Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

BeingFaltu Confessions | गुंजन और अभय – जब प्यार बना पागलपन और मुर्गा बनी सज़ा

📝 Story Preview:

📚 Table of Contents – "गुंजन और अभय: सजा, प्यार और परिवर्तन की दास्तान"

Chapter 1: शादी के बाद की पहली शरारत

Chapter 2:अभय की झिझक और गुंजन का गेम

Chapter 3:सीक्रेट साइन: येलो चेन का वादा

Chapter 4:ड्रेस कोड और सजा की पहली रात

Chapter 5:प्यार से इनकार और सख्ती की शुरुआत

Chapter 6:तीन दिन की लगातार सजा

Chapter 7:दूरी में भी प्यार का आदेश

Chapter 8:वीडियो कॉल पर दर्द का सबूत

Chapter 9:जब सजा बनी एक्सरसाइज

Chapter 10:अभय का नया फिटर अवतार

Chapter 11:"Guilt-Free Punishment" – एक अनोखा प्लेटफॉर्म

Chapter 12:पैसे लेकर सजा: नया प्रोफेशन

Chapter 13:छात्र की मदद: दर्द से छुटकारा

Chapter 14:सजा से बना सुधार का रास्ता

Chapter 15:‘द आयरन टीचर’ की पहचान

Chapter 16:टॉर्चर से आतंकियों से सच उगलवाना

Chapter 17:महिलाओं की सुरक्षा की योद्धा बनी गुंजन

Chapter 18:देह व्यापार पर सख्त वार

Chapter 19:जब सजा बना जुनून और अभय का नर्क

Chapter 20:अभय की मुक्ति और गुंजन का अकेलापन

Story credit to Abhay (My friend copied from his telegram account)


### गुंजन और अभय: प्यार, शरारत और एक नया एहसास  


#### शादी के दो दिन बाद...  

गुंजन और अभय की शादी को अभी बस दो ही दिन हुए थे। हनीमून जैसा ही माहौल था – हर पल प्यार, रोमांस और मस्ती से भरा हुआ। उनकी नई-नई शादी की मिठास हर छोटी बात में झलक रही थी। 

उस रात, दोनों अपने कमरे में थे। हल्की रोशनी, धीमा संगीत और चारों ओर बस प्यार का एहसास था। गुंजन अभय के सीने पर सिर रखकर मुस्करा रही थी। अचानक उसके दिमाग में एक शरारती ख्याल आया। 

"अभय, एक गेम खेलते हैं?" गुंजन ने उसकी शर्ट की बटन से खेलते हुए कहा। 

"कैसा गेम?" अभय ने प्यार से उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा। 

गुंजन शरारती अंदाज में बोली, "तुम मेरे सामने थोड़ी देर के लिए मुर्गा बन जाओ। बस एक रोमांटिक मज़ेदार गेम के लिए।"  

अभय का चेहरा हैरानी से खुला का खुला रह गया। "क्या? मैं मुर्गा बनूं? ये कैसा गेम हुआ?" 

#### अभय की झिझक  

अभय को ये अजीब लग रहा था। उसे लगा कि ये कुछ ज्यादा ही अटपटा आइडिया है। 

"गुंजन, प्लीज़! ये कैसी डिमांड है?" अभय ने संजीदगी से कहा। 

गुंजन ने उसकी शर्ट पकड़कर प्यार से उसे अपनी ओर खींचा और मीठी आवाज़ में बोली, "प्लीज़ ना... बस थोड़ी देर के लिए। मज़ा आएगा, ट्रस्ट मी। दर्द और प्यार का कॉम्बिनेशन सोचो।"  

अभय अब भी झिझक रहा था, लेकिन गुंजन ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसे गहरी निगाहों से देखा। 

"अगर तुम मुझसे प्यार करते हो, तो मेरी ये छोटी-सी बात मान लो। ये बस एक गेम है, एक मज़ेदार शरारत।" 

अभय ने गहरी सांस ली। वो अपनी पत्नी को ना नहीं कह सकता था, खासकर जब उसकी आँखों में इतनी मासूमियत और शरारत थी। 


#### अभय की हिम्मत और रोमांटिक ट्विस्ट  

थोड़ी देर की झिझक के बाद, अभय ने धीरे-धीरे अपने कान पकड़े और झुक गया। 

गुंजन खुशी से ताली बजाते हुए बोली, "ओह माय गॉड! तुम सच में मान गए! कितना क्यूट लग रहे हो!"  

अभय ने शर्माते हुए कहा, "बस ज्यादा मत हंसो। और जल्दी खत्म करो।"  

लेकिन गुंजन को तो मज़ा आ रहा था। उसने हल्की-सी छड़ी उठाई और प्यार से अभय की पीठ पर एक हल्का झटका दिया। 

"उफ़्फ़! दर्द और प्यार एक साथ... कैसा लग रहा है?" गुंजन ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा। 

अभय की सांसें तेज़ हो गईं। उसे भी कुछ नया अनुभव हो रहा था – हल्का दर्द, शरारत, और उनकी बढ़ती नज़दीकियाँ। 

गुंजन ने धीरे से उसके कानों में फुसफुसाया, "अब तो समझ आएगा कि मेरी हर छोटी बात माननी चाहिए?"  

अभय ने उसकी ओर देखा, मुस्कराया, और अचानक उसे पकड़कर पलंग पर गिरा दिया। 

"अब मेरी बारी!" अभय ने उसे अपनी बाहों में समेटते हुए कहा। 

गुंजन खिलखिला उठी, और फिर उस रात उनकी नई जिंदगी का एक और हसीन पन्ना जुड़ गया—दर्द, प्यार, और रोमांटिक शरारतों से भरा।



### गुंजन और अभय: प्यार, शरारत और एक अनोखा वादा  


#### गुंजन का जन्मदिन  

गुंजन का आज जन्मदिन था। सुबह से ही वो खुश थी, लेकिन उसके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उसे अभय को मुर्गा बनते देखना बहुत अच्छा लगता था – जैसे कोई शरारती बच्चा स्कूल में सजा पा रहा हो। लेकिन हर बार उसे बहुत रिक्वेस्ट करनी पड़ती थी, मनाना पड़ता था, तब जाकर अभय मानता था। 

अभय को इस बात का एहसास हो चुका था कि उसकी पत्नी को इस खेल में बहुत मज़ा आता है। और आज उसके जन्मदिन पर, उसने एक खास प्लान बनाया। 

रात को डिनर के बाद अभय ने गुंजन को एक खूबसूरत पीली चेन (Yellow Chain) गिफ्ट की। 

गुंजन ने चेन को देखा और उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। "अरे वाह! ये तो बहुत सुंदर है, थैंक यू सो मच!" 

अभय मुस्कुराया और बोला, "ये सिर्फ गिफ्ट नहीं है, ये एक सीक्रेट साइन भी है।"  

गुंजन ने हैरानी से पूछा, "मतलब?"  

अभय ने थोड़ा शरमाते हुए कहा, "जब भी तुम ये येलो चेन पहनोगी और व्हाइट शर्ट, ब्लैक जींस और हाथ में बेल्ट लोगी... मैं बिना किसी बहाने के, बिना किसी नखरे के... खुद ही मुर्गा बन जाऊँगा।"  

गुंजन की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसकी आँखों में शरारत चमक उठी। 

"सच में?" उसने रोमांटिक अंदाज में पूछा। 

अभय ने सिर हिलाया, "लेकिन एक शर्त है... ये बात सिर्फ हमारे बीच ही रहेगी। कोई तीसरा इंसान इसे कभी नहीं जानना चाहिए।"  

गुंजन ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और धीरे से कहा, "डील पक्की!"  

#### पहली बार सीक्रेट गेम  

गुंजन ने तुरंत अपनी येलो चेन पहनी, व्हाइट शर्ट और ब्लैक जींस पहनी, और हाथ में बेल्ट पकड़ ली। 

अभय ने उसे देखा और बिना किसी सवाल के, बिना किसी हिचकिचाहट के, सीधे अपने कान पकड़कर मुर्गा बन गया। 

गुंजन ने उसके चारों ओर घूमते हुए शरारती अंदाज में कहा, "अब तो तुम्हें खुद ही बनना पड़ेगा जब भी मैं इस ड्रेस में रहूँगी!"  

अभय ने हंसते हुए कहा, "हां हां, अब तो जिंदगीभर तुम्हारे हर आदेश पर मुर्गा बनना पड़ेगा!"  

गुंजन ने प्यार से उसकी पीठ पर हल्की सी बेल्ट मारी और कहा, "लेकिन मजा तो आ रहा है ना?"  

अभय ने मुस्कुराते हुए कहा, "जब तुम्हारी खुशी इसमें है, तो मुझे भी मज़ा आता है।"  

और इस तरह उनकी जिंदगी में प्यार और शरारत का एक नया गेम शुरू हो गया—सीक्रेट, सिर्फ उनके बीच!


### गुंजन और अभय: प्यार, गुस्सा और सीक्रेट गेम  


#### रसोई में रोमांस और इनकार  


शाम का समय था। गुंजन किचन में खाना बना रही थी, और अभय पास ही बैठा मोबाइल चला रहा था। हल्की रोमांटिक धुन बज रही थी। अचानक, गुंजन ने मुस्कुराते हुए कहा, 

"डार्लिंग, एक मिनट के लिए मुर्गा बन जाओ ना, बड़ा अच्छा लगेगा!"  

अभय हंस पड़ा और बोला, "सॉरी मैडम, लेकिन ड्रेस कोड पूरा नहीं है!"  

गुंजन ने थोड़ी शरारत से कहा, "अरे, ड्रेस कोड मत देखो, बस मेरी बात मान लो।"  

अभय ने सिर हिलाया, "नियम तो नियम होते हैं, जब तक तुम येलो चेन, व्हाइट शर्ट, ब्लैक जींस और बेल्ट के साथ नहीं होगी, मैं मुर्गा नहीं बनूंगा!"  

गुंजन ने गहरी सांस ली। "अच्छा, मतलब प्यार से समझाने से कुछ नहीं होता?"  

अभय ने मजाक में कहा, "बिल्कुल नहीं, नियम तोड़ना ठीक नहीं!"  

#### गुंजन का गुस्सा और सजा  

गुंजन को थोड़ी देर तक तो कुछ नहीं कहा, लेकिन अंदर ही अंदर उसके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उसने खाना बनाया, टेबल सेट किया, लेकिन उसके चेहरे पर एक सख्त टीचर वाला एक्सप्रेशन था। 

थोड़ी ही देर में वह किचन से बाहर निकली, लेकिन अब उसकी वेशभूषा पूरी तरह बदल चुकी थी—व्हाइट शर्ट, ब्लैक जींस, गले में येलो चेन और हाथ में बेल्ट!  

अभय की हंसी गायब हो गई। 

गुंजन ने ठंडी आवाज़ में कहा, "अब तो कोई बहाना नहीं चलेगा। मुर्गा बनो!"  

अभय ने थोड़ा बचने की कोशिश की, "अरे यार, अभी-अभी तो मज़ाक कर रहा था, इतनी जल्दी गुस्सा?"  

गुंजन ने सख्त लहजे में कहा, "अब गुस्सा नहीं, सजा मिलेगी! प्यार की भाषा समझ नहीं आती ना? तो अब टीचर वाली भाषा समझाओंगी!"  

#### तीन दिन तक लगातार सजा  

अभय को कोई और रास्ता नहीं दिखा। उसे धीरे-धीरे कान पकड़कर मुर्गा बनना पड़ा। 

पहले दिन, गुंजन ने उसे 20 मिनट तक किचन में मुर्गा बनाए रखा। जब अभय ने हल्की सी भी हिलने की कोशिश की, 'थाप!' – उसकी बेल्ट हल्के से चल गई। 

"डर मत, ये सिर्फ याद दिलाने के लिए है कि नियम सब पर लागू होते हैं!" गुंजन ने शरारती मुस्कान के साथ कहा। 

अगले दो दिन तक, जैसे ही अभय किचन में आता, गुंजन अपने ड्रेस कोड में तैयार मिलती। 

"अब ड्रेस कोड पूरा है ना? अब बच नहीं सकते!"  

तीसरे दिन के बाद, अभय ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "अब समझ आ गया कि प्यार की भाषा को इग्नोर करना भारी पड़ सकता है!"  

गुंजन ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब तुमसे प्यार से जो कहूँगी, वो बिना ड्रेस कोड के भी मानोगे ना?"  

अभय ने सिर झुकाकर कहा, "हाँ मैडम, हां जान!"  

और इस तरह, उनकी शादीशुदा जिंदगी में प्यार, रोमांस और सख्ती का यह अजीब लेकिन मज़ेदार खेल चलता रहा – कभी प्यार से, कभी गुस्से से, लेकिन हमेशा एक-दूसरे की खुशी के लिए!


### गुंजन और अभय: दूरियों में भी प्यार और सख्ती  


#### अभय की ट्रेनिंग और दूरियां  

अभय की बैंक की ट्रेनिंग शुरू हो गई थी, और उसे शहर से बाहर जाना पड़ा। पहली बार दोनों इतने दिनों के लिए अलग हो रहे थे। गुंजन को उसकी बहुत याद आ रही थी, लेकिन अब वो सिर्फ एक प्यारी पत्नी नहीं रही थी—वो थोड़ी सैडिस्टिक भी हो गई थी। उसे अभय को मुर्गा बनते देखना अब सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक रिलेशनशिप रूटीन बन चुका था, जिसे वो मिस कर रही थी। 

रात के 10 बजे थे। गुंजन अपने बेड पर लेटी हुई थी और वीडियो कॉल पर अभय से बात कर रही थी। 

#### वीडियो कॉल पर अनोखा आदेश  

गुंजन ने कैमरे में झांकते हुए शरारती अंदाज में कहा, "डार्लिंग, तुम्हें मेरी कितनी याद आ रही है?"  

अभय ने मुस्कुराते हुए कहा, "बहुत ज्यादा! बस ट्रेनिंग जल्दी खत्म हो और मैं वापस आ जाऊं।"  

गुंजन ने अचानक आँखों में चमक के साथ कहा, "तो फिर अभी प्रूफ दो कि तुम सच में मुझसे प्यार करते हो!"  

अभय ने हैरानी से पूछा, "कैसे?"  

गुंजन ने अपने बालों को पीछे किया और हल्की आवाज़ में कहा, "अभी वीडियो कॉल पर मुर्गा बनो!"  

अभय एकदम चौंक गया, "क्या? यहाँ हॉस्टल में हूँ, रूममेट भी हो सकता है!"  

गुंजन ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, "कोई बहाने नहीं... तुम्हारी प्यारी टीचर-वाइफ का आदेश है!"  

#### अभय की झिझक और गुंजन का मोटिवेशन  

अभय झिझक रहा था, लेकिन गुंजन की आवाज़ में एक सख्त लेकिन प्यार भरा जादू था। 

"चलो ना डार्लिंग, बस थोड़ी देर... प्लीज़!"  

अभय ने इधर-उधर देखा, फिर कैमरे को सही एंगल पर सेट किया, ताकि कोई और न देख सके। धीरे-धीरे उसने कान पकड़े और मुर्गा बन गया।  

गुंजन की आँखें चमक उठीं। उसने प्यार से एक फ्लाइंग किस दी और धीरे से कहा, "वाह! बहुत अच्छे... लेकिन अभी और थोड़ी देर!"  

अभय ने थोड़ी देर सहन किया, फिर जैसे ही उसने अपने कान छोड़े, गुंजन ने स्क्रीन पर उंगली हिलाते हुए कहा, "नो नो! अभी नहीं, थोड़ी देर और!"  

अभय ने हंसते हुए कहा, "तुम सच में अब बहुत सैडिस्टिक होती जा रही हो!"  

गुंजन ने शरारती अंदाज में कहा, "और तुम्हें ये पसंद भी आ रहा है, है ना?"  

अभय ने मुस्कुराते हुए कहा, "प्यार के लिए कुछ भी!"  

गुंजन ने एक और फ्लाइंग किस दी और धीरे से फुसफुसाई, "बहुत अच्छे... अब मैं चैन से सो सकती हूँ!"  

और इस तरह, दूर रहते हुए भी उनकी नटखट और रोमांटिक बॉन्डिंग बरकरार रही—जहां दर्द और प्यार का अनोखा मेल उनके रिश्ते को और गहरा बना रहा था!


### अभय का नया रूप: जब सज़ा ही रोमांस बन गई!  


#### गुंजन का असर और अभय की नई आदत  

गुंजन की सख्ती और रोमांटिक शरारतों का अब अभय पर गहरा असर होने लगा था। पहले वो सिर्फ प्यार में पड़कर मजबूरी में मुर्गा बनता था, लेकिन अब धीरे-धीरे उसे खुद इसमें मज़ा आने लगा।  

वो महसूस करने लगा कि मुर्गा बनने से सिर्फ उसकी पत्नी खुश नहीं होती, बल्कि उसकी फिटनेस भी बेहतर हो रही थी—पैरों की स्ट्रेंथ बढ़ रही थी, बैलेंस अच्छा हो रहा था, और बॉडी टोन हो रही थी!  

अब हालत ये थी कि छोटी-छोटी गलतियों पर भी अभय खुद ही बिना कहे मुर्गा बन जाता।  

#### गुंजन की हैरानी और खुशी  

एक दिन गुंजन सुबह उठी और देखा कि अभय बिना किसी सजा के ही खुद कान पकड़कर बैठा था। 

"अरे! ये क्या कर रहे हो?" गुंजन ने चौंककर पूछा। 

अभय ने मुस्कुराते हुए कहा, "कल रात तुम्हारे बिना एक दिन गया था, तो सजा दे रहा हूँ खुद को!"  

गुंजन हंस पड़ी, "मतलब अब तुम्हें मेरी जरूरत भी नहीं? खुद ही मुर्गा बनने लगे?"  

अभय ने आँख मारते हुए कहा, "अब तो तुम्हारी ये सजा मुझे रोमांस से भी ज्यादा पसंद आने लगी है!"  

#### हर दिन कोई न कोई बहाना!  

अब तो गुंजन और अभय के बीच रोज़ का नियम बन गया था—चाहे गलती हो या न हो, कोई न कोई बहाना निकालकर मुर्गा बनाने का सिलसिला चलता रहता।  

- ब्रश करना भूल गया? – 10 मिनट मुर्गा!  

- किचन में प्लेट नहीं उठाई? – 15 मिनट मुर्गा!  

- गुंजन को सुबह गुड मॉर्निंग विश करना भूल गया? – 5 मुर्गा राउंड!  

- फोन में ज्यादा बिजी? – मुर्गा बनो और स्क्रीन टाइम कम करो!  

अब गुंजन को सजा देने का बहाना नहीं ढूंढना पड़ता, बल्कि अभय खुद मांगने लगा था!  

#### अभय का फिटर और रोमांटिक अवतार!  

अब अभय की बॉडी भी बदलने लगी थी—उसकी जांघों की मसल्स स्ट्रॉन्ग हो गई थीं, बैलेंस बेहतर हो गया था और स्टैमिना भी बढ़ने लगा था।  

एक दिन गुंजन ने उसकी मसल्स को देखकर कहा, "अरे वाह! अब तो तुम सच में फिट होते जा रहे हो!"  

अभय ने शरारती अंदाज में कहा, "तुम्हारी सज़ा ही मेरी एक्सरसाइज है!"  

गुंजन ने मुस्कुराते हुए बेल्ट उठाई और कहा, "तो फिर आज की एक्सरसाइज शुरू करें?"  

अभय ने बिना किसी सवाल के कान पकड़े और बोला, "ऑर्डर मिले बिना भी कर सकता हूँ!"  

गुंजन हंस पड़ी, "अब तो तुम परमानेंट मुर्गा एडिक्ट बन चुके हो!"  

और इस तरह, जो कभी मस्ती और सजा का खेल था, वो अब प्यार और फिटनेस का नया अंदाज बन चुका था!


### गुंजन का नया आइडिया: गिल्टी लोगों की सजा और कमाई का नया जरिया  


#### एक नया सोशल प्लेटफॉर्म  

गुंजन अब सिर्फ अभय को ही सजा देने में नहीं, बल्कि इस आइडिया को बिजनेस में बदलने के बारे में सोचने लगी थी। उसे एहसास हुआ कि बहुत से लोग अपनी गलतियों का बोझ लिए घूमते हैं, और अगर उन्हें कोई सजा देकर उनका गिल्ट कम किया जाए, तो वो खुद को हल्का महसूस कर सकते हैं। 

यही सोचकर उसने एक ऑनलाइन सोशल प्लेटफॉर्म बनाया—"Guilt-Free Punishment"  

यहाँ पर कोई भी गिल्टी इंसान आकर अपनी गलती बता सकता था और गुंजन उसे उसकी गलती के हिसाब से मुर्गा बनने की सजा देती थी। 

#### पहले क्लाइंट और गिल्ट रिलीफ  

पहले ही हफ्ते में एक आदमी ने मैसेज किया—  

*"मैंने ऑफिस में अपनी पत्नी से झूठ बोला कि मैं मीटिंग में हूँ, लेकिन असल में दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा था। मुझे बहुत गिल्ट हो रहा है।"* 

गुंजन ने जवाब दिया, "अगर गिल्ट से छुटकारा पाना है, तो 30 मिनट तक मुर्गा बनो, और हर 5 मिनट में जोर से कहो—'मैं झूठा हूँ, अब कभी झूठ नहीं बोलूँगा!'"  

उस आदमी ने ऐसा किया और फिर गुंजन को मैसेज किया, "मैम, अब सच में हल्का महसूस कर रहा हूँ। धन्यवाद!"  

#### गुंजन की कमाई और बढ़ती पॉपुलैरिटी  

धीरे-धीरे गुंजन का प्लेटफॉर्म पॉपुलर होने लगा। लोग अपनी गलतियाँ बताते, और गुंजन उन्हें लाइव वीडियो कॉल पर मुर्गा बनवाकर सजा देती।  

इसके लिए उसने मेंबरशिप फीस रखना शुरू कर दिया: 

- Basic Package: 15 मिनट की सजा – ₹500 

- Standard Package: 30 मिनट की सजा – ₹1000 

- Premium Package: 1 घंटे की कड़ी सजा – ₹2500 

अब गुंजन सिर्फ अपने मज़े के लिए नहीं, बल्कि प्रोफेशनली लोगों को मुर्गा बनाकर उनके गिल्ट को दूर कर रही थी—और इससे उसकी अच्छी कमाई भी हो रही थी! 

#### अभय की प्रतिक्रिया  

जब अभय को इस बारे में पता चला, तो उसने हंसते हुए कहा, "मतलब अब तुमने इसे करियर बना लिया?"  

गुंजन मुस्कुराई, "हाँ, और अब तुम मेरे पहले फ्री क्लाइंट नहीं रहे, अब तुम्हें भी चार्ज देना पड़ेगा!"  

अभय ने मजाक में कहा, "मतलब अब सजा भी पैसे देकर लेनी पड़ेगी? तब तो मुझे मेंबरशिप लेनी पड़ेगी!"  

गुंजन ने शरारती अंदाज में बेल्ट उठाई और कहा, "तुम्हारे लिए आज का सेशन फ्री!"  

और इस तरह, जो कभी सिर्फ एक रोमांटिक खेल था, वो अब एक सक्सेसफुल ऑनलाइन बिजनेस बन चुका था, जहां लोग दर्द के जरिए अपने गिल्ट से मुक्ति पा रहे थे, और गुंजन एक सख्त लेकिन क्यूट टीचर की तरह अपना नाम कमा रही थी!


### गुंजन की सबसे कड़ी सजा: जब गिल्ट मिटाने के लिए दर्द जरूरी हो गया  


#### एक छात्र की मदद की गुहार  

गुंजन के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म *"Guilt-Free Punishment"* पर रोज़ लोग आते थे, लेकिन इस बार एक 24 साल का छात्र गुंजन से पर्सनल मीटिंग की मांग कर रहा था। 

उसका मैसेज आया— 

"मैम, मेरी बहुत बुरी आदत है। मैं जब भी पढ़ाई करने बैठता हूँ, तो ध्यान भटक जाता है और मैं अडल्ट चीज़ें देखने लगता हूँ। मैं इस आदत से छुटकारा पाना चाहता हूँ, लेकिन खुद को रोक नहीं पाता। प्लीज, आप मुझे कड़ी से कड़ी सजा दें। मुझे जितना भी रुला लो, लेकिन मुझे इस लत से बाहर निकाल दो! मैं आपको 5000 रुपये तक देने को तैयार हूँ, बस मेरी मदद करो!"  

गुंजन ने मैसेज पढ़ा और कुछ देर सोचने के बाद जवाब दिया— 

"तुम्हें सिर्फ सजा नहीं, बल्कि एक सही सीख भी मिलेगी। कल शाम को मेरी क्लासरूम में आ जाओ, तुम्हारी सबसे कठिन परीक्षा वहीं होगी!"  

#### सबसे कठिन सजा की तैयारी  

अगले दिन शाम को छात्र गुंजन के पास आया। वो पहले से ही व्हाइट शर्ट, ब्लैक जींस और हाथ में बेल्ट लिए तैयार थी। छात्र को अंदर बुलाया और कड़ाई से बोली— 

"तुम्हें सच में इस लत से छुटकारा पाना है?"  

छात्र ने झुककर कहा, "हाँ मैम, मैं बहुत कोशिश कर चुका हूँ, लेकिन खुद को रोक नहीं पाता। मुझे एक झटका चाहिए ताकि मैं हमेशा के लिए सुधर जाऊँ।"  

गुंजन ने ठंडी आवाज़ में कहा, "ठीक है, तो फिर अब से हर बार जब तुम्हारा दिमाग भटकेगा, तो तुम्हें यह सजा याद आएगी!"  

#### सजा की शुरुआत: सबसे कठिन परीक्षा!  

गुंजन ने उसे आदेश दिया— 

"पहले 30 मिनट तक बिना हिले-डुले मुर्गा बनो!"  

छात्र ने कान पकड़े और बैठ गया। 10 मिनट बाद ही उसके पैरों में जलन होने लगी, लेकिन गुंजन की सख्त निगाहें उसे हिलने नहीं दे रही थीं। जैसे ही उसने हल्की भी हरकत की— *'थाप!'* – बेल्ट हवा में लहराई और हल्का वार उसके पैरों पर पड़ा। 

गुंजन ने गुस्से से कहा, "कहा था बिना हिले रहो! ये सजा तुम्हारी भटकती सोच को काबू में करने के लिए है!"  

छात्र ने दर्द से आँखें बंद कर लीं लेकिन कुछ नहीं बोला। 

#### मुर्गा राउंड: स्टैमिना की परीक्षा!  

गुंजन ने अगला आदेश दिया— 

"अब 5 मुर्गा राउंड लगाओ, हर राउंड 50 मीटर का!"  

छात्र ने जैसे-तैसे उठकर पहले राउंड में दौड़ लगाई, लेकिन तीसरे राउंड तक उसके पैर कांपने लगे। पसीना टपक रहा था, सांस फूल रही थी, लेकिन गुंजन की कड़ी निगाहें उसे रुकने नहीं दे रही थीं।  

"अब आखिरी राउंड में हर कदम के साथ जोर से बोलो— 'मैं अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करूंगा, मैं अपना भविष्य सुधारूंगा!' "  

छात्र ने कांपती आवाज़ में यह दोहराया, लेकिन हर शब्द के साथ उसका गिल्ट कम हो रहा था। आखिरी राउंड पूरा होते ही वो घुटनों के बल बैठ गया। 

#### गुंजन का आखिरी सबक  

गुंजन ने उसके पास जाकर बेल्ट सामने रख दी और कड़क आवाज़ में कहा— 

"आज का दर्द तुझे जिंदगी भर याद रहेगा। अगली बार जब भी तेरा मन भटकेगा, तो यह सजा याद आएगी।"  

छात्र की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार यह दर्द के नहीं, बल्कि सच्चे पछतावे और बदलाव के आँसू थे।  

वो हाथ जोड़कर बोला, "मैम, मुझे अब यकीन है कि मैं इस आदत से बाहर आ सकता हूँ। आपका धन्यवाद!"  

गुंजन मुस्कुराई और कहा, "अब जाओ और जिंदगी को सही दिशा में ले जाओ। अगली बार तुम्हें मुर्गा नहीं, टॉपर बनते देखना चाहती हूँ!"  

#### नतीजा: सजा जिसने जिंदगी बदल दी!  

उस छात्र ने बाद में मैसेज किया— 

"मैम, आपकी सजा के बाद मैं सच में सुधर गया हूँ। जब भी भटकने का मन करता है, मैं आपकी दी हुई सजा याद कर लेता हूँ और तुरंत पढ़ाई पर ध्यान लगा देता हूँ। आप मेरी लाइफ चेंजर हैं!"  

गुंजन ने खुद से कहा, "मेरा मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि लोगों को सही रास्ते पर लाना है!"  

और इस तरह, गुंजन का प्लेटफॉर्म सिर्फ एक सजा देने की जगह नहीं, बल्कि जिंदगी सुधारने का माध्यम बन गया!


जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है! पासवर्ड डालिए और जानिए आगे क्या हुआ 🔓

👉 पासवर्ड नहीं पता? Get Password पर क्लिक करो password जानने के लिए।

⭐⭐ मेरी कहानी की वेबसाइट पसंद आई हो तो Bookmark करना — भूलना मत! https://beingfaltu.blogspot.com


BeingFaltu Originals | जब सच बन गया श्राप – और तानों ने बदल दी ज़िंदगी

📝 Story Preview:

📘 सच की चोटी

एक मर्द की गृहस्थ यात्रा







🧾 Table of Contents

  1. अध्याय 1: ताना

  2. अध्याय 2: श्राप

  3. अध्याय 3: बगावत और बाल कट

  4. अध्याय 4: सज़ा और विस्तार

  5. अध्याय 5: खुद से हार

  6. अध्याय 6: ऑफिस का तमाशा

  7. अध्याय 7: ऊँची एड़ी का बदला

  8. अध्याय 8: समय की साड़ी में लिपटी समझदारी


अध्याय 1: ताना

दोपहर का वक्त था। गर्मी कुछ कम हो चली थी, लेकिन मंदिर के संगमरमर की सीढ़ियाँ अब भी तप रही थीं। हल्की हवा चल रही थी, जिससे मंदिर के पास लगे पीपल के पत्ते सरसराने लगे थे। मंदिर के आँगन में धूप और छांव की लहरें फैली थीं।


Anita, हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में थी — उस पर सफेद फूलों की प्रिंट थी। माथे पर छोटी सी बिंदी, और गले में सिंपल मोती की माला। बाल उसकी गर्दन तक थे, साफ-सुथरे और खुले हुए। चेहरे पर हल्की थकावट थी लेकिन आंखों में एक स्थिरता — जैसे वो कुछ कहे बिना बहुत कुछ सह चुकी हो।


Santosh, सफेद कुर्ता और हल्की ग्रे चूड़ीदार में था। चेहरा तना हुआ, फोन बार-बार देखता हुआ, जैसे पूजा में नहीं, कहीं और दिमाग हो।


दोनों मंदिर के अंदर जाने से पहले हाथ में नारियल और प्रसाद लिए खड़े थे।


तभी एक महिला, जिसकी उम्र कोई तीस के आसपास रही होगी, मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ती दिखी। नीली सिल्क की साड़ी में लिपटी हुई, बाल कमर से भी नीचे तक — चमकदार, घने और एक खूबसूरत जूड़े में बंधे हुए। उसकी चाल में आत्मविश्वास था, मानो वो जानती हो कि लोग उसकी ओर देख रहे हैं।


Santosh की नजरें उस पर टिक गईं। उसने बिना कोई मौका गंवाए Anita की ओर झुककर कहा —

"देखा? ऐसे बाल होने चाहिए एक औरत के। कितने सुंदर लगते हैं ना? तुम भी रख सकती थी।"


Anita एक पल के लिए चुप रही। फिर उसने धीरे से अपने बालों को कान के पीछे किया और आंखों में सीधा देखती हुई बोली —

"सुंदर लगते हैं, ये तो ठीक है। पर इन्हें रोज़ सँभालना, धोना, सुखाना, उलझने से बचाना — ये सब दिखता नहीं ना तुम्हें?"


Santosh ने नज़रे फेर लीं, थोड़ा हँसा और बोला —

"इतना तो कर ही सकती हो, दिनभर फुर्सत में रहती हो। तुम्हें कौन-सा ऑफिस जाना होता है?"


Anita के चेहरे से मुस्कान एक पल में गायब हो गई। वो कुछ कहने ही वाली थी, लेकिन खुद को रोक लिया।


वो जानती थी, Santosh को ताना मारना पसंद है — खासकर जब वो अपने आप को 'सही' साबित कर सके। पर आज उसके शब्दों में कुछ चुभन थी — वो चुभन जो उसके अधूरे सपनों और कुचले आत्मसम्मान को फिर से कुरेद रही थी।


Anita की आवाज धीमी थी लेकिन साफ़ —

"हाँ, घर की ज़िम्मेदारी में समय नहीं लगता, ना? नाश्ता बनाना, सफाई, कपड़े, राशन — ये सब तो अपने आप हो जाता है?"


Santosh को थोड़ी असहजता हुई। उसने तुरंत बात बदलने के लिए मंदिर की ओर इशारा किया,

"चलो, पूजा कर लेते हैं, पंडित जी इंतज़ार कर रहे होंगे।"


Anita ने लंबी सांस ली और सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। अंदर जाते हुए उसने भगवान की मूर्ति की ओर देखा और मन ही मन बोली —

"काश भगवान किसी दिन इसे मेरी ज़िंदगी जीने का अनुभव दे दें... बस एक दिन के लिए..."


उस वक्त वो नहीं जानती थी — उसकी प्रार्थना, भगवान तक पहुँच चुकी थी। और शायद... सुन भी ली गई थी।


अध्याय 2: श्राप

मंदिर के अंदर हल्की सी गूंज थी — घंटियों की धीमी आवाज, फूलों की खुशबू, और पंडित जी का मंत्रोच्चारण। हल्का धुआं धूप से उठ रहा था जो वातावरण को और भी आध्यात्मिक बना रहा था।


Anita और Santosh मंदिर के गर्भगृह के सामने खड़े हो गए। पंडित जी ने नारियल और अगरबत्ती लेकर पूजा शुरू की। दोनों ने आंखें बंद कर लीं और हाथ जोड़ लिए।


Anita मन ही मन कुछ माँग रही थी। उसकी प्रार्थना में कोई लालच नहीं था — बस एक सच्ची चाह थी कि Santosh को थोड़ा समझ आए… थोड़ा अनुभव हो… थोड़ा एहसास हो…।


उसी पल, Santosh को अचानक अपने सिर पर किसी का हाथ महसूस हुआ।


हल्की सी छुअन — जैसे कोई आशीर्वाद दे रहा हो। उसने सोचा, शायद पंडित जी ने सिर पर हाथ रखा होगा।


लेकिन जब उसने आंखें खोलीं और मुड़कर देखा… वो हैरान रह गया।


उसके सामने एक बहुत अजीब-सी बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसकी उम्र का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था — पचड़ी-सी त्वचा, उलझे हुए सफेद बाल, लेकिन आंखें… वो आंखें चमक रही थीं जैसे सब कुछ जानती हों।


उसने हल्के से मुस्कराते हुए कहा —

"बेटा, अब दूसरों पर हँसना बंद कर। तुम्हारे बाल… अब तुम्हारी समझ का इम्तिहान लेंगे।"


Santosh ने भौंहें सिकोड़ लीं।

"क्या बकवास कर रही हो अम्मा? हटो यहाँ से।"

वो गुस्से में फुसफुसाया और उसे हल्का सा धक्का देने ही वाला था कि Anita ने उसका हाथ थाम लिया।


Anita ने चौंककर देखा —

"ये कौन हैं?"


लेकिन जब तक दोनों समझ पाते, वो बूढ़ी औरत वहाँ से गायब हो चुकी थी — जैसे कभी थी ही नहीं।


Santosh ने झुंझलाते हुए कहा,

"पता नहीं कहाँ से आ जाती हैं ये पागल औरतें, और उलटी-सीधी बातें करने लगती हैं..."


Anita कुछ सोचने लगी।

"उसने क्या कहा था? तुम्हारे बाल… समझ का इम्तिहान?"


Santosh ने उसकी बात को हँसी में उड़ा दिया,

"छोड़ो न! कुछ भी बोल गई। चलो, घर चलते हैं। शाम तक गर्मी और बढ़ जाएगी।"


दोनों मंदिर से बाहर निकल पड़े। Santosh का चेहरा भले ही सामान्य दिख रहा था, लेकिन कहीं न कहीं उसके भीतर कुछ हल्का सा काँपा था… कुछ ऐसा, जो समझ से परे था।


रास्ते में Anita ने कुछ नहीं कहा। उसकी आंखें आसमान की ओर थीं — जैसे सवाल कर रही हो…

"क्या ये सच में कोई संकेत था?"


उधर Santosh ने इस घटना को दिमाग से निकाल फेंकने की कोशिश की, लेकिन उसे क्या पता था —

असली चौंकाने वाला पल तो अगली सुबह उसका इंतज़ार कर रहा था।


अध्याय 3: बगावत और बाल कट

रात धीरे-धीरे अपने साए समेट रही थी। घर के भीतर शांति थी — लेकिन एक अजीब सी बेचैनी भी हवा में घुली हुई थी, जो किसी आने वाले तूफान से पहले की ख़ामोशी जैसी लग रही थी।


Santosh गहरी नींद में था। उसके खर्राटे हल्के-हल्के कमरे में गूंज रहे थे। Anita भी उसकी पीठ की तरफ मुँह किए लेटी थी, लेकिन उसकी नींद उतनी गहरी नहीं थी। मंदिर में हुई उस बूढ़ी औरत की बातें उसके मन को कचोट रही थीं।


"तुम्हारे बाल… तुम्हारी समझ का इम्तिहान लेंगे…"


यह वाक्य जैसे उसके ज़ेहन में अटक गया था।


सुबह करीब 6 बजे — खिड़की से हल्की धूप की एक किरण सीधे बिस्तर पर पड़ी।


Anita की आंखें अपने आप खुल गईं। उसने धीरे से करवट ली और Santosh की ओर देखा — पर तभी उसके मुँह से एक तीखी चीख निकल गई।


"संतोष!"

उसकी आवाज़ काँप रही थी, और चेहरा सफेद पड़ चुका था।


Santosh नींद से झटके में उठा।

"क्या हुआ? क्या चीख रही हो?"


पर उसकी आवाज़ थोड़ी भरी-भरी सी लग रही थी… और… उसके चेहरे पर बाल थे… बहुत सारे बाल…


उसने माथे से बाल हटाने की कोशिश की — लेकिन वो काटने नहीं, खींचने पड़ रहे थे।


"ये क्या है...?" Santosh ने बड़बड़ाते हुए बाल पकड़े।


जैसे ही उसने जोर से खींचा, एक तेज़ झटका-सा दर्द उसके सिर में उठा।


"अरे! ये तो… ये मेरे अपने बाल हैं?"


Santosh बिस्तर पर सीधा बैठ गया और दहशत में चारों तरफ देखने लगा। उसकी गर्दन से लेकर पीठ तक बालों की लटें लहराती थीं — काले, घने, चमकदार बाल — और वो भी उसकी खुद की खोपड़ी से निकले हुए।


Anita के चेहरे पर चौंक, डर और विस्मय सब एक साथ थे।


वो धीरे से आगे बढ़ी, एक बाल की लट को पकड़कर देखने लगी।

"ये… ये तुम ही हो ना, Santosh?"


Santosh की आंखों में पानी आ गया।

"क्या हो रहा है मेरे साथ...? ये सपना है ना? बोलो Anita, ये सपना है ना?"


Anita अब धीरे-धीरे स्थिति को समझने लगी थी।

"वो बूढ़ी औरत… उसने कहा था — बालों को मत काटना… नहीं तो दंड मिलेगा…"


Santosh को अब पसीना छूट रहा था, बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे, आँखों में घुस रहे थे।


वो झल्लाने लगा।

"ये कैसे झेलते हो तुम लोग? ये तो आँखों में चला जाता है, कुछ दिख नहीं रहा… चिपचिपाहट… उलझन…"


Anita ने पास आकर उसकी हालत देखी।

फिर चुपचाप पीछे खड़ी हुई, उसके बालों को सुलझाया और एक लंबी, मजबूत चोटी बना दी।


Santosh ने गुस्से में आईने में खुद को देखा — उसका चेहरा अब उसके ही लंबे बालों से घिरा था। और वो चोटी… इतनी लंबी… कि उसकी कमर को छू रही थी।


"तुमने चोटी बना दी मेरी?" उसने नाराज़ होकर पूछा।


Anita ने थककर कहा,

"और कर भी क्या सकती थी? सँभालने का यही तरीका है।"


Santosh का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।

"मुझे नहीं चाहिए ये सब नाटक! मैं अभी के अभी इसे काट डालता हूँ!"


वो गुस्से में बाथरूम की ओर भागा। किचन से कैंची उठाई और आईने के सामने खड़ा होकर एक झटके में अपनी ही चोटी काट डाली।


चोटी उसके हाथ में थी… भारी… गिरी हुई… और हवा में एक अजीब सी सनसनी फैल गई।


Anita दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आंखों में अब डर साफ़ झलक रहा था।


"Santosh… तुमने उसे काट दिया… लेकिन उस औरत ने कहा था — मत काटना…"


Santosh ने उसकी ओर देखा और मुस्कराया —

"तो अब क्या होगा? फिर से उगेंगे क्या?"


Anita कुछ नहीं बोली। लेकिन उसकी आंखों में एक सन्नाटा था… जैसे कोई बड़ा तूफ़ान आने वाला हो।


और उन्हें क्या पता था…


अगली सुबह… एक ऐसा सवेरा होगा… जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे।


अध्याय 4: सज़ा और विस्तार

सुबह के चार बज चुके थे। बाहर अब भी अंधेरा था, लेकिन हल्की-हल्की रोशनी आकाश में उभरने लगी थी। कमरे में घड़ी की टिक-टिक और ceiling fan की धीमी आवाज़ के अलावा सब कुछ शांत था।


Anita की नींद अचानक टूट गई। उसे लगा जैसे कोई उसके पास धीरे-धीरे सांस ले रहा हो… भारी और गहरी सांसें।


उसने करवट ली — और सन्न रह गई।


बिस्तर का आधा हिस्सा बालों से ढका हुआ था। घने, काले, रेशमी बाल — इस बार और भी ज़्यादा लंबे और फैले हुए।


उसने एक पल को तो खुद को भ्रम में समझा — पर जब उसने गौर से देखा, तो Santosh उन्हीं बालों के बीच लेटा था… उनका चेहरा अब तक पूरी तरह छिप चुका था।


उसने Santosh को हिलाया,

"Santosh… उठो… उठो, देखो क्या हो गया है तुम्हें…"


Santosh की आंखें धीरे-धीरे खुलीं। उन्होंने एकदम से उठने की कोशिश की, लेकिन बाल उनके चारों तरफ लिपटे हुए थे। आँखों में घुस रहे थे, चेहरे को ढक रहे थे, और गर्दन तक पहुँच चुके थे।


"क्या... क्या फिर से...?" उसकी आवाज़ काँप रही थी।


Anita ने रौशनी जलाई — और दोनों की नजरें एक-दूसरे से टकराईं। Santosh ने नीचे देखा — उसकी चोटी अब पहले से भी लंबी हो चुकी थी… इतनी लंबी कि ज़मीन पर घिसट रही थी।


और उसके हाथ में, जो उसने कल काटी थी — वो कटी हुई चोटी अब कोने में पड़ी थी — मरी हुई साँप जैसी।


Santosh की आंखें भर आईं।


"ये... ये तो मैंने काट दी थी… फिर?"


Anita धीरे से बोली —

"शायद… जितना तुम काटोगे… उतना ये लौटेगा… दुगना होकर…"


Santosh का गला सूखने लगा।


"मैं ऐसे कैसे रहूँगा, Anita? ये क्या मज़ाक है? लोग मुझे देखेंगे तो क्या सोचेंगे? मेरे बालों का क्या मतलब है? मेरी मर्दानगी, मेरी पहचान… सब बदल जाएगा!"


Anita कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से Santosh के पास बैठी, उसकी चोटी को अपने हाथों में लिया, और शांत स्वर में कहा —

"तुम्हारी मर्दानगी क्या बालों में थी, Santosh? या इस बात में कि तुमने कभी समझा ही नहीं कि जिन्हें तुम 'छोटा' समझते हो… वो कितना भारी होता है?"


Santosh ने अपनी हथेलियों में चेहरा छुपा लिया।

"मुझसे ये नहीं होगा, Anita… मैं ये सब नहीं झेल सकता…"


Anita ने उसकी आंखों में देखा — वो डर, बेचैनी और असहायता साफ़ नजर आ रही थी। वही असहायता जो Anita ने तब महसूस की थी जब उसे अपने सपनों को छोड़ कर सिर्फ गृहिणी बन जाना पड़ा था।


वो खड़ी हुई, Santosh के बालों को फिर से चुपचाप सुलझाया। धीरे-धीरे तेल लगाया, एक-एक लट को सीधा किया और पूरी सावधानी से एक नई, लंबी चोटी बना दी — जो अब उसके घुटनों को छू रही थी।


Santosh ने शीशे में खुद को देखा।


वो वो नहीं लग रहा था… लेकिन वो खुद ही था।


एक आंसू फिर से उसके गाल पर बह निकला।


"अब क्या होगा, Anita…?"


Anita ने पहली बार मुस्कराकर कहा —

"शायद… अब तुम्हें खुद को देखने का मौका मिलेगा… मेरी नज़रों से।"


और कमरे के बाहर, आंगन में… हवा एक बार फिर पीपल के पत्तों को हिला रही थी… जैसे कोई अदृश्य शक्ति फिर से चेतावनी दे रही हो:


“अब सिर्फ बाल नहीं बढ़ेंगे… तुम्हारी समझदारी भी बढ़नी चाहिए… वरना ये श्राप सिर्फ शुरुआत है।”


अध्याय 5: खुद से हार

Santosh बिस्तर पर बैठा था — चुप, स्थिर, और टूटा हुआ।


घुटनों तक लंबी चोटी उसके सामने पड़ी थी, जैसे हर पल उसे याद दिला रही हो कि वो अब ‘पहले वाला’ नहीं रहा।


उसने बालों को खोलने की कोशिश की — शायद उन्हें किसी तरह छोटा दिखा सके, छिपा सके… लेकिन जैसे ही उसने चोटी खोली, बालों की मोटी लटें चारों तरफ बिखर गईं — एक समंदर की तरह, जिसे अब कोई छोटी बाल्टी में नहीं भर सकता था।


उसने बालों को पकड़कर ऊपर बाँधने की कोशिश की, बार-बार क्लिप लगाई, खुद से उलझा, मगर वो हर बार उलझते गए।


"एक आदमी होकर मैं अपनी ही चोटी नहीं बाँध पा रहा…"

उसका मन खुद को धिक्कारने लगा।


आंखों में आँसू आ चुके थे, पर वो रोया नहीं। बस चुप रहा।


कुछ देर बाद, कमरे में Anita आई। उसके हाथ में तेल की शीशी और कंघी थी।


Santosh ने आँखें फेर लीं।


Anita पास आकर बैठ गई, पर कुछ नहीं कहा। बस धीरे से तेल रखने लगी।


Santosh ने होंठ भींचते हुए कहा —

"रहने दो। मैं खुद कर लूंगा।"


Anita ने सिर्फ एक नज़र डाली और वापस खड़ी हो गई।


कुछ देर Santosh कोशिश करता रहा — बाल उलझते रहे, हाथ काँपते रहे, क्लिप गिरती रही।


थोड़ी देर बाद उसने हार मान ली। माथे से पसीना पोंछा… और फिर धीरे से सिर झुकाकर बोला —


"Anita... प्लीज़... मेरी मदद करो।"


Anita की आँखों में हल्की सी नमी आ गई। उसने चुपचाप Santosh के पीछे बैठकर उसके बालों को सुलझाया।


तेल लगाया, एक-एक लट को सहलाया — बिल्कुल वैसे जैसे एक माँ अपने बच्चे के बाल संवारती है।


धीरे-धीरे एक मजबूत, साफ और सुंदर चोटी बन गई — जो अब भी घुटनों तक पहुँचती थी।


Santosh ने कहा नहीं… लेकिन उसकी आंखों से झलक रहा था कि वो शर्म और अहंकार को अंदर ही अंदर तोड़ रहा था।


दोपहर को उसे सब्ज़ी लेने बाहर जाना पड़ा।


पहले वो तैयार हुआ, फिर दरवाज़े पर रुक गया —

"क्या लोग कुछ कहेंगे?"


Anita ने उसका हौसला बढ़ाने के लिए सिर्फ इतना कहा —

"कहेंगे ज़रूर… पर तुम क्या कहोगे, ये ज़्यादा ज़रूरी है।"


Santosh ने गहरी सांस ली, और बाहर निकल गया।


गली के नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर बैठे तीन-चार लोग उसे देखकर ठहर गए।


"अरे Santosh भैया… ये क्या नया स्टाइल है?"


"भाभी ने कोई शर्त तो नहीं जीत ली?"


कुछ बच्चों ने पीछे से खी-खी करके कहा —

"लड़का है या लड़की?"


Santosh के पैर एक पल के लिए लड़खड़ाए… पर उसने खुद को संभाला।


"हाँ, ये मैं ही हूँ। और हाँ, बाल मेरे हैं। जितने लंबे हैं, उतनी मेरी समझदारी की सज़ा है। हँस लो… क्योंकि सीखना सबको नहीं आता।"


भीड़ चुप हो गई।


Anita थोड़ी दूर से ये सब देख रही थी — उसकी आंखों में गर्व था।


Santosh अब धीरे-धीरे चलता हुआ सब्ज़ी मंडी की ओर बढ़ा — सिर ऊँचा था, चाल स्थिर… और चोटी? हवा में लहराते हुए उसके नए रूप की कहानी कह रही थी।


इस दिन Santosh ने सिर्फ बाहर की नहीं — अपने भीतर की लड़ाई जीत ली थी।

जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है! पासवर्ड डालिए और जानिए आगे क्या हुआ 🔓

👉 पासवर्ड नहीं पता? Get Password पर क्लिक करो password जानने के लिए।

⭐⭐ मेरी कहानी की वेबसाइट पसंद आई हो तो Bookmark करना — भूलना मत! https://beingfaltu.blogspot.com


BeingFaltu Confessions | Mistress बनी बॉस… और मैं बना उसका आज्ञाकारी गुलाम

📝 Story Preview:

मिस्ट्रेस  और गुलाम की कहानी

मेरे हाथ अब भी बंधे हुए थे और में कंधे के तरफ से नीचे गिरा था और अब बैलेंस करके में पेट के बल हो गया था 

मिस्ट्रेस मेरे पास आआई और मेरे पिछवाड़े पर अपने बूट्स की एक कस कर लात मारी और बोली बहुत स्मार्ट बन रहे हो फिर मेरे पीठ पर एक पैर रख कर खड़ी हो गई और बोली तुझे कहा था ना कुत्ते जब तक पोज देने को नही कहा जाता है तब तक तुझे मेरी दी गई लाइन को रटना है 

तो कुत्ते अब तक तू बोल क्यों नही रहा है चल सुरु हो जा और फिर एक सिगरेट जलाई और बोली अगर जरा भी चालाकी की तो ये सिगरेट तेरे पिछवाड़े में लगा कर आग लगा दूंगी समझा और फिर जिंदगी भर कन्फ्यूज रहना के अब सांस कहा से लेना है और पादना कहा से है 

में बहुत डर गया था है बोलना शुरू करता पर मेरे से लाइन सही से निकल नही रही थी और जो मिस्ट्रेस के गुस्से को और बढ़ा रहा था अब मिस्ट्रेस ने मेरे बम पर अपने हंटर से मारा 

मेरे बम पर एक रेड लाइन बन गई में दर्द से चीख पड़ा 

आई आई आई ओह मम्मी

जो आपने अभी पढ़ा, वो तो बस शुरुआत थी — कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा अभी बाकी है! पासवर्ड डालिए और जानिए आगे क्या हुआ 🔓

👉 पासवर्ड नहीं पता? Get Password पर क्लिक करो password जानने के लिए।

⭐⭐ मेरी कहानी की वेबसाइट पसंद आई हो तो Bookmark करना — भूलना मत! https://beingfaltu.blogspot.com


Total Pageviews