Disclaimer

यह ब्लॉग पूरी तरह काल्पनिक है। किसी से समानता संयोग होगी। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयाँ ((जैसे स्तन वर्धक या हार्मोन परिवर्तन)न लें - यह जानलेवा हो सकता है।— अनीता (ब्लॉग एडमिन)

घमंडी गोपाल से गंगू तक: शीतल का क्रूर जाल

📝 Story Preview:

### Chapter 1: घमंडी इंजीनियर की दुनिया  

   

दिल्ली का मई का महीना।

सुबह के नौ बजे और धूप पहले ही तप रही थी, जैसे आसमान ने भी गुस्सा कर लिया हो। करोल बाग के पीछे वाले पुराने मोहल्ले में, तंग गलियों और पुरानी हवेलियों के बीच एक तीन मंजिला घर था — गोपाल पाटील का घर।

बाहर सड़क पर उसकी चमकती हुई Creta खड़ी थी, जिस पर हर हफ्ते पॉलिश कराई जाती थी। गोपाल, २९ साल का सॉफ्टवेयर इंजीनियर, Noida के एक बड़े IT कंपनी में Senior Developer था। सैलरी अच्छी, स्टॉक ऑप्शन्स अच्छे, और सबसे बढ़कर — उसका घमंड।

“अरे माँ! चाय दे दो ना, कितनी देर लगाती हो!”

गोपाल ने ऊपर से चिल्लाया, आवाज़ में वो बेरुखी थी जो बेटा माँ से बात करते वक्त दिखाता है।

नीचे किचन में सुनीता देवी चुपचाप चाय बना रही थीं। उनके हाथ काँप रहे थे। पति रमेश पाटील अभी-अभी ऑफिस के लिए निकले थे। रिटायर्ड क्लर्क, सारी जिंदगी सरकारी दफ्तर में झुकते-झुकते कमर टेढ़ी हो गई थी, लेकिन बेटे के सामने कुछ बोल नहीं पाते थे।

“आ रही हूँ बेटा…” सुनीता की आवाज़ धीमी थी।

गोपाल नीचे उतरा। सफेद शर्ट, डार्क ब्लू पैंट, घड़ी में चमक। बाल ठीक से सेट, चेहरा साफ — लेकिन आँखों में वो चमक जो कहती थी — “मैं सबसे ऊपर हूँ।”

माँ ने चाय का कप बढ़ाया। गोपाल ने एक घूँट लिया और मुँह बिगाड़ा।

“फिर वही बिना स्वाद वाली चाय! कितनी बार कहा है, अदरक डालो। तुम औरतें कुछ काम का नहीं करतीं। बस खाना बनाना और रोना आता है।”

सुनीता चुप हो गईं। उनकी आँखें नम हो गईं, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। गोपाल ने चाय का कप ऐसे रखा जैसे कोई जूठा गिलास हो और बाहर निकल गया।

कार में बैठते वक्त उसने गाना लगाया — कोई पंजाबी गाना जिसमें औरतों को “item” कहा जा रहा था। वो जोर-जोर से गुनगुनाते हुए नोएडा की तरफ बढ़ गया।

ऑफिस पहुँचते ही उसका असली रूप दिखने लगा।

“प्रिया! ये रिपोर्ट फिर गलत है। तुम लड़कियाँ हो ना, बस मेकअप और गॉसिप में माहिर हो। काम तो हम मर्द ही करते हैं।”

प्रिया, २६ साल की जूनियर डेवलपर, सिर झुकाए खड़ी थी। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वो पी गई। पूरा टीम चुप था। गोपाल हँसा और अपनी केबिन में चला गया।

दोपहर के लंच में वो अपने दोस्तों के साथ कैंटीन में बैठा था।

“भाई, कल वाली वाली लड़की देखी? स्कर्ट पहन के आई थी। मैंने बोला — ‘ऑफिस है या फैशन शो?’ हँस के मर गए सब।”

सब हँसे। गोपाल का सीना फूल गया। उसे लगता था — दुनिया उसी के इशारे पर चलती है।

शाम को छह बजे वो ऑफिस से निकला। ट्रैफिक भयानक था। करोल बाग की तरफ लौटते वक्त उसने सोचा — आज घर जाकर माँ को फिर डाँटना है कि खाना जल्दी लगाए। कल ऑफिस में प्रिया को और नीचा दिखाना है। जिंदगी बढ़िया चल रही थी।

रेलवे स्टेशन के पास वाली भीड़ भरी सड़क।

लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे। बसें हॉर्न बजा रही थीं। हवा में धूल और पसीने की गंध थी।

गोपाल फोन पर किसी क्लाइंट से बात कर रहा था।

“हाँ सर, वो काम मैंने कर दिया। औरतों को काम सौंपा था तो गड़बड़ हो गई, मैंने खुद ठीक किया…”

उसी वक्त सामने से एक लड़की तेजी से आ रही थी।

लंबे, घने, काले बाल कमर तक लहरा रहे थे। हल्का सलवार-सूट, हाथ में एक छोटा बैग। वो फोन पर किसी से बात कर रही थी और थोड़ी जल्दी में थी।

टक्कर।

गोपाल का फोन उसके हाथ से छूटा और सीधे सड़क पर गिरा। स्क्रीन चटक गई।

लड़की भी लड़खड़ा कर गिर पड़ी।

चारों तरफ लोग रुक गए।

गोपाल ने नीचे देखा — उसका नया iPhone 15 Pro, जिसके लिए उसने दो महीने की सैलरी लगाई थी — अब टूटा पड़ा था।

उसका खून खौल गया।

लड़की उठने की कोशिश कर रही थी। उसके घुटने छिले हुए थे। बाल बिखरे हुए थे। चेहरा पीला पड़ गया था।

गोपाल ने एक कदम आगे बढ़ाया, उसका हाथ उठा — और जोरदार थप्पड़ मार दिया।

चटाक!

लड़की फिर से गिर गई। उसकी आँखों में आँसू छलक आए।

“कुत्ती कहीं की! देख के नहीं चल सकती? मेरा फोन तोड़ दिया!” गोपाल चीखा। उसकी आवाज़ पूरे स्टेशन के पास गूँज गई।

लोग देख रहे थे, लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा था। दिल्ली में ऐसे दृश्य रोज होते थे।

लड़की ने धीरे से सिर उठाया।

उसकी आँखें — गहरी, कजरारी, लेकिन अब उनमें गुस्सा नहीं, कुछ और था।

एक शातिर, ठंडी, बदले की मुस्कान।

वो धीरे से बोली, आवाज़ काँप रही थी लेकिन शब्द साफ थे —

“सॉरी… मैं… ठीक करवा दूँगी।”

गोपाल ने उसे घूरा।

“ठीक करवाएगी? अब तू ही ठीक करेगी! मेरा फोन ले ले। दो घंटे में मेरे पास वापस लाकर दे। वरना पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दूँगा।”

लड़की ने चुपचाप फोन उठा लिया। उसके लंबे बाल हवा में लहराए।

“मेरा नाम शीतल है,” उसने धीरे से कहा। “मेरा घर बस पाँच मिनट की दूरी पर है। दो घंटे बाद आ जाना।”

उसने एक कागज़ पर पता लिखकर गोपाल को थमा दिया।

गोपाल ने कागज़ झपट लिया और बिना एक शब्द बोले कार में बैठ गया।

शीतल वहीं खड़ी रही।

उसके घुटने दर्द कर रहे थे। गाल जल रहा था। लेकिन होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी।

मन ही मन वो हँस रही थी।

“अब सारी औरतों की तरफ से… बदला लूँगी।”



### Chapter 2: थप्पड़ और टूटा मोबाइल  

   

शीतल ने चुपचाप गोपाल का टूटा हुआ फोन उठाया।


उसके लंबे, घने काले बाल हवा में लहरा रहे थे। गाल पर थप्पड़ की लाल छाप अभी भी जल रही थी। घुटने छिल गए थे, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। बस एक ठंडी, शातिर मुस्कान के साथ उसने फोन अपने बैग में रख लिया और भीड़ में घुल गई।

गोपाल वहीं खड़ा रह गया। उसका चेहरा लाल हो गया था।

“कुत्ती कहीं की…!” वह दाँत पीसता हुआ बोला, लेकिन शीतल पहले ही गायब हो चुकी थी।

वह चिड़चिड़ाते हुए अपनी Creta में बैठ गया। इंजन स्टार्ट करते वक्त उसने इतनी जोर से हॉर्न बजाया कि आस-पास के लोग चौंक गए। ऑफिस की तरफ जाते हुए उसका पूरा शरीर गुस्से से काँप रहा था।

Noida का ऑफिस पहुँचते ही उसने दरवाज़ा जोर से खोला।

“प्रिया! ये रिपोर्ट अभी तक तैयार नहीं हुई? तुम लड़कियाँ हो ना, बस मेकअप और फोन पर चैटिंग में लगी रहती हो!” उसने चीखते हुए कहा।

प्रिया की आँखें भर आईं। वह सिर झुकाए खड़ी थी।

“सर… मैं…”

“चुप रहो! कल वाली गलती के लिए आज सॉरी बोल रही हो? मैंने तुम्हें इसलिए रखा है कि तुम काम करो, रोने-धोने के लिए नहीं!”

पूरी टीम चुप थी। गोपाल ने अपनी केबिन में घुसते हुए दरवाज़ा इतनी जोर से बंद किया कि शीशे हिल गए।

दोपहर तक उसने तीन लड़कियों को रोते हुए देख लिया। एक को तो उसने इतना डाँटा कि वह बाथरूम में जाकर फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन गोपाल को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसका गुस्सा शीतल पर निकल रहा था।

शाम को पाँच बजे उसने शीतल को फोन लगाया।

“स्विच्ड ऑफ…”

फोन बंद।

उसका खून खौल गया।

“ये क्या बकवास है!” उसने फोन पटक दिया।

उसने कागज़ पर लिखा पता देखा — करोल बाग से थोड़ा आगे, एक पुराना मोहल्ला।

वह सीधे वहाँ पहुँचा।

साँझ ढल चुकी थी। गलियों में बच्चों की चीख-पुकार, चाय की दुकानों पर लोगों की हँसी, मंदिर की घंटियाँ। लेकिन शीतल का घर… बंद था।

दरवाज़े पर ताला लगा था। पड़ोसी ने बताया — “दीदी तो दोपहर में आई थीं, फिर कहीं चली गईं।”

गोपाल ने दरवाज़ा जोर-जोर से पीटा।

“बाहर निकलो! मेरा फोन कहाँ है?”

कोई जवाब नहीं।

उसका दिमाग खराब हो गया।

घर पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज गए थे।

“माँ! दरवाज़ा खोलो!” उसने बाहर से ही चिल्लाया।

सुनीता देवी ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोला।

“बेटा… क्या हुआ?”

“क्या हुआ? सब कुछ बर्बाद हो गया!” गोपाल ने चीखा। “एक कुत्ती ने मेरा नया फोन तोड़ दिया और अब गायब है! तुम्हें पता है कितने पैसे लगे थे उसमें?”

उसने माँ को एक तरफ धकेल दिया और अंदर घुस गया।

रसोई में रमा, घर की नौकरानी, चुपचाप बर्तन धो रही थी।

“रमा! आज का खाना फिर जल गया है ना? तुम औरतें सब एक जैसी हो! बस खाना खराब करना आता है!”

रमा ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों में आँसू थे।

गोपाल ने पूरे घर को सर पर उठा लिया।

कुर्सियाँ उलटीं, तकिए फेंके, टीवी का वॉल्यूम बढ़ाकर गाली-गलौज शुरू कर दी।

“सब मर गए हो क्या? कोई कुछ काम का नहीं है इस घर में!”

सुनीता देवी कोने में बैठकर चुपचाप रो रही थीं। रमेश पाटील अभी ऑफिस से लौटे ही थे। उन्होंने कुछ कहने की हिम्मत नहीं की। बस चुपचाप बेटे को देखते रहे।

रात भर गोपाल सो नहीं पाया। बार-बार शीतल का नंबर मिलाता, हर बार “स्विच्ड ऑफ”।

दूसरा दिन… तीसरा दिन…

दो दिन बीत गए।

शीतल का कोई पता नहीं।

न तो फोन चालू हुआ, न घर का ताला खुला। गोपाल हर रोज़ उस गली में जाता, पड़ोसियों से पूछता, लेकिन सब यही कहते — “दीदी तो दिखी नहीं।”

उसका घमंड अब डर में बदलने लगा था। महंगा फोन गया, और अब वो लड़की भी गायब। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने का मन करता, लेकिन फिर सोचता — “लोग क्या कहेंगे? एक लड़की ने मुझे धोखा दे दिया?”

घर में माहौल बिगड़ चुका था। माँ चुपचाप खाना बनातीं, बाप चुपचाप अखबार पढ़ते, रमा सिर झुकाए काम करती। कोई हँसी नहीं, कोई बात नहीं। सिर्फ गोपाल की चीखें।

दूसरी तरफ…

शीतल अपने छोटे से फ्लैट में, दिल्ली के दूसरे छोर पर, बिस्तर पर लेटी थी।

उसके लंबे बाल बिखरे हुए थे। गाल पर अब भी हल्की लालिमा बाकी थी। घुटनों पर पट्टी बँधी थी।

वह जोर-जोर से रो रही थी।

“कितनी बेइज्जती हुई… सबके सामने… थप्पड़ मारा… कुत्ती कहा…”

रोते-रोते उसका गला रुँध रहा था। वह तकिए में मुँह छुपाए रोई, रोई, रोई।

“मैंने क्या किया था? बस भीड़ में चल रही थी… और उसने… सब देख रहे थे… कोई कुछ नहीं बोला…”

रोने के बीच उसकी आँखों में एक अलग चिंगारी जल उठी।

वह उठी। आँसू पोंछे।

“अब बस… काफी हुआ।”

उसने अपने लंबे बालों को पीछे किया। आईने में खुद को देखा।


### Chapter 3: शितल का गुप्त गुस्सा  

   

दिल्ली का वो छोटा सा 1BHK फ्लैट, लाजपत नगर के पुराने मोहल्ले में। बाहर सड़क पर कुत्ते भौंक रहे थे, कहीं दूर मंदिर की आरती की आवाज़ आ रही थी। उसने दरवाज़ा बंद किया और चिटकनी लगा दी।

बैग फेंका।

जूते उतारे।

और फिर… बिस्तर पर गिर पड़ी।

“आआआह…”

जैसे कोई बाँध टूट गया हो।

शीतल जोर-जोर से रोने लगी। उसके लंबे, घने, काले बाल तकिए पर बिखर गए। गाल पर थप्पड़ की लाल छाप अब भी जल रही थी। घुटने में दर्द था। लेकिन सबसे ज्यादा दर्द था — इज्जत का।

“सबके सामने… सब देख रहे थे… और उसने मुझे थप्पड़ मारा… कुत्ती कहा…”

वह तकिए में मुँह छुपाकर सिसक रही थी। रोते-रोते उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

“मैंने क्या बिगाड़ा था उसका? बस भीड़ में चल रही थी… फोन गिर गया तो मेरी गलती? मैं औरत हूँ इसलिए मार दिया?”

आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

माँ की याद आ गई। पिताजी की। अगर वो देखते तो कितना दुख होता। मोहल्ले में लोग क्या कहेंगे? “शीतल को किसी ने थप्पड़ मारा…”

रोते-रोते उसकी साँस फूलने लगी।

फिर अचानक…

एक हल्की सी हँसी।

पहले धीमी।

फिर तेज।

फिर जोर-जोर से।

शीतल हँसने लगी।

पागलों की तरह।

वह उठकर बैठ गई। आँखों से आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उसने अपने लंबे बालों को पीछे किया। आईने में खुद को देखा — गाल लाल, आँखें सूजी हुईं, लेकिन उस चेहरे के पीछे कुछ और था।

एक शातिर दिमाग।

“अब काफी हुआ…”

वह उठी और अपनी स्टडी टेबल की तरफ गई। टेबल पर लैपटॉप, सर्किट बोर्ड, वायरिंग के टुकड़े और एक खास डिवाइस पड़ा था।

“पेशाब ट्रेनिंग सिस्टम – Beta Version”

यह उसका नया प्रोजेक्ट था।

शीतल इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्ट डिवाइस इंजीनियर थी। एक छोटी सी स्टार्टअप कंपनी में लीड इंजीनियर। बच्चों के लिए बेड-वेटिंग ट्रेनिंग टूल — जो मोबाइल ऐप से कंट्रोल होता था। सेंसर लगे डिवाइस जो रात में अगर बच्चा अनजाने में गीला करे तो हल्का शॉक, वाइब्रेशन और ऐप पर अलर्ट दे। पूरी तरह सेफ, लेकिन कंट्रोल शीतल के हाथ में।

उसने डिवाइस को हाथ में लिया।

उसके चेहरे पर एक अजीब सी हँसी फैल गई।

“गोपाल पाटील…”

वह धीरे-धीरे बोली, जैसे नाम का स्वाद चख रही हो।

“तुम तो बड़े इंजीनियर हो ना? घमंडी मर्द… औरतों को कुत्ती समझते हो… थप्पड़ मारते हो…”

उसकी आँखें चमक उठीं।

अचानक उसके दिमाग में पूरा प्लान क्लियर हो गया।

“तुम्हें भी ट्रेनिंग की ज़रूरत है… लेकिन बेड-वेटिंग वाली नहीं…”

वह हँसी।

“तुम्हें औरत बनने की ट्रेनिंग चाहिए।

तुम्हें गुलाम बनने की ट्रेनिंग चाहिए।

तुम्हें… सिसी बनने की ट्रेनिंग चाहिए।”

शीतल ने लैपटॉप खोला। उसकी उँगलियाँ तेज़ी से चलने लगीं।

उसने अपने प्रोजेक्ट के कोड को खोला।

नए सेंसर्स की लिस्ट बनाई।

स्मार्ट डिजिटल चेस्टिटी केज का प्रोटोटाइप याद किया जो कंपनी में टेस्टिंग के लिए था।

स्मार्ट बैंगल्स — जो हाथों को रिमोट से कंट्रोल कर सकें।

स्मार्ट हाई हील्स — जो पहनने वाले को बिल्कुल immobile कर दें जब तक ऑपरेटर न चाहे।

और सबसे खतरनाक —

Smart Digital Leather Mask — जो ब्लाइंडफोल्ड, गैग और वॉइस कंट्रोल सब कर सके।

शीतल के होंठों पर मुस्कान गहरी होती गई।

“दो घंटे बाद तू आएगा ना गोपाल?

मेरा घर, मेरा रास्ता… सब तैयार है।”

उसने एक ड्रॉअर खोला।

अंदर रखा था — एक छोटा सा इंजेक्शन।

फीमिनाइजेशन सीरम।

कंपनी में सिर्फ टेस्टिंग के लिए बनाया गया था। एक बार लगा दिया तो शरीर धीरे-धीरे लड़की जैसा हो जाता। permanence के लिए एंटीडोट सिर्फ उसी के पास।

शीतल ने इंजेक्शन को हाथ में लिया और उसे देखकर धीरे से बोली —

“तुमने मुझे मारा था ना?

अब मैं तुम्हारी मर्दानगी मारूँगी।

हर थप्पड़ का बदला…

हर गाली का बदला…

हर औरत के आँसू का बदला…”

वह फिर हँसी।

अब उसकी हँसी में कोई दर्द नहीं था।

सिर्फ ठंडा, शातिर, बदले का स्वाद था।

उसने मोबाइल उठाया।

Gopal का टूटा फोन चार्जिंग पर लगा दिया था।

स्क्रीन अभी भी चटकी हुई थी, लेकिन काम कर रहा था।

शीतल ने खुद से कहा —

“दो घंटे बाद जब तू आएगा…

तब तू गोपाल नहीं रहेगा।

तू…  गंगू  बनेगा।

मेरी  गंगू ।

मेरी सिसी गुलाम।”

बाहर अंधेरा घना हो चुका था।

मंदिर की घंटियाँ बंद हो चुकी थीं।

लेकिन शीतल के फ्लैट में एक नई आग जल रही थी।

### Chapter 4: जाल में कदम  

   

शीतल ने गोपाल का टूटा हुआ फोन चार्जिंग से निकाला।

स्क्रीन अभी भी चटकी हुई थी, लेकिन काम कर रहा था। उसने गहरी साँस ली, अपनी आवाज़ को बिल्कुल ठंडा और मुलायम बनाया, और कॉल लगाई।

दूसरी तरफ दूसरा रिंग बजते ही गोपाल ने फोन उठा लिया।

“हेलो?” उसकी आवाज़ में अभी भी गुस्सा था।

शीतल बहुत धीरे, बहुत ठंडे स्वर में बोली —

“गोपाल जी… सॉरी। बहुत सॉरी।”

गोपाल चौंक गया।

“क्या? अब सॉरी बोल रही है? कहाँ गायब थी दो दिन से?”

“मोबाइल रिपेयर करवाने में टाइम लग गया। अब ठीक हो गया है। मैंने नया ग्लास लगवा दिया, पूरा फंक्शनल है।” शीतल की आवाज़ में कोई भाव नहीं था। “आप आकर ले जा सकते हैं।”

“अब कहाँ आऊँ?”

शीतल ने एक पुराना फैक्ट्री एड्रेस बताया — दिल्ली से बाहर, नोएडा-फरीदाबाद बॉर्डर के पास, एक सुनसान इलाका। “वहाँ मेरी छोटी सी वर्कशॉप है। दरवाज़ा खुला रहेगा। बस अंदर चले आइए।”

गोपाल को थोड़ा संदेह हुआ।

“फैक्ट्री? सुनसान जगह? तू मुझे वहाँ बुला रही है?”

शीतल हल्के से हँसी — “आपका 1.5 लाख का फोन है। अगर मुझे डर होता तो मैं खुद आपके ऑफिस आ जाती। आइए या न आइए, आपकी मर्जी।”

लाइन कट गई।

गोपाल ने फोन हाथ में पकड़े कुछ देर सोचा। फिर मन ही मन हँसा।

“एक कुत्ती मुझका क्या बिगाड़ लेगी? मैं इंजीनियर हूँ, मर्द हूँ। घमंड से उसका सीना फूल गया। “चल, ले आता हूँ अपना फोन। और अगर कोई चक्कर निकला तो देख लूँगा उसका भी।”

उसने Creta स्टार्ट की और एड्रेस की तरफ निकल पड़ा।

दो घंटे बाद…

सूरज डूब चुका था।

पुरानी, जंग लगी फैक्ट्री। चारों तरफ खाली प्लॉट, टूटी दीवारें, ऊँची घास। कोई रोशनी नहीं। सिर्फ एक पुराना गेट खुला पड़ा था।

गोपाल ने कार पार्क की और उतरा। हवा में पुरानी मशीनों और धूल की गंध थी।

उसने शीतल को फिर कॉल किया।

इस बार शीतल की आवाज़ आई — लेकिन बहुत दूर से, जैसे स्पीकर से।

“दरवाज़ा खुला है। अंदर आ जाइए।”

गोपाल ने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। फिर भी उसने कदम बढ़ाया।

“सीधे चलते रहो… दाईं तरफ मुड़ो… अब सीधे… रुक जाओ।”

शीतल की आवाज़ एक-एक कदम पर निर्देश दे रही थी। गोपाल बेमन से चलता रहा। अंदर अंधेरा था, लेकिन उसका घमंड उसे आगे बढ़ा रहा था।

“अब ठहर जाइए।”

जैसे ही गोपाल रुका —

धड़ाम!

नीचे का फर्श अचानक खुल गया।

“आआआह!”

गोपाल चीखा और सीधा नीचे गिर पड़ा। करीब दस फुट नीचे एक छोटे, अंधेरे कमरे में। उसकी टाँगें मुड़ीं, कोहनी टकराई।

ऊपर फर्श अपने आप बंद हो गया।

अंधेरा।

पूरी तरह काला अंधेरा।

गोपाल ने घबराकर अपनी जेब से पुराना कीपैड फोन निकाला और टॉर्च ऑन की।

कमरा बहुत छोटा था।

एक तरफ पानी की बोतल।

बीच में उसका अपना iPhone — रिपेयर किया हुआ, लेकिन बैटरी फुल।

एक टूटी कुर्सी।

ऊपर पुराना पंखा — बंद।

“ये क्या बकवास है?!” गोपाल चिल्लाया।

उसने चारों तरफ दरवाज़ा ढूँढा। मिल भी गया — भारी लोहे का दरवाज़ा। लेकिन बाहर से बंद। उसने जोर-जोर से पीटा।

“शीतल! बाहर निकाल! क्या मजाक है ये?!”

कोई जवाब नहीं।

गोपाल ने iPhone उठाया और शीतल को कॉल किया।

“स्विच्ड ऑफ…” नहीं।

फोन बज रहा था, लेकिन जैसे कोई खिलौना हो — “तु-तु-तु” करके कट जाता। नेटवर्क जीरो।

“मादरचोद! निकाल मुझे बाहर!” वह चीखा।

कमरे में गर्मी बढ़ने लगी। हवा रुक गई थी। पसीना बहने लगा।

“शीतल! तू जानती है मैं कौन हूँ? मैं तुझे जेल भिजवा दूँगा! पुलिस बुला लूँगा!”

उसकी आवाज़ अब डर से काँपने लगी थी।

तभी अचानक दीवार पर एक बड़ा स्क्रीन जल उठा।

CCTV फीड।

शीतल का चेहरा।

वह हँस रही थी।

जोर-जोर से। पेट पकड़कर।

“हाहाहाहा…! अब आ गया मेरे जाल में!”

गोपाल स्तब्ध रह गया।

“शीतल! ये क्या कर रही है तू? निकाल मुझे!”

शीतल स्क्रीन पर झुकी, उसकी लंबी बालें एक तरफ लहराईं। आँखों में ठंडी चमक।

“गोपाल पाटील… घमंडी इंजीनियर… अब तू मेरे कंट्रोल में है।

जो चाहूँगी, वो करूँगी।

जब चाहूँगी, तब करूँगी।

और तू… कुछ भी नहीं कर सकेगा।”

गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया।

“ये… ये मजाक है ना? शीतल… प्लीज…”

शीतल ने और जोर से हँसा।

“मजाक? थप्पड़ मारते वक्त मजाक नहीं लगा था ना?

अब मज़ा ले… घमंडी साहब।

तुम्हारी सजा शुरू होती है… अभी।”

स्क्रीन अचानक बंद हो गई।

कमरा फिर अंधेरे में डूब गया।

गोपाल दीवार से टिककर बैठ गया। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

पसीना, गर्मी, डर… और सबसे बड़ा — बेबसी।

उसे पहली बार एहसास हुआ —

वो अब अकेला नहीं है।

कोई उसे देख रहा है।

और वो… पूरी तरह फँस चुका है।



### Chapter 5: बेहोशी और तैयारी  

   

गोपाल ने कितनी देर चीखा, उसे खुद भी पता नहीं चला।

“शीतल! निकाल मुझे बाहर, मादरचोद! मैं तुझे जेल भिजवा दूँगा! पुलिस बुला लूँगा! तू जानती है मैं कौन हूँ?!”

उसकी आवाज़ पहले तेज़ थी, फिर धीरे-धीरे काँपने लगी। लोहे के दरवाज़े पर मुक्के मारते-मारते उसके हाथों की हड्डियाँ दर्द करने लगीं। लेकिन कोई जवाब नहीं। सिर्फ़ दीवारों से टकराकर उसकी ही चीखें वापस लौट रही थीं।

गर्मी बढ़ती जा रही थी।

पंखा बंद था। हवा का एक झोंका भी नहीं। कमरे में घुटन बढ़ने लगी। पसीना उसके माथे से बहकर आँखों में चला गया, नमक जलाने लगा। गला सूखने लगा। वह दीवार से टिककर बैठ गया।

“पानी… पानी चाहिए…”

उसने बोतल उठाई, आधी पी गई, फिर भी गला सूखा ही रहा।

फिर उसने iPhone उठाया। नेटवर्क जीरो। फिर भी बार-बार कोशिश करता रहा — Wi-Fi सर्च, एयरप्लेन मोड ऑन-ऑफ, रीस्टार्ट। हर बार वही “तु-तु-तु” आवाज़।

“ये क्या बकवास है… ये लड़की पागल है… मुझे यहाँ मार डालेगी क्या?”

उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठ रहा था।

क्यों?

केवल एक थप्पड़ के लिए?

वो तो बस गुस्से में था… फोन टूट गया था…

क्या वो सच में इतना बड़ा अपराध था?

तभी अचानक उसे एक अजीब सी बदबू आई।

मीठी-मीठी, लेकिन नक में चुभने वाली। जैसे कोई केमिकल हो।

“ये क्या…?”

वह नाक दबाकर खड़ा हुआ। लेकिन बदबू तेज़ होती गई। कमरे में हल्का-हल्का धुआँ-सा भरने लगा।

“शीतल! क्या कर रही है तू?! निकाल… निकाल मुझे…”

उसकी आँखें भारी होने लगीं। टाँगें डगमगाईं।

“नहीं… नहीं… मैं… मैं…”

आखिरी बार उसने दरवाज़े की तरफ़ हाथ बढ़ाया, फिर धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा।

पूरी तरह बेहोश।


शीतल ऊपर कंट्रोल रूम में खड़ी थी।

CCTV स्क्रीन पर गोपाल का बेहोश शरीर साफ़ दिख रहा था। उसके लंबे बाल कंधे पर लहरा रहे थे। चेहरे पर अब कोई मुस्कान नहीं थी — सिर्फ़ ठंडी, गणना भरी निगाह।

“अब तू मेरे पास है, गोपाल पाटील,” वह धीरे से बोली। “सारी औरतों की तरफ़ से… अब हिसाब बराबर होगा।”

उसने मोबाइल पर एक बटन दबाया।

नीचे का फर्श अपना आप खुल गया। शीतल धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर अंदर आई।

कमरे में अब भी हल्की गैस की गंध थी, लेकिन शीतल ने मास्क पहन रखा था। वह गोपाल के पास घुटनों के बल बैठ गई।

पहले उसने उसके सारे कपड़े फाड़े।

शर्ट के बटन एक-एक करके तोड़े। पैंट की चेन खींची। अंडरवियर तक नहीं बख्शा।

नंगा, बेहोश, गोपाल अब उसके सामने पड़ा था — वही घमंडी मर्द, जिसने उसे सार्वजनिक रूप से थप्पड़ मारा था।

“अब तू मर्द नहीं रहेगा,” शीतल ने ठंडे स्वर में कहा।

उसने पहले Smart Digital Chastity Cage निकाला।

यह एक छोटा, चमकदार, हाई-टेक डिवाइस था — सिलिकॉन और मेटल का मिश्रण, अंदर सेंसर्स, वाइब्रेशन मोटर, और बायोमेट्रिक लॉक। शीतल ने गोपाल के लिंग को सावधानी से अंदर डाला। ठंडी धातु छूते ही बेहोश शरीर में हल्की-सी झुरझुरी हुई। शीतल ने इसे पूरी तरह फिट किया, फिर मोबाइल से “Lock” कमांड दिया।

क्लिक।

एक हल्की-सी धात्विक आवाज़।

चाबी गायब। पासवर्ड सेट। बायोमेट्रिक सिर्फ़ शीतल की उँगली और चेहरा।

“अब तू कभी भी अपनी मर्दानगी को छू भी नहीं सकेगा,” शीतल ने फुसफुसाया। “जब तक मैं न चाहूँ। हर बार जब तुझे उत्तेजना होगी… ये डिवाइस तुझे दर्द देगा। तुझे याद दिलाएगा कि अब तू औरत है।”

फिर उसने Smart Digital Bangles निकाले।

दोनों कलाईयों में चमकदार, पतले, लेकिन बेहद मजबूत बैंगल्स। अंदर इलेक्ट्रॉनिक मोटर्स और जायरोस्कोप। शीतल ने इन्हें गोपाल की कलाइयों में पहनाया और लॉक कर दिया। मोबाइल से “Full Control” मोड ऑन किया।

“अब तेरे हाथ भी मेरे कंट्रोल में। मैं चाहूँ तो तू अपनी उँगली भी नहीं हिला सकेगा। मैं चाहूँ तो तू खुद अपना मेकअप करेगा… अपनी साड़ी पहनेगा… मेरे पैर दबाएगा।”

आखिरी — Smart Digital High Heels

सात इंच की स्टिलेटो हील्स, लेकिन अंदर हाई-टेक मोटर्स। पहनने वाले को जब चाहे immobilize कर सकती हैं। शीतल ने गोपाल के पैरों में इन्हें फिट किया, पट्टियाँ कस दीं और लॉक कर दिया।

क्लिक। क्लिक।

“अब तू चल भी नहीं सकेगा… जब तक मैं न चाहूँ। एक कदम भी मेरी मर्ज़ी के बिना नहीं। तू मेरी गुड़िया बनेगा, गोपाल। मेरी सिसी गुड़िया।”

शीतल पीछे हटी और खड़ी हो गई।

बेहोश गोपाल अब पूरी तरह नंगा, locked, और उसके कंट्रोल में था।

उसने गहरी साँस ली।

“मैंने फैसला कर लिया है।

तुझे सिर्फ़ सजा नहीं दूँगी…

तुझे पूरी तरह लड़की बना दूँगी।

तुझे  गंगू  बना दूँगी।

सारी औरतों के आँसू, सारी थप्पड़ों की याद, सारी गालियों का बदला…

तू खुद भोगेगा।

जब तू होश में आएगा…

तब तुझे पता चलेगा कि अब तू मर्द नहीं रहा।

अब तू मेरी संपत्ति है।

आजीवन।”

शीतल ने मोबाइल पर एक और कमांड दिया।

कमरे का तापमान सामान्य होने लगा। गैस निकलने वाली वेंट बंद हो गई।

वह ऊपर की तरफ़ मुड़ी।

“अब इंतज़ार…

जब तू जागेगा,  गंगू …

तब असली खेल शुरू होगा।”



### Chapter 6: डिजिटल बंधन  

   

शीतल ने गोपाल के बेहोश चेहरे को एक पल और देखा।

उसके लंबे बाल कंधे पर लहरा रहे थे। चेहरे पर अब कोई भाव नहीं — सिर्फ़ ठंडी, गणना भरी निगाह।

“अब तुझे देखने की ज़रूरत नहीं,” वह फुसफुसाई। “अब तू सिर्फ़ महसूस करेगा… हर पल… हर सांस… कि तू अब मेरा है।”

उसने ड्रॉअर से Smart Digital Leather Mask निकाला।

काला, चमकदार लेदर, अंदर सॉफ्ट पैडिंग और हाई-टेक सेंसर्स। उसने गोपाल के सिर पर मास्क चढ़ाया। पहले माथा, फिर आँखें, फिर नाक और मुँह। पीछे की ज़िप खींची — ज़िप ज़ीप्प… पूरी तरह बंद।

फिर उसने Digital Smart Glasses (एक खास तरह का डिजिटल चश्मा) मास्क के अंदर फिट कर दिया। ये चश्मा पूरी तरह लॉक हो जाता था — शीतल के मोबाइल से ही खुलता था। अंदर AR लेंस थे जो वास्तविकता को पूरी तरह बदल सकते थे।

“Blindfold… और Mouth Gag… दोनों एक साथ,” शीतल ने ठंडे स्वर में कहा।

उसने मास्क का दूसरा हिस्सा एक्टिवेट किया।

मुँह के अंदर एक सॉफ्ट लेकिन मोटा सिलिकॉन गैग अपने आप फूल गया। गोपाल के मुँह में पूरी तरह भर गया — न बोल सकता था, न चीख सकता था। सिर्फ़ “म्म्म… म्म्म…” की दबी हुई आवाज़ निकल रही थी।

शीतल ने मोबाइल पर “Lock All” कमांड दिया।

तीन छोटी-छोटी क्लिक की आवाज़ें।

मास्क लॉक।

चश्मा लॉक।

गैग टाइट।

अब गोपाल पूरी तरह अंधेरे में था।

न देख सकता था।

न बोल सकता था।

सिर्फ़ महसूस कर सकता था — अपने नंगे शरीर पर चेस्टिटी केज का ठंडा, कड़ा दबाव… कलाइयों में बैंगल्स का हल्का वजन… पैरों में हाई हील्स की तंगी… और अब चेहरे पर लेदर की चिपचिपाती गर्मी।

शीतल खड़ी हो गई।

“अब खेल शुरू होता है, गोपाल… या फिर…  गंगू ?”

वह हल्के से हँसी और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर चली गई।

डिजिटल सीक्रेट रूम का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

कुछ देर बाद…

गोपाल की पलकें फड़फड़ाईं।

“म्म्म… म्म्म्म…”

सबसे पहले उसे अहसास हुआ — अंधेरा।

पूरी तरह काला, घना अंधेरा। आँखें खुली हुई थीं, लेकिन कुछ दिख नहीं रहा था। फिर उसे एहसास हुआ — मुँह में कुछ भरा हुआ है। गला सूखा, जीभ दबी हुई। बोलने की कोशिश की — सिर्फ़ दबी हुई कराह निकली।

“क्या… क्या हो रहा है…?”

उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठा।

कहाँ हूँ मैं?

कितनी देर बीत गई?

ये लड़की… शीतल… वो पागल है… मुझे यहाँ मार डालेगी क्या?

तभी अचानक…

उसके चश्मे में रोशनी आई।

AR लेंस एक्टिव हो गए।

गोपाल को लगा — वो अब आज़ाद है।

वो एक सुनसान सड़क के किनारे खड़ा है। शाम का हल्का अंधेरा। सामने उसकी चमकती Creta खड़ी है। सिर्फ़ दो कदम की दूरी पर।

“अरे…! मैं… मैं बाहर हूँ?!”

गोपाल के मन में उम्मीद जागी। गुस्सा भी।

“शीतल! तू मादरचोद! निकाल मुझे!” वह चीखा — लेकिन असल में सिर्फ़ “म्म्म… म्म्म!” ही निकला।

वह गाड़ी की तरफ़ भागा।

लेकिन…

पहला कदम…

“आआह!”

उसके पैरों में अचानक भारीपन महसूस हुआ। जैसे सात इंच की हाई हील्स पहने हों। वास्तव में वही था, लेकिन चश्मा उसे दिखा रहा था कि उसके पैरों में उसके अपने जूते हैं — लेकिन वो जूते अचानक भारी हो गए हैं।

“ये… ये क्या…?”

वह लड़खड़ाया। पूरा शरीर आगे की तरफ़ झुका। बहुत मुश्किल से खुद को संभाला।

“चल… चल गोपाल… बस दो कदम… गाड़ी है… भाग जा…”

उसने पूरी ताकत लगाई। एक कदम… फिर दूसरा…

अचानक चश्मे ने फिर बदलाव किया। अब उसे लगा — उसके पैर आज़ाद हैं। जूते हल्के हो गए। वह दौड़ने लगा।

“हाँ… हाँ…!”

लेकिन वास्तविकता कुछ और थी।

उसके पैरों में स्मार्ट डिजिटल हाई हील्स थे। सात इंच की एड़ियाँ। वह लड़खड़ाया… और सीधा दीवार से टकरा गया।

धड़ाम!

सिर में तेज़ चोट लगी। दर्द की लहर दौड़ गई।

“आआआह… म्म्म!”

वह गिर पड़ा। बहुत मुश्किल से हाथों के बल खुद को उठाया।

अब हाथ…

उसने सिर सहलाने के लिए हाथ उठाया।

लेकिन…

उसके हाथ में अचानक बहुत भारी चीज़ महसूस हुई। चश्मा दिखा रहा था कि उसके हाथ में उसका iPhone है। गुस्से में उसने फोन को दूर फेंक दिया।

“फेंक दिया… अब…”

उसने फिर हाथ सिर की तरफ़ बढ़ाया।

लेकिन हाथ हवा में ही जाम हो गया।

जैसे कोई अदृश्य दीवार हो।

“क्या…?”

उसका हाथ हिल ही नहीं रहा था। पूरी ताकत लगाई। पसीना बहने लगा। लेकिन हाथ हवा में ही अटका हुआ था — बिल्कुल वैसे जैसे स्मार्ट डिजिटल बैंगल्स ने उसे फ्रीज़ कर दिया हो।

शीतल ऊपर कंट्रोल रूम में बैठी मोबाइल पर हँस रही थी।

“हाहाहा… देखो… मेरा घमंडी इंजीनियर… अब हवा से भी लड़ रहा है।”

उसने मोबाइल पर “Release Hand” कमांड दिया।

गोपाल का हाथ अचानक गिर गया।

लेकिन अब उसे समझ आ गया।

“ये… ये सब… उसके कंट्रोल में है…”

उसके मन में सवालों का तूफ़ान उठा।

क्या मैं पागल हो गया हूँ?

ये चश्मा… ये मास्क… ये जूते… ये कड़े…

मैं नंगा हूँ… मेरे लिंग पर कुछ कड़ा बंधा है…

मैं चल भी नहीं सकता… बोल भी नहीं सकता…

शर्म।

डर।

बेबसी।

“मैं… मैं गोपाल हूँ… सॉफ्टवेयर इंजीनियर… मैं मर्द हूँ… मैं… मैं किसी लड़की का गुलाम कैसे बन सकता हूँ?”

उसकी आँखों में (जो चश्मे के अंदर थीं) आँसू आ गए।

लेकिन बाहर मास्क के कारण कोई आँसू नहीं बह रहा था। सिर्फ़ दबी हुई सिसकी निकल रही थी — “म्म्म… म्म्म… प्लीज…”

तभी चश्मे में फिर बदलाव हुआ।

अब उसे दिखाई दिया — वो फिर उसी अंधेरे कमरे में है।

नंगा।

लॉक।

बेहद छोटा।

और ऊपर स्क्रीन पर शीतल का चेहरा।

वह मुस्कुरा रही थी।

“कैसा लग रहा है…  गंगू ?”

गोपाल का पूरा शरीर काँप उठा।

डर।

शर्म।

और सबसे बड़ी — बेबसी।

वह समझ गया —

अब भागने का कोई रास्ता नहीं।

अब उसकी हर सांस, हर हिलना-डुलना… शीतल के मोबाइल पर एक बटन दबाने भर की बात है।

Chapter 7: सिसी की पहली सजा

गोपाल थककर दीवार से टिक गया।

कितनी देर वह बेकार की कोशिशें करता रहा — हाथ हिलाने की, पैर उठाने की, चीखने की — पता ही नहीं चला। लेकिन कुछ भी उसके काबू में नहीं था।

हाथ हवा में जकड़े हुए।

पैर हाई हील्स में जकड़े हुए।

मुँह में गैग।

आँखों पर डिजिटल चश्मा।

सब कुछ शीतल के मोबाइल का गुलाम बन चुका था।

“मैं… मैं गोपाल हूँ… मैं इंजीनियर हूँ… ये कैसे हो सकता है…”

उसके मन में बार-बार यही सवाल घूम रहा था। शर्म से उसका चेहरा जल रहा था। नंगा शरीर, लॉक किए हुए लिंग, और अब ये सारा सिस्टम — जैसे कोई बुरा सपना हो, जिससे जागा नहीं जा रहा।

तभी अचानक चश्मे की काली स्क्रीन हट गई।

सामने की दीवार पर बड़ा स्क्रीन जल उठा।

शीतल खड़ी थी।

सिल्की हल्टर नेक ड्रेस में, लंबे बाल खुल्ले, होंठों पर शातिर मुस्कान।

गोपाल कुछ कहना चाहता था, लेकिन मुँह से सिर्फ़ “म्फ़… म्फ़ म्फ़!” ही निकल रहा था।

शीतल ने मोबाइल पर एक बटन दबाया।

गैग थोड़ा ढीला हो गया। अब वो बोल सकता था, लेकिन आवाज़ दबी हुई और मुश्किल से निकल रही थी।

“मादरचोद… कुत्ती कहीं की!” गोपाल तुरंत चीखा, “मुझे छोड़ दे! मैं तेरी जान ले लूँगा… तुझे जेल भिजवा दूँगा… रंडी!”

वह एक के बाद एक गालियाँ बकता रहा। सारी गंदी-गंदी गालियाँ जो उसने कभी औरतों को दी थीं, आज उसी के मुँह से निकल रही थीं।

शीतल सिर्फ़ मुस्कुराती रही। फिर उसने मोबाइल पर एक और बटन दबाया।

अचानक गोपाल की छाती पर लगा डिवाइस सक्रिय हो गया।

“आआआह…!”

उसकी छाती धीरे-धीरे फूलने लगी।

जैसे कोई गुब्बारा हो। सिलिकॉन पैड्स और वेक्यूम सक्शन के साथ जुड़े हुए — असली मांस से चिपके हुए। कुछ ही सेकंड में उसकी छाती पर दो बड़े, भारी, गोल ब्रेस्ट उभर आए।

“ये… ये क्या… आआह… दर्द…!”

वजन बढ़ता गया। भारी। खिंचाव। जैसे कोई उसके ओरिजिनल छाती के मांस को खींच रहा हो। निप्पल्स सख्त हो गए।

गोपाल चीखा।

शीतल ने फिर बटन दबाया।

अब हल्का वाइब्रेशन शुरू हुआ।

निप्पल्स पर हल्की-हल्की करंट की झनझनाहट। जैसे कोई अनजान हाथ उसके ब्रेस्ट को मसल रहा हो।

“नहीं… नहीं… छोड़… आआह…!”

गोपाल का शरीर तड़प उठा।

उसका लिंग चेस्टिटी केज के अंदर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। लेकिन केज ने तुरंत तेज़ दर्द का शॉक दे दिया।

“आआआह… मर गया…!”

दर्द और उत्तेजना साथ-साथ।

छाती पर भारी ब्रेस्ट, निप्पल्स पर मसाज और करंट, लिंग पर कैद और दर्द — सब कुछ एक साथ।

शीतल ने एक और कमांड दिया।

गोपाल के दोनों हाथ पीछे की तरफ़ खिंच गए और एक-दूसरे से चिपक गए। जैसे हैंडकफ लगा हो। अब वह अपने नए ब्रेस्ट को छू भी नहीं सकता था।

“बस… बस कर… प्लीज…” उसकी आवाज़ अब रोने जैसी हो गई थी। “मुझे… मुझे ये ब्रेस्ट… ये भारी… दर्द हो रहा है… निकाल दे…”

लेकिन शीतल हँस रही थी।

“कैसा लग रहा है…  गंगू ?

तेरी छाती पर असली लड़की वाले स्तन… भारी… संवेदनशील…

जब कोई छुएगा तो कैसा लगेगा?

जब मैं इन्हें और बड़ा कर दूँगी… तब?”

गोपाल के मन में तूफ़ान था।

“ये… ये असली जैसा महसूस हो रहा है…

मेरे निप्पल्स… क्यों इतने संवेदनशील हो गए…

मैं मर्द हूँ… मैं गोपाल हूँ…

फिर ये उत्तेजना… ये दर्द… ये शर्म…”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

छाती भारी हो रही थी। हर साँस के साथ ब्रेस्ट हिल रहे थे। वाइब्रेशन कभी तेज़, कभी धीमा। निप्पल्स पर हल्का-हल्का करंट — जैसे कोई चुस रहा हो।

और लिंग…

हर बार खड़ा होने की कोशिश पर तीखा दर्द।

“मैं… मैं पागल हो जाऊँगा…

ये कैसे सहन करूँ…

मुझे छोड़ दो… मैं कभी किसी लड़की को हाथ भी नहीं लगाऊँगा… प्लीज…”

वह रोते हुए गालियाँ भी दे रहा था, लेकिन अब गालियों में दर्द और बेबसी ज्यादा थी।

“कुत्ती… रंडी… छोड़ दे मुझे…”

शीतल स्क्रीन पर झुकी, अपनी लंबी बालें एक तरफ़ करती हुई बोली —

“अभी तो शुरुआत है,  गंगू ।

ये तो सिर्फ़ तेरे नए ब्रेस्ट की ट्रेनिंग है।

असली इंजेक्शन अभी बाकी है।

जो तुझे पूरी तरह लड़की बना देगा…

हमेशा के लिए।”

गोपाल की आँखें भय से फैल गईं।

“नहीं… नहीं… इंजेक्शन… मत…

मैं… मैं मर जाऊँगा…”

लेकिन शीतल सिर्फ़ मुस्कुराई।

“मरना नहीं…

बदलना है।

और तू… बदल चुका है।

बस अब शरीर को भी बता देना है।”

स्क्रीन पर शीतल का चेहरा और पास आया।

“रो… चीख… तड़प…

सारी औरतें जिन्हें तूने रुलाया था… आज तू रो रहा है।

मज़ा आ रहा है ना… घमंडी इंजीनियर?”

गोपाल सिर झुकाकर फूट-फूट कर रोने लगा।

भारी ब्रेस्ट, जकड़े हाथ, दर्द भरा लिंग, और शर्म से जलता हुआ चेहरा।

पहली बार उसे एहसास हुआ —

अब उसकी कोई इज्जत नहीं बची।

अब वो सिर्फ़ शीतल की गुड़िया है।


Chapter 8: हर घंटे की मौत

दर्द अब असहनीय हो चुका था।

गोपाल की छाती पर लगे भारी, नकली ब्रेस्ट हर साँस के साथ हिल रहे थे। निप्पल्स पर वाइब्रेशन और हल्का करंट अभी भी चल रहा था। चेस्टिटी केज के अंदर उसका लिंग खड़ा होने की कोशिश कर-कर के थक चुका था, हर बार तीखा दर्द उसे चीरता जा रहा था।

“आआआह… बस… बस कर दो… प्लीज!”

वह गिड़गिड़ाने लगा। आँखों से आँसू बह रहे थे।

“मैं माफी माँगता हूँ… शीतल… मैंने गलती की… तुम्हें थप्पड़ मारा… गाली दी… मैं बहुत घमंडी था… मुझे छोड़ दो… मैं कभी किसी लड़की को हाथ भी नहीं लगाऊँगा… प्लीज… माफ कर दो…”

उसकी आवाज़ रोने में बदल गई थी।

स्क्रीन पर शीतल मुस्कुराई। जैसे कोई माँ बेटे को माफ कर रही हो।

“अरे… darling… तुम मुझे गलत समझ रहे हो।”

उसकी आवाज़ मीठी थी, लेकिन उसमें छिपा जहर गोपाल की रीढ़ में उतर गया। “मैं तो बस तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ। तुम्हें सही रास्ता दिखाना चाहती हूँ।”

उसने मोबाइल पर कुछ बटन दबाए। स्क्रीन पर एक 3D डिज़ाइन आ गया — गोपाल के चेस्टिटी केज का।

“देखो… तुम्हारे पेनिस पर जो मशीन लॉक है… वो सिर्फ़ उत्तेजना रोकने के लिए नहीं है। वो एक खास ट्रेनिंग मशीन भी है। अब मैं इसे एक्टिवेट कर रही हूँ।”

शीतल ने बटन दबाया।

“इसका काम है — तुम्हें ट्रेन करना। अब से हर घंटे में एक बार तुम्हें इस मशीन में मूतना होगा। समझे? वही जो तुमने सुना है। पेशाब करना होगा।”

गोपाल स्तब्ध रह गया।

“क्या… मतलब… मूतना होगा?”

“हाँ darling। और अगर तुम एक घंटे में अपना मूत नहीं गिराए… तो इस मशीन में लेवल-बाय-लेवल करंट शुरू हो जाएगा। हर 10 मिनट में बढ़ता जाएगा। आखिरी लेवल पर… अगर तुमने वो भी झेल लिया और मूता नहीं… तो ये मशीन ब्लास्ट हो जाएगी।”

शीतल ने ठंडे स्वर में कहा, “और तुम्हारा पेनिस भी… हमेशा के लिए खत्म।”

गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया।

“नहीं… नहीं… ये मजाक है ना?”

“मजाक? तो देखो… डेमो।”

शीतल ने मोबाइल पर बटन दबाया।

एक जोरदार करंट गोपाल के पेनिस और ब्रेस्ट दोनों में एक साथ लगा।

“आआआआह…!!!”

उसका पूरा शरीर लोट-पोट हो गया। हाथ पीठ के पीछे लॉक थे, इसलिए वह छू भी नहीं पा रहा था। वह ज़मीन पर लोटने लगा, चीखता रहा, रोता रहा। दर्द इतना तेज़ था कि आँखों के आगे अँधेरा छा गया।

शीतल जोर-जोर से हँस रही थी।

“अरे रो क्यों रहे हो darling? ये तो सिर्फ़ थर्ड लेवल का करंट था। सोचो… टेन्थ लेवल का करंट कैसा होगा? और अगर तुमने उसे भी झेल लिया तो… बस ब्लास्ट। तुम्हारा पेनिस हमेशा के लिए खत्म।”

वह हँसती रही।

“घबराओ मत। मैंने तुम्हारे कमरे में बहुत सारी पानी की बोतलें रख दी हैं। बस उन्हें ढूँढना है और पीना है। हाथ तुम्हारे पीछे लॉक रहेंगे। चश्मा मेरे कंट्रोल में रहेगा। तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा कि क्या असली है और क्या illusion। इसलिए… ज़्यादा से ज़्यादा पानी पीते रहो। हर घंटे पेशाब करते रहो।”

“जल्द मिलेंगे, darling।”

स्क्रीन गायब हो गई।

चश्मे की स्क्रीन डार्क हो गई।

अंधेरा।

गोपाल के लिए अब ये समझना भी मुश्किल था कि अंधेरा चश्मे की वजह से है या कमरे में सच में अंधेरा है।

तभी चश्मे पर टाइमर शुरू हो गया।

00:59:59…

पहले 5 मिनट कुछ नहीं हुआ। गोपाल को लगा — शायद मजाक है।

लेकिन 10 मिनट बाद…

उसके पेनिस में हल्का-हल्का मसाज शुरू हुआ।

मजा आ रहा था।

फिर वाइब्रेशन।

फिर बहुत हल्का सा करंट।

गोपाल डर गया। अंधेरे में ही उसका मूत निकल गया। डर के मारे।

डिवाइस ने तुरंत पढ़ लिया — मात्रा, क्वालिटी, बॉडी हेल्थ।

स्क्रीन हरी हो गई।

कुछ देर शांति रही।

लेकिन फिर… Water Consume Notification पॉप-अप आया।

गोपाल ने आँखें बंद कर लीं। इग्नोर किया।

फिर दूसरा नोटिफिकेशन।

फिर तीसरा।

वह सोने की कोशिश कर रहा था। लेकिन हर थोड़ी देर में नोटिफिकेशन उसे जगाते रहे।

एक घंटा बीत गया। गोपाल को नींद आ गई थी।

तभी…

हल्का मसाज।

वाइब्रेशन।

फिर करंट।

गोपाल चौंककर जागा।

अभी समझ भी नहीं आया था कि क्या हो रहा है, स्क्रीन पर 10 मिनट warning आ गई।

“नहीं… नहीं… अभी तो…”

उसने पेशाब करने की कोशिश की। लेकिन घबराहट में कुछ नहीं निकला।

फिर अगला करंट।

Level 2

“आआह…!!!”

गोपाल चीखा। आत्मा शरीर से बाहर निकल गई लगी।

उसने हताश होकर कोशिश की। आखिरकार मूत निकला।

स्क्रीन हरी हो गई।

कुछ देर बाद उसे आवाज़ आई — जैसे गेट खुला हो।

शीतल की आवाज़ — “Darling… सही सुन रहे हो? मैं ही हूँ। गेट भी खुला है। अगर भागना चाहो तो भाग जाओ। मैं तुम्हारे कमरे में पानी की बोतलें रखने आई हूँ। फिर मैं तुम्हें अगले दो दिन के लिए यहीं छोड़कर चली जाऊँगी।”

स्क्रीन पर फ्लैश — अंधेरा कमरा, सामने रोशनी, शीतल पानी की बोतलें रख रही है।

गोपाल के हाथ अभी भी पीछे लॉक थे। वह ज़मीन पर पड़ा था। शरीर में जान नहीं बची थी। लेकिन रोशनी देखकर उसने भागने का फैसला कर लिया।

“ये… ये मौका है…”

वह उठा। हाई हील्स में लड़खड़ाया। गिर पड़ा। फिर खुद को संभाला। रेंगते हुए रोशनी की तरफ़ बढ़ा।

“बाहर… बस बाहर निकल जाऊँ…”

लेकिन जैसे ही वह रेंगता… दरवाज़ा दूर चला जाता।

जितना आगे बढ़ता, दरवाज़ा उतना पीछे।

आखिरकार वह दीवार से टकराया।

“ये… ये illusion था…”

स्क्रीन पर फिर Water Consume नोटिफिकेशन।

पानी कहाँ है? कैसे ढूँढे?

गोपाल घबरा गया। प्यास लग रही थी। लेकिन पेशाब नहीं।

उसने मन बनाया — वह खड़ा होकर चलेगा।

कई बार गिरने के बाद वह हाई हील्स में खड़ा हो गया।

धीरे-धीरे एक कदम… दूसरा… तीसरा…

उसे पता नहीं था कहाँ जाना है, लेकिन हाई हील्स में बैलेंस करना अब जिंदगी-मौत का सवाल बन चुका था।

स्क्रीन पर झूठी रोशनी आई — सामने पानी की बोतल दिख रही थी।

वह लड़खड़ाते हुए पहुँचा। बोतल उठाने को हाथ बढ़ाया — लेकिन हाथ पीछे लॉक थे।

सर दीवार से टकराया।

पेशाब का अलर्ट आ गया।

घबराहट में एक बूँद मूत निकली। स्क्रीन हरी हो गई।

लेकिन खतरा टला नहीं। सिर्फ़ एक घंटे की मोहलत मिली थी।

शरीर में अब बिल्कुल पानी नहीं बचा था।

गोपाल रेंगता-उठता, गिरता-उठता बोतलें ढूँढ रहा था।

बार-बार गिरता।

उठता।

कमरा उसके लिए अब बहुत बड़ा महल जैसा लग रहा था।

वह छोटा-सा अंधेरा कमरा… अब उसकी पूरी दुनिया बन चुका था।

लेकिन धीरे-धीरे उसे हाई हील्स में चलना थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था।

खुद को बैलेंस करना… खड़े रहना…

फिर भी…

अगला घंटा आने वाला था।

समय का पता ही नहीं चल रहा था।

गोपाल को अब दिन-रात, घंटे या मिनट — कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। वो दो दिन से उस अंधेरे, छोटे से डिजिटल कमरे में कैद था। बिना रोशनी, बिना हवा, बिना इंसानी आवाज़ के। बाहर की दुनिया — माँ, बाप, ऑफिस, Creta, सब कुछ धुंधला पड़ चुका था।

अब उसकी पूरी जिंदगी एक survival game बन गई थी।

हर घंटे —

हाई हील्स में बैलेंस बनाकर पानी की बोतल ढूँढना।

पानी पीना।

थोड़ा-सा पेशाब करना।

नोटिफिकेशन लगातार आ रहे थे — “Water Consume”, “Urine Alert”, “Level 1 Warning”…

वे उसे सोने नहीं दे रहे थे। पागल कर रहे थे।

वह थक चुका था। शरीर में जान नहीं बची थी। लेकिन करंट का डर उसे सोने भी नहीं दे रहा था। वह गिड़गिड़ाता, रोता, कभी गालियाँ देता, कभी माफी माँगता… लेकिन कोई फायदा नहीं।

तभी अचानक उसके चश्मे में रोशनी आई।

AR मोड ऑन।

दृश्य — उसका अपना घर। करोल बाग वाला घर।

Creta का दरवाज़ा खुला। कोई व्यक्ति गाड़ी से उतरा। चेहरा धुंधला था, लेकिन जूते… वही उसके जूते। कपड़े… वही उसके कपड़े।

वो अंदर घुसा।

सुनीता देवी खड़ी थीं। चेहरे पर वो हमेशा वाला डर नहीं था। आज संतोष था।

“बेटा… आ गए? चाय रखी है।”

“हाँ माँ… थक गया हूँ।”

वो शीतल थी। गोपाल बनकर। उसकी आवाज़, उसका अंदाज़ — बिल्कुल गोपाल जैसा।

कैमरा घूमा और फोकस गोपाल पर हो गया।

वो अभी भी नंगा, हाई हील्स में, हाथ पीछे लॉक, भारी ब्रेस्ट वाली हालत में ज़मीन पर पड़ा था।

शीतल की आवाज़ आई — मीठी, लेकिन जहरीली:

“Darling… मैं हूँ तुम्हारे घर में। गोपाल बनकर आई हूँ। ताकि तुम्हारे घरवालों को तुम्हें ढूँढने की ज़रूरत न पड़े। बस अब मैं उन्हें बता दूँगी कि तुम एक साल के लिए आउट ऑफ कंट्री प्रोजेक्ट पर जा रहे हो। सुबह ही निकलना है।”

गोपाल की आँखें फट गईं।

“नहीं… नहीं… माँ… माँ को मत…”

“अब एक साल तक तुम मेरे हो,  गंगू । बिना किसी डर के।”

शीतल हँसी।

“वैसे… heels में अच्छा balance करने लगे हो। अगली बार आऊँगी तो तुम्हारी माँ से तुम्हारे लिए अच्छा-सा खाना पैक करवा लूँगी। भूख लगी होगी ना?”

गोपाल फूट-फूट कर रोने लगा।

“माँ… माँ बहुत याद आ रही है… प्लीज… मुझे घर ले चलो…”

शीतल स्क्रीन पर झुकी।

“दो दिन से यहीं बंद हो, पानी-पेशाब वाला खेल खेल रहे हो। थक गए होगे ना? लेकिन तुम्हें ऐसे तड़पते देखने का अलग ही मजा आ रहा है। फिर भी… rest भी ज़रूरी है। छह घंटे बाद मैं ये डिवाइस कुछ घंटों के लिए बंद कर दूँगी। तुम सो सकते हो। लेकिन अगले छह घंटे तक मेहनत करते रहो।”

स्क्रीन पर अब शीतल गोपाल के कमरे में दिख रही थी।

नौकरानी रमा खाना लेकर आई।

शीतल ने आराम से बैठकर खाना खाया — गोपाल का पसंदीदा दाल-चावल, आलू की सब्ज़ी, रायता।

गोपाल वहीं रोता रहा।

“माँ… माँ के हाथ का खाना… मैं कभी नहीं खा पाऊँगा…”

उसकी छाती पर भारी ब्रेस्ट हिल रहे थे। आँखों से आँसू बह रहे थे। शर्म, दर्द, भूख, प्यास, घर की याद — सब कुछ एक साथ उसे तोड़ रहा था।

“मैं… मैं कभी माँ को डाँटा नहीं करूँगा… कभी किसी लड़की को हाथ नहीं लगाऊँगा… बस मुझे वापस ले लो… प्लीज…”

लेकिन शीतल ने खाना खाते हुए सिर्फ़ मुस्कुराकर कहा —

“रो मत darling…

अब तुम्हारी नई जिंदगी शुरू हो चुकी है।

 गंगू  की जिंदगी।

मेरी सिसी गुलाम की जिंदगी।”

स्क्रीन बंद हो गई।

अंधेरा।

फिर से वही टाइमर शुरू।

00:59:59…

गोपाल ज़मीन पर लेट गया। शरीर काँप रहा था।

दो दिन पहले का घमंडी इंजीनियर अब एक भूखा, प्यासा, रोता हुआ, हाई हील्स वाली सिसी बन चुका था — जिसकी हर सांस, हर बूँद पेशाब, हर कदम… शीतल के मोबाइल पर एक बटन दबाने भर की बात थी।

और ये सिर्फ़ शुरुआत थी।

एक साल… या शायद ज़िंदगी भर…





### Chapter 9: इंजेक्शन और बदलाव  

   

शीतल ने दरवाज़ा खोला और अंदर आई।

कमरे में अभी भी हल्की गैस की महक बाकी थी। गोपाल ज़मीन पर पड़ा था — नंगा, पसीने से तर, हाई हील्स में, कलाइयों में स्मार्ट बैंगल्स, लिंग पर चेस्टिटी केज, छाती पर दो भारी नकली ब्रेस्ट और चेहरे पर लेदर मास्क।

शीतल कुछ पल चुपचाप खड़ी रही। फिर जोर-जोर से हँसने लगी।

“हाहाहाहा… देखो तो… मेरा घमंडी इंजीनियर… कितना प्यारा लग रहा है!”

उसकी हँसी दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थी। गोपाल ने मास्क के अंदर से “म्म्म… म्म्म!” की आवाज़ निकाली। उसकी आँखें डर से भर गई थीं।

शीतल उसके पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने गोपाल का चेहरा दोनों हाथों में थामा (हालाँकि मास्क के कारण वो छू नहीं पा रही थी) और धीरे से बोली —

“डरो मत darling… अब असली सजा शुरू होती है।”

उसने अपनी जेब से एक छोटा, चमकदार इंजेक्शन निकाला। सुई में हल्का गुलाबी तरल भरा हुआ था।

“ये… ये इंजेक्शन तुम्हें हमेशा के लिए लड़की बना देगा।”

गोपाल की साँस अटक गई। उसने जोर-जोर से सिर हिलाया।

“नहीं… नहीं… म्फ़… म्फ़…!”

“हाँ गोपाल… अब तुम गोपाल नहीं रहोगे। तुम्हारा पुरुष शरीर… तुम्हारी मर्दानगी… सब खत्म।”

शीतल ने इंजेक्शन को हवा में दिखाया।

“ये सीरम तुम्हारे हार्मोन्स को पूरी तरह बदल देगा। तुम्हारी हड्डियाँ नरम होंगी, चेहरा गोल हो जाएगा, आवाज़ पतली, कमर पतली, कूल्हे चौड़े… और तुम्हारे ब्रेस्ट… असली हो जाएँगे।”

गोपाल की आँखों में आतंक था। वह रेंगने की कोशिश कर रहा था, लेकिन हाई हील्स और बैंगल्स ने उसे बिल्कुल बेबस कर रखा था।

“प्लीज… शीतल… मैं मर जाऊँगा… मत लगाओ… मैं तुम्हारी गुलामी करूँगा… जो कहोगी करूँगा… बस ये मत…”

शीतल ने ठंडे स्वर में कहा, “तुम पहले ही मेरी गुलामी कर रहे हो। अब बस शरीर को भी बता देना है।”

उसने गोपाल की बाँह पकड़ी।

“ये तुम्हारे थप्पड़ का जवाब है।

ये तुम्हारी हर गाली का जवाब है।

ये सारी औरतों के आँसुओं का जवाब है।”

और सुई घुसा दी।

“आआआआह…!!!”

गोपाल चीख उठा।

सुई के अंदर जाते ही उसके शरीर में आग-सी लग गई।

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