Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

Company ka High Sales Target aur Bra Panty ka magic Sandip aur Nitu ki Anokhi Kahani

📝 Story Preview:

😳 क्या आपने कभी सोचा है कि पत्नी की पैंटी पहनने से पति की किस्मत कैसे बदल सकती है?


जयपुर के एक साधारण MR संदीप की जिंदगी में एक दिन ऐसा मोड़ आया कि उसकी पत्नी नीतू ने मजबूरी में उसे अपनी **गुलाबी लेस वाली पैंटी और सिल्की कैमिसोल** पहना दिया...

पहले दिन ही 20 लाख का ऑर्डर! 🔥

लेकिन असली कहानी तो रात को शुरू हुई...

जब नीतू ने शरारत से कहा — “आज मेरी लाल सलवार-कमीज़ पहनकर दिखाओ ना... मेरी खुशी के लिए।”

संदीप शर्म से लाल हो गया, लेकिन नीतू की नरम जिद के आगे हार गया।

नीतू ने उसके हाथ पीछे दुपट्टे से बाँध दिए...  

उसके खड़े लंड को रेशमी सलवार के ऊपर से ही चूसना शुरू कर दिया...  

अपने नरम-नरम बूब्स से उसकी छाती रगड़ने लगी…


संदीप सिसकारते हुए चीख उठा — “नीतू... उफ्फ... क्या कर रही हो तुम...”

नीतू ने मुस्कुराते हुए कहा — “आज तुम मेरी लड़की हो... मेरी शर्मीली, गर्म लकी लड़की...”

रात भर नीतू ने उसे साड़ी, ब्रा, पैंटी और मेकअप में तैयार किया...  

उसके होंठों पर लाल लिपस्टिक लगाई...  

और फिर blindfold करके उसे पूरी तरह अपना बना लिया 💦

शर्म, प्यार, domination और जंगली रोमांस का वो तूफान...  

जिसके बाद संदीप खुद को रोक नहीं पाया।

अगले दिन ऑफिस में भी वही गुलाबी पैंटी...  

फिर लाल... फिर पेडेड ब्रा...  

और जब ऑफिस की लड़कियों को राज़ पता चला तो कहानी और भी गर्म हो गई 😈

क्या संदीप को रोज़ साड़ी पहनकर ऑफिस जाना पड़ा?  

क्या नीतू ने उसे chastity cage में लॉक कर दिया?  

और क्या आखिर में संदीप को अपनी पत्नी की “लकी लड़की” बनकर रहना पड़ा?

ये सिर्फ एक erotic कहानी नहीं...  

ये है पति-पत्नी के बीच गहरा प्यार, शर्मीला रोमांस, intense sexual domination और एक अनोखी किस्मत की दास्तान।


चैप्टर 1: जयपुर की भागती ज़िंदगी

जयपुर की सुबह हमेशा की तरह हलचल भरी थी। गुलाबी शहर की गलियों में सूरज की पहली किरणें पड़ते ही स्कूटरों, बाइकों और ऑटो की आवाज़ें गूँजने लगती थीं। उसी भीड़-भाड़ वाले मोहल्ले में, एक छोटी सी सोसाइटी के दूसरे माले पर स्थित 2BHK फ्लैट में संदीप शर्मा और उनकी पत्नी नीतू चौधरी की ज़िंदगी चल रही थी। फ्लैट छोटा था, लेकिन प्यार से भरा हुआ। दीवारों पर नीतू द्वारा लगाए गए छोटे-छोटे वॉल हैंगिंग्स, किचन में रंग-बिरंगे बर्तन और बालकनी में दो कुर्सियाँ – जहाँ शाम को दोनों चाय पीते हुए दिन की बातें शेयर करते थे।

संदीप शर्मा, उम्र 32 साल, लंबा-चौड़ा कद-काठी वाला, साफ-सुथरा चेहरा। वह एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) था – फार्मा कंपनी "हेल्थकेयर फार्मा" में काम करता था। सुबह 7:30 बजे उसकी आँख खुलती, फिर जल्दी-जल्दी तैयार होना, बैग में सैंपल्स और ब्रोशर ठूँसना, और फिर दिन भर डॉक्टरों के क्लिनिक, हॉस्पिटल और स्टॉकिस्टों के चक्कर लगाना। जॉब अच्छी थी, लेकिन टारगेट की मार बहुत भारी थी। हर महीने 50 लाख का सेल्स टारगेट। अगर पूरा न हुआ तो बॉस की डाँट, इंसेंटिव कम, और कभी-कभी जॉब पर भी सवाल खड़े हो जाते।

नीतू चौधरी, 29 साल की, गोरी, नाजुक कद-काठी, लेकिन अंदर से बहुत मज़बूत। वह भिलवाड़ा के एक छोटे से गाँव से थी। शादी के बाद जयपुर आकर उसने स्कूल टीचर की नौकरी जॉइन कर ली थी। सुबह 7 बजे घर से निकलकर सरकारी स्कूल जाती, छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाती, उनके चेहरे पर मुस्कान लाती। शाम को थकी-हारी घर लौटती, लेकिन संदीप के लिए हमेशा एक मुस्कान और गरम चाय तैयार रखती। नीतू को साड़ी में बहुत सुंदर लगता था – सिंपल कॉटन साड़ी, बिंदिया, और हल्का मेकअप। उसकी आवाज़ में गाँव की मिट्टी की खुशबू थी।

दोनों की शादी को पाँच साल हो चुके थे। संदीप जयपुर का रहने वाला था, जबकि नीतू भिलवाड़ा के एक साधारण परिवार से। पहली मुलाकात शादी के रिश्ते से हुई थी, लेकिन दोनों एक-दूसरे को बहुत जल्दी समझ गए थे। संदीप को नीतू की सादगी और हँसमुख स्वभाव पसंद था, जबकि नीतू को संदीप की मेहनती और जिम्मेदार प्रकृति। घर में छोटी-छोटी खुशियाँ थीं – रात को साथ में डिनर करना, वीकेंड पर कभी पुरानी फिल्म देखना, या फिर बालकनी में बैठकर नीतू का गाना सुनना।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से संदीप के चेहरे पर एक छाया सी छा गई थी। हर रात सोने से पहले वह टारगेट की गणना करता – "इस महीने अभी तक सिर्फ 28 लाख का बिजनेस हुआ है। बाकी 22 लाख कहाँ से आएगा?" नीतू उसे समझाती, "संदीप, चिंता मत करो। मेहनत करो, भगवान सब ठीक कर देंगे।" लेकिन संदीप के मन में डर था। कंपनी में हाल ही में दो MR को टारगेट न पूरा करने पर निकाल दिया गया था। वह खुद को बार-बार कहता, "मुझे और मेहनत करनी होगी। नीतू का भविष्य, हमारा घर... सब मेरे ऊपर है।"

एक सुबह, संदीप नाश्ते की टेबल पर बैठा था। नीतू ने उसके लिए पराठे और दही रखा था। संदीप चुपचाप खा रहा था। नीतू ने उसके चेहरे को देखा और पूछा,

"क्या हुआ जी? फिर टारगेट की टेंशन?"

संदीप ने आह भरी, "हाँ नीतू। इस महीने सिर्फ 10 दिन बचे हैं। अगर आज-कल कुछ बड़ा ऑर्डर न निकला तो मुश्किल हो जाएगी। बॉस ने कल फोन पर साफ कह दिया – 'शर्मा, अब बहाने नहीं चलेंगे।'"

नीतू ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। उसकी उँगलियाँ नरम और गर्म थीं।

"देखो, तुम इतने सालों से यह जॉब कर रहे हो। कभी न कभी तो किस्मत साथ देगी न? और हाँ, अगले हफ्ते हमें दो दिन की छुट्टी मिल रही है। मैं सोच रही हूँ भिलवाड़ा चलें। मम्मी-पापा से मिल आएँगे। तुम्हें भी थोड़ा ब्रेक मिल जाएगा। क्या कहते हो?"

संदीप ने नीतू की आँखों में देखा। उसकी मुस्कान में हमेशा की तरह शांति थी। वह हल्के से मुस्कुराया,

"ठीक है। चलते हैं। शायद गाँव की हवा में कुछ अच्छा हो जाए।"

नीतू खुशी से उछल पड़ी। "तो फिर मैं पैकिंग शुरू करती हूँ। तुम बुलेट बाइक तैयार रखना। हम दोनों बाइक पर ही जाएँगे। तीन घंटे का रास्ता है, मज़ा आएगा!"

संदीप ने सिर हिलाया। मन में अभी भी टारगेट की चिंता थी, लेकिन नीतू की इस छोटी सी खुशी ने उसे थोड़ा राहत दी। वह जानता था कि नीतू उसके लिए कितनी मायने रखती है। जॉब की भागती ज़िंदगी में वह उसकी सबसे बड़ी ताकत थी।

उस दिन ऑफिस जाते वक्त संदीप ने बैग में सैंपल्स रखते हुए खुद से कहा,

"आज कुछ तो होना चाहिए। बस एक अच्छा ऑर्डर... बस एक मौका।"


चैप्टर 2: दो दिन की छुट्टी और भिलवाड़ा प्लान

शाम के सात बज रहे थे। जयपुर का मौसम हल्का ठंडा हो चुका था। बालकनी में दोनों चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। नीतू ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और उत्साह से बोली,

"संदीप, अच्छी खबर है! स्कूल में दो दिन की स्पेशल छुट्टी मिल गई है – गुरुवार और शुक्रवार। तुम्हारी कंपनी से भी कन्फर्म हो गया न?"

संदीप ने चाय का कप नीचे रखा और थोड़ा मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।

"हाँ, कन्फर्म है। लेकिन नीतू, सिर्फ दो दिन... भिलवाड़ा जाना-आना ही तीन-तीन घंटे का है। वहाँ ज्यादा टाइम नहीं मिलेगा।"

नीतू की आँखों में चमक आ गई। वह संदीप के पास सरक आई और उसके कंधे पर सिर रख दिया।

"बस दो दिन ही सही, लेकिन मम्मी-पापा को बहुत याद आ रही है। गाँव की हवा, पुरानी यादें, माँ के हाथ का खाना... और तुम्हें भी थोड़ा ब्रेक मिल जाएगा न? रोज़ डॉक्टरों के पीछे भागते-भागते तुम थक गए हो।"

संदीप ने नीतू के बालों में हाथ फेरा। उसकी आवाज़ में प्यार था, लेकिन चिंता भी।

"ठीक है। चलो जाते हैं। लेकिन बाइक पर ही जाना पड़ेगा। ट्रेन या बस में टाइम वेस्ट होगा।"

नीतू खुशी से ताली बजाने लगी।

"वाह! बुलेट पर जाना है तो? बहुत मज़ा आएगा। तुम ड्राइव करोगे, मैं पीछे बैठूँगी। हवा में बाल उड़ेंगे... जैसे शादी के बाद पहले-पहले गए थे न?"

संदीप हँस पड़ा। "हाँ, याद है। लेकिन इस बार नीतू, तुम्हारी एक्टिवा भी घर पर है। अगर बीच में कुछ हो जाए तो?"

"अरे नहीं, बुलेट ही लेंगे। वो ज्यादा सेफ और कम्फर्टेबल है लंबे रास्ते के लिए।" नीतू ने फैसला सुना दिया।

रात का खाना जल्दी निपटाकर दोनों पैकिंग शुरू करने वाले थे। नीतू ने अलमारी खोली और एक बड़ा बैग निकाला। कमरे में रोशनी हल्की थी, पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था। नीतू फर्श पर बैठ गई और कपड़ों को एक-एक करके चुनने लगी।

सबसे पहले उसने अपने कपड़े निकाले – दो सूती साड़ियाँ, एक सलवार सूट, दो नाइट सूट, कुछ चूड़ियाँ, बिंदिया, और छोटा मेकअप किट। फिर उसकी नज़र संदीप के कपड़ों पर पड़ी।

"संदीप, तुम्हारे लिए क्या ले जाऊँ?"

वह उठी और संदीप की अलमारी खोली। उसने दो कम्फर्टेबल शर्ट्स निकालीं – एक हल्की नीली और एक चेक वाली। फिर दो जींस और एक ट्रैक पैंट। अंडरगारमेंट्स के लिए उसने संदीप के तीन जोड़ी जांघिया और बनियान निकाले। सब कुछ ध्यान से मोड़कर बैग में रखती गई।

जब वह संदीप के अंडरवियर को हाथ में ले रही थी, तो हल्के से मुस्कुराई।

"तुम्हारे ये जांघिए तो बड़े आरामदेह हैं। राइडिंग के लिए परफेक्ट।"

संदीप बेड पर लेटा हुआ उसे देख रहा था।

"नीतू, तुम इतना ध्यान से पैक कर रही हो जैसे महीने भर की ट्रिप हो। सिर्फ दो दिन हैं यार।"

नीतू ने पलटकर उसे घूरा, लेकिन आँखों में शरारत थी।

"चुप रहो। औरतें पैकिंग ऐसे ही करती हैं। क्या पता वहाँ कुछ और चाहिए पड़ जाए।"

उसने बैग में और सामान डालना शुरू किया – टूथब्रश, पेस्ट, रेज़र, शेविंग क्रीम, एक छोटी दवा किट, और दोनों के लिए चप्पलें। बैग धीरे-धीरे भरता जा रहा था। नीतू हर चीज़ को बार-बार मोड़ रही थी, जैसे हर कपड़े में यादें समेट रही हो।

जब पैकिंग लगभग खत्म हो गई, तो नीतू ने बैग का ज़िप बंद किया और संदीप की तरफ देखा।

"सब हो गया। कल सुबह 6 बजे निकलेंगे। तुम बुलेट को अच्छे से चेक कर लेना – तेल, एयर, ब्रेक सब। मैं नाश्ता तैयार रखूँगी।"

संदीप उठकर उसके पास आया। उसने नीतू को पीछे से गले लगा लिया। नीतू की गरदन पर हल्का किस किया।

"तुम बहुत खुश लग रही हो आज।"

नीतू ने उसकी बाहों में घूमकर उसकी छाती पर सिर रख दिया। उसकी आवाज़ नरम थी।

"हूँ न। मम्मी-पापा से मिलने जा रही हूँ। और सबसे अच्छी बात – तुम मेरे साथ हो। जॉब की टेंशन को दो दिन के लिए भूल जाओ संदीप। बस हवा में उड़ते हुए भिलवाड़ा पहुँचेंगे।"

संदीप ने आँखें बंद कर लीं। नीतू की खुशबू, उसके बालों का स्पर्श, और उसकी गर्माहट... सब कुछ अच्छा लग रहा था। टारगेट की चिंता अभी भी मन में थी, लेकिन इस पल में वह कम हो गई थी।

रात को लेटते वक्त नीतू ने कहा,

"सो जाओ जल्दी। कल लंबी ड्राइव है। और हाँ... बुलेट पर मैं भी थोड़ी देर ड्राइव करूँगी, ठीक है?"

संदीप मुस्कुराया। "जैसी तुम कहो।"

अंधेरे कमरे में दोनों एक-दूसरे से सटकर सो गए। बाहर जयपुर की रात शांत थी, लेकिन संदीप के मन में एक हल्की सी बेचैनी थी।

चैप्टर 3: जयपुर से भिलवाड़ा की धूल भरी यात्रा

अगली सुबह ठंडी और तरोताज़ा थी। जयपुर की सड़कें अभी भी नींद में थीं जब संदीप और नीतू घर से निकले। घड़ी में सुबह के 6:15 बजे थे। नीतू ने हल्की पीली सूती सलवार-कमीज़ पहनी थी, जिसमें वह बहुत फ्रेश लग रही थी। बालों में एक साधारण सी रिबन बाँधी हुई, कलाई में चूड़ियाँ और माथे पर छोटी बिंदिया। संदीप ने राइडिंग के लिए कम्फर्टेबल कपड़े चुने थे – एक ढीली ग्रे ट्रैक पैंट, ब्लैक टी-शर्ट और ऊपर से एक हल्की जैकेट। पैरों में स्नीकर्स, ताकि लंबी ड्राइव में पैर दर्द न करे।

बुलेट बाइक तैयार खड़ी थी। संदीप ने बैग को अच्छे से पीछे बाँध लिया। नीतू ने हेलमेट लगाते हुए शरारत से कहा,

"आज मैं भी ड्राइव करूँगी, याद है न? आधा रास्ता मेरा!"

संदीप हँसा, "हाँ यार, लेकिन पहले मैं 2 घंटे चलाऊँगा। उसके बाद तुम। चलो, निकलते हैं।"

इंजन की गड़गड़ाहट के साथ बुलेट ने जयपुर की सीमा पार की। सुबह की हल्की धुंध अभी भी सड़क पर बिखरी हुई थी। संदीप ने स्पीड बढ़ाई। हवा उनके चेहरे पर जोर से टकरा रही थी। नीतू पीछे बैठी थी, उसने संदीप की कमर को दोनों हाथों से अच्छे से पकड़ रखा था। उसकी छाती संदीप की पीठ से सटी हुई थी।

रास्ता खूबसूरत था – एक तरफ खेत, दूसरी तरफ छोटे-छोटे गाँव। कभी-कभी ट्रक गुजरता तो धूल का गुबार उठता। नीतू ने हेलमेट के अंदर से चिल्लाकर कहा,

"संदीप! हवा कितनी अच्छी लग रही है न? लगता है जैसे उड़ रहे हों!"

संदीप ने सिर हिलाया और जोर से बोला, "हाँ, लेकिन धूल भी बहुत है। मुँह बंद रखो, वरना दाँत किटकिटा जाएँगे!"

दोनों हँस पड़े। रास्ते में छोटे-छोटे मज़ाक चलते रहे। संदीप नीतू को पुरानी यादें दिलाता – "याद है शादी के बाद पहली बार भिलवाड़ा गए थे? तब भी बाइक पर ही गए थे और तुम डर रही थीं कि कहीं गिर न जाएँ।"

नीतू ने उसकी पीठ पर हल्का थप्पड़ मारा, "चुप रहो! तब मैं नई-नई दुल्हन थी। अब तो मैं बुलेट भी चला सकती हूँ।"

लगभग दो घंटे बाद, एक छोटे से ढाबे के पास संदीप ने बाइक रोकी। दोनों ने हेलमेट उतारे। संदीप का चेहरा धूल से भरा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में तरोताज़गी थी। नीतू के बाल हवा से बिखरे हुए थे, कुछ धूल के कण उसके गालों पर चिपके थे। वह बहुत प्यारी लग रही थी।

"अब तुम ड्राइव करो," संदीप ने कहा और पीछे बैठ गया।

नीतू उत्साह से आगे बैठ गई। उसकी स्टाइल बिलकुल अलग थी – स्कूटी वाली औरत की तरह वह बुलेट को संभाल रही थी। उसने दोनों हाथों से हैंडल पकड़ा, पैरों को सही पोजीशन में रखा और धीरे-धीरे बाइक को आगे बढ़ाया। शुरू में स्पीड कम थी, लेकिन कुछ देर बाद वह कॉन्फिडेंट हो गई।

अब हवा नीतू के बालों को और ज़ोर से उड़ा रही थी। संदीप पीछे बैठा था, उसने नीतू की कमर को हल्के से पकड़ रखा था। नीतू की सलवार-कमीज़ की हल्की कपड़े हवा में फड़फड़ा रहे थे। संदीप को उसकी पीठ की गर्माहट महसूस हो रही थी।

"नीतू, स्पीड बढ़ाओ थोड़ी!" संदीप ने चिल्लाकर कहा।

नीतू ने हँसते हुए स्पीड बढ़ा दी। "देखो, मैं कितनी अच्छी ड्राइवर हूँ!"

रास्ते में दोनों के बीच हँसी-मज़ाक का सिलसिला जारी रहा। नीतू कभी-कभी गाना गुनगुनाती, "मेरा दिल ये पुकारे... आ जा रे..." और संदीप पीछे से ताली बजाता। धूल के गुबार में कभी-कभी दोनों की आँखें बंद हो जातीं, लेकिन मज़ा आ रहा था। बीच में एक जगह उन्होंने पानी पीने के लिए रुकना पड़ा। नीतू ने संदीप को पानी पिलाया और खुद भी पिया। दोनों के चेहरे पर पसीना और धूल का मिश्रण था, लेकिन उनकी मुस्कानें साफ थीं।

आखिरी एक घंटा नीतू ने ही ड्राइव किया। जब भिलवाड़ा की सीमा नज़दीक आई, तो नीतू ने बाइक को साइड में रोका। दोनों ने हेलमेट उतारा। नीतू का चेहरा लाल हो रहा था, बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे। संदीप ने उसके गाल से धूल झाड़ी।

"कैसा लगा ड्राइविंग?" संदीप ने पूछा।

नीतू ने साँस लेते हुए कहा, "बहुत मज़ा आया! लेकिन अब थोड़ा थक गई हूँ। तुम फिर से ड्राइव कर लो आखिरी हिस्सा।"

संदीप ने मुस्कुराते हुए आगे बैठ लिया। आखिरी 20-25 मिनट में दोनों चुपचाप बैठे रहे। नीतू ने संदीप की पीठ से सिर टिका दिया। हवा अब गर्म होने लगी थी, लेकिन दोनों के मन में एक मीठी थकान और खुशी थी।

जैसे-जैसे भिलवाड़ा नज़दीक आ रहा था, नीतू की उत्सुकता बढ़ रही थी। वह अपने माता-पिता को देखने के लिए बेताब थी। संदीप के मन में भी छुट्टी की राहत थी, लेकिन दूर कहीं जॉब की टेंशन अभी भी छिपी हुई थी।

आखिरकार, भिलवाड़ा के गाँव की मिट्टी की सड़क पर बुलेट दाखिल हुई। नीतू के घर के पास पहुँचते ही नीतू ने खुशी से चीख मारी,

"मम्मी... पापा... हम आ गए!"

संदीप ने बाइक खड़ी की। दोनों उतरे। नीतू दौड़कर अपने माता-पिता से लिपट गई। संदीप धीरे-धीरे पीछे से आया, मुस्कुराते हुए।

यात्रा पूरी हो चुकी थी – धूल भरी, हँसी भरी, और यादों से भरी हुई।


चैप्टर 4: भिलवाड़ा में परिवार के साथ मीठी छुट्टियाँ

भिलवाड़ा के छोटे से गाँव में नीतू का मायका पुरानी यादों और मिट्टी की खुशबू से भरा हुआ था। जैसे ही बुलेट बाइक घर के आँगन में रुकी, नीतू की माँ कमला देवी दौड़ती हुई बाहर आईं। उनके चेहरे पर आँसू और मुस्कान का अनोखा मिश्रण था।

"नीतू बेटी! आ गई मेरी लाड़ली..." माँ ने नीतू को सीने से लगा लिया। नीतू भी माँ की गोद में समा गई, जैसे बचपन वापस आ गया हो।

पापा रमेश चौधरी धीरे-धीरे बाहर आए। उनकी आँखों में गर्व था। उन्होंने संदीप को गले लगाया और पीठ थपथपाई,

"बेटा, कितने दिनों बाद आए हो। थक गए होगे रास्ते में। अंदर आओ।"

घर छोटा सा था, लेकिन दिल बड़ा। आँगन में पीपल का पेड़, एक तरफ गाय का बाड़ा, और दूसरे कोने में नीतू की पुरानी झूला। हवा में मिट्टी, गोबर और फूलों की खुशबू मिली हुई थी। शहर की भागदौड़ से दूर यह जगह शांति का अहसास करा रही थी।

नीतू ने तुरंत अपने पुराने कमरे में घुसकर सब कुछ छूना शुरू कर दिया। उसकी आँखें चमक रही थीं।

"मम्मी, यह मेरी पुरानी डायरी अभी भी रखी है! और यह वाला कुर्ता... मैंने दसवीं में पहना था न?"

माँ हँसती हुई बोलीं, "हाँ बेटी, सब रखा है। तुम्हारी याद में।"

संदीप को भी गाँव का माहौल बहुत अच्छा लग रहा था। वह आँगन में खड़ा होकर चारों तरफ देख रहा था। शहर में हमेशा स्ट्रेस रहता था, लेकिन यहाँ समय जैसे रुक गया हो। पापा ने उसे चाय का गिलास थमाया और बोले,

"बेटा, बैठो। आज दोपहर में खेत दिखाऊँगा। तुम्हें शहर की हवा से थोड़ी मिट्टी की हवा लग जाएगी।"

दो दिन की छुट्टी बहुत छोटी थी, लेकिन हर पल यादगार बन गया।

पहला दिन – स्वागत और पुरानी यादें

दोपहर में माँ ने नीतू के पसंदीदा खाने बनाए – दाल-बाटी-चूरमा, घी वाली रोटियाँ, और कढ़ी। टेबल पर बैठकर नीतू बचपन की कहानियाँ सुनाने लगी।

"संदीप, जानते हो? मैं छोटी थी तो इस आँगन में झूला झूलते-झूलते गिर गई थी। पापा ने मुझे गोद में उठाकर डॉक्टर के पास दौड़ लगाई थी!"

पापा हँसे, "हाँ, और आज वो लड़की इतनी बड़ी हो गई कि स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है।"

संदीप चुपचाप सब सुन रहा था। उसे नीतू की यह रूप बहुत पसंद आ रहा था – गाँव की बेटी वाली मासूमियत। वह खुद भी रिलैक्स फील कर रहा था। टारगेट की टेंशन यहाँ तक नहीं पहुँच रही थी।

शाम को सब आँगन में बैठे। नीतू ने संदीप को अपने पुराने स्कूल की कहानियाँ सुनाईं। दोनों हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। रात को छत पर बिछी चारपाई पर दोनों लेटे। आसमान में तारे चमक रहे थे। नीतू ने संदीप का हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोली,

"यहाँ आकर कितना अच्छा लग रहा है न? शहर में तो हम कभी ऐसे नहीं बैठ पाते।"

संदीप ने उसकी हथेली को चूमा, "हाँ नीतू। तुम्हारी खुशी देखकर मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा है।"

दूसरा दिन – खेत और गाँव की सैर

दूसरे दिन सुबह पापा संदीप को खेत ले गए। हरी-भरी सरसों और गेहूँ के खेतों में घूमते हुए संदीप को एक अनोखा सुकून मिला। पापा ने बताया,

"बेटा, ज़िंदगी शहर जितनी तेज़ नहीं होती यहाँ। मेहनत तो यहाँ भी है, लेकिन दिल को शांति मिलती है।"

नीतू माँ के साथ रसोई में मदद कर रही थी। कभी-कभी वह बाहर आकर संदीप को आवाज़ लगाती, "देखो, मैंने आज रबड़ी बनाई है! शाम को खाना।"

दोपहर में नीतू ने संदीप को गाँव की पुरानी जगहें दिखाईं – वह कुआँ जहाँ वह बचपन में पानी भरने जाती थी, वह आम का पेड़ जिस पर वह चढ़ा करती थी। दोनों हँसते-मज़ाक करते रहे। संदीप ने नीतू को कंधे से लगाकर कहा,

"तुम्हें यहाँ देखकर लगता है जैसे तुम्हारी असली खुशी यहीं है।"

नीतू शरमाते हुए बोली, "तुम्हारे साथ कहीं भी खुशी है। लेकिन हाँ... मम्मी-पापा के पास आने से मन हल्का हो जाता है।"

शाम को विदाई का समय आया। माँ ने दोनों के लिए टिफिन पैक किया – घर का बना खाना, अचार, और कुछ मिठाई। पापा ने संदीप को गले लगाकर कहा,

"बेटा, फिर आना। नीतू को अकेला मत छोड़ना।"

नीतू की आँखें नम हो गईं। वह माँ से लिपटकर रो पड़ी, "मम्मी, जल्दी आऊँगी।"

संदीप ने नीतू का हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "चलो, कल सुबह जल्दी निकलना है। घर पहुँचकर काम भी करना है।"

रात को दोनों पुराने कमरे में लेटे। नीतू संदीप से सटी हुई थी। उसकी आवाज़ में थोड़ी उदासी थी,

"दो दिन कैसे बीत गए संदीप? लगता है अभी तो आए थे।"

संदीप ने उसे गले लगाया, "ये छोटी छुट्टियाँ ही तो याद रहती हैं। अगली बार फिर आएँगे। अब सो जाओ। कल सुबह 4:30 बजे निकलना है ताकि 8 बजे तक घर पहुँच जाएँ और ऑफिस भी जा सकें।"

नीतू ने सिर हिलाया और संदीप की छाती पर सिर रख दिया। गाँव की रात शांत थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। दोनों थके हुए थे, लेकिन मन में मीठी यादों का खजाना भर गया था।

दो दिन की यह छोटी सी छुट्टी वाकई यादगार थी – परिवार का प्यार, गाँव की शांति, नीतू की खिलखिलाती खुशी और संदीप को मिला थोड़ा सुकून। लेकिन कल सुबह वापसी की यात्रा शुरू होने वाली थी... और उसी यात्रा के साथ एक अनोखी कहानी भी शुरू होने वाली थी।


चैप्टर 5: सुबह-सुबह वापसी – नीतू की बुलेट बाइक पर

रात के अंधेरे में ही नीतू का पुराना कमरा जाग गया। घड़ी में सुबह के 4:15 बजे थे। नीतू ने धीरे से संदीप को जगाया।

"संदीप... उठो जी। हमें 4:30 बजे निकलना है। जल्दी से तैयार हो जाओ।"

संदीप ने आँखें मलते हुए उठा। नीतू पहले ही तैयार हो चुकी थी – उसी पीली सलवार-कमीज़ में, लेकिन अब ऊपर से एक हल्की शॉल ओढ़ ली थी। बालों को टाइट बन बनाकर पीछे बाँध लिया था। उसकी आँखों में एक नई ऊर्जा थी।

माँ और पापा भी उठ गए थे। माँ ने रसोई में जल्दी-जल्दी गरम चाय और पराठे बना दिए। चारों ने चुपचाप नाश्ता किया। विदाई का पल हमेशा भारी होता है। माँ ने नीतू को फिर से गले लगाया, आँखों में आँसू थे।

"बेटी, ख्याल रखना अपना और संदीप का। जल्दी आना।"

पापा ने संदीप को आशीर्वाद दिया, "बेटा, सुरक्षित पहुँचना।"

बैग फिर से बुलेट पर बाँध दिया गया। नीतू ने हेलमेट लगाया और बाइक की सीट पर बैठ गई। उसने संदीप की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा,

"आज पूरा रास्ता मैं चलाऊँगी। तीन घंटे लगातार। तुम आराम से पीछे बैठो। ऑफिस जाना है न, इसलिए जल्दी पहुँचना ज़रूरी है।"

संदीप थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन नीतू के कॉन्फिडेंस को देखकर मुस्कुरा दिया।

"ठीक है। लेकिन अगर थक जाओ तो बता देना। मैं ले लूँगा।"

इंजन स्टार्ट हुआ। बुलेट की गड़गड़ाहट गाँव की शांति को चीरती हुई आगे बढ़ी। रात अभी पूरी तरह नहीं टूटी थी। आसमान में हल्की लाली छा रही थी। ठंडी हवा उनके चेहरे पर तीर की तरह लग रही थी। नीतू ने स्पीड धीरे-धीरे बढ़ाई।

पहले आधे घंटे में सड़क सुनसान थी। सिर्फ दूर-दूर तक खेत और पेड़ दिख रहे थे। नीतू बुलेट को बहुत अच्छे से संभाल रही थी। उसकी ड्राइविंग में स्कूटी वाली नाजुकता नहीं, बल्कि एक नई मज़बूती थी। हैंडल को दोनों हाथों से पकड़े हुए, पैरों को सही पोजीशन में रखे, वह बाइक को तेज़ गति से चला रही थी। संदीप पीछे बैठा था, उसने नीतू की कमर को हल्के से पकड़ रखा था। उसकी पीठ से सटकर वह महसूस कर रहा था कि नीतू कितनी कॉन्फिडेंट है।

सुबह की ठंडी हवा उनके कपड़ों को फड़फड़ाने लगी। नीतू की शॉल हवा में उड़ रही थी। कभी-कभी वह हेलमेट के अंदर से बोलती,

"संदीप, कैसी हवा लग रही है? कितनी ठंडी और ताज़ा है न?"

संदीप जोर से जवाब देता, "बहुत अच्छी! लेकिन तुम्हें ठंड तो नहीं लग रही?"

"नहीं! मैं तो एंजॉय कर रही हूँ। लग रहा है जैसे मैं फ्लाइट चला रही हूँ!"

दोनों के बीच हल्की-हल्की बातें होती रहीं। नीतू कभी-कभी गाना भी गुनगुनाती – "रसिक बलमा... दिल मेरा ले गया..." और संदीप पीछे से ताली बजाता। रास्ते में धूल कम थी क्योंकि सुबह का समय था। सूरज धीरे-धीरे निकल रहा था। लाल-नारंगी किरणें खेतों पर पड़ रही थीं। नीतू की ड्राइविंग स्किल देखकर संदीप को गर्व हो रहा था। वह सोच रहा था – "मेरी नीतू कितनी मज़बूत है। शहर में स्कूल संभालती है, घर संभालती है, और अब बुलेट भी इतनी अच्छी चला रही है।"

एक घंटा बीत गया। नीतू की थकान का नामोनिशान नहीं था। उसकी स्पीड स्थिर थी। संदीप ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा,

"नीतू, तुम थक गई होगी। अब मैं ले लूँ?"

नीतू ने सिर हिलाया, "नहीं जी। मैं ठीक हूँ। तुम आराम करो। ऑफिस जाकर तुम्हें फ्रेश रहना है। मैं पूरा रास्ता चलाऊँगी।"

संदीप मुस्कुराया और पीछे और आराम से बैठ गया। अब वह सिर्फ नीतू की पीठ और उसके बालों को देख रहा था। हवा में नीतू की खुशबू आ रही थी। उसकी सलवार-कमीज़ हवा में लहरा रही थी। संदीप को यह रोमांच अच्छा लग रहा था। नीतू की यह नई वाली ताकत उसे आकर्षित कर रही थी।

दूसरा घंटा बीता। सूरज ऊपर आ चुका था। अब हवा थोड़ी गर्म होने लगी थी, लेकिन नीतू ने स्पीड नहीं कम की। बीच में एक जगह उन्होंने पानी पीने के लिए रुके। नीतू ने हेलमेट उतारा। उसका चेहरा लाल हो रहा था, माथे पर पसीना था, लेकिन आँखों में चमक थी।

"कैसा लग रहा है?" संदीप ने पूछा।

नीतू ने पानी पीते हुए कहा, "बहुत रोमांचक! लग रहा है मैंने आज कुछ नया कर लिया। तीन घंटे लगातार बुलेट चलाना... मुझे खुद पर गर्व हो रहा है।"

संदीप ने उसके गाल पर हल्का हाथ फेरा, "मुझे भी तुम पर गर्व है।"

आखिरी घंटे में नीतू थोड़ी थक गई थी, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। जयपुर की सीमा नज़दीक आते ही उसने संदीप से कहा,

"अब हम घर के पास हैं। देखो, 8 बजे ठीक पहुँच रहे हैं।"

संदीप ने घड़ी देखी। ठीक 8:05 बजे बुलेट उनके सोसाइटी के गेट पर रुकी। नीतू ने बाइक स्टैंड पर लगाई और हेलमेट उतारा। उसका पूरा शरीर थका हुआ था, लेकिन चेहरा खुशी से चमक रहा था।

दोनों ऊपर फ्लैट में गए। नीतू ने बैग रखा और सीधे पानी पीने लगी। संदीप ने उसे देखा और कहा,

"नीतू, तुमने आज कमाल कर दिया। तीन घंटे लगातार... वाह!"

नीतू मुस्कुराई, "अब तुम जल्दी नहा लो। ऑफिस जाना है। मैं भी तैयार होती हूँ।"

संदीप ने बाथरूम की तरफ जाते हुए कहा, "ठीक है।"

घर में वापस आकर दोनों की साँसें सामान्य हो रही थीं। लेकिन नीतू की इस ड्राइविंग ने संदीप के मन में एक नई प्रशंसा भर दी थी। वह नहीं जानता था कि आने वाले कुछ घंटों में उनकी ज़िंदगी का एक अनोखा मोड़ आने वाला है।


चैप्टर 6: घर पहुचकर भूले हुए अंडरगारमेंट्स

बुलेट बाइक सोसाइटी के पार्किंग में खड़ी हुई तो घड़ी में ठीक 8:10 बजे थे। नीतू ने हेलमेट उतारा और थकी हुई मुस्कान के साथ संदीप की तरफ देखा।

"अरे वाह! टाइम पर पहुँच गए। अब तुम जल्दी नहा लो, ऑफिस के लिए तैयार होना है। मैं चाय बनाती हूँ।"

संदीप ने गर्दन हिलाई। पूरा शरीर धूल और थकान से भरा हुआ था। तीन घंटे की वापसी यात्रा में नीतू ने बुलेट चलाई थी, इसलिए वह खुद को थोड़ा तरोताज़ा महसूस कर रहा था। दोनों ऊपर फ्लैट में गए। बैग को एक कोने में रखकर संदीप सीधे बाथरूम की तरफ बढ़ गया।

"नीतू, मेरे अंडरगारमेंट्स निकालकर रख देना। जल्दी नहाकर निकलना है।"

नीतू ने "हाँ" कहा और बैग खोल दिया। वह कपड़ों को बाहर निकाल रही थी – साड़ियाँ, सूट, शर्ट्स, ट्रैक पैंट... लेकिन जब अंडरगारमेंट्स वाले हिस्से तक पहुँची तो उसके हाथ रुक गए। उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

संदीप बाथरूम से आवाज़ लगाई, "नीतू, जल्दी करो यार। देर हो रही है।"

नीतू ने धीरे से बाथरूम के दरवाज़े के पास आकर कहा,

"संदीप... एक प्रॉब्लम है।"

संदीप ने दरवाज़ा थोड़ा खोला। उसके बाल गीले थे, शरीर पर सिर्फ तौलिया लिपटा हुआ था।

"क्या हुआ?"

नीतू ने शर्माते हुए नीचे देखा,

"तुम्हारे सारे अंडरगारमेंट्स... भिलवाड़ा में भूल आए। मैंने बैग में डाले थे न? लेकिन शायद जब मैंने तुम्हारे कपड़े निकाले तो... वो वहीं रह गए।"

संदीप की आँखें फैल गईं।

"क्या? मतलब अब क्या? ऑफिस जाना है आज। कोई शॉप भी तो अभी नहीं खुली होगी।"

नीतू ने कंधे उचकाए, "हाँ, सुबह 8:30 बजे तक तो कोई भी कपड़े की दुकान नहीं खुलेगी। और तुम्हारे पास समय भी नहीं है।"

कुछ पल चुप्पी रही। संदीप के मन में जल्दी-जल्दी विचार घूम रहे थे। ऑफिस जाना ज़रूरी था, टारगेट का प्रेशर था। वह परेशान होकर बोला,

"तो अब क्या करूँ? ऐसे तो नहीं जा सकता..."

नीतू ने हल्के से होंठ काटे और फिर धीरे से बोली,

"संदीप... एक उपाय है। मेरी पैंटी पहन लो। या फिर कैमिसोल... अंदर से। ऊपर से तुम्हारे नॉर्मल कपड़े पहन लोगे। बाहर से कोई नहीं देखेगा। सिर्फ आज के लिए।"

संदीप एक पल के लिए सन्न रह गया। उसके गाल लाल हो गए।

"क्या? तुम्हारी पैंटी? नीतू, तुम पागल तो नहीं हो गई? मैं... मैं पुरुष हूँ। कैसे पहनूँगा वो?"

नीतू ने शर्माते हुए लेकिन दृढ़ता से कहा,

"अरे, सिर्फ अंदर ही तो है। कोई नहीं जानेगा। और वैसे भी, मेरी पैंटी बहुत सॉफ्ट और कम्फर्टेबल होती है। तुम्हारे जांघिए से ज़्यादा अच्छी रहेगी राइडिंग और पूरे दिन के लिए। प्लीज... आज के लिए मान जाओ। बाद में शाम को कोई शॉप से खरीद लेंगे।"

संदीप ने तौलिया कसकर लपेटा और बाथरूम के अंदर घूमने लगा। उसके मन में शर्म, झिझक और थोड़ी अजीब सी उथल-पुथल हो रही थी। "मैं नीतू की पैंटी पहनूँ? ये कैसे हो सकता है? लेकिन अगर नहीं पहना तो ऑफिस कैसे जाऊँ? टारगेट का दिन है आज..."

नीतू बाहर खड़ी रही। उसने अपनी अलमारी से एक हल्की गुलाबी रंग की लेस वाली पैंटी निकाली और एक सफेद कैमिसोल भी। दोनों को दरवाज़े के नीचे से अंदर सरका दिया।

"लो... ये ले लो। पैंटी तो पहन ही लो। अगर शर्म आए तो कैमिसोल भी पहन सकते हो। बहुत सॉफ्ट है।"

संदीप ने कपड़ों को उठाया। पहली बार उसकी उँगलियाँ नीतू की पैंटी को छू रही थीं। कपड़ा बेहद नरम, सिल्की और हल्का था। लेस का किनारा उसके हाथ में महसूस हुआ। एक अनोखी सनसनी हुई – नरम, ठंडक भरा, और स्त्रीत्व से भरा स्पर्श। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया।

"नीतू... ये... ये बहुत... अजीब लग रहा है," उसने बाहर आवाज़ लगाई।

नीतू ने धीरे से कहा, "पहले ट्राई तो करो। अगर बुरा लगे तो मत पहनो। लेकिन जल्दी करो, समय हो रहा है।"

संदीप ने कुछ पल और सोचा। फिर आह भरकर उसने फैसला कर लिया। तौलिया हटाया और धीरे-धीरे गुलाबी पैंटी को पैरों में डाला। कपड़ा उसके जांघों से गुजरा। जब पैंटी अपने जगह पर आ गई तो एक अजीब सा एहसास हुआ – टाइट लेकिन बहुत सॉफ्ट। लेस वाली किनारी उसके कूल्हों पर हल्का सा दबाव दे रही थी। वह कभी भी ऐसा कुछ नहीं पहना था। शरीर में एक अजीब सी गुदगुदी, शर्म और थोड़ी सी रोमांचक सनसनी एक साथ उभर रही थी।

फिर उसने कैमिसोल भी ट्राई किया। सिल्की फैब्रिक उसकी छाती पर सरकता हुआ आया। स्ट्रैप्स कंधों पर पड़ीं। कैमिसोल का हल्का फिट उसके शरीर को एक नई तरह से छू रहा था। वह शीशे में खुद को देखने लगा। बाहर से कुछ नहीं दिख रहा था, लेकिन अंदर... अंदर कुछ अलग हो रहा था।

संदीप की साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं। शर्म से उसका पूरा शरीर गर्म हो रहा था। वह खुद से बोला, "ये क्या कर रहा हूँ मैं? लेकिन... कम्फर्टेबल तो है।"

बाहर नीतू इंतज़ार कर रही थी। संदीप ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर शर्म और असमंजस साफ दिख रहा था।

नीतू ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और हल्के से मुस्कुराई,

"कैसा लग रहा है?"

संदीप ने शर्माते हुए कहा, "बहुत... अजीब। शर्म लग रही है। लेकिन... ठीक है। आज के लिए। शाम को नया खरीद लेंगे।"

नीतू ने आगे बढ़कर उसके गाल पर हल्का किस किया।

"कोई नहीं जानेगा। अब जल्दी तैयार हो जाओ। चाय रखी है।"

संदीप ने अपनी नॉर्मल शर्ट और पैंट पहनी। ऊपर से सब कुछ बिलकुल नॉर्मल लग रहा था। लेकिन अंदर... गुलाबी पैंटी और कैमिसोल का सिल्की टच हर कदम पर उसे याद दिला रहा था। वह चलते वक्त भी एक अनोखी सनसनी महसूस कर रहा था – नरम फैब्रिक का स्पर्श, लेस का हल्का खिंचाव, और अपनी मर्दानगी के साथ स्त्रीत्व का यह पहला गुप्त स्पर्श।

उसके मन में शर्म थी, लेकिन साथ ही एक छोटा सा रोमांच भी जाग उठा था।

जब वह ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर निकला, तो नीतू ने मुस्कुराते हुए कहा,

"ऑल द बेस्ट। आज अच्छा दिन होगा।"


चैप्टर 7: पहला दिन – लकी अंडरगारमेंट्स

सुबह का सूरज जयपुर के फ्लैट में घुसा तो संदीप अभी भी शीशे के सामने खड़ा था। उसने अपनी शर्ट ठीक की, पैंट की जेब में हाथ डाला, लेकिन उसका पूरा ध्यान अंदर था। गुलाबी लेस वाली पैंटी उसके कूल्हों को नरम लेकिन मजबूती से जकड़े हुए थी। हर कदम पर लेस का किनारा जांघों की नाजुक जगह पर हल्का-हल्का रगड़ खा रहा था। कैमिसोल की सिल्की स्ट्रैप्स कंधों पर पड़ी हुई थीं और हर साँस के साथ उसके सीने पर हल्का सा खिंचाव महसूस हो रहा था।

वह खुद को देख रहा था। बाहर से बिलकुल सामान्य MR — सफेद शर्ट, ग्रे पैंट, टाई। लेकिन अंदर... एक स्त्री के अंडरगारमेंट्स। शर्म से उसका चेहरा लाल हो रहा था। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। “मैं क्या कर रहा हूँ? अगर किसी को पता चल गया तो?” लेकिन उसी शर्म के साथ एक अनोखी गुदगुदी भी थी — नरम, ठंडक भरा, सिल्की स्पर्श। जैसे उसका शरीर पहली बार खुद को एक नए तरीके से महसूस कर रहा हो।

नीतू पीछे से आई और उसकी कमर से लिपट गई।

“कैसा लग रहा है?” उसने कान में फुसफुसाया।

संदीप की आवाज़ काँप रही थी, “बहुत... शर्म लग रही है नीतू। लेकिन... बहुत सॉफ्ट है। हर जगह महसूस हो रहा है।”

नीतू ने हँसकर उसके गाल चूमे, “कोई नहीं देखेगा। बस आज का दिन निकाल लो। और हाँ... मुझे पूरा यकीन है, आज तुम्हारा दिन अच्छा जाएगा।”

ऑफिस जाते वक्त बाइक पर हर झटके के साथ पैंटी का टाइट फिट और कैमिसोल का सिल्की टच उसे बार-बार याद दिला रहा था। शर्म और रोमांच दोनों साथ-साथ दौड़ रहे थे।

पहले क्लिनिक में डॉक्टर ने जैसे ही सैंपल देखे, मुस्कुराकर बोले, “शर्मा, आज तुम्हारा मूड अच्छा लग रहा है। 8 लाख का ऑर्डर लिख देते हैं।”

संदीप को यकीन नहीं हुआ।

दूसरे स्टॉकिस्ट के पास पहुँचा तो वहाँ भी चमत्कार हो गया। “12 लाख का ऑर्डर। आज ही डिलीवरी चाहिए।”

दोपहर तक कुल 20 लाख का बिजनेस। टारगेट पूरा। जब वह ऑफिस लौटा तो बॉस ने खुशी से उसका कंधा थपथपाया,

“शर्मा! आज तुमने कमाल कर दिया। महीने का टारगेट एक दिन में पूरा। ऐसे ही काम करते रहो बेटा।”

संदीप मुस्कुरा रहा था, लेकिन अंदर से वह जानता था — आज का यह लक शायद उन गुलाबी पैंटी और कैमिसोल की वजह से था। हर बार जब वह बैठता, चलता या झुकता, सिल्की फैब्रिक उसकी त्वचा को छूता और एक अजीब सा कॉन्फिडेंस देता। शर्म अब धीरे-धीरे कम हो रही थी और उसकी जगह ले रही थी एक नई, गुप्त, रोमांचक ऊर्जा।

शाम को घर लौटते वक्त संदीप ने नीतू के लिए एक खूबसूरत रेड कलर की सलवार-कमीज़ खरीदी — चमकदार रेशमी कपड़ा, गोल्डन बॉर्डर वाला। साथ में मिठाई की डिब्बी भी। आज का दिन इतना शानदार था कि वह नीतू को सरप्राइज़ देना चाहता था।

घर पहुँचते ही नीतू ने ड्रेस देखकर उछल पड़ी।

“वाह संदीप! कितनी सुंदर ड्रेस है। और आज तुमने 20 लाख का बिजनेस किया... मैं बहुत खुश हूँ।”

रात का खाना खत्म होने के बाद माहौल गर्म हो गया। नीतू संदीप के गले लग गई। उसकी आँखों में शरारत और प्यार दोनों थे। दोनों ने एक-दूसरे को जोरदार तरीके से प्यार किया। संदीप की हर हरकत में आज का नया कॉन्फिडेंस झलक रहा था। नीतू बार-बार सिसकार रही थी, “आज तुम बहुत अलग लग रहे हो... बहुत अच्छे...”

जब दोनों थककर बिस्तर पर लेटे, नीतू ने संदीप की छाती पर सिर रखा और धीरे से बोली,

“आज तुमने बहुत अच्छा परफॉर्म किया। काश रोज ऐसे ही ऑर्डर मिलते रहें। ये रेड ड्रेस बहुत प्यारी है।”

संदीप मुस्कुराया, “तुम्हें पसंद आई तो अच्छा लगा।”

नीतू ने शरारत से उसकी आँखों में देखा,

“ये रेड कलर तुम्हारी ब्रा-पैंटी से भी मैचिंग है न? अगर बुरा न मानो... बस एक बार मेरे कहने से ब्रा-पैंटी के ऊपर ये सलवार-कमीज़ पहनकर दिखा दो न। मुझे देखना है कि तुम पर कैसी लगती है।”

संदीप का चेहरा तुरंत लाल हो गया।

“नीतू... प्लीज। मैं लड़का हूँ। ये सब...”

लेकिन नीतू जिद पर अड़ गई। उसने प्यार से संदीप के होंठों को चूमा और फुसफुसाई,

“बस एक बार... मेरी खुशी के लिए। आज तुम्हारा दिन इतना अच्छा गया, मेरी एक छोटी सी इच्छा पूरी कर दो ना।”

नीतू की नरम जिद और प्यारी नज़रों के आगे संदीप हार गया। वह उठा। पहले वही गुलाबी पैंटी और कैमिसोल पहने हुए थे। नीतू ने रेड सलवार-कमीज़ उसके हाथ में थमा दी।

संदीप ने शर्माते हुए पहले कमीज़ पहनी। रेशमी कपड़ा उसके शरीर पर सरकता हुआ आया। फिर सलवार चढ़ाई। कपड़े आश्चर्यजनक रूप से उसके शरीर पर फिट बैठ रहे थे। नीतू ने आगे बढ़कर दुपट्टा उसके कंधों पर सेट किया। दुपट्टा सेट करते वक्त उसने जानबूझकर संदीप के सीने को दोनों हाथों से दबाया। संदीप के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।

फिर “ड्रेस ठीक कर रही हूँ” के बहाने नीतू ने नीचे हाथ डालकर संदीप के लंड को धीरे-धीरे सहलाया। संदीप का लंड तुरंत सख्त होकर खड़ा हो गया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

“नीतू... उफ्फ... क्या कर रही हो?”

नीतू ने मुस्कुराते हुए संदीप के दोनों हाथ पीछे कर दिए और दुपट्टे से ही मजबूती से बाँध दिए। फिर उसने संदीप की सलवार को कमर तक ऊपर खींच दिया, ताकि उसका खड़ा लंड सलवार के अंदर ही फँस जाए।

नीतू संदीप के ऊपर चढ़ गई। उसने धीरे-धीरे संदीप का लाँड़ सलवार के ऊपर से ही अपने मुह मे लेना शुरू कर दिया उसके तने हुए लंड  पर अपने नरम नरम बूब्स  रगड़ना शुरू किया। संदीप का पूरा गर्म लंड सलवार के रेशमी कपड़े के अंदर दबा हुआ था। हर रगड़ के साथ गर्मी बढ़ती गई। नीतू ने संदीप के बूब्स को अपने हाथों से मसलन शुरू कर दिया , संदीप के हाथ उसकी पीठ के पीछे बंधे थे वो बूब्स के रगड़ने से होने वाले दर्द और लाँड़ पर नीतू के बूब्स की रगड़न  से दोनों तरह की फीलिगनस मे पीस रहा था आखिरकार संदीप की सारी गर्मी सलवार के अंदर ही निकल गई। रेड सलवार गर्म और गीली हो गई। संदीप का गरम गरम सफेद दूध जैसा वीर्य उसकी सलवार के ऊपर तक निकल आया 

संदीप शर्म और थकान से साँसें ले रहा था। जब वह सलवार उतारने लगा तो नीतू ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं... आज इसे मत उतारो। क्यूँ के अभी मेरा मन नहीं भरा है अभी तो मैँ तुम्हें ठीक से फ़ील भी नहीं कर पाई हूँ , अब मैँ तुम्हें बताऊँगी के औरत का सेक्स एन्जॉय करने का असली तरीका क्या है


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