगे बढ़ी। उसने मेरे हाथ में एक छोटी-सी परची थमा दी।

“कॉलेज के बाद ठीक तीन बजे। कैंटीन के पीछे वाले बगीचे में। अगर असली मर्द का बच्चा है तो आना। वरना…” उसकी आँखों में जहरीली मुस्कान थी, “तेरी हीरोइन को कल पूरे कॉलेज के सामने नंगा करके थप्पड़ मारेंगे। उसका सारा कॉन्फिडेंस तोड़ देंगे। फैसला तेरा।”

वो परची मेरे हाथ में काँप रही थी।

मैं कुछ बोलने ही वाला था कि वे सब हँसती हुई चली गईं।

कुछ ही देर बाद अनीता आ गई। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“गोपाल… वो लड़कियाँ यहाँ क्या कर रही थीं? क्या बोल रही थीं? तुम ठीक तो हो?” उसकी आँखों में चिंता साफ दिख रही थी।

मैंने जबरन मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं यार। बस पुबाई  बात। तू चिंता मत कर। चल, मूवी देखने चलते हैं।”

अनीता ने मेरे हाथ को और जोर से पकड़ा।

“गोपाल, इनसे दूर रहो। खासकर शितल से। वो यहाँ के MLA की बेटी है। उसके पापा की बहुत बड़ी पहचान है… माफिया तक से कनेक्शन बताते हैं। वो जो चाहे कर सकती है। प्लीज… पंगा मत लेना।”

मैंने सिर हिलाया, लेकिन अंदर कुछ और ही तय हो चुका था।

मैंने अनीता से झूठ बोला, “अरे… अचानक पेट में बहुत दर्द हो रहा है। मुझे घर जाना पड़ेगा। सॉरी यार, मूवी अगली बार।”

उसने चिंतित होकर मेरे माथे पर हाथ रखा। “ठीक है… दवा लेना। मैं घर छोड़ दूँ?”

“नहीं… तू जा। मैं ठीक हूँ।”

जैसे ही वो चली गई, मैंने गहरी साँस ली।

स्कूल में लड़ाइयाँ होती थीं — धक्का-मुक्की, मुक्के। लेकिन लड़कियों से? क्या बिगाड़ लेंगी ये? मैंने सोचा।

मैंने कंधे घुमाए, हल्का वार्मअप किया। घूँसे की मुद्रा बनाई। फिर ठीक तीन बजे…

कॉलेज के कैंटीन के पीछे वाले पुराने बगीचे में पहुँच गया।

वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ पुबाई  पीपल की छाँव, सूखी पत्तियाँ और दूर से आती हुई चिड़ियों की आवाज़।

मेरा दिल तेज़ धड़क रहा था। लेकिन डर नहीं… गुस्सा था।

मैंने इंतज़ार किया।

तीन बजकर दस मिनट हुए…

तभी पीछे से आवाज़ आई।

“तो आ गया मेरा छोटा हीरो…”

मैं मुड़ा।

शितल… अकेली।

लेकिन उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो मुझे आज भी याद आती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

“अब बोल… क्या हिसाब चुकाना है?” मैंने सीधे पूछा।

शितल धीरे-धीरे मेरे करीब आई। उसकी सिल्की ड्रेस हवा में फरफरा रही थी। बाल खुलकर कमर तक लहरा रहे थे।

उसने मेरी आँखों में सीधे देखा और बहुत धीरे से, लेकिन जहरीले स्वर में बोली —

“हिसाब तो बहुत बड़ा है, गोपाल जांभुलकर… बहुत बड़ा।”

उस दिन कैंटीन के पीछे वाले पुराने बगीचे में जब मैं खड़ा था, तो दिल में आग थी। लेकिन कुछ ही मिनटों में वो आग राख हो गई।

शितल अकेली नहीं आई।

पूरी गैंग थी — शिवानी, नंदिनी, अंजलि, रीना, आश्विनी और प्रतिक्षा। सातों। सबकी लंबी-लंबी चोटियाँ, सिल्की ड्रेसेज चमक रही थीं। शाम ढल रही थी, लेकिन उनकी आँखों में चमक और भी तेज थी।

शितल मेरे सामने आई। उसकी मुस्कान में जहर था।

“तो आ गया मेरा छोटा हीरो। अच्छा। अब सुन अच्छे से। मुझे बात दोहराना पसंद नहीं। जो कहूँगी, वो करना पड़ेगा। वरना तेरी अनीता को कल पूरे कॉलेज के सामने…” उसने अधूरी बात को हवा में लटका दिया।

मैं चुप रहा।

“अब ध्यान से सुन। तुझे प्रिंसिपल सर के ऑफिस तक मुर्गा बनकर जाना है। बिना रुके, बिना गिरे, और ‘कुक-डू-कू’ की आवाज़ करते हुए। हम यहाँ चाय पीते हैं। जब तक हम पहुँचें, तुझे वहाँ मुर्गा बनकर खड़ा रहना है। अगर टास्क सही किया तो इनाम, वरना सजा। समय शुरू।”

मैंने चारों तरफ देखा। शाम का वक्त था, कॉलेज लगभग खाली। मैंने सोचा — अकेले में क्या फर्क पड़ता है? बस जल्दी खत्म करूँ।

मैं मुर्गा बन गया। घुटने मोड़े, हाथ कान पर, सिर नीचे। गर्मी अभी भी बाकी थी। पसीना बहने लगा। हर कदम पर घुटनों में दर्द, कमर में ऐंठन। लेकिन मैं चला। ‘कुक-डू-कू… कुक-डू-कू…’

जब मैं ऑफिस के बाहर पहुँचा, तो साँस फूल रही थी। पूरा शरीर पसीने से तर। गला सूख गया था।

शितल और सब 2 मिनट बाद आईं।

“बहुत अच्छे। अब मुर्गा बनकर ही खड़ा रह। हम आ रहे हैं,” शितल ने कहा।

जब उसने ऑफिस का ताला खोला, तो मैं अंदर घुसा।

“अब असली गेम शुरू,” शितल बोली। “तेरा मोबाइल अंदर रखा है। इस चाबी के गुच्छे से ताला खोल। हर गलत कोशिश पर एक कपड़ा उतारना पड़ेगा। अगर सारे कपड़े उतरने से पहले ताला खुल गया तो मोबाइल लेकर घर जा। वरना जो हम कहेंगे, वो करेगा। मंजूर?”

मैंने सिर हिलाया। क्या विकल्प था?

पहले 7 कोशिशें फेल।

शितल हँसी, “तो 7 कपड़े उतार। शुरू कर।”

मैंने जूते उतारे… मोजे… शर्ट… बनियान… बेल्ट… पैंट…

आखिरी में सिर्फ अंडरवियर बचा।

“उतार!” शितल चिल्लाई।

मेरा हाथ काँप रहा था। दिल में हजार सवाल — “ये क्या हो रहा है? मैं कौन हूँ? क्यों सह रहा हूँ? अनीता को बचाने के चक्कर में…”

मैंने अंडरवियर भी उतार दिया। दोनों हाथों से प्राइवेट पार्ट्स ढक लिए। शर्म से पूरा शरीर जल रहा था।

तभी एक लड़की (आश्विनी) ने मेरे सारे कपड़े इकट्ठे किए और स्कूटी की डिग्गी में रखकर कैंपस से बाहर चली गई। मैं चीखा, “अरे रुक!” लेकिन वो जा चुकी थी।

अब मैं बिल्कुल नंगा खड़ा था।

सब लड़कियाँ जोर-जोर से हँसने लगीं। शितल ने उन्हें चुप कराया।

“अभी ताला नहीं खुला। तो अब पनिशमेंट। हर गलत कोशिश पर अब तुझे हमारी कपड़े पहनने पड़ेंगे।”

मैंने चाबी ली। चौथी कोशिश में ताला खुल गया।

मैंने राहत की साँस ली।

लेकिन शितल मुस्कुराई, “3 गलत कोशिशें हुईं। तो तीन कपड़े। तैयार हो जाओ कृष्णा को गंगू  बनाने के लिए।”

सब हँस पड़ीं।

पहली सजा — मेरे हाथों में 24-24 काँच की चूड़ियाँ।

दूसरी — शितल की चोली-चुननी (जो उसके बदन पर फिट बैठती थी, मेरे ऊपर थोड़ी टाइट पड़ रही थी)।

तीसरी — पूरा मेकअप। लिपस्टिक, क्रीम, रोज़ पाउडर, आइलाइनर।

फिर मेरे पैरों में डांस क्लास वाले घुँघरू बाँध दिए। और बहुत ऊँची हील्स वाली सैंडल। मैं खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। हर कदम पर ‘छम-छम’ की तेज़ आवाज़।

मेरा दिल रो रहा था। दिमाग चीख रहा था — “ये मैं नहीं हूँ… ये मेरी क्या हालत हो गई… अनीता को अगर पता चला तो…”

शितल ने मुझे आईने के सामने खड़ा किया।

मैंने खुद को देखा — लाल चोली-चुननी, मेकअप, चूड़ियाँ, घुँघरू, हील्स।

आँखों से आँसू बहने लगे।

“अब चल। कॉलेज से बाहर,” शितल ने कहा।

मैंने चेहरे पर चुननी से घूँघट कर लिया। शर्म से सिर नीचे था।

रोड पर कुछ गाड़ियाँ और बाइक गुजर रही थीं। लोग घूर रहे थे। कोई हँस रहा था। मेरे आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

मैंने बहुत मुश्किल से शितल से कहा, “प्लीज… यहाँ से ले चलो। सब देख रहे हैं। मुझे दया करो… जाने दो…”

शितल हँसी।

“अभी शुरुआत है dear। पहले यहाँ 20 उक-बैठ कर। कान पकड़कर। और हर बार बोलना — ‘मैं गंगू  हूँ’। 20 बार। फिर सोचेंगे।”

मेरे आँसू फूट पड़े। आवाज़ रुआँसी हो गई।

“प्लीज… मत करवाओ…”

“1 मिनट में नहीं किया तो यहीं छोड़कर चले जाएँगे। बिना कपड़ों के, बिना पैसे के घर कैसे जाएगा? घरवालों के सामने क्या कहेगा?”

मैंने चारों तरफ देखा। कोई राहत नहीं।

मैंने घूँघट हटाया, कान पकड़े और तेज़ी से उक-बैठ करने लगा।

“मैं गंगू  हूँ… मैं गंगू  हूँ…”

हर बार घुँघरू की आवाज़, चूड़ियों की खनक, हील्स की अस्थिरता… सब कुछ मुझे और शर्मिंदा कर रहा था।

20 बार पूरा किया।

सब लड़कियाँ ताली बजाकर हँस रही थीं।

फिर उन्होंने गाड़ी स्टार्ट की। मुझे शितल के पीछे बैठना पड़ा। चोली-चुननी में दोनों तरफ पैर नहीं कर पा रहा था। लड़कियों की तरह एक तरफ पैर करके बैठ गया।

सब मुझे देखकर और भी जोर से हँसने लगीं।

गाड़ी चल पड़ी।

मेरा दिल टूट रहा था।

सिर्फ एक सवाल बार-बार मन में घूम रहा था —

“अब आगे क्या होगा… और मैं इस से कैसे बाहर निकलूँगा?”

लड़कियों के कपड़ों मे आउटिंग 


गाड़ी चल रही थी।

मैं शितल के पीछे एक तरफ पैर करके बैठा हुआ था, जैसे लड़कियाँ बैठती हैं। लाल चोली-चुननी मेरे शरीर पर चिपकी हुई थी। घुँघरू हर हलचल पर छम-छम कर रहे थे। चूड़ियाँ खनक रही थीं। ऊँची हील्स की वजह से पैर दर्द कर रहे थे। मेकअप से चेहरा भारी लग रहा था।

शितल जानबूझकर सबसे भीड़ वाली सड़कों पर गाड़ी घुमा रही थी — नागपुर का शाम का पीक आवर। ब्रेक बार-बार मार रही थी, तेज़ी से मोड़ ले रही थी, ताकि मेरा घूँघट बार-बार हट जाए।

मुझे बहुत परेशानी हो रही थी। एक तो साइड में पैर करके बैठना, ऊपर से घूँघट संभालना। हर ब्रेक पर मेरा शरीर उसके पीछे झुक जाता। आखिरकार मैंने हिम्मत करके आँखें बंद कर लीं और उसकी कमर में हाथ डालकर उसे पेट से कसकर पकड़ लिया।

अब जो होना हो सो हो।

शितल की कमर और पेट सचमुच बहुत नरम था। वो लड़की थी आखिर। मेरे अचानक छूने से उसे झटका तो लगा। एक पल के लिए उसका शरीर सख्त हुआ, लेकिन फिर… वो मुस्कुराई। शायद उसे मेरा टच अच्छा लगने लगा था। अब वो और जानबूझकर ब्रेक मार रही थी, ताकि मेरा हाथ कभी उसके स्तनों के पास, कभी नीचे तक चला जाए।

अचानक उसने गाड़ी एक जगह रोकी।

“गंगू  के बच्चे… क्या कर रहा था?” उसकी आवाज़ में शरारत और गुस्सा दोनों थे।

मैंने काँपती आवाज़ में कहा, “आप ही गाड़ी ऐसे चला रही थीं… डर लग रहा था तो कस के पकड़ लिया।”

शितल हँसी। पीछे बैठी शिवानी, नंदिनी सब हँस पड़ीं।

“डर लग रहा था ना? अब असली डर आएगा। तेरे मोबाइल के लिए एक और टास्क है। पूरा कर दे तो सोचूँगी कपड़ों के बारे में। वरना…”

उसने गाड़ी से नीचे उतरने का इशारा किया।

“अभी नीचे उतर। सामने वाला ब्यूटी पार्लर देख रहा है ना? अकेला जाकर फुल बॉडी वैक्सिंग करवा। समझा?”

मेरे पैर थरथरा गए।

“क्या बोल रही हो शितल? मजाक मत करो… मैं ये नहीं कर सकता।” मेरी आवाज़ टूट गई।

“करना पड़ेगा। एक मिनट समय है। वरना घूँघट उठाकर चिल्लाऊँगी कि ये लड़का हमारी ड्रेस पहनकर हमें छेड़ रहा है।”

मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने उसके पैर छूने की कोशिश की।

“शितल… प्लीज… मैं तुम्हारे पैरों पर पड़ता हूँ। ये मत करो। वहाँ सब लड़कियाँ होंगी… मैं कपड़े कैसे उतारूँगा? वो मना कर देंगी…”

“3… 2…”

मेरा दिल धड़क रहा था। मैंने घूँघट को कसकर पकड़ा और सड़क पार की। लोग घूर रहे थे। कोई हँस रहा था। मैं ब्यूटी पार्लर के अंदर घुस गया और एक कोने में बैठ गया।

अंदर ज्यादा भीड़ नहीं थी। सिर्फ पार्लर की लड़कियाँ।

तभी एक लड़की (जो बाहर गई थी) वापस आई और बोली, “गर्ल्स, हमारे पास एक खास कस्टमर है। शटर बंद कर दो।”

मेरा दिल बैठ गया।

शटर बंद हुआ। पिछला गेट बंद किया गया।

“डरो मत… शितल ने मुझे सब बता दिया है,” उस लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा।

सब लड़कियाँ मेरे चारों तरफ आ गईं।

“घूँघट हटा लो गंगू  जी… अब कैसी शर्म? अभी तो सारा कपड़ा और शरीर भी दिखाना है।”

उन्होंने मेरा घूँघट हटाया। सब हँस पड़ीं।

“वाह… कितना चिकना घड़ा है! मेकअप और कपड़े डाल दो तो कोई पहचानेगा नहीं।”

फिर उन्होंने मेरी चोली-चुननी, घुँघरू, चूड़ियाँ सब उतार दिए। सिर्फ पैंटी रह गई। मुझे स्लीपिंग चेयर पर लिटा दिया। पूरी बॉडी पर वैक्स लगाई गई, पट्टियाँ चिपकाई गईं।

“मुँह खोलो,” एक लड़की ने कहा और मेरा मुँह एक मोटा रुमाल ठूँस दिया। “आवाज़ बाहर न जाए, इसलिए।”

दो लड़कियों ने मेरे हाथ पकड़े, दो ने पैर।

और फिर शुरू हुआ असली यातना।

एक-एक पट्टी बिना रहम के खींची जाने लगी। हर पट्टी के साथ लगता था जैसे शरीर से जान निकल रही हो। मेरी आँखों से आँसुओं की धार बहने लगी। दर्द इतना तेज था कि चीख भी नहीं निकल पा रही थी। सिर्फ रुमाल में दबी हुई कराह निकल रही थी।

लड़कियाँ हँस रही थीं। “अरे वाह… कितना मजा आ रहा है!”

आधे घंटे तक चला ये torture। जब आखिरी बाल भी जड़ से निकल गए, तो मेरी त्वचा जल रही थी।

उन्होंने मुझे बाथरूम में शावर लिया, बॉडी लोशन लगवाया, पेनकिलर दिया।

फिर नई ब्रा और पैंटी पहनाई गई।

मेकअप चेयर पर बिठाया गया।

लंबे बालों वाली विग फिट की गई — मेरी कमर तक पहुँच रही थी। बालों में चोटी डाली गई। नाखूनों पर पॉलिश। फेशियल। ब्लिचिंग क्रीम। आँखें बंद रखने को कहा गया।

जब आँखें खोलीं तो…

मेरी ब्रा के अंदर दो बड़े-बड़े सिलिकॉन ब्रेस्ट्स चिपके हुए थे। भारी, नकली, लेकिन बिल्कुल असली लग रहे थे।

मैंने छूने की कोशिश की, लेकिन रोका गया।

फिर कान और नाक छेद दिए गए। बड़े-बड़े झुमके और नथनी डाल दी गई।

मेरा पूरा शरीर अब लड़की जैसा हो चुका था।

नरम, चिकना, मेकअप वाला, लंबे बाल, ब्रेस्ट्स, नथनी, झुमके…

मैं आईने में खुद को देख रहा था।

आँखों से आँसू गिर रहे थे।

दिल में सिर्फ एक सवाल बार-बार घूम रहा था —

“गोपाल… तू कहाँ खो गया? तू कौन है अब? अनीता को अगर ये हालत दिख गई तो… घरवालों को पता चला तो…”

शितल बाहर से आवाज़ आई —

“गंगू … तैयार हो गई? अब असली मज़ा शुरू होता है।”

मैं काँप उठा।


गोपाल की सुहागरात 

शाम ढल चुकी थी जब शितल की गाड़ी एक पुराने बंगले के अंदर घुसी। नागपुर के बाहर का इलाका, जहाँ आस-पास कोई घर नहीं। मैं अभी भी उसी स्कूल यूनिफॉर्म वाली स्कर्ट, डबल चोटी और घुँघरू में था। हाथ पीछे हैंडकफ में जकड़े हुए।

घर के अंदर घुसते ही शितल मेरे सामने आई। उसकी आँखों में वही पुबाई  जहरीली मुस्कान थी।

“तो… कोई अंदाजा है अब तेरे साथ क्या होने वाला है?”

मैं चुप रहा। बस इतना ही बोला, “जितना हो चुका है… इससे बुरा और क्या हो सकता है? तुमने मेरी वैक्सिंग करवा दी, वो तो कपड़ों में छिप जाएगी… लेकिन नाक-कान छिदवाने की क्या जरूरत थी? घर जाकर मैं क्या जवाब दूँगा?”

मेरी आवाज़ काँप रही थी।

शितल हँसी। पीछे खड़ी शिवानी, नंदिनी, अंजलि सब हँस पड़ीं।

“बस इतनी-सी बात से डर गए? अभी तो बहुत कुछ बाकी है। वो सब छिपाने में तू खुद भूल जाएगा कि क्या छिपाना है और क्या बताना है। तू खुद कुछ नहीं छिपाएगा… उल्टा घरवालों को खुद दिखाएगा कि तूने ये सब क्यों किया।”

“क्या मतलब?” मैंने डरते हुए पूछा।

“कुछ नहीं… सब समझ जाएगा।”

उसने मेरी सैंडल उतरवा दी।

“घुँघरू भी उतार दूँ प्लीज?”

“कुछ उतारना है तो कुछ पहनना भी पड़ेगा। सोच ले।”

मैंने हार मान ली, “जो बचा है… पहनने को तैयार हूँ।”

शितल मुस्कुराई, “ठीक है। घुँघरू उतार। अब दीवार की तरफ मुँह करके खड़ा हो जा। हाथ दीवार पर रख। मैं अभी आती हूँ।”

मैंने वैसा ही किया। पीठ दीवार की तरफ।

दो मिनट बाद वो मेरे बिल्कुल पीछे आकर चिपक गई। उसकी नरम छाती मेरी पीठ को छू रही थी। अचानक उसने मेरे दोनों हाथ दीवार से हटाए, पीछे लाए और…

‘क्लिक!’

हैंडकफ।

“ये क्यों? मैं तो तेरी बात मान रहा हूँ!” मैंने घबराकर कहा।

“जरूरत समझ आएगी dear…”

तभी बाकी लड़कियाँ भी अंदर आईं।

“ओहो… गंगू  मैडम हैंडकफ भी हो गईं। हमारा इंतजार तो कर लेती!” नंदिनी ने चिढ़ाते हुए कहा।

शितल बोली, “अब एक छोटा-सा टास्क है।”

“क्या?”

“‘ग्रैब द ग्रेप’ सुना है ना? वही। ऊपर लटके अंगूर खाने हैं। बिना हाथ लगाए। अगर खा लिया तो तुझे कपड़े मिल जाएँगे। एक टास्क और पूरा करने पर ब्रेस्ट्स, विग, नथनी, झुमके… सब निकाल दूँगी। घर जा सकेगा।”

“और अगर नहीं खा पाया?”

शितल ने मेरी चोटी को खींचा, “तो आधी दुल्हन तो बन ही चुकी है… पूरी दुल्हन बनना पड़ेगा। मेहंदी, चोली, घूंघट, मंगलसूत्र… सब। या फिर ऐसे ही हैंडकफ लगे पैदल घर जाना पसंद है? रास्ते में जो कुछ भी हो, उसकी जिम्मेदारी तेरी।”

मैं रो पड़ा।

लेकिन कोई रास्ता नहीं था।

उन्होंने नियम थोड़े बदले — स्कर्ट रखी, लेकिन टॉप बदला, कान के झुमके हटाकर छोटे घुँघरू, नाक में छोटी नथनी, बालों में बन। फिर मुझे व्हाइट स्कूल शर्ट और घुटने तक वाली प्लेटेड स्कर्ट पहना दी। डबल चोटी बनाकर बन में बाँध दी।

हाथ पीछे हैंडकफ।

गेम शुरू हुआ।

अंगूर ऊपर लटके थे। नंदिनी (करेना वाली भूमिका में) ने शॉर्ट स्कर्ट और स्पोर्ट्स शूज पहने, आँखों पर पट्टी बाँध ली। वो उछल-उछलकर अंगूर पकड़ने की कोशिश कर रही थी। मैं भी कोशिश कर रहा था, लेकिन हैंडकफ और स्कर्ट की वजह से बहुत मुश्किल हो रही थी।

आखिरकार नंदिनी हार गई।

लेकिन शितल ने कहा, “अभी खेल खत्म नहीं हुआ।”

फिर मुझे दूसरे कमरे में ले जाकर फोन करवाया — “माँ, दो दिन बाद आऊँगा… प्रोजेक्ट का काम है।”

मोबाइल छीनकर लॉकर में बंद कर दिया।

उसके बाद…

मुझे नहलाया गया। एक नई स्लीवलेस ड्रेस और शॉर्ट स्कर्ट पहनाई गई। फिर मेहंदी लगाने की तैयारी।

मैंने बहुत रोया, मना किया।

“प्लीज शितल… अब मत…”

“आँखों पर पट्टी बाँध दो,” शितल ने आदेश दिया।

मुझे गाना गाने को कहा गया। कुछ देर बाद पानी पिलाया गया… उसमें कुछ मिला हुआ था।

होश आया तो…

मैं एक भारी-भरकम ब्राइडल चोली-चुननी में खड़ा था।

भारी ज्वेलरी — बड़ी नथनी, मंगलसूत्र, पायल, कमरबंद, कड़े, हार, झुमके। हाथों में मेहंदी। चेहरा घूंघट में।

आईने में देखा…

मैं खुद को पहचान नहीं पाया।

एक बिल्कुल नई, नवेली, शर्माती हुई दुल्हन खड़ी थी।

नंदिनी दुल्हे के कपड़ों में थी। मंगलसूत्र बाँधा गया। फेरे लिए गए।

मुझे फूलों से सजे कमरे में घूंघट में बिठा दिया गया।

शितल ने आखिरी बार कहा,

“अब नंदिनी तेरा घूंघट उठाएगी। उसका सम्मान करना। हर बात मानना। अगले दो दिन तक वो तेरा पति है… और तू उसकी पत्नी।”

कमरे में सिर्फ फूलों की महक और मेरी धड़कनें थीं।

मैं घूंघट के अंदर बैठा रो रहा था।

मन में हजार सवाल —

“गोपाल… तू अब क्या है?

अनीता को अगर ये हालत दिख गई तो?

माँ-पापा, भैया-भाभी… अगर किसी ने देख लिया तो?

मैं दो दिन बाद घर कैसे जाऊँगा?

ये मेहंदी, नथनी, ब्रेस्ट्स… सब कैसे छिपाऊँगा?”

आँखों से आँसू बह रहे थे।

लेकिन घूंघट के बाहर नंदिनी की कदमों की आवाज़ आ रही थी।


सुहागरात पर हाई हीलस मे मुर्गा पनिशमेंट 


कमरा फूलों से सजा हुआ था। गुलाब, चमेली और रजनीगंधा की महक चारों तरफ फैली हुई थी। भारी ब्राइडल चोली-चुननी मेरे शरीर पर लदी हुई थी। मेहंदी भरे हाथ, पायल, कमरबंद, बड़ी-बड़ी नथनी, मंगलसूत्र, झुमके — सब कुछ। घूंघट मेरे चेहरे पर गिरा हुआ था।

लड़कियों ने सख्त हिदायत दी थी —

“जब तक नंदिनी तुम्हारा घूंघट नहीं हटाएगी, तब तक यहीं बैठे रहना। हिलना भी मत। समझे?”

एक लड़की ने मेरे पल्लू से घूंघट को और नीचे कर दिया। फिर सब कमरे से बाहर निकल गईं।

अकेला।

महक इतनी तेज थी कि सिर घूम रहा था। मैंने रुमाल निकालकर नाक दबा ली। दिल में डर, शर्म, गुस्सा और एक अजीब-सी बेचैनी थी। “ये मैं क्या बन गया हूँ? अनीता… अगर तुझे पता चल गया तो…”

तभी दरवाजा खुला।

नंदिनी अंदर आई। दुल्हे के कपड़ों में। उसकी आँखों में जीत और शरारत दोनों थे।

“क्यों बेटा? बहुत स्मार्ट बन रहे थे ना कॉलेज में? अब आ गए अपनी औकात में। बोलती बंद। अब बोल… किसे डर लग रहा है? बता, तेरे साथ क्या करूँ — मार दूँ या छोड़ दूँ?”

मैं चुप रहा। आँखें नीचे थीं।

नंदिनी मेरे सामने बैठ गई। धीरे से मेरा घूंघट उठाया। मेरी पलकें झुकी हुई थीं।

“ओये होये… इतनी नखरत मत दिखा।” उसने मेरे ठोड़ी को ऊपर उठाया। “बहुत अच्छे लग रहे हो गंगू … Kiss तो बनती है, पर इतनी आसानी से नहीं।”

वो मेरे पीछे चली गई। पल्लू थोड़ा सरकाया और गर्दन पर हल्का-सा kiss कर दिया।

जिंदगी में पहली बार किसी लड़की के होंठों का स्पर्श।

पूरे शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। रोंगटे खड़े हो गए। शर्म से चेहरा जलने लगा, लेकिन अंदर कहीं एक अनजाना सिहरन भी हुई।

फिर उसने मेरी गर्दन में बाँहें डालीं, सिर पर दबाव दिया और…

Lip-to-lip kiss।

कम से कम दो मिनट तक।

मेरी सारी लिपस्टिक उसके होंठों पर लग गई। साँसें तेज हो गईं। शरीर गर्म हो रहा था।

“चल… सारे कपड़े उतार,” उसने अचानक कहा।

“क्या??” मेरी आवाज़ काँप गई।

“जितना कहा है, उतना कर।”

मैं बेड से उठा। मन में एक तरफ डर था, दूसरी तरफ… वो अजीब-सा उत्साह भी।

नंदिनी ने सॉन्ग लगाया — “दिल को हजार बार रोका…”

मैंने डांस शुरू किया।

धीरे-धीरे, हिलते-डुलते, नखरे दिखाते हुए एक-एक चीज उतारता गया। कान की झुमके, नथनी, पायल, हार, ब्लाउज… सब कुछ डांस के साथ उसके शरीर पर पहनाता गया। उसकी गोद में बैठकर उसे तड़पाया। आखिरकार उसके हाथ पीछे करके हैंडकफ लगा दिए।

अब वो कुछ नहीं कर पा रही थी।

मैंने उसकी नाक में नथनी, पैरों में पायल डाली। उसकी जाँघ पर हाथ फेरा। होंठों के पास चेहरा ले गया। वो तड़प रही थी।

फिर हमने कपड़े बदल लिए।

अब मैं दुल्हे के कपड़ों में था। वो दुल्हन बन गई।

मैंने उसे घूंघट में बिठाया।

“मैं बाहर से एंट्री करूँगा,” मैंने कहा।

जैसे ही मैं कमरे से बाहर निकला, देखा — सारी लड़कियाँ शितल के कमरे में थीं और गेट खुला हुआ था।

ये मौका था।

मैं चुपके से गेट के बाहर निकल गया।

कुछ दूर चलने के बाद लगा जैसे कैद से आजादी मिल गई हो। लेकिन फिर ध्यान गया —

मैं अभी भी चूड़ियाँ पहने हुए था। मेकअप, लिपस्टिक, काजल, लंबे बाल, बड़े सिलिकॉन ब्रेस्ट्स, ब्रा… सब कुछ। पैरों में चप्पल तक नहीं थी।

मैं ऑटो रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन कोई रुक नहीं रहा था। सब मुझे शादी के मंडप से भागी दुल्हन समझ रहे थे।

तभी किसी ने मेरी पीठ पर हाथ रखा।

मैं मुड़ा।

नंदिनी। और उसके साथ शितल और पूरी गैंग। शितल बाइक पर थी।

शितल ने इशारा किया — चुपचाप बैठ जा।

मुझे घर ले जाया गया।

सोसायटी के गेट से दस कदम पहले गाड़ी रोकी गई।

“उतर।”

मैं उतरा।

“अब मुर्गा बन और घर तक चल।”

मैंने मना कर दिया।

शितल मुस्कुराई, “नहीं मानेगा तो रिजल्ट बहुत बुरा होगा।”

सब लड़कियाँ मुझे घेर लिया।

“एक काम करो… इसके कपड़े फाड़ दो और नंगा करके घर तक पैदल ले चलें।”

मैं डर गया। “ठीक है… बनता हूँ मुर्गा… प्लीज ऐसा मत करो।”

“चलो बन।”

मैंने कहा, “मैं बहुत थक गया हूँ और घर दूर है। घर के पास से बना लेंगे, मैं मना नहीं करूँगा।”

जब घर से थोड़ी दूरी बची, शितल बोली, “चलो शुरू हो जा।”

जैसे ही मैं मुर्गा बनने लगा, नंदिनी ने कहा, “ऐसे नहीं।”

उसने अपनी बहुत ऊँची हील्स उतारीं और मुझे पहनने को दे दीं।

“ये पहन।”

बहुत ऊँची हील्स थीं। उनमें चलना भी मुश्किल था, मुर्गा बनकर तो नामुमकिन। लेकिन कोई चारा नहीं था।

मैं मुर्गा बना। घुटने मोड़े, हाथ कान पर।

हर कदम पर गिरते-पड़ते, कपड़े गंदे होते, चूड़ियाँ बजती, ब्रेस्ट्स हिलते, लंबे बाल चेहरे पर आते…

दो मिनट का रास्ता एक घंटे में पूरा हुआ।

आखिरकार मैं घर के ठीक सामने पहुँचा।

पसीने से तर, साँस फूल रही थी। आँखों में आँसू थे।

दिल में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था —

“अब माँ-पापा, भैया-भाभी… अगर किसी ने दरवाजा खोला और मुझे इस हालत में देख लिया तो…?”


रैगिंग हॉरर की रात 

जब मैं घर के अंदर घुसा, तो मेरी हालत देखकर खुद को रोने का मन कर रहा था। कपड़े, चेहरे, बाल — सब मिट्टी में सने हुए थे। शितल ने मुझे बाथरूम भेज दिया।

“जा, नहा ले। वरना सारी रात बदबू आएगी।”

मैं अंदर गया। कपड़े उतारे।

और आईने में खुद को देखा…

तो बस देखता ही रह गया।

लंबे, गीले बाल कमर तक लहरा रहे थे। चेहरा अभी भी मेकअप में था। बड़े-बड़े सिलिकॉन ब्रेस्ट्स, पूरी बॉडी वैक्स्ड और चिकनी, कंधों से जाँघों तक मेहंदी, हाथों में चूड़ियाँ और कड़े…

किसी भी कोण से मैं गोपाल नहीं लग रहा था।

मैं लड़का नहीं था।

मैं गंगू  बन चुका था।

आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने towel कसकर कमर पर बाँधा, जैसे रोज बाँधता था। लेकिन ब्रेस्ट्स बिना ब्रा के नीचे झूल रहे थे। चलते वक्त त्वचा खिंच रही थी। मुझे दोनों हाथों से उन्हें सहारा देकर ढकना पड़ रहा था। शर्म से मेरा चेहरा जल रहा था।

जब मैं बाहर निकला, तो सारी लड़कियाँ मेरा इंतजार कर रही थीं।

एक लड़की गायब थी — नंदिनी।

मेरा ध्यान कोने की तरफ गया।

नंदिनी मुर्गा बनी खड़ी थी — सिर्फ ब्रा और पैंटी में। घुटने मोड़े, हाथ कान पर, सिर नीचे। पूरा शरीर काँप रहा था।

शितल बोली, “ये तेरे भागने की सजा है। अब तेरे साथ क्या करें, ये सोचने से पहले कपड़े पहन।”

मुझे ब्लैक ब्रा और पैंटी दी गई। मैं चुपचाप पहन लिया।

फिर मेरे दोनों हाथ रस्सी से कसकर बाँध दिए गए।

शितल ने पूछा, “पता है अब क्या करने वाले हैं?”

मैंने सिर हिलाया।

“गजनी देखी थी ना? आमिर खान की तरह… तेरे पेट और पीठ पर परमानेंट टैटू बनाएँगे। लिखेंगे — ‘मैं गंगू  हूँ और मुझे लड़कियों के कपड़े पहनना और उनकी तरह रहना बहुत पसंद है’। और तेरी दुल्हन वाली फोटो पीठ पर।”

मेरे होश उड़ गए।

टैटू मशीन देखते ही मैं सचमुच रो पड़ा। छूटने की कोशिश करने लगा।

अभी तो सिर्फ़ शुरुआत हुई है…

असली मसाला, असली यातना, और वो गंदा सच अब शुरू होने वाला है।

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