Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

शादी की पहली रात और जबरदस्ती की शुरुआत और रागिनी का बदला

📝 Story Preview:

कहानी का टाइटल: Payback Time

राजस्थान के जोधपुर से कुछ दूर, राठौड़ परिवार की पुरानी हवेली थी। ऊँची दीवारें, मेहराबदार दरवाजे, आँगन में पीपल का पुराना पेड़ और चारों तरफ सख्त परंपराओं की दीवारें। यहाँ समय रुक-सा गया था।

यहाँ पुरुषों का राज था। महिलाएँ घूँघट के पीछे, सिर झुकाए, चुपचाप। घर की हर औरत को बचपन से सिखाया जाता था — “पुरुष देवता है, उसकी इच्छा ही भगवान की इच्छा है।”

सुबह के 7 बजे का वक्त था।

आँगन में सुनीता सिंह (कुलदीप की माँ) चाय बना रही थीं। उनके घूँघट इतने घने थे कि चेहरा मुश्किल से दिखता था। पास ही निकिता चौहान (शेर सिंह की पत्नी) बैठी चावल छाँट रही थी। दोनों औरतें चुपचाप काम कर रही थीं।

तभी ओम सिंह राठौड़ (घर के मुखिया) अपनी मूँछों पर ताव देते हुए आए।

ओम सिंह: (गहरी आवाज़ में)

“सुनीता! चाय कहाँ है? और रागिनी को बुला, कुलदीप के लिए नाश्ता तैयार करे। मर्द को भूख लगी है तो औरत को तुरंत काम पर लगना चाहिए।”

सुनीता ने तुरंत घूँघट संभाला और झुककर बोलीं,

सुनीता: “जी हुजूर… अभी लाती हूँ।”

निकिता चुपचाप मुस्कुराई, लेकिन कुछ नहीं बोली।

इतने में शेर सिंह राठौड़ भी आ गया — कुलदीप का छोटा भाई।

शेर सिंह: (हँसते हुए)

“भैया अभी भी सो रहा है क्या? कल रात तो रागिनी की चीखें पूरे आँगन में गूँज रही थीं। लगता है भैया ने रात भर अच्छी ‘ट्रेनिंग’ दी है।”

ओम सिंह जोर से हँसे।

ओम सिंह: “मर्द को अपनी औरत को संभालना आना चाहिए। औरतें रोती हैं तो समझो काम ठीक चल रहा है। हमारी परंपरा यही है।”

तभी रागिनी घूँघट निकालकर चाय का ट्रे लेकर आई। उसकी चाल में हल्का दर्द साफ दिख रहा था। कल रात कुलदीप ने फिर से उसे बेरहमी से इस्तेमाल किया था। रागिनी की आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन वो सिर झुकाए खड़ी थी।

रागिनी: (बहुत धीमी आवाज़ में)

“सासू माँ… चाय…”

सुनीता ने बिना घूँघट हटाए ही ट्रे ले लिया और फुसफुसाकर कहा,

सुनीता: “बेटी, आज रात फिर वही होगा… सह लेना। पुरुष की इच्छा के आगे औरत का दर्द कुछ नहीं।”

रागिनी ने सिर्फ सिर हिलाया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन घूँघट की वजह से कोई नहीं देख पाया।

इतने में कुलदीप सिंह राठौड़ भी आ गया — लंबा, मूँछों वाला, गर्व भरी चाल। उसने रागिनी की तरफ देखा भी नहीं। सीधे पिता के पास बैठ गया।

कुलदीप: (गर्व से)

“पापा, कल रात रागिनी ने अच्छा संघर्ष किया। रोई बहुत, लेकिन मैंने नहीं छोड़ा। राजपूत मर्द को अपनी बीवी को वश में रखना आना चाहिए।”

ओम सिंह ने पीठ थपथपाई,

ओम सिंह: “बहुत अच्छा। औरत को रोना सिखाना ही उसका असली काम है।”

निकिता (जेठानी) चुपचाप सब सुन रही थी। उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी। वो जानती थी कि रागिनी कितनी तकलीफ में है, लेकिन वो भी इसी घर की बहू थी — चुप रहना ही उसकी मजबूरी थी।

रागिनी चाय परोसकर पीछे हट गई। उसके मन में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था —

“क्या मेरी जिंदगी हमेशा ऐसे ही गुजरेगी? सिर्फ दर्द और शर्म में?”

लेकिन उस वक्त उसे पता नहीं था कि आने वाले दिनों में किस्मत का खेल उलटने वाला है।

जिस मर्द ने उसे हर रात चीखने पर मजबूर किया, उसी को एक दिन उसी दर्द और शर्म से गुजरना पड़ेगा।

Payback Time की शुरुआत हो चुकी थी… बस अभी कोई नहीं जानता था।

Chapter 1: शादी की पहली रात और जबरदस्ती की शुरुआत

रागिनी कंवर का जन्म एक साधारण लेकिन खुशहाल परिवार में हुआ था। वो बचपन से ही बहुत चुलबुली, हँसमुख और पढ़ाई में तेज लड़की थी। स्कूल में टीचर उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। उसकी लंबी काली लटें, पतली कमर, गोरापन और चमकती आँखें देखकर लोग कहते थे — “ये तो साक्षात देवी लगती है।”

जब वो साड़ी पहनकर बाजार जाती, तो लोग मुड़-मुड़कर देखते। लड़के उसकी एक झलक पाने को तरसते। लेकिन खूबसूरती की अपनी कीमत होती है। रिश्ते बहुत जल्दी आने लगे। रागिनी के माता-पिता ने सोचा — “हमारी लड़की इतनी सुंदर है, अमीर घर में ब्याह दें तो उसका भला हो जाएगा।”

और ऐसा ही हुआ।

कुलदीप सिंह राठौड़ — जोधपुर के पास राठौड़ परिवार का सबसे बड़ा बेटा। अमीर, हट्टा-कट्टा, मूँछों वाला, पुरानी सोच वाला। उसका परिवार सच्चा राजपूत था। वहाँ औरतों को घूँघट के पीछे रहना, पुरुषों की सेवा करना और चुप रहना सिखाया जाता था। कुलदीप के माता-पिता ने रागिनी का रिश्ता देखा तो तुरंत हाँ कर दी। रागिनी की इच्छा पूछी भी नहीं गई। बस एक दिन उसके पिता ने आकर कहा — “बेटी, तुम्हारी शादी तय हो गई है। राठौड़ परिवार बहुत बड़ा और सम्मानित है।”

रागिनी चुप रही। उसके मन में डर था, लेकिन परिवार की इज्जत के आगे वो कुछ बोल नहीं पाई।

शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। हल्दी, मेहंदी, सांगरी — सब कुछ धूमधाम से हुआ। रागिनी की सहेलियाँ उसे चिढ़ाती रहती थीं।

सहेली 1: “रागिनी, तेरे पति तो बहुत मर्द लगते हैं। पहली रात में तुझे रुला देंगे!”

सहेली 2: (हँसते हुए उसके स्तनों को हल्के से दबाकर)

“ये छोटे-छोटे अंगूर देख रही है? तेरे पति इन्हें संतरे बना देंगे… एकदम नारंगी! तेरी इतनी घिसाई करेंगे कि तेरी चूत पर बाल कभी उगेंगे ही नहीं!”

सब जोर-जोर से हँस पड़ीं। रागिनी शर्मा गई, लाल हो गई और बोली,

रागिनी: “तुम लोग भी ना… बहुत नालायक हो!”

मेहंदी की रात में भी वही मस्ती चली। रागिनी की भाभियाँ और चाचियाँ उसे चिढ़ा रही थीं — “सुहागरात में सावधान रहना बेटी, राजपूत मर्द बहुत जोरदार होते हैं।”

रागिनी बस मुस्कुरा देती। उसे नहीं पता था कि उसकी जिंदगी का सबसे डरावना सपना सच होने वाला है।

शादी हो गई। रागिनी राठौड़ हवेली में आ गई। दो दिन तक रस्में चलीं — पगफेरा, मोहरे, विदाई। फिर आ गई वो रात — सुहागरात

रागिनी ने सोचा था कि कुलदीप से बातें होंगी, एक-दूसरे को जानेंगे, फिर धीरे-धीरे प्यार से सुहागरात मनाएंगे। उसने सुंदर लाल साड़ी पहनी, हल्का मेकअप किया, लंबा घूँघट निकाला और बेड पर बैठ गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

लेकिन कुलदीप दोस्तों के साथ शराब पीकर आया। कमरे में घुसते ही उसने बिना एक शब्द बोले रागिनी का घूँघट खींचकर फेंक दिया। रागिनी चौंक गई।

रागिनी: (डरते हुए) “कुलदीप जी… धीरे…”

कुलदीप ने कुछ नहीं सुना। उसने रागिनी की साड़ी एक झटके में खींच ली। ब्लाउज के हुक तोड़े, पेटीकोट उतारा और रागिनी को पूरी तरह नंगा कर दिया। रागिनी डर से काँप रही थी।

रागिनी: “प्लीज… धीरे… मुझे डर लग रहा है…”

लेकिन कुलदीप ने कोई ध्यान नहीं दिया। वो रागिनी पर टूट पड़ा। बहुत क्रूरता से, बिना किसी प्यार के, बिना किसी तैयारी के उसने रागिनी के साथ सेक्स किया। रागिनी दर्द से चीख उठी। उसकी चीखें पूरे कमरे में गूँज रही थीं।

हर राउंड 30-35 मिनट तक चलता। कुलदीप रुकता नहीं था। रागिनी के शरीर के हर छेद का इस्तेमाल किया — चूत, गांड, मुँह। रागिनी रोती रही, भीख माँगती रही, लेकिन कुलदीप नहीं रुका।

रात भर रागिनी को सोने नहीं दिया। हर 10 मिनट के ब्रेक के बाद फिर शुरू। सुबह होने पर भी कुलदीप ने उसे तब छोड़ा जब उसकी ताकत खत्म हो गई।

रागिनी की हालत खराब हो गई थी। उसका पूरा शरीर दर्द कर रहा था। नीचे से खून निकल रहा था। वो रात भर रोती रही।

सुबह रागिनी किसी तरह उठी। नहाई, मेकअप किया, जेवर पहने, मारवाड़ी पोशाक पहनी और लंबा घूँघट निकाल लिया। उसके पैर अभी भी काँप रहे थे। वो हल्की-हल्की लंगड़ाती हुई बाहर आई।

निकिता (जेठानी) और कोमल (ननद) कमरे में आईं। दोनों ने रागिनी की हालत देखी और हल्के से मुस्कुराए। निकिता ने कहा,

निकिता: “चलो भाभी, सासू माँ के पैर छूने चलें।”

रागिनी चुपचाप उनके साथ चली गई। उसके मन में सिर्फ शर्म और डर था। वो सोच रही थी — “ये मेरी जिंदगी है? रोज यही होगा?”


Chapter 2: रोज़ की क्रूरता और घर की परंपरा

सब मंदिर गए और रस्म-रिवाजों में रागिनी का दिन कट गया। लेकिन जैसे-जैसे शाम ढल रही थी, रागिनी के मन में कल रात का बुरा सपना फिर से घूमने लगा। “ये जल्लाद फिर आएगा… आज फिर मुझे नोचेगा…”

उसके पास कोई विकल्प नहीं था।

रात हुई। रागिनी फिर से लंबा घूँघट निकालकर बेड पर बैठ गई। हाथ काँप रहे थे। दिल में बस एक ही प्रार्थना थी — “भगवान, आज थोड़ी दया कर दो…”

थोड़ी देर बाद बाहर से पैरों की आहट आई। रागिनी समझ गई — जल्लाद आ रहा है। कुलदीप फिर शराब पीकर आ रहा था। उसकी चाल लड़खड़ा रही थी, लेकिन आवाज़ में वही पुराना गर्व था।

रागिनी ने तुरंत सने का नाटक किया। जैसे बहुत बुखार और थकान हो। जब कुलदीप कमरे में घुसा, तो रागिनी काँपते हुए बोली,

रागिनी: (बहुत डरते हुए, रोते हुए)

“कुलदीप जी… आज प्लीज… मुझे बहुत थकान लग रही है… सिर में तेज दर्द है… माँ की कसम… आज मत कीजिए… बस आज की रात छोड़ दीजिए…”

कुलदीप रुक गया। उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं।

कुलदीप: (गुस्से में)

“कसम? तू मुझे अपनी माँ की कसम दे रही है? तू मेरी बीवी है और मुझे कसम दे रही है?”

उसने रागिनी को जोर से बालों से पकड़ा और घसीटते हुए बेड के पाये के पास ले गया। रागिनी चीखी, लेकिन कुलदीप ने एक झटके से उसके कपड़े फाड़ दिए। रागिनी फिर से पूरी तरह नंगी खड़ी थी।

फिर कुलदीप ने उसकी आँखों पर एक मोटी काली पट्टी कसकर बाँध दी। अब रागिनी कुछ भी देख नहीं पा रही थी। अंधेरा छा गया था।

रागिनी: (रोते हुए) “नहीं… प्लीज… मुझे मत बाँधिए… बहुत डर लग रहा है…”

लेकिन कुलदीप ने कोई सुनने की इच्छा नहीं की। उसने रागिनी को बिस्तर पर पटक दिया और उसके दोनों हाथों को बेड के ऊपरी सिरहाने से रस्सी से कसकर बाँध दिया। फिर दोनों पैरों को बेड के नीचे वाले पायों से फैलाकर बाँध दिया।

रागिनी अब पूरी तरह बंधी हुई थी — नंगी, अंधी, हाथ-पैर फैले हुए, और बेबस। उसका शरीर बुरी तरह काँप रहा था। आँसू पट्टी के अंदर बह रहे थे।

कुलदीप ने उसके आँसू देखे, एक-एक करके पोंछे, और फिर मुस्कुराते हुए एक और दुपट्टा लिया। रागिनी के मुँह पर भी कसकर बाँध दिया। अब न उसकी चीखें बाहर जा सकती थीं, न आँसू दिख सकते थे।

कुलदीप: (ठंडी, क्रूर आवाज़ में)

“तूने कसम नहीं देनी चाहिए थी। तूने कहा था कि तेरी आँखों के सामने कपड़े न उतारूँ… देख, अब तुझे कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा है। अब तू बस महसूस कर… मैं क्या करता हूँ।”

और फिर शुरू हुई रागिनी की रगड़ाई — पलंगतोड़ चुदाई।

इस बार राउंड और भी लंबे और बेरहम थे। कल के 30 मिनट के राउंड आज 1 घंटे के बिना रुके चल रहे थे। कुलदीप रुकता ही नहीं था। रागिनी की साँसें फूल रही थीं। उसका शरीर बार-बार झड़ रहा था, लेकिन कुलदीप की ताकत खत्म नहीं हो रही थी।

रागिनी की दबी हुई चीखें दुपट्टे में दब रही थीं, लेकिन महल के अंदरूनी हिस्से में अभी भी गूँज रही थीं। उसका गला सूख गया था। वो पानी-पानी कर रही थी, लेकिन कुलदीप नहीं रुक रहा था।

पूरी रात रागिनी की दबी चीखें हवेली में गूँजती रहीं।

सुबह हुई। कुलदीप ने आखिरकार रागिनी के हाथ-पैर खोले। आँखों की पट्टी और मुँह का दुपट्टा अभी भी बँधा था। कुलदीप उसके बगल में गिरकर सो गया।

रागिनी किसी तरह उठी। आँखें खोलीं। शरीर में इतना दर्द था कि चलना भी मुश्किल हो रहा था। वो नहाई, कपड़े बदले, मेकअप किया, जेवर पहने और लंबा घूँघट निकाल लिया।

वो थोड़ी देर आराम करने के लिए लेटी ही थी कि निकिता (जेठानी) कमरे में आ गई।

निकिता: (हल्के से मुस्कुराते हुए)

“भाभी, बिंदी सती ही रहेगी क्या? चल जaldi, आज तू सबको चाय पिलाएगी।”

रागिनी आधी नींद में, थकी हुई, सिर घूम रहा था। फिर भी घूँघट की आड़ लेकर कमरे से बाहर आई। सास, जेठानी, ससुर — सबके पैर छुए। फिर रसोई में चाय बनाने लगी।

तभी कुलदीप भी मूँछों पर ताव देते हुए आया और बोला,

कुलदीप: “चाय मिल जाएगी क्या?”

वो अपने पिता ओम सिंह के पास बैठ गया। ओम सिंह ने हँसते हुए कहा,

ओम सिंह: “तू जaldi उठ गया? सुबह तक तो तेरे कमरे की चीखें आती रही थीं। थोड़ी बहुत आराम भी कर लिया कर। एक काम कर — आज दिन में आराम कर, काम पर मत जा।”

दोनों बाप-बेटे जोर से हँस पड़े।

रागिनी हल्की लंगड़ाती हुई चाय दे रही थी। सुनीता और निकिता एक-दूसरे को देखकर धीरे से बोलीं,

सुनीता: (धीमी आवाज़ में)

“ये कुलदीप तो बिल्कुल जल्लाद है… मासूम सी बिंदी की जान ले रखी है। इसे कुछ दिन मायके भेज देते हैं।”

निकिता ने सिर हिलाया और फुसफुसाकर कहा,

निकिता: “हाँ सासू माँ… बेचारी की हालत देखिए… चल नहीं पा रही है।”

रागिनी ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप चाय परोसती रही। उसके मन में सिर्फ एक ही सवाल बार-बार घूम रहा था —

“क्या मेरी जिंदगी हमेशा यही दर्द, यही शर्म और यही चीखें लेकर गुजरेगी?”

Chapter 3: बीमारी का आगमन और डॉक्टर का फैसला

रागिनी को कुछ दिन के लिए मायके भेज दिया गया। सुनीता ने कहा था, “बिंदी को थोड़ा आराम की जरूरत है।” रागिनी अपनी माँ के घर पहुँची तो सहेलियाँ चारों तरफ से घेरकर बैठ गईं।

**सहेली 1:** (हँसते हुए)  

“अरे रागिनी! सुहागरात में क्या-क्या हुआ? बताना तो!” 

**सहेली 2:** (उसके स्तनों को हल्के से दबाकर)  

“देखो तो, कुलदीप ने तो कुछ ही दिनों में अंगूर को संतरे बना दिया! लगता है अगली बार आने पर संतरे तरबूज बन जाएंगे!”


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Deepak Se Deepika Tak: Ek Lady Doctor Ki Kahani

📝 Story Preview:

Chapter 1: करियर की परेशानी और भाभी का सुझाव

Chapter 1: करियर की परेशानी और भाभी का सुझाव


दीपक 28 साल का एक होनहार गायनेकोलॉजिस्ट डॉक्टर था। दिल्ली के पश्चिमी हिस्से में, राजौरी गार्डन के पास एक छोटा-सा क्लिनिक चलाता था। एमबीबीएस और एमडी पूरा करने के बाद उसने सोचा था कि अब अपना नाम होगा, मरीजों की लाइन लगेगी, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। क्लिनिक में दिनभर में मुश्किल से 4-5 मरीज आते थे, और उनमें से ज्यादातर पुरुष या पुरानी मरीजें होतीं जो पहले से आ रही थीं। महिला मरीजें? वो तो बस नाम के लिए आतीं और फिर कभी नहीं लौटतीं।

एक दिन एक 7 महीने की प्रेग्नेंट महिला आई थी। उसका नाम रुखसाना था। पति साथ में था, चिंतित। दीपक ने अल्ट्रासाउंड किया, बच्चे की हार्टबीट चेक की, सब नॉर्मल बताया। लेकिन जब इंटरनल एग्जामिनेशन की बात आई तो रुखसाना की आँखें भर आईं। “डॉक्टर साहब, आप मर्द हैं ना… मुझे बहुत शर्म आ रही है। क्या कोई महिला डॉक्टर नहीं है?” दीपक ने मुस्कुरा के समझाया, “मैं बहुत एक्सपीरियंस्ड हूँ, आप टेंशन मत लो।” लेकिन रुखसाना ने सिर हिलाया, “नहीं डॉक्टर, घरवाले भी कह रहे हैं कि महिला डॉक्टर से ही चेकअप करवाओ।” वो दोनों चले गए और कभी वापस नहीं आए। दीपक को लगा जैसे कोई थप्पड़ मारा हो।

ऐसे ही कई बार हुआ। एक बार तो एक फैमिली ने कहा, “हमारी बेटी की शादी होनी है, अगर मेल डॉक्टर से चेकअप हुआ तो लोग क्या कहेंगे?” दीपक सोचता, “मैं डॉक्टर हूँ, इंसान हूँ, लेकिन बस जेंडर की वजह से लोग मुझसे दूर भागते हैं।” क्लिनिक का किराया, स्टाफ की सैलरी, दवाइयों का खर्च – सब बढ़ता जा रहा था, लेकिन इनकम घटती जा रही थी। बैंक बैलेंस कम होता देख दीपक रातों को नींद नहीं आती।

घर में वो बड़े भाई अजय और भाभी निशा के साथ रहता था। अजय सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, नोएडा में आईटी कंपनी में काम करता था। सुबह 8 बजे निकलता, रात 9-10 बजे आता। निशा 32 साल की थी – गोरी, लंबी, हमेशा सलवार-सूट में, लेकिन बहुत मॉडर्न सोच वाली। वो घर संभालती, खाना बनाती, लेकिन कभी-कभी ऑनलाइन शॉपिंग, योगा क्लासेस भी करती। निशा दीपक से 4 साल बड़ी थी, लेकिन हमेशा उसे छोटे भाई की तरह प्यार करती।

एक शाम दीपक क्लिनिक से थका-हारा घर लौटा। बाहर बारिश हो रही थी, ट्रैफिक में फँसा रहा। कपड़े गीले, मूड खराब। वो सीधा सोफे पर गिर पड़ा। निशा किचन से चाय लेकर आई, “क्या हुआ दीपक? आज फिर चेहरा उतरा हुआ है?” दीपक ने आह भरी, “भाभी, आज सिर्फ तीन मरीज आए। एक ने तो कहा, ‘महिला डॉक्टर से मिलना चाहती हूँ।’ मैं क्या करूँ? इतनी मेहनत की, लेकिन लोग बस जेंडर देखते हैं। करियर कैसे बनाऊँ?”

निशा उसके बगल में बैठ गई। चाय का कप थमाया। “दीपक, तू बहुत अच्छा डॉक्टर है। तेरी पढ़ाई, तेरी समझ – सब टॉप क्लास है। लेकिन सच कहूँ? इस फील्ड में मरीजों को कम्फर्ट चाहिए। औरतें अपनी प्राइवेट प्रॉब्लम्स किसी मर्द से शेयर करने में हिचकिचाती हैं। खासकर दिल्ली-एनसीआर में, जहाँ लोग अभी भी बहुत कंजर्वेटिव हैं।” निशा ने थोड़ा रुककर कहा, “तूने कभी सोचा है… अगर तू खुद महिला बन जाए तो?”

दीपक चौंक गया। चाय का घूँट बीच में ही रुक गया। “भाभी, क्या बकवास कर रही हो? मैं मर्द हूँ!” निशा हँसी, लेकिन उसकी आँखों में सीरियसनेस थी। “अरे, मैं मजाक नहीं कर रही। क्रॉसड्रेसिंग से शुरू कर सकते हैं। घर पर ट्राई कर, मैं मदद करूँगी। मेकअप, कपड़े, वॉकिंग – सब सिखा दूँगी। फिर अगर तुझे अच्छा लगे तो आगे बढ़ सकते हैं। हॉर्मोन थेरेपी भी है, लेकिन पहले सिंपल तरीके से देखते हैं। करियर के लिए, मरीजों के कम्फर्ट के लिए… और शायद तुझे खुद भी अच्छा लगे। महिला मरीजों से बात करने में तू ज्यादा सहज महसूस करेगा।”

दीपक ने सिर हिलाया, “नहीं भाभी, ये पागलपन है। मैं डॉक्टर हूँ, ऐसा करके क्या करूँगा?” लेकिन निशा ने उसका हाथ पकड़ा, “दीपक, तू हर रोज तनाव में है। क्लिनिक बंद होने वाला है। सोच ले। मैं तेरे साथ हूँ। कोई नहीं जानने वाला। सिर्फ हम दोनों का सीक्रेट।”

उस रात दीपक सो नहीं पाया। बार-बार सोचता रहा – क्या सच में ये तरीका काम कर सकता है? क्या वो क्रॉसड्रेसिंग कर सकता है? क्या वो खुद को महिला की तरह देख पाएगा? सुबह उठते ही उसने निशा से कहा, “ठीक है भाभी… ट्राई करते हैं। लेकिन सिर्फ घर पर, और सिर्फ तब जब भैया ऑफिस में हों।”

निशा की आँखें चमक उठीं। वो खुशी से उछल पड़ी। “वाह! मेरा सीक्रेट प्रोजेक्ट शुरू! आज से तू मेरी दीपिका है!” शाम को अजय ऑफिस चला गया तो निशा ने दीपक को अपने बेडरूम में बुलाया। अलमारी खोली, एक सिंपल पिंक कलर का सॉफ्ट कॉटन सलवार-कमीज निकाला। “पहले शावर ले ले। मैं तेरे बाल धोती हूँ।”

दीपक ने शावर लिया। निशा ने उसके बालों में शैंपू लगाया, कंडीशनर किया – जैसे कोई बहन छोटे भाई को तैयार कर रही हो। फिर टॉवल से सुखाए। दीपक को कुर्सी पर बिठाया। लाइट मेकअप शुरू – पहले फाउंडेशन, फिर काजल, थोड़ा ब्लश, और हल्की पिंक लिपस्टिक। “देख, कितनी प्यारी लग रही है मेरी दीपिका!” निशा ने आईने के सामने खड़ा किया।

दीपक ने आईने में देखा। चेहरा अलग लग रहा था। नरम, स्त्री जैसा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शर्म भी आ रही थी, लेकिन एक अजीब सा एक्साइटमेंट भी। निशा ने सलवार-पैंट पहनाई, फिर कमीज़। ब्रा में पैडेड ब्रेस्ट फॉर्म्स डाले। “अभी ये ट्रायल है। कल से विग भी लाएँगे।” निशा ने उसके कंधे पर हाथ रखा, “अब से जब भैया घर पर न हों, तू दीपिका बनेगी। प्रैक्टिस करेगी – बात करना, चलना, बैठना। मैं तेरी टीचर हूँ।”

दीपक – अब दीपिका – ने आईने में खुद को देखा। पहली बार लगा कि शायद ये तरीका काम कर सकता है। करियर बच सकता है। लेकिन साथ ही डर भी था – अगर किसी को पता चल गया तो? निशा ने उसे गले लगाया, “टेंशन मत ले। मैं हूँ ना। हम साथ में सफल बनाएँगे तुझे – एक परफेक्ट लेडी गायनेकोलॉजिस्ट।”


Chapter 2: घर पर फुल फेमिनाइजेशन और पहला पब्लिक आउटिंग


अगले हफ्ते निशा ने सब कुछ प्लान कर लिया था। जैसे कोई कोचिंग सेंटर चलाने वाली टीचर हो, वैसे ही उसने टाइमटेबल बना लिया। सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक – दीपक की ट्रेनिंग। पहले दिन निशा ने कहा, “आज से तू दीपिका है। घर में जब भी अकेले होंगे, सिर्फ दीपिका। नाम से बुलाऊँगी, तू भी नाम से जवाब देगी।” दीपक – मतलब अब दीपिका – ने हल्के से सिर हिलाया। डर था, लेकिन उत्सुकता भी।

सुबह सबसे पहले वॉइस ट्रेनिंग। निशा ने यूट्यूब पर कुछ वीडियो दिखाए थे – कैसे पुरुषों की आवाज़ को सॉफ्ट और हाई पिच में लाया जाए। “गले से बोलने की बजाय नाक से बोल, और होंठ थोड़े आगे कर।” दीपिका ने ट्राई किया। पहली बार आवाज़ निकली तो खुद को हँसी आ गई – जैसे कोई कार्टून कैरेक्टर बोल रहा हो। निशा ने हँसते हुए कहा, “अरे, प्रैक्टिस से आएगा। रोज़ 30 मिनट बोलना – ‘हैलो, मैं डॉक्टर दीपिका हूँ’।” धीरे-धीरे दीपिका की आवाज़ नरम होने लगी। शाम को जब वो कहती, “भाभी, चाय पी लूँ?” तो लगता जैसे कोई लड़की बोल रही हो।

फिर वॉकिंग ट्रेनिंग। निशा ने अपनी पुरानी हील्स निकालीं – 2 इंच वाली ब्लैक। 

“पहले घर में चल। कूल्हे हिलाकर, छोटे कदम।” दीपिका ने पहली बार पहनीं तो लुढ़क गई। निशा ने हाथ पकड़कर सिखाया, “सीधा खड़ी हो, कंधे पीछे, सिर ऊँचा।” घंटों प्रैक्टिस। बैठना भी सिखाया – पैर जोड़कर, घुटने बंद, हाथ गोद में। “मरीज आएँगी तो तू ऐसे ही बैठेगी – प्रोफेशनल औरत की तरह।”


ऑनलाइन ऑर्डर आ गए। एक बड़ा पैकेट – विग (लंबे काले बाल, स्ट्रेट), सिलिकॉन ब्रेस्ट फॉर्म्स (34B साइज), कई पैंटीज़, ब्रा, स्टॉकिंग्स। निशा ने कहा, “ये सब तेरे लिए। आज से रोज़ पहनना।” पहली बार ब्रेस्ट फॉर्म्स लगाए तो दीपिका को अजीब लगा – जैसे कोई वजन छाती पर हो। लेकिन आईने में देखा तो लगा, “वाह… सच में लड़की जैसी लग रही हूँ।”

फिर हॉर्मोन थेरेपी की बात आई। निशा ने बताया, “मैंने नर्सिंग कोर्स किया था, तो मुझे पता है। डॉक्टर के तौर पर मैं प्राइवेटली प्रिस्क्राइब कर सकती हूँ। एस्टोजेन पिल्स और कभी-कभी इंजेक्शन। लेकिन धीरे-धीरे, साइड इफेक्ट्स देखते हुए।” दीपिका ने हाँ कर दी। पहले हफ्ते से पिल्स शुरू। रोज़ सुबह एक गोली। निशा खुद देती, “ये तेरा नया जीवन है, दीपिका।”

पहले महीने में असर दिखने लगा। छाती पर हल्की सूजन, निप्पल सेंसिटिव हो गए। स्किन बहुत सॉफ्ट, चेहरे पर ग्लो। बाल भी थोड़े ज्यादा घने लगने लगे। दीपिका को लगता, “ये सब सच में हो रहा है।” लेकिन साथ ही डर भी – क्या ये वापस जा पाएगा? निशा हर शाम कहती, “तू चिंता मत कर। हम कंट्रोल में हैं।”

हर शाम ड्रेसिंग का टाइम। निशा दीपिका को तैयार करती। एक शाम तो फुल साड़ी – लाल रंग की सिल्क साड़ी, मैचिंग ब्लाउज, पेटीकोट। निशा ने पहले पेटीकोट बाँधा, फिर ब्लाउज, फिर साड़ी प्लेट्स बनाईं। “देख, कितनी खूबसूरत लग रही है मेरी दीपिका!” मेकअप फुल – आईलाइनर, काजल, ब्लश, रेड लिपस्टिक। विग लगाई, चोटी बनाई। दीपिका आईने के सामने खड़ी हो गई। दिल धड़क रहा था। 

“भाभी… मैं सच में लड़की लग रही हूँ।” निशा ने पीछे से गले लगाया, “हाँ, और अब तू परफेक्ट लेडी डॉक्टर बनेगी।”

अगले दिन निशा ने कहा, “अब घर से बाहर निकलने का टाइम है। शॉपिंग पर चलें।” दीपिका डर गई, “कहीं कोई पहचान न ले ले?” निशा ने हँसकर कहा, “तू देख, कोई नहीं पहचानेगा। तू अब लड़की लगती है।” दोनों तैयार हुए। दीपिका ने सिंपल नीले सलवार-सूट पहना, दुपट्टा, फ्लैट्स। विग, लाइट मेकअप। सरोजिनी नगर मार्केट गए। लेडीज़ सेक्शन में। सलवार-सूट देखे, कुर्तियाँ ट्राई कीं, हील्स देखीं। दुकानदार ने कहा, “मैडम, ये वाला बहुत सूट करेगा आपको।” दीपिका को लगा जैसे कोई सपना है। कोई शक नहीं किया। सब नॉर्मल।

घर लौटकर निशा ने उसे जोर से गले लगाया, “देखा? तू मेरी बहन बन गई है। अब तू बाहर भी जा सकती है।” दीपिका की आँखें नम हो गईं। “भाभी, थैंक यू। मुझे लग रहा है… मैं सही रास्ते पर हूँ।”

भैया अजय को कुछ पता नहीं था। वो रोज़ ऑफिस के चक्कर में रहता। कभी-कभी पूछता, “दीपक कहाँ है?” निशा कहती, “क्लिनिक गया है।” दीपिका अब घर पर ही प्रैक्टिस करती। आईने के सामने खड़ी होकर बोलती, “हैलो, मैं डॉक्टर दीपिका शर्मा हूँ। आपकी क्या समस्या है?” निशा रोल-प्ले करती। “डॉक्टर, मुझे पीरियड्स में बहुत दर्द होता है।” दीपिका प्रोफेशनल तरीके से जवाब देती। धीरे-धीरे कम्फर्टेबल होने लगी। एचआरटी से एनर्जी बढ़ रही थी, कॉन्फिडेंस भी।

एक शाम दीपिका ने फैसला किया। “भाभी, अब नई क्लिनिक खोलूँगी – डॉक्टर दीपिका शर्मा, फीमेल गायनेकोलॉजिस्ट। पेपरवर्क में नाम चेंज करवाना होगा।” निशा ने खुशी से ताली बजाई, “बस यही चाहिए था! हम साथ में सफल बनाएँगे तुझे।”



Chapter 3: एचआरटी का असर और पहला ‘मंथली पीरियड्स’ एक्सपीरियंस


दो महीने बीत चुके थे। एचआरटी – हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी – अब अपना जादू दिखाने लगी थी। दीपिका हर सुबह आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देखती। छाती अब पहले जैसी सपाट नहीं रही थी। सिलिकॉन फॉर्म्स की जरूरत कम पड़ने लगी थी क्योंकि असली ब्रेस्ट ग्रोथ शुरू हो गई थी। 34C साइज तक पहुँच चुकी थी। निप्पल बहुत सेंसिटिव हो गए थे – बस कपड़े छूने से भी हल्की सी झुरझुरी सी होती। स्किन इतनी सॉफ्ट और चमकदार हो गई थी कि निशा कहती, “देख, तेरी स्किन अब मेरी स्किन से भी बेहतर लग रही है!” हिप्स थोड़े चौड़े हो गए थे, कमर पतली दिखने लगी थी। चेहरा गोल-मटोल, गालों पर नेचुरल ब्लश। बाल भी अब खुद के ज्यादा घने और लंबे हो रहे थे – विग की जरूरत सिर्फ स्पेशल दिनों में पड़ती।

निशा हर रोज़ दीपिका को देखकर खुश होती। “अब तू 100% फीमेल लगती है, दीपिका। कोई भी देख ले, शक नहीं करेगा।” दीपिका खुद भी महसूस कर रही थी – अब वो सिर्फ कपड़े पहनकर लड़की नहीं बन रही थी, बॉडी खुद बदल रही थी। कभी-कभी वो अकेले में छाती को छूती, हल्के से दबाती – और एक अजीब सा सुख मिलता। लेकिन साथ ही थोड़ा डर भी – ये सब कितना आगे जाएगा? क्या वापस पुरानी बॉडी मिल पाएगी? लेकिन करियर की सोचकर वो चुप रहती।

एक सुबह, करीब 6 बजे। दीपिका को नींद में ही पेट के नीचे तेज दर्द हुआ। जैसे कोई चाकू घुमाया जा रहा हो। वो कराहते हुए उठी। पसीना आ रहा था। “भाभी… भाभी!” वो धीरे-धीरे निशा के कमरे में गई। निशा जाग गई, लाइट जलाकर देखा। दीपिका का चेहरा पीला पड़ गया था। “क्या हुआ दीपिका? कहाँ दर्द है?”

“पेट के नीचे… बहुत तेज दर्द। लग रहा है जैसे कुछ फट रहा हो।” निशा ने तुरंत समझ लिया। उसकी आँखों में मुस्कान आई। वो हँसते हुए बोली, “अरे मेरी जान, ये तो तेरा पहला पीरियड्स है! हॉर्मोन थेरेपी से कुछ ट्रांस वुमन को ऐसा होता है – क्रैम्प्स, लाइट डिस्चार्ज, सब कुछ। जैसे हम लड़कियाँ हर महीने झेलती हैं, वैसे ही तू भी अब झेलेगी।”

दीपिका हैरान। “पीरियड्स? लेकिन मैं तो…” निशा ने उसे बेड पर बिठाया। “हाँ, तू। हॉर्मोन बॉडी को ऐसा सिग्नल देते हैं कि वो महिला जैसा रिस्पॉन्स दे। अब तू पूरी तरह औरत बन गई है। चल, मैं सिखाती हूँ कैसे हैंडल करना है।”


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