📝 Story Preview:
राजेश! अब बहुत हो गया है, अपना बाल कटवा लो। माँ रोज़-रोज़ एक ही बात लेकर बैठती है, तुम्हें क्या प्रॉब्लम है इससे?
मुझे परेशानी है, क्योंकि तुम इनकी 케यर नहीं करते और ये जहां-तहां टूटे-मिलते रहते हैं, बिस्तर में, वाशरूम में, खाने के टेबल पर।
यार, माँ बाल तो सबके टूटते हैं, मेरे कोई अलग थोड़े हैं जो नहीं टूटेंगे। और तुम्हारे पास कोई इलाज हो तो बताओ जो ना टूटे।
तुम बातों में मत बदलो, शाम तक अगर तुमने बाल नहीं कटाए तो मुझे ही कुछ इलाज तुम्हारे बालों का ढूँढ़ना पड़ेगा।
देखो, माँ को जो करना हो करो, पर मैं बाल नहीं कटाऊँगा, ये फाइनल है।
तो ठीक है, अगर तुम्हें लड़की बनने का शौक चढ़ा है, तो आज से घर के काम तुम करोगे, तुम्हारी बहन की जगह, वैसे भी उसके एक्साम हैं अगले वीक, उसे थोड़ा समय मिल जाएगा।
देखो, माँ सपने मत देखो, मैं कुछ नहीं करूँगा और ना ही बाल कटाऊँगा।
अगले दिन, राजेश जब सोकर उठा, उसे कुछ अजीब लगा क्योंकि उसकी ड्रेस की जगह सलवार-कमीज थी और बालों में दो लंबी चोटी, कान में झुमके, माथे पर बिंदी थी। और हाथों में चूड़ियाँ थीं जो कुछ बोलती थीं, उससे पहले ही, क्लिक, क्लिक, फोटो, फ्लैश, फ्लैश..
क्या हुआ, राजेश भाई, घबराए गए?
ओह, माँ की चमची, तुमने और माँ ने ठीक नहीं किया, ये और तुम यहीं क्यों आईं, इतने कुछ करके पेट नहीं भर सका, चुपचाप मेरे लॉकर की चाबी दे, मुझे चेंज करना है।
भाईया, सॉरी, अब तुम कहां भाई हो, अब तो तुम्हें चूतकी बुलाऊँ तो कैसा रहेगा?
वैसे, चूतकी एक बात कहूँ, तुम इस रूम में लग, तो अच्छी रही हो, हा हा हा, और राजेश की छोटी को जोर से खींचा।
ओव्हच, तुम मानेगी नहीं है, ना, रुक अभी, बताता हूँ।
अच्छा, सॉरी, अब नहीं करूँगी। प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़, माफ कर दो। पहले, बताओ, चाबी कहाँ है, अलमारी की। और ये एरिंग निकल चबहा रही है, कान में दर्द हो रहा है।
भाईया, सोचना भी मत निकलने की, माँ ने मुझे पूछने को भेजा है, अकल ठिकाने पर आई और बाल कटवा रही हो, आज के ट्रेलर से या कल पूरी पिक्चर देखना चाहते हो।
ठीक है, तो तैयार रहो।
अगले दिन good morning भाईया।
जाग गए। सॉरी, छोटकी जाग गई क्या हा हा हा
ओह शिट ये क्या है साड़ी किसने पहनाई और ये हाथ भर के इतनी साड़ी चूड़ियाँ, शिट नहीं।
अरे मुँह क्यों चिपरा रही हो, छोटकी अभी तो आधा ही तैयार किया है अभी तो ज्वैलरी मेकअप सब बचा है।
और आज दीवाली है तो सब मेहमान भी तो आएँगे तो सबके लिए नस्ते की प्लेट तो तुम ही लाओगे ना आज। छोटकी। और ये कहकर माँ और दीदी ठहाका लगा कर हसने लगे…
हैप्पी दीवाली आप भी आना छोटकी के हाथ से नस्ता खाने। फेस्टिवल एनजॉय करो। लव यू ऑल।
क्या बात है, राजेश भाईया, आप तो बहुत बहादुर निकले।
आपने सारा दिन साड़ी में कट लिया।
सच में बहुत प्यार करते हो, अपने लंबे बालों से।
इसलिए, तुम्हारे लिए एक गुड न्यूज़ है।
राजेश: कैसी गुड न्यूज़?
मम्मी ने बोला है कि अगर आप कल भैदूज वाले दिन जैसे हम चाहते हैं वैसे तैयार होते हो तो, आप को मम्मी कभी भी परेशान नहीं करेगी बाल कटने के लिए।
राजेश थोड़ा सोचकर बोला, मुझे मंजूर है।
एक बार फिर सोच लो क्योंकि इस बार चीजें आसान नहीं होंगी। क्योंकि इस बार सो नहीं रहे होगे।
राजेश बोला, मुझे मंजूर है।
ठीक है तो सबसे पहले महेन्दी लगानी पड़ेगी
महेन्दी नहीं प्लीज़, वो तो चली भी नहीं।
हां पर मम्मी ने बोला है। वरना बाल कटने पड़ेगें।
अरे यार ठीक है लगाओ जो हो जाए देखेंगे।
अगले दिन नहाने के बाद, राजेश ने पूछा, मेरे कपड़े कहाँ हैं?
वही बेड पर है पर यहाँ तो...तुम्हारी रेड चनिया चोली है। अरे, छोटकी ध्यान से देखो, मेरी नहीं, तुम्हारी चनिया चोली है आज तुम्हें यहाँ पहनना है।
राजेश बोला, मैं नहीं पहनूँगा।
तो मम्मी ने रिप्लाई किया, तो बाल कटवाओ।
अच्छा ठीक है, पहेंटा हूँ। राजेश ने रिप्लाई किया।
जब राजेश ने चनिया चोली पहनी फिर ज्वेलरी और मेकअप की बारी थी।
मम्मी दीदी ने दोनों हाथ भर कर चूड़ियाँ पहनाई। गले में भारी नैकलेस के बाद कान में झुमके और बालों में बुना बनाया उसके माथे पर मंग तिका के बाद नाक के लिए बड़ी सी नथ पहनाई।
और उसके बाद फोटो क्लिक करने के बाद।
दीदी मेरे पास आई और मेरे कान में बोली, एक सörप्राइज़ है तुम्हारे लिए।
राजेश बोला, कैसा सörप्राइज़?
दीदी बोली, अब ही दूर बेल बजेगी और गेट तुम खोलोगे क्योंकि तुम्हारी गर्लफ्रेंड अपनी फ्रेंड्स के साथ तुमसे मिलने दीवाली विश करने आ रही है।
राजेश डर गया और जैसे ही नथनी उतारने को हुआ, मम्मी ने कैंची सामने रखी—"बाल कटवाओगे या तो ऐसे ही अपनी गर्लफ्रेंड के सामने जाओ।"
राजेश सोच में पड़ गया, क्या करूँ?
जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है!
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राजेश के हाथ-पैर सब जैसे ठंडे पड़ गए थे, यह सोचकर कि गेट पर गर्लफ्रेंड है और वो चनिया-चोली में है, जबकि उसकी गर्लफ्रेंड ने पक्का जींस-टीशर्ट पहना होगा।
पता नहीं वो कैसे रिएक्ट करेगी।
कहीं गुस्से में ब्रेकअप ही न कर ले! वैसे, राजेश के लम्बे बाल उसे ही पसंद थे और उसके कहने पर ही राजेश ने बाल बढ़ाना शुरू किए थे। और उनका रिश्ता भी तो बहुत पुराना था, लगभग 5 साल का।
तभी डोर बेल बजी और राजेश अपने ख्यालों से बाहर आया, पर प्रॉब्लम अब भी वही थी कि वो ऐसे लड़की के गेटअप में गर्लफ्रेंड के सामने कैसे जा सकता है। और फिर उसने गेट खोलने का ही फैसला किया।
क्योंकि अब उसके पास न गेटअप चेंज करने का ऑप्शन था और वो चनिया-चोली उतार भी देता, तो भी सारा मेकअप, ज्वेलरी, हेयर बर्न सब उतारने में टाइम लगता ही।
और फिर भी ये दोनों हाथों की ब्राइडल मेहंदी तो फिर भी दिखनी ही थी। तो उसने फ्लो के साथ जाने का ही फैसला किया। एक लंबी सांस लेकर गेट खोला और सामने उसकी गर्लफ्रेंड थी।
लेकिन जितना सरप्राइज राजेश को देख गर्लफ्रेंड को होना था, उतना ही सरप्राइज राजेश अपनी गर्लफ्रेंड को देख कर था।
क्योंकि आज उसकी गर्लफ्रेंड जींस-टीशर्ट नहीं, बल्कि फुल्ली ट्रेडिशनल गेटअप में मेहंदी, मेकअप, ज्वेलरी में थी।
वो तो राजेश को देखते ही ख़ुशी से झूम उठी और उसे कसकर गले लगा लिया। अगर उसका बस चलता और दोनों ने नाक में नथनी न पहनी होती, तो लिप-टू-लिप किस ही कर देती, पर अभी बस माथे से माथा लगाकर ही काम चला लिया।
और जैसे दो सहेलियां आपस में हाथ पकड़कर जाती हैं, वैसे मेरा हाथ पकड़कर घर में ले गई।
मुझे तो समझ ही नहीं आया कि यह हो क्या रहा है।
तभी मुझे मेरे फ़ोन पर कॉल आया, मेरे फ्रेंड दीपक का।
और मेरा चेहरा उतर गया, क्योंकि वो घर आ रहा था, 5 मिनट में पहुँच रहा था।
ओह शिट! अब क्या होगा...
वो नेक्स्ट पार्ट में आप बताओ, स्टोरी कैसी लग रही है? आप क्या करते अगर राजेश आप होते? कमेंट में बताना ज़रूर। हैप्पी भाईदूज टू ऑल द रीडर्स।
दीपक का कॉल तो आया था घर पर आने का, पर थोड़ी देर बाद उसने कॉल करके बोला कि वो घर नहीं आ सकता, कुछ प्रॉब्लम है और फिर कुछ सोचकर मूवी हॉल के पास आने को बोला। बहुत डरा हुआ और घबराया हुआ था। उसने कॉल काटने से पहले कसम दी कि मैं आऊँ, चाहे जितना भी ज़रूरी काम कर रहा हूँ।
मैं कुछ बोलूँ, उससे पहले कॉल कट।
अब घर में मिलने तक तो ठीक था, काम ज़्यादा मैनेज हो ही जाता, पर घर से बाहर कैसे जा सकते हैं हम ऐसे हाल में।
तभी गर्लफ्रेंड बोली, "अरे डरो मत, तुमने बहुत घुमाया है मुझे बाइक पर, आज मैं तुम्हें घुमाऊँगी स्कूटी पर। तुम भी देखो लड़की होना और पीछे बैठना कैसा होता है! बहुत लड़कियाँ ताड़ते थे ना, आज तुम्हें पता चलेगा लड़की को कोई ताड़े तो कैसा फील होता है।"
फिर मैं जैसे ही जूते पहनने को हुआ, दीदी और गर्लफ्रेंड दोनों बोले, "अरे पागल हो क्या! चनिया-चोली पर जूते कोई लड़की पहनती है क्या? रुको।"
और गर्लफ्रेंड स्कूटी से हाई हील्स निकाल कर लाई और बोली, "डार्लिंग, मेरी तरफ़ से तुम्हारे लेडी अवतार की मुँह दिखाई का गिफ्ट! और हाँ, मैं पहले ही बता रही हूँ, दीपक से मिलने के बाद हम मेरे घर चलेंगे, मेरी मम्मी बड़े दिनों से तुमसे मिलना चाहती थीं और तुम हर बार बहाने बनाकर भाग जाते थे बाइक से। आज तुम सही फँसे हो, कहीं भाग नहीं सकोगे।" और मेरे पैरों में हील्स पहनाकर खड़े होते हुए बोली, "क्योंकि तुम भाग तो दूर, ठीक से चल भी नहीं पाने वाले हो।"
और मुझे हाथ पकड़कर एक-एक कदम चलाते हुए स्कूटी तक ले गई।
अब चनिया-चोली और हील की वजह से एक प्रॉब्लम—दोनों पैर एक तरफ़ करके ही बैठना पड़ा राजेश को, जो उसका एक तरफ़ पैर करके बैठने का फर्स्ट एक्सपीरियंस था।
उसके बाद गर्लफ्रेंड ने खुद तो अपने मुँह पर दुपट्टा बाँध लिया, पर राजेश का दुपट्टा भी ऐसे पिन किया था कि वो मुँह भी न ढँक सके। तो राजेश को बस आँखें झुकाए गर्लफ्रेंड की पीठ के पीछे छिपकर ही खुद को बचाना था कि कोई उसे पहचाने न।
भीड़-भाड़ वाली जगहों और हाईवे पर कमेंट करने वाले लुच्चे और बिना बात ही घूरने वाले लक्खों की तो जैसे बाढ़ आ गई थी! क्या बूढ़ा और क्या जवान, सब अपने बाप का माल समझकर घूर रहे थे, कुछ तो गंदे-गंदे इशारे और कुछ गंदे कमेंट कर रहे थे।
और ये सब झेलने के बाद फ़रक्ली मूवी हॉल के पास पहुँचे, पर वहाँ कोई नहीं था, सिर्फ़ एक लड़की उल्टी तरफ़ मुँह किए ब्लू साड़ी में खड़ी थी। ये देखकर राजेश को दीपक पर बहुत गुस्सा आया, क्योंकि दीपक की वजह से आज उसे पता नहीं क्या-क्या गंदे कमेंट्स और इशारे देखने और सुनने को मिले थे। वैसे, ये सब नए नहीं थे, क्योंकि वो या उसके दोस्त खुद भी ऐसी हरकतें करते रहते थे, पर आज टेबल का साइड बदल गया था—आज वो लड़कों की साइड नहीं, लड़की की साइड इशारे और नज़ारे झेलने वाले की तरफ़ था।
थोड़ी देर इधर-उधर देखने के बाद, जैसे ही उन लोगों ने वहाँ से जाने के लिए स्कूटी ऑन की, उसे दीपक की आवाज़ आई, जो उस लड़की की तरफ़ से आ रही थी। और जब वो लड़की पलटी, तो राजेश का तो मुँह ही खुला रह गया, क्योंकि वो ब्लू साड़ी वाली कोई और नहीं, दीपक ही था!
राजेश के पास आकर बोला, "अबे, मुझे लगा था मैं तुझे सरप्राइज दूंगा, यहाँ तो तूने ही सरप्राइज कर दिया! तेरा तो हाल मुझसे भी बुरा है।"
"मेरा तो मम्मी ने जीना मुश्किल कर रखा है, ज़िद पर अड़ गई हैं बाल कटाने के, मेरा मोबाइल ज़ब्त कर लिया है और घर से बाहर जाना बंद करा दिया है। और अब तो शर्त रखी है—बाहर जाना है, तो वो जो कपड़े बोलेंगी, उसमें ही जाना पड़ेगा, वरना नहीं।"
"भाई, देख! हम दोनों ने साथ में बाल बढ़ाने शुरू किए थे, तू जीता, मैं हारा! क्योंकि मैं और नहीं झेल पाऊंगा भाई, धमकी मिली है कल से घर के काम कराने लगेंगी, जो मेरे बस का नहीं है। मैं अपनी हार मानता हूँ और तेरे अकाउंट में 10,000 रुपये ट्रांसफर कर दूंगा, अगर तू अगले एक साल बाल नहीं कटाता है तो।"
"पर तेरे हाल देखकर लग नहीं रहा तू भी ज़्यादा टिकने वाला है। वैसे, कल मैं तो बाल कटवा लूँगा और बैक टू नॉर्मल बॉयज़ लाइफ! इसलिए सोचा, तुझे अपना ये रूप भी दिखा दूँ, इसके बाद तो कभी देखने को मिलेगा नहीं।"
और तभी क्लिक! मेरी गर्लफ्रेंड ने दीपक की फोटो क्लिक की, हमने सेल्फी ली और दीपक को ऑटो तक छोड़कर आए।
फिर मेरी गर्लफ्रेंड बोली, "अच्छा, तो ये बाल 10,000 के लिए बढ़ाए हैं, मेरे लिए नहीं!"
मैंने बोला, "अरे, कैसी बात कर रही हो! बिल्कुल तुम्हारे लिए बढ़ाए हैं।"
"तो इसका मतलब है कि तुम बाल नहीं कटाओगे, है ना?"
राजेश के पास कोई ऑप्शन ही कहाँ था 'हाँ' कहने के अलावा! क्योंकि अगर 'ना' कहता, तो उसका मूड खराब हो जाता और कहीं गुस्से में वहीं छोड़कर चली जाती, तो राजेश के पास न मोबाइल था और न ही पैसे। क्योंकि साड़ी में जेब नहीं होती, जहाँ वो ये सब रख सके।
पर अभी तो अग्निपरीक्षा बाकी थी, क्योंकि गर्लफ्रेंड की माँ से भी मिलना बाकी था!
राजेश मन ही मन सोचने लगा, "भगवान, अब तक तो सब ठीक रहा, आगे इज़्ज़त बचा लेना भगवान।"
"हाय राजेश, कैसे हो दोस्त?"
"अरे दीपक, मैं तो कैसा होूँगा, वही बाल लम्बे करने के चक्कर में लगी पड़ी है।"
दीपक: "क्या हुआ, सब ठीक तो है?"
राजेश: "अरे यार, लम्बी कहानी है, छोड़ ना कभी घर आएगा तो बताऊँगा।"
दीपक: "घर तो आना ही है, चल शाम को मिलता हूँ।"
राजेश: "और बता, बाल कटवा लिए या अभी नहीं?"
दीपक: "हाँ भाई, मैंने तो शाम को ही कटवा लिए थे, वरना मम्मी तो घर से बाहर भी नहीं जाने देती और पता नहीं क्या-क्या करतीं। भाई, मेरे बस का नहीं था साड़ी झेलना, मैं तो शर्ट-पेंट में खुश हूँ। तू बता, शर्ट-पेंट पहन रहा है या साड़ी-ब्लाउज़ ही तेरे लिए फाइनल कर दिया मम्मी और दीदी ने? और उस दिन गर्लफ्रेंड के घर भी गया था क्या वैसे ही या कोई बहाना बना लिया?"
राजेश: "क्या बताऊँ, उस दिन तो बहुत मुश्किल से बचा था! वो मान ही नहीं रही थी, पर पेट दर्द का बहाना बनाकर बहुत मुश्किल से बचा, वरना तो आंटी के सामने क्या इज़्ज़त रह जाती! कहाँ तो दामाद बनने के सपने देख रहा हूँ, घर की बहू बनकर जाना पड़ता।"
दीपक: "ठीक किया यार! अच्छा सुन, एक काम था और तेरे अलावा कोई और नहीं कर पाएगा ये काम मेरा।"
राजेश: "यार, तुझे मेरा हाल पता तो है, आजकल तो घर से बाहर तो दूर, घर में भी हूँ, तो हर वक़्त सवाल-जवाब चलते रहते हैं कि क्या कर रहा हूँ। फिर मैं क्या हेल्प कर पाऊँगा तेरी? अभी तो मैं खुद हेल्प माँग रहा हूँ।"
दीपक: "पता है मुझे तेरी हालत, तभी तो कहा तू ही मेरी हेल्प कर पाएगा। देख, मैं तुझे गोल-गोल नहीं घुमाऊँगा, सीधा पॉइंट पर आता हूँ। मेरी गर्लफ्रेंड को तो तू जानता ही है, उससे मेरी इंगेजमेंट भी हो गई है, पर मैं उससे शादी नहीं करना चाहता हूँ। तो मैं चाहता हूँ कि तू थोड़े दिन के लिए मेरी गर्लफ्रेंड बन जा और हम मेरी गर्लफ्रेंड को जलाएंगे, गुस्सा दिलाएंगे और वो खुद इंगेजमेंट तोड़ लेगी। वैसे भी तो तू एक साल के लिए लड़की बनकर ही रहने वाला है हमारी शर्त के अकॉर्डिंग और तेरी गर्लफ्रेंड की जिद्द की वजह से। जहाँ इतना सह रहा है, थोड़ा सा मेरा भला कर दे! तू चाहे तो मैं तेरे घर आकर तेरी मम्मी से परमिशन भी ले लूँगा, तेरा हाथ माँग लूँगा यार! इसमें तेरा भी फायदा है—घर में रहेगा, घर के काम करना पड़ेगा, नो फन, नो स्मोकिंग, नो मूवी, ऊपर से सारा दिन किट-किट सुनेगा। मेरे साथ घर के बाहर रहेंगे, घूमेंगे-फिरेंगे, मूवीज़ देखेंगे और सारा खर्चा मेरा होगा।"
राजेश: "देख दीपक, लगता है तू पागल हो गया है! मेरी तरफ़ से साफ़ ‘ना’ है और मैं अपनी गर्लफ्रेंड से प्यार करता हूँ, इसलिए ये सब कर रहा हूँ—उसकी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी है, तेरी तरह उसे धोखा देने के लिए नहीं! और घूमना-फिरना, पैसा खर्चा, मूवी, ये सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते हैं। लेकिन सिगरेट के लिए एक बार सोच भी सकता हूँ, पर तेरी बात सुनकर अब मुझे तुझसे कोई हेल्प नहीं चाहिए। मैं बिना सिगरेट भी मैनेज कर लूँगा, जहाँ 15 दिन काट लिए, साल भी ऐसे ही कट जाएगा।"
दीपक: "अरे यार, तू तो नाराज़ हो गया! मेरा वो मतलब नहीं था, प्लीज मेरी बात सुन। अच्छा बता, कौन सी सिगरेट पिएगा? मैं तेरे घर आ रहा हूँ, घर पर आराम से समझाता हूँ, उसके बाद तू खुद बताना क्या मैं गलत हूँ? चल, घर पर मिलते हैं थोड़ी देर में। बाय।"
राजेश: "ओके, बाय।"
क्या लगता है दीपक की क्या मजबूरी है? या कहीं दीपक को राजेश के 'गर्ली लुक' से प्यार तो नहीं हो गया? और राजेश की जगह आप होते तो क्या करते? क्या अपने बेस्ट फ्रेंड की गर्लफ्रेंड बनना एक्सेप्ट करते? कमेंट्स में बताना ज़रूर।
दीपक से बात हुए 2 दिन हो गए पर वो आया नहीं। अब मुझे दीपक पर बहुत गुस्सा आ रहा था, साले ने सिगरेट की बात करके दुखती रग पर हाथ रख दिया था।
अब न चाहते हुए भी मैं कहीं न कहीं दीपक का वेट कर रहा था कि वो कहीं से सिगरेट की जुगाड़ कर दे।
जब मुझसे नहीं रहा गया, तो मैंने ही उसे कॉल किया और बोला कि घर क्यों नहीं आया? तो दीपक बोला—"तूने ही तो मेरे काम को मना किया था आने को।"
मैंने बोला—"आ जा, प्लीज़! और सिगरेट का जुगाड़ कर दे, गला सूख रहा है बिना सिगरेट के। और प्लीज़, एक-दो मत लाना, कम से कम दो पैकेट ला दे।"
दीपक बोला—"जो आज्ञा गुरु, अभी आया।"
और आधे घंटे बाद डोर बेल बजी। गेट पर दीपक था, दीदी ने गेट खोला और मेरे कमरे में भेज दिया।
मुझे पता था कि दीपक आ रहा है, तो मैंने आज शर्ट-पेंट ही पहना था।
वो आया और बोला—"अबे, मैंने तो सोचा था कि तू साड़ी-वाड़ी में होगा, तू तो शर्ट-पेंट में है!"
मैंने बोला—"तू आ रहा था साले, इसलिए चेंज कर लिया और अब पता नहीं इसके लिए क्या सज़ा मिलेगी मम्मी से।"
दीपक बोला—"चल, बढ़िया किया! अच्छा ये ले अपनी सिगरेट, पकड़! कहीं मम्मी-दीदी ने देख लिया, तो दोबारा घर में आने भी नहीं देंगी।"
मैं बोला—"अबे ये कौन सा ब्रांड है? मैं ये नहीं पीता, तुझे पता तो है।"
दीपक बोला—"है मस्त चीज़! नया ब्रांड है, सस्ता और मज़ेदार। ट्राई कर। सुन, मैं चलता हूँ, मुझे कुछ काम है अभी। और हाँ, अगर और कुछ चाहिए हो, तो कॉल कर देना।" और दीपक 'बाय' करके चला गया। मम्मी ने चाय पिलाई और उसे विदा किया।
उसके जाने के बाद रात को सबके सोने के बाद मैं छत पर गया और सिगरेट पी।
'वाओ! मज़ा आ गया।' इतने दिन बाद सिगरेट मिली थी, पता ही नहीं चला कब एक-दो-तीन-चार-पाँच होते हुए रात भर में दोनों डिब्बे ख़त्म हो गए! मैंने सोचा था रोज़ एक-एक पियूँगा, एक महीना कट जाएगा, पर ये तो एक ही रात में सब ख़त्म हो गई! उसके बाद भी नींद नहीं आ रही थी, अब क्या करूँ?
अगले दिन मैंने दीपक को फिर से सिगरेट लाने को कहा, तो दीपक बोला—"देख राजेश, मुझे गलत मत समझ, पर तू ऐसे सिगरेट उड़ाएगा तो मेरी इतनी पॉकेट मनी नहीं है और तेरी हालत देखकर लगता नहीं है कि तेरे पास एक भी रुपया होगा, तो तू सिगरेट मत ही पी। और वैसे भी तूने ही बोला था कि तू सिगरेट के बगैर रह सकता है, तो तू ऐसे ही रह अब।" और ये कहकर कॉल काट दिया।
मैंने 2 से 3 बार कॉल किया, पर उसने उठाया नहीं। अब तो मेरी हालत बिना सिगरेट के और बुरी हो गई! अब तो दिन भर मेरे दिमाग में सिगरेट की तलब ही थी।
3 दिन बाद मैंने दीपक को मैसेज किया और 'सॉरी' लिखा—कि उस दिन मैंने उसकी बात सुने बिना 'ना' बोल दिया, उसके लिए सॉरी, पर प्लीज़ सिगरेट अरेंज कर दे।
दीपक का रिप्लाई आया—"अरेंज तो कर दूंगा, पर सिर्फ़ सॉरी से काम नहीं बनेगा।"
मैंने रिप्लाई किया—"जो तू पनिशमेंट बोले, पर तू नाराज़ मत हो और एक बार कॉल पर बात कर ले।"
दीपक का कॉल आया और बोला—"अरे, मैं कोई नाराज़ नहीं था, एक भसड़ में फँस गया हूँ, कभी फुर्सत में बताऊँगा, पर तेरा पनिशमेंट तो बनता है!"
"एक काम कर, दो चोटी कर अपने बालों में और एक पिक भेज।"
मैंने बोला—"बस इतनी सी बात? अभी ले।" और फिर मैंने अपनी पिक भेज दी, क्योंकि वैसे ही आज दीदी ने दो चोटी ही की थीं।
दीपक बोला—"ऐ, ये क्या है? मज़ा नहीं आया, कुछ मज़ेदार भेज ना!"
मैंने बोला—"अबे, मैं कोई लड़की थोड़ी हूँ जो मेकअप करके भेजूँगा।"
दीपक बोला—"हाँ, बात तो सही है, पर तू किसी लड़की से कम थोड़ी है!"
"एक काम कर, शर्ट चेंज कर और किसी फीमेल ड्रेस में पिक भेज दो चोटी में।"
"अबे यार, तू चाहता क्या है? क्यों ऐसे कर रहा है? रुक जा, भेजता हूँ, पर इसके बाद नहीं, चाहे तुझे पसंद आए या नहीं।"
दीपक बोला—"ओके, ठीक है।"
फिर राजेश ने शर्ट उतार दी और अपनी बहन का स्ट्रेचेबल टॉप पहना और पिक सेंड की और बोला—"बस, अब ख़ुश? चल, अब फटाफट दो पैकेट सिगरेट ले आ।"
दीपक बोला—"चल, ठीक है, पर तू चेंज मत करना, ऐसे ही मिलना।"
राजेश बोला—"ठीक है।" और कॉल काटकर फिर से बाल दो चोटी से खोल लिए और अपने शर्ट-पेंट पहन लिए।
थोड़ी देर बाद दीपक आया, मम्मी ने गेट खोला और आने का कारण पूछा, तो दीपक बोला—"वो राजेश को कुछ काम था, उसने बुलाया है।" तो मम्मी बोलीं—"ओके, ठीक है, आ जाओ।" और मेरे कमरे में भेजा।
पर दीपक मुझे खुले बालों और शर्ट-पेंट में देखकर बोला—"साले, चीटिंग की ना तूने? ये ले अपनी सिगरेट।" और फिर मैंने ही उसकी प्रॉब्लम के बारे में पूछा, पर वो कुछ बोला ही नहीं।
दीपक थोड़ी देर इधर-उधर की बातें करके चला गया और मैं भी रात में सबके सोने के बाद सिगरेट पीने पहुँच गया और इस बार सिर्फ़ 4 सिगरेट पीं।
ऐसे ही रोज़ की 4 पीने से इस बार मेरी सिगरेट 5 दिन चलीं, पर अब दीपक से सिगरेट मँगवाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
पर मेरी तलब सिगरेट की कहाँ मानती और मुझसे कॉल करवा कर ही मानी! पर इस बार दीपक बोला कि वो नहीं आ सकता है, क्योंकि मम्मी बहुत अजीब तरीके से गुस्से से देखती हैं।
मैंने बोला—"बात तो सही है, मेरे से भी गुस्सा कर रही थी, पर बिना सिगरेट काम कैसे चलेगा? कुछ जुगाड़ तो करना ही था!"
मैंने ही मम्मी को बोला कि दीपक आएगा एक कॉलेज की फाइल देने, उसे भेज देना। और मैंने दीपक को आने को कहा, तो दीपक बोला—"वो नहीं आ सकता है।" तो मैंने बोला—"मैंने इतनी मुश्किल से जुगाड़ की और अब तू मना कर रहा है आज!"
इस पर दीपक बोला—"मैं सिगरेट लेकर आऊँगा, पर उसके लिए तू क्या करेगा?"
मैंने बोला—"बता, क्या कर सकता हूँ?"
दीपक बोला—"ठीक है, तू अबकी बार जब मैं घर आऊँगा, तब दो चोटी करके, प्रॉपर रिबन लगाकर हमारे स्कूल की गर्ल्स ड्रेस में मिलना।"
मैंने बोला—"मेरे पास कहाँ से आएगी स्कूल ड्रेस? और मुझे रिबन बाँधना नहीं आता स्कूल गर्ल्स की तरह।"
तो दीपक बोला—"देख, बहाने नहीं बना, समझा? सिगरेट इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली तुझे। तो पहले मैंने जो कहा है, वैसे तैयार हो कर पिक भेज, तभी मैं सिगरेट ला पाऊँगा, वरना तेरी मर्ज़ी है।" और कॉल कट!
राजेश को दीपक पर बहुत गुस्सा आ रहा था, दीपक को पेट भरकर गालियाँ दीं और सोचने लगा कि क्या करे।
आपको क्या लगता है राजेश क्या करेगा? कैसे मैनेज करेगा? कमेंट में बताना ज़रूर।
(टिल देन, वेट फॉर नेक्स्ट पार्ट)
मैंने 2 से 3 बार ट्राई किया दीपक को मनाने के लिए, पर वो नहीं माना और ज़िद पर अड़ा रहा कि पहले पिक भेजूँ स्कूल ड्रेस के, दो चोटी में, तभी वो सिगरेट ला पाएगा।
फिर उसकी ज़िद के सामने हार गया, क्योंकि वो अब इसे इगो पर ले चुका था! पर अब दीदी और मम्मी को कैसे मनाऊँ? स्कूल ड्रेस के लिए बोलूँगा क्या?
मैं ये सोच ही रहा था, तभी मुझे याद आया चिल्ड्रेंस डे! और मैं दीदी के पास गया और उनसे उनके फेवरेट पॉलिटिशियन के बारे में पूछा, फिर इधर-उधर की बातों से होते हुए फाइनली चिल्ड्रेंस डे पर बातों को लाया।
तभी मम्मी भी आ गईं और बोलीं—"भाई-बहन में क्या बातें हो रही हैं?" तो दीदी बोलीं—"ये हमारी छुटकी है, इसे चिल्ड्रेंस डे याद आ रहा है।" तो मम्मी बोलीं—"हाँ, जब तुम लोग छोटे थे, तो स्कूल में टीचर्स बनते थे और तुम्हारे टीचर्स स्टूडेंट्स बनते थे।" दीदी बोलीं—"हाँ, बात तो सही है, वो भी क्या दिन थे!"
तभी मैंने कहा—"क्या दी, आप तो बड़े-बूढ़ों वाली बातें कर रही हो, हम भी तो बच्चे ही हैं! और याद है हमारी लैला मैम? वो तो कितनी मस्त स्कूल ड्रेस और चोटी करके आती थीं! और उन पर जचती भी थी स्कूल ड्रेस। चलो, आज मम्मी को लैला मैम बनाते हैं और हम टीचर्स बनते हैं, मज़ा आएगा!"
तभी दीदी बोलीं—"हाँ, मज़ा तो आएगा।"
मम्मी बोलीं—"नहीं, मैं कुछ नहीं करने वाली हूँ, मैंने देखा है तुम्हारी लैला मैम को चिल्ड्रेंस डे पर। सोचना भी मत, मैं पागल लगूँगी!"
मैंने रुआँसी सी शक्ल बनाकर कहा—"एक ज़रा सी बात भी मेरी कहाँ मानी जाएगी इस घर में! इतने दिन से मुझे ये सब पहना रहे हो, उसका कुछ नहीं, अब मैंने कहा तो मना कर रहे हो।"
फिर मम्मी को लगा शायद मैं बुरा मान रहा हूँ, तो बोलीं—"ठीक है, पर तुम दोनों को भी स्कूल ड्रेस में रेडी होना पड़ेगा।" मैंने कहा—"पहले आप तो रेडी हो जाओ।"
फिर मम्मी ने मेरी स्कूल की रेड शर्ट पहनी और नीचे व्हाइट स्कर्ट पर व्हाइट मोजे और ब्लैक जूते पहन लिए। फिर दीदी बोलीं—"मस्त लग रही हो, मम्मी!"
तो मैंने कहा—"हाँ, पर एक कमी है।" तो दीदी बोलीं—"सही तो है, क्या कमी है?"
मैंने कहा—"बस लैला मैम की दो चोटियाँ मिसिंग हैं, वो हो जाए तो मम्मी कंपलीटली लैला मैम लगेंगी!" फिर दीदी हँसते हुए बोलीं—"मम्मी, एक बार ट्राई करें क्या?" तो मम्मी कुछ नहीं बोलीं। फिर दीदी बोलीं—"चलो, मैं ट्राई करती हूँ।" और फिर दीदी ने मम्मी की दो चोटी बनाईं और व्हाइट रिबन से फोल्ड करके बाँध दीं। फिर मम्मी ने अपना चश्मा लगाया और हमने उनकी पिक खींच ली।
अब दीदी बोलीं—"राजेश भैया, मम्मी ने तो आपकी शर्ट पहन ली, अब तो आपको मेरी ही ड्रेस पहननी पड़ेगी!" और फिर मुझे अपनी पुरानी स्कूल ड्रेस लाकर दी। मैं तो साले दीपक की वजह से चाहता ही यही था! दीदी ने मेरा दुपट्टा ठीक किया, पिन लगाया, बालों में दो लाल रिबन से मम्मी जैसी ही फोल्ड करके चोटी बनाई और मेरे कानों में झुमकी पहनाई, माथे पर बिंदी, गले में गोल्ड की चेन और होंठों पर लाइट पिंक लिपस्टिक लगाई। और फिर घर के गार्डन में ले जाकर पिक क्लिक की।
अब बारी थी दीदी को रेडी होने की, तो दीदी ने साफ़ मना कर दिया—वो ऐसा कोई पागलपन नहीं करने वाली हैं और हँसने लगीं।
मैंने दीपक को फोटो भेज दिया था और दीपक भी आने को रेडी हो गया था और अब दीदी के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
थोड़ी देर में मम्मी ने भी बाल खोल दिए और कपड़े चेंज करके नॉर्मल गेटअप में आ गईं। मैंने भी सोचा चेंज कर लूँ, पर कुछ सोचकर रुक गया और उसका इंतज़ार करने लगा। सच में, टाइम नहीं कट रहा था! ऐसी फीलिंग्स आ रही थीं, मानो कोई नई-new जवान हुई लड़की अपने बॉयफ्रेंड का करती है।
पर क्या कर सकते थे सिवाय इंतज़ार के?
आप भी मेरे साथ इंतज़ार करो अगले पार्ट का...
फाइनली, दीपक घर आया, मम्मी ने मेरे कमरे में भेज दिया, दीपक ने मुझे सिगरेट दी और बोला—"चल!"
मैंने पूछा—"कहाँ?" तो बोला—"तू घर में रहकर बोर नहीं होता क्या?"
मैंने रिप्लाई किया—"हाँ, बोर तो हो गया हूँ, पर क्या करूँ? घर से बाहर जाने के लिए परमिशन रिक्वायर्ड है।"
तो बोला—"अरे यार, तो ले ले परमिशन!" मैंने कहा—"चल, ठीक है, ट्राई करता हूँ, पर तू ये तो बता, कहाँ ले जा रहा है मुझे? और तू उस दिन हेल्प की कुछ बात कर रहा था, तो बात तो बता।"
दीपक बोला—"देख, मुझे पता है तू मानेगा नहीं, तो फिर तुझे क्या बताऊँ अब?"
मैं बोला—"तू बता तो सही, क्या पता मान ही जाऊँ!" तो दीपक बोला—"देख, मुझे गलत मत समझना, पर तुझे थोड़े दिन के लिए मेरी गर्लफ्रेंड बनना पड़ेगा।"
मैं बोला—"क्या बकवास कर रहा है?"
दीपक बोला—"देख, मैंने बोला था ना, तू नहीं मानेगा।"
मैंने रिप्लाई किया—"यार, बात मानने के लिए बात मानने जैसी भी तो हो!"
दीपक बोला—"अच्छा, तू मेरी पूरी बात सुन ले, फिर तुझे जो ठीक लगे वो करना, बस!"
मैंने कहा—"ठीक है, सुनूँगा, पर अगर तेरा मुझे दो चोटी में देखने का मन भर गया हो, तो मैं अपने बाल खोल सकता हूँ अब।"
दीपक बोला—"अरे शिट! मैंने तो ध्यान ही नहीं दिया, हाँ बिल्कुल खोल ले।"
मैंने कहा—"थैंक गॉड! तेरे दो चोटी के चक्कर में मुझे क्या-क्या करना पड़ा है, बता नहीं सकता हूँ।"
दीपक बोला—"अच्छा सुन, एक काम कर, जल्दी से तैयार हो जा, मेरे पास एक मस्त सरप्राइज है।"
मैंने कहा—"ठीक है।" मैंने अपने शर्ट-पेंट पहने और बोला—"चल, कहाँ जाना है, देखा जाएगा जो होना है आगे।" फिर दीपक मुझे एक ब्यूटी पार्लर ले गया और बोला—"यार, तू मेरी गर्लफ्रेंड को जानता है ना, दिव्या? वो तुझसे मिलना चाहती है।"
मैंने कहा—"हाँ, तो उसमें प्रॉब्लम क्या है? चल, उससे भी मिल लेते हैं।"
दीपक बोला—"पर तू उससे ऐसे नहीं मिल सकती है, क्योंकि उसकी शादी हो रही है और वो चाहती है कि मैं उसके साथ रहूँ या हर पल मुझसे बात कर सके। पर तुझे पता है ना, शादी के घर में कोई न कोई उसके साथ रहना ज़रूरी है, इसलिए वो यानी मैं यानी हम दोनों चाहते हैं कि तू लड़की बनकर उसके घर में, उसके कमरे में उसके साथ रहे।"
"उसने घरवालों से बात कर ली है, तुझे कोई परेशानी नहीं होगी और तेरे बहाने से मैं भी उससे मिल पाऊँगा।" मैंने बोला—"वो कैसे?"
"क्यूंकि मैं फिर तेरा भाई बनकर उससे मिलने जा पाऊँगा ना!"
यार भाई, अपने घर में लड़की बनकर रहना अलग होता है, पर किसी लड़की के साथ लड़की बनकर शादी वाले घर में रहना अलग होता है! तू समझने की कोशिश कर, अगर कोई गड़बड़ हुई, तो वो लोग मुझे मार-मार कर मेरा कचुम्बर बना देंगे और मैं भाग भी नहीं पाऊँगा।"
दीपक बोला—"भाई, प्लीज मना मत कर, मेरी आख़िरी उम्मीद तू ही है।"
"यार, तू समझ नहीं रहा है! चल, मैं मान भी जाऊँ, पर मैं लड़की कहाँ से दिखता हूँ तुझे? कोई भी एक नज़र में मुझे पहचान जाएगा।"
दीपक बोला—"तू उसकी टेंशन मत ले, मैंने उसका भी जुगाड़ कर लिया है।"
मैं बोला—"अच्छा, क्या जुगाड़ है वैसे?"
तो दीपक बोला—"तू 'हाँ' बोल बस, फिर जादू देख!"
मैंने कहा—"तेरा कॉन्फिडेंस देखकर तो डर लग रहा है, पर चल, तेरा मान रखने के लिए 'यस' बोलता हूँ, पर अगर मुझे ठीक नहीं लगा, तो मैं मना कर दूँगा।"
दीपक बोला—"तूने 'हाँ' बोला है, इसलिए चल, यहाँ बैठ जा!" और दीपक ने मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी और फिर उसने किसी को बुलाया और उसके बाद पता नहीं क्या-क्या करने लगे, पर हाथ के स्पर्श से यह पता चल रहा था कि दीपक के साथ कोई लड़की भी है।
उन दोनों ने मिलकर मेरे कपड़े चेंज किए—कुछ ब्लाउज़ और पेटीकोट पहनाया, यह लगा, उसके बाद हाथों में चूड़ियाँ पहनाईं, फिर गले में नेकलेस, फिर इयरिंग्स, फिर बालों में जूड़ा और उसमें फूलों का गजरा लगाया।
माथे में माँगटीका पहनाया और फाइनली मेरी आँखें खोलीं और बोला—"ये आधी तैयारी है, अब मेकअप करके तू रेडी..."
फिर फाइनली फेस मेकअप और पूरा लुक रेडी!
दीपक बोला—"अब तू बोल, कहाँ से लड़का लग रहा है तू?"
मैंने खुद को आईने में देखा और धीरे से बोला—"वैसा तू बोल तो सही रहा है, पर मैं यह नहीं कर सकता हूँ, सॉरी!"
तभी दीपक बोला—"मुझे पता था तू चीटिंग करेगा, इसलिए मैंने असली चीज़ तुझे नहीं बताई! अब सुन, ये जो ड्रेस तूने पहनी है, ये ऐसी-वैसी ड्रेस नहीं है, ये कंप्यूटराइज्ड है और अब तेरे लिए सरप्राइज!"
दीपक ने फ़ोन में एक बटन दबाया और मेरे चेस्ट में जैसे हल्का-हल्का सा करंट लगा—जैसे कोई बहुत हल्के-हल्के हाथों से, ठंडे-ठंडे हाथों से बड़े हल्के हाथों से मसल रहा हो! फिर थोड़ा-थोड़ा मसन चेस्ट में बढ़ रहा था और जैसे ही मैंने अपने हाथ अपने चेस्ट पर रखे, एक ज़ोर का करंट मेरे पैर की पायल में लगा! वो इतना तेज़ था कि मैं लगभग चीख पड़ा।
मैंने दीपक से कहा—"ये क्या है सब?" तो दीपक बोला—"क्यों, क्या हुआ? अब क्या बोलता है? जाएगा दिव्या के घर या मज़े लेते रहना है अपने चेस्ट में? जल्दी सोच के बता, क्योंकि थोड़ी देर में ये मज़ा तेरी पैंटी में भी शुरू हो जाएगा! जल्दी बोल, जल्दी..."
धीरे-धीरे यह मज़ा मेरी बॉडी में सिहरन बढ़ा रहा था... मज़ा बढ़ रहा था... और पागलपन भी! पर यह वो जगह नहीं थी जहाँ यह मज़ा लिया जाए। और मैंने ज़ोर से चिल्लाकर कहा—"दीपक, अब बहुत हो रहा है, यह बंद कर अभी!"
दीपक बोला—"पहले 'हाँ' बोल!"
मेरे न चाहने के बावजूद मुझे 'हाँ' ही बोलना पड़ा, क्योंकि राजेश के डिवाइस मुझे पागल कर रहे थे और मैं फाइनली रेडी हो गया।
दीपक मुझे दिव्या के घर ले गया और घर के बाहर पहुँचकर दिव्या को कॉल किया...
दिव्या खुद मुझे गेट तक लेने आई और आते ही मुझे ऐसे गले लगाया जैसे कि मुझे बचपन से जानती हो। पर कुछ भी हो, मुझे तो मज़ा ही आया, क्योंकि आख़िर था तो मैं लड़का ही, भले ही वो दोस्त की गर्लफ्रेंड थी, पर अभी गले तो मेरे ही लगी थी! और ये बात दीपक ने भी नोटिस कर ली थी।
और खाँसकर बोला—"दिव्या, थोड़ा दूर से! लड़के के गेटअप में राजेश है, समझो।"
दिव्या बोली—"राजेश है नहीं, था! क्योंकि अब ये अगले एक महीने मेरे साथ मेरी फ्रेंड बनकर रहेगा और अब ये मेरी प्रॉपर्टी है, समझे?"
"अब सबसे पहले ये बताओ, जो आइटम्स मैंने तुम्हें दिए थे, तुमने इसमें फिट कर दिए हैं ना?"
तो दीपक बोला—"हाँ, कर दिए हैं।" तो दिव्या मन में हँसती हुई बोली—"बहुत बढ़िया! अब आएगा असली मज़ा!"
"अब एक काम करो, इसके सारे एक्सेस मुझे दो और खुद को सेकंडरी ओनर बनाओ।"
दीपक बोला—"ओके डार्लिंग, इट्स डन।"
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या बातें हो रही हैं। मैंने बोला—"तुम दोनों ये क्या बातें कर रहे हो? मुझे कुछ बताओगे भी?"
दिव्या बोली—"राजेश, सॉरी—रानी! तुम्हें सब पता चल जाएगा, चलो अब घर में आओ।" और दीपक को 'बाय' करके मुझे अपने घर में ले गई।
वहाँ पर मुझे अपने मम्मी-पापा और अपने भाई से मिलवाया।
और फिर अपने कमरे में ले गई और बोली—"रानी डार्लिंग, आज से तुम मेरे साथ मेरे कमरे में रहोगी, समझे?"
मैंने कहा—"वाओ! पर तुम्हें कोई परेशानी नहीं है कि एक लड़का तुम्हारे साथ रहेगा?"
तो दिव्या बोली—"लड़का? कौन सा लड़का?"
तो मैंने अपनी ओर इशारा करते हुए कहा—"कि मैं और कौन?"
तो दिव्या हँसने लगी और बोली—"ज़रा अपनी शक्ल आईने में देख लो और कहाँ से तुम लड़का हो, वो बता दो!"
मैंने कहा—"हाँ, पर वो..."
दिव्या ने मुझे बीच में ही चुप करा दिया और बोली—"बहुत बातें हो गई हैं, चलो अब यहाँ मेरे पास बैठो और मेरे पैर दबाओ!"
मैं बोला—"क्या? पैर दबाओ?! हैलो, मैं तुम्हारी सहेली बनकर आया हूँ, नौकर नहीं!"
दिव्या बोली—"डार्लिंग, तुम्हें दीपक ने शायद सब कुछ बताया नहीं है, पर मैं बताती हूँ—तुम यहाँ पर मेरे नौकर बनकर ही आए हो! और हाँ, ज़रा सी भी चालाकी दिखाने की कोशिश की, तो तुम्हें दीपक से डेमो देखा था, मैं तुम्हें पूरी पिक्चर दिखा सकती हूँ! याद है या भूल गए?"
मैंने कहा—"देखो दिव्या, तुम्हें कुछ ग़लतफ़हमी हुई है, पर मैं यह नहीं कर सकता हूँ।"
तो दिव्या बोली—"ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी!"
और दिव्या बोली—"ऑर्डर, रानी!" और तभी मेरी बॉडी से एक कंप्यूटराइज्ड आवाज़ आई—"हाई, दिव्या!"
मैं खुद को चेक करने लगा, तभी दिव्या बोली—"रानी! 5 नंबर का शॉक ब्रेस्ट में दो।"
दिव्या के इतना कहते ही मेरे चेस्ट में इतना तेज़ करंट लगा, जैसे 440 वोल्ट की नंगी तार पकड़ ली हो!
दिव्या बोली—"अबकी 6 नंबर का करंट पैंटी में!"
और मेरी टांगों के बीच, मेरे प्रायवेट्स में एक ज़ोरदार करंट लगा और मैं लगभग चीख ही पड़ा था।
दिव्या बोली—"और डेमो देखना है, या जो मैं कह रही हूँ वो करना है, या एक झटका और चाहिए?"
मैंने कहा—"प्लीज़, प्लीज़! करंट मत दो, मैं मर जाऊँगा, ये बहुत ज़ोर का झटका है!"
तो दिव्या बोली—"चलो, वेरी गुड! देर आए, दुरुस्त आए।"
"अब चलो, शुरू हो जाओ!" और फिर दिव्या ने वैक्स किए हुए मेहंदी वाले पैर मेरे सामने रख दिए और बोली—"चलो, दबाओ।"
मैंने डरते-डरते अपने हाथ से दिव्या के पैर दबाने शुरू किए। थोड़ी देर बाद दिव्या बोली—"एक काम करो, चलो, ये मुझसे ज़्यादा खूबसूरत दिखना बंद करो सबसे पहले! और जाकर ये साड़ी पहनकर आओ।"
मैंने कहा—"मुझे साड़ी पहननी नहीं आती है।"
तो दिव्या बोली—"चलो, मैं पहना देती हूँ।" और मेरी साड़ी-ज्वेलरी उतार दी और मुझे सस्ती सी साड़ी पहना दी।
और बोली—"अब पैर दबाओ! और हाँ, ये तो बस शुरुआत है, अभी तुम्हें बहुत कुछ करना है।"
मैंने दिव्या से पूछा—"यार, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो तुम मेरे साथ ये सब कर रही हो?"
तो दिव्या बोली—"इतनी क्या जल्दी है जानने की? समय आने पर सब पता चल जाएगा।"
और मुझसे पैर दबवाते-दबवाते ही सो गई।
वैसा, मुझे बुरा तो बहुत लग रहा था, पर वो दूध सी सफ़ेद थी और मेहंदी में उसके पैर सोने की तरह चमक रहे थे। उसके सोने के बाद मेरी तो आँखें ही नहीं हट रही थीं उसके पैरों से, पर क्या किया जा सकता था?
समझ नहीं आ रहा था कि अपनी किस्मत पर हँसूँ या रोऊँ—दोस्त की गर्लफ्रेंड के साथ उसके घर में, उसके साथ हूँ या अपनी दुर्दशा पर रोऊँ?
दिव्या के पैर दबाते-दबते पता नहीं कब मुझे भी नींद आ गई और मैं उसके पैरों के पास ही सो गया।
सुबह दिव्या जब उठी और मुझे सोता देख कर बोली—"रानी! ब्रेस्ट और पैंटी में 5 नंबर का करंट दो।"
और मुझे दोनों जगह एक साथ 440 वोल्ट का करंट लगा और मैं चीख कर उठ गया।
सामने दिव्या थी, हँस रही थी और बोली—"डार्लिंग, सोने के लिए यहाँ थोड़ी रखा है? पैर दबाने को रखा था ना और तुम सो रहे हो!"
मैंने 'सॉरी' बोला और बताने की कोशिश की कि वो सो गई थी, उसके बाद सोया था, पर कोई फायदा था नहीं।
दिव्या बोली—"सुनो, फटाफट नहाकर आओ, मैं तब तक तुम्हारे लिए कुछ कपड़े निकाल कर रखती हूँ।"
और फिर वार्निंग दी—"ठंडे पानी से नहाना है और 15 मिनट का टाइम है तुम्हारे लिए! नया रेज़र रखा है, पूरी बॉडी के बाल साफ़ करने हैं, फिर नहाना है। और जब तक मेरे साथ हो, तब तक यही करना है, समझे? या समझाऊँ मैं?"
मैं चीख पड़ा—"जी, समझ गया!" क्योंकि उसका समझाना मतलब... करंट!
मैं बाथरूम गया और मैंने खुद को ध्यान से देखा, आखिर ये करंट आ कहां से रहा है, पर कुछ समझ नहीं आया क्योंकि दीपक ने बोला था ड्रेस में कोई डिवाइस है जो मुझे करंट दे रहा है, पर वो तो दिव्या ने कल ही उतरवा दी थी। इसका मतलब था मेरे ब्रा पैंटी में कुछ है। मैंने वो भी उतार दिए और खुश हो गया, अब मैं आजाद हो गया। मैं नहा कर बाहर आया और दिव्या से बोला, "मेरे कपड़े दो मुझे अपने घर जाना है।" तो दिव्या बोली, "क्या बात है, आवाज चेंज हो गई? क्या हुआ, करंट का असर खत्म हो गया क्या?"
मैंने बोला, "मुझे पता है करंट वो ब्रा और पैंटी में था जो मैं उतार चुका हूं, अब तुम मुझे अपनी उंगलियों पर नहीं नचा सकती हो।"
तो दिव्या बोली, "ओह तो ये बात है।"
"तुम लड़के भी ना, अकल एक रुपए की नहीं है तुम्हारे अंदर।"
"चलो जादू दिखाती हूं।"
दिव्या हंसते हुए बोली: "Hi Rani,"
और मेरी बॉडी से आवाज आई "Hi Divya"
और मैं खुद को दिव्या की तरफ बेवकूफ की तरह देख रहा था कि ये आवाज आ कहां से रही है।
"अब करंट भी खाना है या अभी के अभी मेरे पैरों में गिर कर सॉरी बोलोगे?"
"जल्दी सोचो, टाइम सिर्फ 3 गिनने तक है।"
और काउंट डाउन करते हुए बोली...
3
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and .....
मैं रानी बन कर अपने दोस्त की गर्लफ्रेंड का गुलाम बन गया
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