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“प्लीज शितल… ये मत करना। मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। माँ-पापा… अनीता… सब खत्म हो जाएगा।”
शितल ने मेरे बाल खींचे, “एक वजह बता क्यों न करें?”
मैं चुप हो गया। फिर गिड़गिड़ाया, “प्लीज… इसके अलावा कुछ भी बोलो। सब करूँगा। पर मेरे साथ इतनी बुरी मत बनो।”
“अगर फिर भागने की बेवकूफी की तो ये काम हम कॉलेज में भी कर सकते हैं। समझा?”
“अब घुटनों पर बैठ। बारी-बारी सब लड़कियों से माफी माँग। जब तक माफी न मिले, माँगता रह। बीच में रुका या कोई बात पसंद नहीं आई तो सिर्फ एक सजा — परमानेंट टैटू।”
मैं घुटनों के बल बैठ गया।
एक-एक करके सभी से माफी माँगी। आवाज़ रुआँसी थी। आँसू गिर रहे थे। सबने जल्दी-जल्दी माफ कर दिया।
जैसे ही मैं उठने लगा, शितल बोली, “रुक गंगू … अभी नंदिनी बची है।”
नंदिनी उठी। उसने मुझे जोर से थप्पड़ मारा।
मेरा बैलेंस बिगड़ गया। मैं जमीन पर गिर पड़ा।
दूसरा थप्पड़… और पेट पर लात।
दर्द से मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
शितल ने मुझे गिरने से बचाया।
फिर मेरा एक हाथ दरवाजे से बाँध दिया गया। मैं पेट के बल वहीं लेट गया और बेहोश हो गया।
जब होश आया, तो शितल बोली, “इसे मेरे कमरे में ले आओ। इसके लिए कुछ है मेरे पास।”
मुझे ब्लैक नेट स्टॉकिंग्स पहनाई गईं। ब्लैक शेपवियर। हाथ दोबारा बाँधे गए। आँखों पर मोटा ब्लैक ब्लाइंडफोल्ड। मुँह में स्पंज और रबर ठूँस दिया गया। पैरों में ऊँची हील्स। गले में घंटी बाँध दी गई।
शितल बोली, “चलो गर्ल्स, अब सोते हैं। इस बिल्ली को मेरे कमरे में छोड़ दो। गुड नाइट।”
सब चली गईं। गेट बंद हुआ।
शितल बेड पर लेट गई।
“अब मैं सोने जा रही हूँ। कुछ जरूरत हो तो घंटी बजाना। लेकिन बिना वजह घंटी बजाई और मेरी नींद खराब हुई तो… नंदिनी को बचा लिया था, तुझे कोई नहीं बचेगा।”
मेरे गले की पट्टी में रस्सी बाँधकर दरवाजे से बाँध दिया गया।
“मेरे सॉक्स की खुशबू पसंद आई? आँखें इसलिए बंद की हैं क्योंकि मुझे रात में बिना कपड़ों के सोने की आदत है।”
“टास्क है — सुबह मेरे उठने से पहले मेरे कपड़ों के ढेर से ब्रा ढूँढकर हाथ में ले आना। तभी आजाद होगा।”
पूरी रात मैं नाक से सूँघता रहा। अंधेरे में, बंधे हाथों से, घंटी बजते हुए… बहुत मुश्किल से ब्रा हाथ लगी।
सुबह शितल उठी, ब्रा ली, कपड़े पहने और मुझे खोला।
“चाय बनाती हूँ, पीते हैं फिर जाना।”
चाय-नाश्ते के बाद शितल बोली, “तुम बहुत ब्रेव हो। तुम्हारी रैगिंग बस एक आखिरी टास्क के बाद खत्म।”
मुझे आखिरी बार दुल्हन की तरह सजाया गया — लाल एंब्रॉयडरी वाली साड़ी, भारी मेकअप, ज्वेलरी, पायल, कमरबंद… सब कुछ।
“अब तू घर जा।”
“मेरे कपड़े चेंज कर लूँ?”
“नहीं। ऐसे ही जाएगा… दुल्हन के गेटअप में।”
सिमरन (एक लड़की) को टीचर बनाकर मेरे साथ भेजा गया। उसने घरवालों को “ड्रामा का प्रोजेक्ट” का बहाना बताया।
घर पहुँचते ही…
माँ और भाभी शॉक होकर खड़ी रह गईं।
भाभी ने आगे बढ़कर मेरा घूंघट हटाया और हँसने लगी।
“देवर जी… ये क्या हालत है?!”
माँ भी हँस पड़ीं, लेकिन उनकी आँखों में हैबाई और दर्द था।
सिमरन ने सब एक्सप्लेन किया और सॉल्वेंट की बोतल दे दी।
भाभी बोलीं, “देवर जी, इतनी जल्दी आजादी थोड़ी मिलेगी। आज ऐसे ही रहो।”
माँ ने भी हँसते हुए कहा, “हाँ… आज ऐसे ही रहो।”
मैं चुपचाप किचन में चाय बनाने चला गया।
साड़ी की घंटियाँ बज रही थीं। ब्रेस्ट्स हिल रहे थे। मेहंदी वाले हाथ काँप रहे थे।
दिल में सिर्फ एक ही सवाल बार-बार घूम रहा था —
“अब अनीता को क्या जवाब दूँगा…?
और ये सजा कब खत्म होगी?”

चाय बनाकर मैंने माँ और भाभी को दी। खुद भी चाय का कप हाथ में लेकर बैठ गया। साड़ी की घंटियाँ हर हलचल पर बज रही थीं। भारी मेकअप, मेहंदी, ज्वेलरी — सब कुछ अभी भी मेरे शरीर पर था।
मैंने भाभी की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “भाभी… ये सब उतारने में मदद कर दो ना। बहुत भारी हो रहा है।”
भाभी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर मुस्कुराईं। उनकी आँखों में शरारत थी।
“वैसे देवर जी… आप लड़की के गेटअप में बहुत अच्छे लग रहे हो। सच कहूँ तो मन ही नहीं कर रहा है उतारने का। पर उतारना तो पड़ेगा। एक शर्त पर उतारूँगी।”
मैंने थककर पूछा, “क्या शर्त है?”
भाभी ने चाय का घूँट लिया और बोलीं, “जिस दिन मैं आपको दोबारा गंगू बनने को कहूँगी… उस दिन आप मना नहीं करोगे।”
मैंने बस जान छुड़ाने के लिए सिर हिला दिया। “हाँ… ठीक है।”
“तो ठीक है। आप अपने कमरे में जाओ। मैं कपड़े धोकर छत पर सुखा देती हूँ। तब तक आप मेकअप उतार लो।”
फिर अचानक बोलीं, “एक मिनट… एक फोटो तो ले लूँ आपका।”
उन्होंने अकेले में, माँ के साथ और खुद के साथ कई फोटोज़ खींच लीं। मैं शर्म से मर रहा था, लेकिन कुछ बोल नहीं सका।
“अब जाओ, मुँह धो लो।”
मैं अपने कमरे में गया। अलमारी के फुल-साइज मिरर के सामने खड़ा हो गया।
खुद को देखकर हँसने लगा… रोने लगा… दोनों साथ-साथ।
वॉशरूम जाकर फेसवॉश से आँखें, मुँह, होंठ रगड़-रगड़कर धोए। काजल और लिपस्टिक चला गया। तौलिए से पोंछा और थोड़ी सी नीविया फॉर मेन क्रीम लगा ली।
तभी भाभी आ गईं।
“गंगू बाई , क्या हाल-चाल? मुँह धो लिया? चलो…”
उन्होंने साड़ी उतारने में मदद की। सैकड़ों पिन निकाले। तभी उनका फोन बजा — भैया का कॉल था।
“तुम थोड़ी देर रुको, मैं अभी आई।”
और मुझे ब्लाउज और पेटीकोट में छोड़कर चली गईं।
मैंने सोचा — ब्रा, पैंटी और ब्लाउज खुद उतार लूँ। लेकिन आलस आ रहा था। सोचा सब उतर जाए तब नहाकर अपने कपड़े पहनूँगा। उसी हालत में बिस्तर पर लेट गया और टीवी देखते-देखते सो गया।
शाम को जब आँख खुली…
तो मेरे कान के झुमके और नाक की नथनी उतर चुके थे। पेटीकोट की जगह मिनी स्कर्ट पहनी हुई थी।
मैं हैरान होकर किचन में गया।
“भाभी… ये स्कर्ट किसने पहनाई?”
भाभी हँसते हुए बोलीं, “आप तो गहरी नींद में थे, जगाना ठीक नहीं लगा। ज्वेलरी जो उतर पाई वो सब उतार दी। पेटीकोट आधा उतरा हुआ था तो पूरा उतार दिया। आप सिर्फ पैंटी में अच्छे नहीं लग रहे थे, इसलिए मेरी बहन की एक स्कर्ट मेरे बैग में पड़ी थी, वो पहना दी।”
मैंने थककर कहा, “ठीक है… पर अब पहले ये सब उतार दो ना।”
“2 रोटी बची है, सेककर आती हूँ।”
आधे घंटे बाद भाभी आईं।
“चलो गंगू बाई के कपड़े उतारें।”
नेल पॉलिश रिमूवर से नाखूनों का रंग उतारा। बहुत मेहनत से चूड़ियाँ निकालीं।
फिर अचानक गंभीर होकर बोलीं, “देवर जी… सच बताओ। कॉलेज में ड्रामा था या वो मैडम जो आई थी, वो सब कर रही थी? सच बोलना।”
मैंने पूरा सच बता दिया — शितल, रैगिंग, मुर्गा बनना, वैक्सिंग, दुल्हन बनना… सब कुछ।
भाभी सुनती रहीं। फिर बोलीं, “तुम सच कह रहे हो।”
“और नहीं तो क्या? मुझे शौक चढ़ा था अपनी इज्जत का बंद बजवाने का?”
भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, “कोई नहीं… जो होना था सो हो गया। इसी बहाने हमें भी पता चल गया कि इस चेहरे के पीछे कितनी सुंदर लड़की छुपी बैठी थी। हमें तो कभी पता ही नहीं चलता।”
मैं शर्म से नीचे देखने लगा।
“अब पता चल गया ना…”
भाभी जाने लगीं तो मैंने पूछा, “कहाँ चलीं?”
“अब सब तो उतार दिया।”
मैं शर्माते हुए विग और ब्रेस्ट्स की तरफ इशारा करके बोला, “ये भी तो निकालने हैं…”
भाभी रुक गईं। उनकी आँखें चौड़ी हो गईं।
“क्या बात कर रहे हो? इसमें ब्रेस्ट्स हैं? इसमें कपड़ा-रुमाल भरकर नहीं बनाया है? हे भगवान! मैं तो तब से कपड़ा-रुमाल टाइप ही सोच रही थी। चलो कोई नहीं… मजे करो।”
“क्या मतलब?”
“दो दिन कॉलेज तो जाना नहीं है, घर में रहना है तो विग और ब्रेस्ट्स रहने दो।”
“भाभी मजाक मत करो…”
“मजाक तुम समझ रहे हो? मैं तो सच कह रही हूँ।”
और वो जाने लगीं। जाते-जाते बोलीं, “नहाकर मेरे कमरे में आ जाना। तब तक सोचती हूँ इन्हें निकालना है या लगे रहने देना है।”
मैं बहाने से चला गया, लेकिन दिमाग में बस यही घूम रहा था —
“अब भाभी के दिमाग में क्या चलने लगा है?
क्या ये सिलसिला यहीं खत्म होगा… या अभी और आगे बढ़ेगा?
अनीता को अगर ये हालत दिख गई तो…
मैं दोबारा गंगू बनने से कैसे बचूँगा?”
रात होने वाली थी।
और मेरी कहानी अभी बहुत लंबी बाकी थी।
गोपाल की ज़िंदगी मे शीतल की वापसी नई शुरुआत

आज जब मैं अपनी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो एक अजीब-सी शांति महसूस होती है। वो सब कुछ… वो कॉलेज के दिन, वो रैगिंग, वो शर्म, वो आँसू, वो दुल्हन बनकर घर लौटना… सब कुछ जैसे किसी पुरानी फिल्म का सीन लगता है। बहुत समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे सब नॉर्मल हो गया।
अनीता अब भी मेरी अच्छी दोस्त है।
हम रोज़ बात करते हैं, कभी-कभी कॉफी पीने चले जाते हैं, सपनों की बातें करते हैं। लेकिन मैं उसे कभी प्रपोज़ नहीं कर पाया। वो दिन, जब मैं गंगू बनकर घर लौटा था, उसके बाद मेरे अंदर का वो लड़का हमेशा के लिए थोड़ा-सा डर गया था। शायद डर था कि अगर अनीता को पता चल गया तो वो मुझे कैसे देखेगी? शायद मैं खुद को अब भी पूरी तरह “लड़का” नहीं मान पाता था। हम बस अच्छे दोस्त बनकर रह गए। और शायद यही बेहतर था।
शितल और उसकी पूरी गैंग ने मुझे पूरे कॉलेज टाइम परेशान जरूर किया, लेकिन बस चिढ़ाने तक। कभी मेरा रास्ता नहीं रोका, न मैंने कभी उनके रास्ते में पड़ने की कोशिश की। वो जो भी करतीं, मैं चुपचाप देखता रहता और सीधा घर चला जाता। पढ़ाई पर ध्यान दिया, सॉफ्टवेयर के प्रोजेक्ट्स पर काम किया।
भाभी आज भी कभी-कभी मुझे “गंगू बाई” कहकर चिढ़ाती हैं, लेकिन अब वो भी बहुत कम हो गया है। पहले वो रोज़ मुझसे पूछती थीं — “गंगू रानी, आज क्या पहनोगी?” अब बस मुस्कुराकर कह देती हैं, “देवर जी, चाय ठंडी हो रही है।” समय सब कुछ बदल देता है।
कॉलेज खत्म हुआ।
मैंने अपनी डिग्री ली और सीधा एक बड़ी MNC में नौकरी लग गई। अच्छी पोस्ट — मैनेजर। सैलरी अच्छी, ऑफिस अच्छा, लोग अच्छे। मैंने अपना सपना भी शुरू कर दिया था — वो सॉफ्टवेयर जो देश की साइबर सिक्योरिटी को नंबर वन बनाए। लाइफ मस्त चल रही थी। सुबह ऑफिस, शाम घर, वीकेंड पर अनीता के साथ घूमना, सपनों पर काम करना।
फिर एक दिन…
ऑफिस में नई बॉस की एंट्री हुई।
जब HR ने अनाउंस किया — “हमारी नई चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर — शितल इंगले” — मेरा खून ठंडा हो गया।
मेरा दिल इतनी जोर से धड़का कि लग रहा था पूरा ऑफिस सुन लेगा। शितल? वही शितल? वही जो मुझे गंगू बनाकर, दुल्हन बनाकर, मुर्गा बनाकर, वैक्सिंग करवाकर, ब्लाइंडफोल्ड करके…
मैंने तुरंत अपना रिज़िग्नेशन तैयार किया। कंप्यूटर पर टाइप करते वक्त हाथ काँप रहे थे।
लेकिन शितल अब बदल चुकी थी।
जब वो पहली बार मीटिंग में आई, तो वो पहले जैसी नटखट, गुंडी, शरारती लड़की नहीं लग रही थी। साड़ी में, प्रोफेशनल लुक में, गंभीर चेहरा, बालों में साधारण बन — वो एक सीरियस बॉस थी।
फिर भी मैंने रिज़िग्नेशन दे दिया।
दो घंटे बाद उसका मैसेज आया — “मेरा केबिन में आ जाओ। अभी।”
मैं काँपते पैरों से गया।
केबिन में घुसते ही उसने दरवाज़ा बंद किया।
“बैठो गोपाल,” उसकी आवाज़ शांत थी।
मैं बैठ गया।
शितल ने एक गहरी साँस ली। “पहले तो… सॉरी।”
मैंने ऊपर देखा।
“जो मैंने कॉलेज में तुम्हारे साथ किया… वो बहुत गलत था। बहुत क्रूर था। मैं तब बहुत immature थी। पापा की बेटी होने का घमंड था। माफ़ी चाहती हूँ।”
उसने सिगरेट का पैकेट निकाला। “सिगरेट पीते हो?”
मैंने इंकार में सिर हिलाया।
“तो चाय पी लो।” उसने इंटरकॉम पर दो चाय मँगवाई।
हम चुपचाप चाय पीते रहे।
फिर वो धीरे से बोली, “मैं जानती हूँ तुम डर गए हो। लेकिन मैं अब वो शितल नहीं हूँ। कॉलेज के बाद बहुत कुछ बदला है। मैंने खुद को बदला है। अब मैं सिर्फ़ काम करना चाहती हूँ। और तुम… तुम बहुत talented हो। तुम्हारा वो सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट मैंने पढ़ा है। बहुत अच्छा है।”
उसकी बातों में सच्चाई थी।
मुझे लगा… शायद वो सच में बदल गई है।
मैंने रिज़िग्नेशन वापस ले लिया।
और उसका फायदा भी मिला।
तीन महीने बाद मुझे प्रमोशन मिल गया। सैलरी इंक्रीमेंट भी। शितल ने मुझे अपनी कोर टीम में रख लिया।
अब मेरी उससे मुलाकात हर रोज़ होती है।
मीटिंग्स, डिस्कशन, कभी-कभी लेट नाइट शिफ्ट। हम एक टीम हैं — कंपनी को सफल बनाने की टीम।
उसकी सारी सहेलियाँ — शिवानी, नंदिनी, अंजलि, रीना, आश्विनी, प्रतिक्षा — भी कभी-कभी ऑफिस आती हैं। अब हम सब अच्छे दोस्त बन गए हैं।
शितल अब कभी-कभी पार्टी देती है।
हम सब साथ में बैठते हैं, थोड़ी शराब पीते हैं, सिगरेट पीते हैं, पुरानी यादें हँस-हँसकर सुनाते हैं। लेकिन अब वो यादें दर्द नहीं, बस हल्की-सी मुस्कान देती हैं।
एक बार पार्टी में शितल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “गोपाल… सच में सॉरी। तुमने मुझे माफ़ कर दिया, ये मेरे लिए बहुत बड़ा है।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “पास्ट को पास्ट रहने दो शितल। अब हम साथ में कुछ अच्छा कर रहे हैं। बस यही काफी है।”
लाइफ अब सचमुच मस्त चल रही है।
मेरा सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
अनीता से दोस्ती अब भी है।
भाभी की चिढ़ाने वाली बातें अब हल्की-फुल्की हो गई हैं।
और शितल… वो अब मेरी बॉस है, लेकिन सबसे अच्छी टीममेट भी।
कभी-कभी रात को जब मैं अकेला होता हूँ, तो पुराने दिनों की याद आती है।
मैं खुद से पूछता हूँ — “गोपाल, तूने वो सब सह लिया… तो क्या सीखा?”
सीखा ये कि जिंदगी में कितनी भी बुरी शुरुआत हो, आखिर में अगर तुम टूटे नहीं, तो वो बुरी शुरुआत ही तुम्हें मजबूत बना देती है।
और कभी-कभी… वो दुश्मन भी, समय के साथ सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है।
अनिता से मेरी दुबारा मुलाकात

ऑफिस की फ्लोरसेंट लाइट्स धीरे-धीरे कम होने लगी थीं। शाम के सात बज रहे थे। मैं अपने केबिन में लैपटॉप बंद कर ही रहा था कि शितल का परफ्यूम पहले ही मेरे पास पहुँच गया।
“गोपाल, अभी भी काम?”
उसकी आवाज़ में वो नरमपन था जो पहले प्रोफेशनल नहीं लगता था। मैंने मुस्कुराते हुए सिर उठाया। वो मेरे टेबल के पास खड़ी थी, एक हाथ में दो कॉफी के कप।
धीरे-धीरे ये सिलसिला बढ़ता गया।
मीटिंग में वो मेरे बगल वाली कुर्सी चुनने लगी।
लेट नाइट शिफ्ट्स में मेरी प्लेट में एक्स्ट्रा बिस्किट रख देती।
मेरी कोई छोटी सी मजाक पर भी वो इतनी जोर से हँसती कि पूरा फ्लोर देखने लगता।
फिर वो शाम आई।
ऑफिस की टेरेस। हवा में हल्की ठंडक। शहर की रोशनियाँ नीचे चमक रही थीं। हम दोनों अकेले थे। शितल रेलिंग पर झुकी हुई थी। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे। अचानक उसने मेरी तरफ घूमकर देखा।
उसकी आँखें नम थीं। चेहरा गंभीर।
“गोपाल…” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मैं जानती हूँ… मेरा पास्ट, मेरी इमेज, सब कुछ तुम्हें डराता है। लेकिन… मैं अब वो शितल नहीं रही।”
उसने एक कदम मेरी तरफ बढ़ाया।
“मुझे तुमसे प्यार हो गया है। सच वाला प्यार। वो जो रात-दिन याद आता रहे। वो जो डर के साथ भी जीने को कहे।”
उसकी आँखों में आंसू चमक रहे थे।
“मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ, गोपाल।”
मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। गला सूख गया था। मैं जानता था — अगर मैंने “नहीं” कहा तो क्या होगा। शितल की पहुँच, उसके रिश्ते, उसकी ताकत… सब कुछ मेरी ज़िंदगी को पल भर में तबाह कर सकता था।
मैंने गहरी साँस ली। हाथ काँप रहे थे।
“ठीक है शितल…”
मैंने धीरे से कहा, “हाँ।”
उसके चेहरे पर जो चमक आई, वो मैं आज तक नहीं भूला। वो मुस्कान… जैसे सारी दुनिया जीत ली हो। उसने तुरंत आगे बढ़कर मुझे कस के गले लगा लिया। उसके आँसू मेरी शर्ट पर गिर रहे थे।
“थैंक यू… थैंक यू गोपाल। तुमने मुझे नई ज़िंदगी दी।”
सगाई हो गई।
परिवारों ने मिलकर रस्में निभाईं। मिठाईयाँ बाँटी गईं। शादी की तारीख भी फिक्स हो गई — तीन महीने बाद। सब कुछ सामान्य, सब कुछ “सही” लग रहा था।
लेकिन जिंदगी को शायद कुछ और ही लिखना था।
उस शाम…
ऑफिस से घर लौटते वक्त बारिश शुरू हो चुकी थी। सड़कें गीली चमक रही थीं। मैं कार धीरे चला रहा था जब अचानक मेरी नजर सड़क किनारे पड़ी।
एक लड़की काली साड़ी में, हाथों में चूड़ियाँ, स्कूटी एक कार से टकरा जाने के बाद सड़क किनारे बैठी रो रही थी। उसके घुटने छिल गए थे। बाल बिखरे हुए थे। बारिश उसके चेहरे पर बह रही थी।
मेरा दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।
अनीता।
बारिश अब हल्की हो चुकी थी, लेकिन सड़क अभी भी चमक रही थी। मैंने गाड़ी एकदम ब्रेक मारी और उतर पड़ा।
“अनीता!”
वो नाम सुनते ही उसने सिर उठाया। उसके आँखों से आँसू बह रहे थे, बारिश के पानी के साथ मिलकर। वही साधारण, प्यारी, दो चोटी वाली अनीता। कॉलेज वाली मेरी सबसे अच्छी दोस्त। वही सरल सी मुस्कान, वही शरमाती नजरें।
वो मुझे देखकर और फूट-फूट कर रो पड़ी।
मैं तेजी से उसके पास पहुँचा। स्कूटी को साइड किया, उसके घुटनों पर लगे खरोंच को देखा। खून निकल रहा था। मैंने कार से पानी की बोतल निकाली, रुमाल से साफ किया और उसे पानी पिलाया। उसके काँपते हाथों को थाम लिया।
“रो मत… मैं हूँ ना।”
उसे सहारा देकर पास ही एक छोटी-सी कॉफी शॉप में ले गया। अंदर हल्की सी गर्माहट थी। हम दोनों कोने वाली टेबल पर बैठ गए।
घंटों बातें होती रहीं।
“तुम बिल्कुल नहीं बदले गोपाल,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, आँखों में वही पुरानी चमक।
मैं हँसा, “तुम भी नहीं। अभी भी वही दो चोटियाँ, वही सादी साड़ी… और वही दिल।”
हम दोनों हँस पड़े। पुरानी यादें ताजा हो गईं।
उस शाम नंबर एक्सचेंज हो गए।
फिर शुरू हो गई रोज़ की बातें। सुबह गुडमॉर्निंग, रात को गुडनाइट। कभी-कभी घंटों फोन पर।
मेरे अंदर अनीता के लिए वो पुरानी जगह अब भी पूरी तरह भरी हुई थी। अब मेरे पास सब कुछ था — अच्छी नौकरी, अपनी गाड़ी, पैसा, रुतबा। मैं धीरे-धीरे उसे इम्प्रेस करने लगा।
कभी अच्छे रेस्टोरेंट में डिनर, कभी लॉन्ग ड्राइव पर शहर से बाहर, कभी छोटी-छोटी सरप्राइज — उसकी पसंद का आइसक्रीम, फूल, या वो किताब जिसकी वो बात कर रही थी।
फिर वो शाम आई।
वही पार्क। जहाँ कॉलेज के दिनों में हम घंटों बैठकर बातें करते थे। शाम ढल रही थी। हल्की हवा चल रही थी। हम पुरानी बेंच पर बैठे थे।
मैंने उसका हाथ थामा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
“अनीता…”
मेरी आवाज़ काँप रही थी।
“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। बहुत। मेरी जिंदगी में तुम्हारे बिना सब कुछ अधूरा-सा लगता है।”
मैंने गहरी साँस ली और उसकी आँखों में देखा।
“शादी करोगी मुझसे?”
अनीता कुछ पल चुप रही। उसकी आँखें नीचे झुक गईं। हाथ मेरे हाथ में काँप रहे थे।
“गोपाल… मुझे थोड़ा समय दो सोचने के लिए।”
कुछ दिन उसकी उलझन चली। मेरे भी दिल में तूफान था।
फिर एक शाम उसका मैसेज आया।
“हाँ।”
मेरा दिल खुशी से उछल पड़ा। मैंने फोन को सीने से लगा लिया। आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
लेकिन…
अब समस्या शुरू हुई थी।
शितल से सगाई हो चुकी थी। रस्में हो चुकी थीं। परिवारों के बीच बातें पक्की हो चुकी थीं। शादी की तैयारी भी शुरू हो गई थी।
मैंने फैसला कर लिया।
अब मैं शितल से शादी नहीं कर सकता।
उस शाम का माहौल अभी भी मेरी आँखों के सामने है। शितल के बड़े से बंगले का हॉल पूरी तरह से सजाया गया था। क्रिस्टल लस्टर से नरम सुनहरी रोशनी गिर रही थी। हल्का म्यूजिक बज रहा था। हवा में महँगे परफ्यूम और फूलों की खुशबू मिली हुई थी। शितल की सारी सहेलियाँ वहाँ थीं — शिवानी अपनी चमकती हुई नीली ड्रेस में, नंदिनी हमेशा की तरह जोर-जोर से हँस रही थी, अंजलि शितल के बगल में चिपकी हुई थी। और भी कई लड़कियाँ थीं, सब अपनी-अपनी बातों में मग्न।
शितल आज सचमुच राजकुमारी लग रही थी। लाल साड़ी में, बालों में मोगरे के फूल, गले में हीरे की चेन। उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे पहले कभी नहीं दिखी थी — शादी की खुशी की चमक।
मैं वहाँ खड़ा था, लेकिन मेरे अंदर तूफान चल रहा था। दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि लग रहा था सब सुन लेंगे। हाथ ठंडे पड़ गए थे। लेकिन मैंने फैसला कर लिया था। अब और इंतजार नहीं कर सकता था।
मैंने गहरी साँस ली और सीधा शितल के सामने चला गया। सबकी नजरें मुझ पर पड़ीं।
“शितल,” मेरी आवाज़ पूरे हॉल में साफ सुनाई दी।
म्यूजिक रुक गया। हँसी-मजाक थम गया।
“मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता। सॉरी।”
पूरा हॉल एक पल में सन्नाटे में डूब गया। जैसे किसी ने समय को रोक दिया हो।
शितल मुझे घूरती रह गई। उसका चेहरा धीरे-धीरे सफेद पड़ता गया। होंठ काँपे। उसका ग्लास हाथ से थोड़ा हिला, लेकिन गिर नहीं पाया। उसकी आँखें फैल गईं, जैसे किसी ने सीने में छुरा भोंक दिया हो।
“क्या… क्या कहा तुमने?” उसकी आवाज़ едва सुनाई दी।
मैंने दोबारा, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“शितल, मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता। ये रिश्ता मेरे लिए सही नहीं है।”
एक सेकंड... दो... तीन...
फिर शितल का पूरा शरीर लड़खड़ा गया। उसके घुटने जैसे जवाब दे गए। वो पीछे की तरफ लुढ़क गई और सोफे पर ढेर हो गई। उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे। चेहरा पूरी तरह राख की तरह सफेद। आँखों में आँसू भर आए, लेकिन अभी तक गिरे नहीं थे।
शिवानी तुरंत उसके पास पहुँची, “शितल! अरे क्या हुआ?”
नंदिनी स्तब्ध खड़ी थी, मुंह खुला का खुला रह गया। अंजलि ने हाथ से मुंह ढक लिया। पूरा हॉल साँस रोककर देख रहा था। कोई हिल भी नहीं रहा था।
मैं उसके पास गया। दिल में हल्का सा दर्द हुआ, लेकिन मैंने हाथ बढ़ाया।
“शितल, सुनो…”
उसने मेरे हाथ को इशारे से ही दूर कर दिया। जैसे मेरा स्पर्श भी अब जहर हो। उसकी आँखों में दर्द, गुस्सा, धोखा और बेबसी सब मिला हुआ था। उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन उसमें वो पुरानी ताकत अभी भी बाकी थी —
“चले जाओ गोपाल…”
वो धीरे-धीरे, लेकिन साफ-साफ बोली, “यहाँ से चले जाओ। अभी।”
उसकी सहेलियाँ मुझे घूर रही थीं। कुछ की नजरों में नफरत थी, कुछ में हैरानी। शिवानी ने मुझे देखकर कहा, “तुम्हें शर्म नहीं आती? इतनी बड़ी पार्टी में ये सब…”
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने शितल की तरफ एक आखिरी बार देखा। वो सोफे पर सिमटी हुई बैठी थी, हाथों को आपस में जकड़े हुए, आँसू अब उसके गालों पर बह रहे थे। लेकिन मैं जानता था — अगर मैं रुका तो ये दृश्य और भयानक हो जाएगा।
मैं मुड़ा और बिना एक बार भी पीछे देखे, सीधा हॉल से बाहर निकल गया। मेरे कदम तेज थे। दरवाजे के बाहर ठंडी हवा मेरे चेहरे पर पड़ी। पीछे से हल्की-हल्की रोने और बात करने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन मैंने कान बंद कर लिए।
गाड़ी में बैठा। दरवाजा बंद किया। इंजन स्टार्ट किया।
एक गहरी साँस ली।
मन में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी —
“अब जो होना है हो जाए। मेरा काम हो गया।”
मैंने रियर व्यू मिरर में देखा। बंगला पीछे छूट रहा था।
मेरे होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
अब मैं आजाद था।
अब सिर्फ अनीता थी।
वो साधारण, प्यारी, दो चोटी वाली, सरल सी अनीता। जिसके साथ मैं बिना किसी डर, बिना किसी दबाव के, सचमुच खुद बनकर रह सकता था।
गंगू वाली वो पुरानी रातें, वो शर्म, वो मजबूरी, वो डर — सब पीछे छूट गया।
अब नई ज़िंदगी शुरू हो रही थी।
टूटा वादा, शुरू हुई सजा

मैंने सच में सोचा था कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। शितल को पार्टी में साफ़ मना कर दिया, बिना पीछे मुड़े बाहर निकल आया, और अनीता के साथ नई ज़िंदगी शुरू करने का सपना देखने लगा था। दिल में एक अजीब सी राहत थी — जैसे भारी बोझ उतर गया हो। लेकिन जिंदगी कभी इतनी आसान नहीं होती। वो हमेशा तुम्हारे पीछे एक और मोड़ रखती है, जो अंधेरा होता है।
दो दिन बाद। शाम के सात बज रहे थे। मैं घर पर अकेला था, अनीता से फोन पर बात करके मुस्कुरा रहा था। तभी doorbell बजी।
मैंने सोचा शायद डिलीवरी वाला होगा। दरवाज़ा खोला तो मेरा खून ठंडा हो गया।
शितल खड़ी थी।
अकेली नहीं।
काली साड़ी में, बाल खुले और बिखरे हुए, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। वो पुरानी चमक, वो मुस्कान, वो प्यार — सब गायब। अब सिर्फ़ ठंडा, बर्फ़ जैसा गुस्सा था, जो आँखों से निकलकर मुझे चीर रहा था।
उसके पीछे छाया की तरह उसकी सारी सहेलियाँ खड़ी थीं — शिवानी, नंदिनी, अंजलि, रीना, आश्विनी और प्रतिक्षा। छह लड़कियाँ। सबकी नजरें मुझ पर थीं। कुछ में गुस्सा, कुछ में बदले की चमक, कुछ में वो उत्तेजना जैसे कोई खेल खेलने आई हों।
मेरा गला सूख गया।
“अंदर आने दोगे… या यहीं खड़ा रखोगे?” शितल की आवाज़ बिल्कुल बर्फ़ की तरह ठंडी और धीमी थी, लेकिन उसमें छिपा ज़हर साफ़ महसूस हो रहा था।
मैं कुछ बोल नहीं पाया। पीछे हट गया। जैसे ही वे सब अंदर आईं, शिवानी ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया। ताला लगने की आवाज़ आई — क्लिक।
अब घर की सारी हवा भारी हो गई थी।
शितल मेरे बिल्कुल सामने आई। इतना करीब कि उसका साँस मेरे चेहरे पर पड़ रहा था। उसने अपना हाथ उठाया और धीरे-धीरे, लगभग प्यार से मेरे गाल पर फेरा। लेकिन वो स्पर्श ठंडा था।
“गोपाल…” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “तुमने मुझे उस पार्टी में, मेरी सारी सहेलियों के सामने, मेरी इज्जत का चिथड़ा कर दिया। सबके सामने मुझे अपमानित किया। अब… मेरी बारी है।”
मैंने हल्का हँसने की कोशिश की, आवाज़ काँप रही थी —
“शितल, वो सब बीत गया। मैंने साफ़ कह दिया था कि—”
थप्पड़!
एक जोरदार, तीखा थप्पड़ पड़ा। मेरा सिर एकदम दाईं तरफ घूम गया। गाल जलने लगा। कान में सीटी-सी बजने लगी।
“चुप!” शितल चीखी, “अब बोलने की बारी मेरी है।”
मैं अभी कुछ समझ पाता, उससे पहले नंदिनी ने मेरे दोनों हाथ पीछे की तरफ मोड़ दिए। उसकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी। शिवानी ने मेरे मुँह में एक मोटा कपड़ा ठूँस दिया। मैं छटपटाया, लेकिन आश्विनी और रीना ने मेरी टाँगें पकड़ लीं।
प्रतिक्षा ने मेरी आँखों पर मोटा ब्लाइंडफोल्ड बाँध दिया। अंधेरा छा गया।
मैं बुरी तरह छटपटा रहा था। हाथ-पैर मार रहा था, लेकिन छह लड़कियों के सामने मैं पूरी तरह लाचार था। उनकी हँसी, उनकी साँसें, उनके परफ्यूम की मिली-जुली खुशबू — सब कुछ डरावना लग रहा था।
“घसीटो इसे,” शितल ने ठंडे स्वर में आदेश दिया।
वे मुझे ज़ोर-ज़ोर से घसीटकर मेरे ही बेडरूम की तरफ ले जाने लगीं। मेरे पैर फर्श पर रगड़ खा रहे थे। मैं कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मुँह में कपड़े के कारण सिर्फ़ दबी हुई आवाज़ निकल रही थी।
दिल में अब डर, गुस्सा और पछतावा सब मिला हुआ था।
मुझे घसीटकर बेडरूम में ले जाया गया। कमरे की लाइट जल गई। मेरे हाथ-पैर अभी भी छटपटा रहे थे, लेकिन उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी।
“कपड़े उतारो इसका,” शितल ने ठंडे स्वर में आदेश दिया।
नंदिनी और शिवानी ने मेरी शर्ट के बटन एक-एक करके खोले। फिर बेल्ट खोली गई। पैंट और अंडरवियर को नीचे सरका दिया गया। हर कपड़ा धीरे-धीरे, जानबूझकर उतारा जा रहा था — जैसे वे हर पल का मजा ले रही हों। कुछ ही मिनटों में मैं पूरी तरह नंगा कर दिया गया। कमरे की ठंडी हवा मेरी त्वचा पर लग रही थी। शर्म और गुस्से से मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।
फिर उन्होंने वो पुरानी चोली-चुननी निकाली — लेकिन ये अब और भी भारी और टाइट थी। चमकदार लाल रंग की, घंटियों वाली। चोली इतनी टाइट थी कि मेरी छाती पर दबाव पड़ रहा था। उन्होंने मेरे सीने पर फेक ब्रेस्ट्स चिपकाए, फिर चोली पहना दी। चुननी को कसकर बाँधा गया। सिर पर लंबा काला विग लगाया गया। भारी मेकअप — लाल लिपस्टिक, काजल, ब्लश। नथनी नाक में डाली गई, जो हर हिलने पर खींचती थी। कान में झुमके, गले में हार, हाथों में चूड़ियाँ और पाँवों में भारी पायल — हर कदम पर घुनघुरू बज रहे थे।
जब सब पूरा हुआ तो वे कुछ कदम पीछे हटकर मुझे देखने लगीं। कमरे में उनकी हँसी गूँज उठी।
शितल मेरे कान के पास झुकी। उसके होंठ मेरे कान को छू रहे थे। उसकी गर्म साँस मेरे गाल पर पड़ रही थी।
“याद है गोपाल… वो कॉलेज वाली रात? जब तुमने मुझे गंगू बनाकर मजा लिया था?”
उसने धीरे से फुसफुसाया, “आज वो रात फिर लौट रही है… लेकिन बहुत लंबी। बहुत-बहुत लंबी।”
वे मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। मेरे हाथों को बेड के दोनों सिरों से फैलाकर रस्सियों से कसकर बाँध दिया। टाँगें भी चौड़ी करके बाँध दी गईं। मैं पूरी तरह spread-eagle होकर लेटा था। बिल्कुल लाचार।
फिर ब्लाइंडफोल्ड हटाया गया।
शितल मेरे ऊपर झुकी हुई थी। उसके चेहरे पर वो डरावनी मुस्कान थी। आँखों में बदले की आग जल रही थी।
“तुमने मुझे छोड़ा क्योंकि अनीता चाहिए थी ना?”
उसने मेरे गाल पर उँगली फेरी, “अच्छा। आज मैं तुम्हें दिखाती हूँ कि अनीता के बिना तुम कैसे रहोगे।”
उसने एक छोटा-सा स्टील का चेस्टिटी केज निकाला। ठंडा, चमकदार, क्रूर। मैं छटपटाया, लेकिन बंधे होने के कारण कुछ नहीं कर पाया। नंदिनी ने मेरे प्राइवेट पार्ट को पकड़कर रखा। शितल ने धीरे-धीरे केज फिट कर दिया।
क्लिक।
ताला लगने की आवाज़ कमरे में गूँज गई।
शितल ने चाभी निकाली और अपनी नेकलेस में डाल ली। चाभी उसके गले में, उसके स्तनों के बीच चमक रही थी।
“अब ये तुम्हारा नहीं रहा, गोपाल। ये मेरा है। जब तक मैं चाहूँगी, तुम इसे नहीं खोल पाओगे। न छू पाओगे। न इस्तेमाल कर पाओगे।”
फिर दर्द शुरू हुआ।
उन्होंने मेरी आँखों पर दोबारा ब्लाइंडफोल्ड बाँध दिया। अंधेरा छा गया। मुँह में एक बड़ा ball gag ठूँस दिया गया। पट्टा सिर के पीछे कसकर बाँध दिया। अब मैं सिर्फ़ कराह सकता था, चीख भी नहीं सकता था।
रात भर…
वे बारी-बारी से मेरे साथ खेलती रहीं। कभी घंटियों वाली चुननी खींचतीं, कभी पायल बजातीं, कभी मेरी छाती पर नाखून फिरातीं। कभी हँसतीं, कभी कान में फुसफुसाकर अपमानित करतीं। कभी शितल ऊपर बैठकर मेरे बाल खींचती, कभी अपनी सहेलियों को बुलाकर कहती, “देखो, ये वही गोपाल है जो मुझे छोड़ना चाहता था।”
समय का पता नहीं चल रहा था। पसीना, दर्द, शर्म और बेबसी — सब मिलकर मुझे तोड़ रहा था। हर कराह पर उनकी हँसी गूँजती।
रात भर अंधेरे में मैं पूरी तरह लाचार पड़ा रहा। हर साँस में दर्द और शर्म घुली हुई थी।
कभी कोई मेरे फेक ब्रेस्ट्स पर जोर से दबाव डालती, चोली के ऊपर से मसलती, नाखून गड़ाती। कभी जाँघों के बीच ठंडा ice cube फेरा जाता — वो बर्फ का टुकड़ा मेरी त्वचा पर पिघलता जाता, ठंड के साथ जलन भी होती। मैं तड़प उठता, शरीर ऐंठ जाता, लेकिन रस्सियाँ मुझे बिस्तर से चिपकाए रखतीं।
कभी-कभी वे vibrating dildo को चेस्टिटी केज के ठीक बाहर रखकर tease करतीं। वो कंपन मेरे सबसे संवेदनशील हिस्से के इतना करीब होता कि मेरा पूरा शरीर काँपने लगता, लेकिन केज की वजह से कुछ भी नहीं हो पाता। बस तड़प और बढ़ती जाती।
मैं कराह रहा था। गला फट रहा था चीखने को, लेकिन ball gag की वजह से सिर्फ़ दबी हुई, गूँगी-सी आवाज़ निकल रही थी — “mmmph… mmmphhh…”
शितल बार-बार मेरे कान के पास आकर फुसफुसाती, उसकी गर्म साँस मेरे कान में पड़ती:
“रोना है ना गोपाल? रोओ… जितना रोना चाहते हो, रो लो।
जितना दर्द हो रहा है, उतना ही दर्द मुझे हुआ था उस पार्टी में।
याद है ना? सबके सामने तुमने मुझे ठुकराया था। अब रो… रोके दिखाओ मुझे।”
उसकी आवाज़ में नफरत और संतोष का मिश्रण था।
कभी-कभी वह मेरे विग वाले बाल खींचती, कान काटती, या मेरे गाल पर चपत मारती। बाकी सहेलियाँ हँसतीं, ताने मारतीं, कभी-कभी फोन पर वीडियो बनातीं। उनकी हँसी कमरे में गूँज रही थी।
सुबह होने तक मैं पूरी तरह टूट चुका था।
जब आखिरकार blindfold हटाया गया, तो कमरे में उजाला था। मेरी आँखें जल रही थीं। चेहरा आँसुओं, पसीने और थूक से सना हुआ था। शरीर दर्द से चीख रहा था। चोली, पायल, चूड़ियाँ — सब अब भी मेरे शरीर पर थे।
शितल मेरे चेहरे के ऊपर झुकी। उसकी आँखों में अब भी वही ठंडा गुस्सा था।
उसने धीरे से अपना मुँह भरकर मेरे चेहरे पर थूक दिया।
“अभी तो दिन शुरू हुआ है, गंगू …”
उसने मेरे नए नाम पर ज़ोर देते हुए कहा, “रात तो सिर्फ़ वार्म-अप थी।”
वे मुझे घर से बाहर नहीं ले गईं, लेकिन पूरे घर को मेरे लिए नरक बना दिया।
मुझे बिस्तर से खोलकर भी नहीं छोड़ा। सिर्फ़ हाथों की रस्सियाँ ढीली की गईं, ताकि मैं थोड़ा हिल सकूँ, लेकिन पाँव अभी भी बंधे रहे। दिन भर वे बारी-बारी से आती रहीं — कभी खाना खिलातीं (मुँह से), कभी पानी पिलातीं, कभी फिर वही tease और दर्द शुरू कर देतीं।
हर घंटे के साथ मुझे एहसास हो रहा था कि ये सिर्फ़ शुरुआत है।
शितल ने मेरे कान में आखिरी बार फुसफुसाया,
“अब देखते हैं… अनीता कितने दिन इंतज़ार कर पाएगी।”
पूरे दिन उन्होंने मुझे दुल्हन बनाकर रखा। लाल चोली-चुननी, भारी घूंघट, विग, मेकअप — सब कुछ वैसा ही था। पायलों की घंटियाँ हर कदम पर बजतीं, याद दिलातीं कि मैं अब गोपाल नहीं, उनकी गंगू हूँ।
बार-बार वे मुझे मुर्गा बनाकर घुटनों पर चलवातीं। पूरे घर में — लिविंग रूम से किचन, किचन से बेडरूम, बेडरूम से बालकनी तक। घुटने फर्श पर रगड़ खा रहे थे। पीठ झुकी हुई, हाथ पीछे बंधे। हर बार जब मैं थककर गिरने लगता, नंदिनी या शिवानी चाबुक की हल्की मार मारतीं।
“सीधे चल गंगू … कसम से कितनी गंदी दुल्हन है तू!”
हर छोटी-सी गलती पर सजा मिलती — कभी जोरदार थप्पड़, कभी निप्पल क्लैंप्स लगाकर घंटों छोड़ दिया जाता। दर्द इतना तेज होता कि आँखों से आँसू बहने लगते। क्लैंप्स की चेन खींचकर वे हँसतीं और कहतीं, “देखो, इसके स्तन कितने संवेदनशील हो गए हैं!”
खाना खिलाने का तरीका और भी अपमानजनक था। वे मुझे फर्श पर बैठाकर चम्मच से खाना खिलातीं। लेकिन हर दूसरा चम्मच उनके मुँह का थूका हुआ होता। शितल खुद कई बार थूककर खिलाती, फिर मेरे गाल थपथपाकर कहती, “चल, प्यार से खा ले मेरी जान।”
शाम ढलते ही उन्होंने मुझे बाथरूम में घसीटा।
मुझे शावर के नीचे खड़ा कर दिया गया। हाथ ऊपर करके पाइप से बाँध दिया। फिर शुरू हुआ पानी का तांडव।
पहले ठंडा पानी — बर्फ जैसा। शरीर काँपने लगा, दाँत बजने लगे। मैं चीखना चाहता था लेकिन ball gag अभी भी मुँह में था।
फिर अचानक गर्म पानी — जलता हुआ। त्वचा लाल हो गई।
फिर फिर ठंडा।
फिर गर्म।
मैं तड़प रहा था, शरीर बार-बार ऐंठ रहा था। पायलें पानी में भीगकर और भारी हो गई थीं।
शितल मेरे बाल खींचकर सिर ऊपर किया। उसकी आँखों में क्रूर संतोष था।
“अनीता को फोन करो,” उसने धीरे से कहा। “कहो कि तुम शादी नहीं करोगे। अभी।”
मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया। आँखों में आँसू थे, लेकिन मैंने हिम्मत दिखाई।
शितल मुस्कुराई।
“ठीक है।”
उसने चेस्टिटी केज में एक छोटा-सा इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइस फिट कर दिया। फिर रिमोट अपने हाथ में लिया।
“दोबारा सोच लो।”
मैंने फिर मना किया।
झटका!
एक तेज बिजली सी मेरे प्राइवेट पार्ट में दौड़ गई। पूरा शरीर झनझना उठा। मैं चीखा, लेकिन gag की वजह से सिर्फ़ जोरदार कराह निकली। घुटने buckling हो गए।
“अब?” शितल ने पूछा।
तीसरी बार “न” कहते ही दूसरा, और तेज शॉक आया।
आखिरकार मैं टूट गया।
वे मुझे घसीटकर बेडरूम ले गईं। gag हटाया गया। फोन मेरे हाथ में थमा दिया। स्पीकर ऑन था। सब लड़कियाँ चारों तरफ खड़ी थीं।
मेरी आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी। गला भर्रा गया था। आँखों से आँसू गिर रहे थे।
“अनीता…”
“गोपाल? क्या हुआ? तुम्हारी आवाज़ कैसी है?”
मैं कुछ पल रुका। शितल ने रिमोट दिखाया।
“अनीता… सॉरी…”
मेरी आवाज़ टूट गई। “मैं शादी नहीं कर सकता… बस… बहुत सॉरी…”
दूसरी तरफ से अनीता की सिसकियाँ आने लगीं।
“गोपाल… क्या कह रहे हो? क्या हुआ? प्लीज बताओ ना… मैं आ रही हूँ…”
मैं रो रहा था। आँसू मेरे गालों पर बह रहे थे।
“नहीं… मत आना… बस… हमारी शादी नहीं हो सकती।”
अनीता फूट-फूट कर रो पड़ी। उसकी रोने की आवाज़ सुनकर मेरा दिल टुकड़े-टुकड़े हो रहा था।
शितल ने झटके से फोन छीन लिया और काट दिया।
फिर मेरे चेहरे पर एक और थप्पड़ मारा।
“बहुत अच्छा… मेरी गंगू ।”
उसने मेरे गीले बालों को प्यार से सहलाया, लेकिन उस स्पर्श में सिर्फ़ जह्र था।
“अब अनीता भी चली गई। अब सिर्फ हम हैं… बहुत लंबा समय है हमारे पास।”
तीसरे दिन शाम हो चुकी थी। कमरे में हल्की-सी सुनहरी रोशनी आ रही थी, लेकिन मेरे लिए वो भी अंधेरा लग रहा था।
मैं फर्श पर घुटनों के बल बैठा हुआ था। लाल चोली अब भी मेरे शरीर पर थी, पायलें पैरों में, विग सिर पर। शरीर दर्द से चूर था। घुटने रगड़ने से छिल गए थे। निप्पल क्लैंप्स की वजह से सीने में अभी भी जलन हो रही थी। चेस्टिटी केज अब और भी भारी लग रहा था।
शितल मेरे सामने एक कुर्सी पर आराम से बैठी थी। उसकी टाँगें क्रॉस किए हुए। चेहरा शांत, लेकिन आँखों में वो जीत की चमक साफ़ दिख रही थी। उसके पीछे बाकी सहेलियाँ खड़ी थीं — चुपचाप, लेकिन उनकी नजरें मुझ पर टिकी हुई थीं।
शितल ने धीरे से आगे झुककर मेरी ठोड़ी को अपनी उँगलियों से ऊपर उठाया। उसकी नजरें मेरी आँखों में गड़ गईं।
“अब सुनो गोपाल… बहुत ध्यान से सुनो।”
उसकी आवाज़ मीठी थी, लेकिन उसमें छिपा ज़हर घातक था।
“तुम्हारे पास अब सिर्फ़ दो रास्ते हैं।”
“पहला रास्ता — तुम मेरे साथ शादी करोगे। मुझे अपनी पत्नी मानोगे। हर रात मेरे पैर दबाओगे, मेरी हर इच्छा पूरी करोगे। घर में, बिस्तर पर, हर जगह। और अनीता का नाम कभी ज़ुबान पर भी नहीं लाओगे। न सोचोगे, न याद करोगे।”
उसने एक पल रुककर मेरे चेहरे को देखा।
“दूसरा रास्ता — मैं वो सारे वीडियो वायरल कर दूँगी। रात की यातनाएँ, तुम्हें दुल्हन बनाकर रोते हुए, घुटनों पर चलते हुए, चीखते हुए, भीख माँगते हुए… सब। अनीता को, तुम्हारे परिवार को, ऑफिस के हर同事 को, पूरे शहर को भेज दूँगी।”
उसके होंठों पर क्रूर मुस्कान आई।
“फिर permanent tattoo — ‘शितल की गंगू ’ तुम्हारे शरीर पर कहीं खूबसूरत जगह पर। castration… और जिंदगी भर की गुलामी।”
मेरा पूरा शरीर काँप रहा था। आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। गला इतना सूख गया था कि बोलने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी।
मन के अंदर सिर्फ़ एक ही सवाल बार-बार घूम रहा था, जैसे कोई चाकू बार-बार चुभ रहा हो —
“मैंने शितल को छोड़कर इतनी बड़ी गलती क्यों कर दी?”
अनीता की सिसकियाँ, उसकी रोती हुई आवाज़, मेरी पुरानी खुशियाँ, मेरी आजादी — सब कुछ मेरे सामने घूम रहा था। लेकिन अब कुछ भी नहीं बचा था।
शितल ने मेरी ठोड़ी को और ऊपर उठाया। उसकी उँगलियाँ मेरी त्वचा में गड़ रही थीं।
“तो… क्या कहते हो… गंगू ?”
कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था। सबकी नजरें मुझ पर थीं। मेरी पायलों की घंटियाँ भी अब चुप थीं।
मैंने आँखें बंद कीं। आँसू गिरते रहे।
एक लंबी, टूटी हुई साँस ली।
“मैं… तुमसे शादी करूँगा।”
मेरी आवाज़ इतनी धीमी और टूटी हुई थी कि खुद को भी मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
शितल ने एक पल चुप रहकर मुझे देखा। फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक विजयी, संतुष्ट मुस्कान फैल गई। उसकी आँखें चमक उठीं।
“बहुत अच्छे…”
उसने मेरे गाल पर प्यार भरा थपथपा दिया, जैसे कोई पालतू कुत्ता हो।
“बहुत अच्छे, मेरी गंगू । अब असली खेल शुरू होता है।”
उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा और धीरे से कहा,
“स्वागत है तुम्हारा… अपनी नई ज़िंदगी में।”
Titanium की सजा

तीसरे दिन शाम को शितल मेरे सामने बैठी थी, लेकिन उससे पहले कुछ और हुआ था।
मुझे याद है, जब मैंने शादी करने की हामी भरी, तो शितल ने मुस्कुराते हुए मेरी बाँह थामी और कहा था, “बहुत अच्छा फैसला लिया मेरी गंगू … अब इसे सील कर देते हैं।”
उसने मेरी छाती पर एक इंजेक्शन लगाया। सुई गहरी चुभी। एक ठंडा, जलता हुआ तरल मेरी नसों में फैल गया। कुछ ही सेकंड में मेरे शरीर में अजीब सा एहसास होने लगा। खासकर मेरी छाती — वो भारी होने लगी, जैसे अंदर कुछ फूल रहा हो, दबाव बढ़ रहा हो। साँस लेना मुश्किल हो गया। सिर चकराने लगा।
“ये… क्या… है…” मैंने हकलाते हुए पूछा।
शितल ने मेरे गाल पर हाथ फेरा और मीठे स्वर में बोला,
“आराम से… सो जा। जब उठेगा तो नई दुनिया में होगा।”
फिर सब कुछ धुंधला हो गया। मैं बेहोश हो गया।
तीन दिन बाद…
जब मेरी आँख खुली तो रात के दो बज रहे थे।
मैं अपने ही बेडरूम में था। कमरे में सिर्फ बेडसाइड लैंप की हल्की रोशनी थी। सिर फट रहा था। शरीर में भारीपन था। खासकर छाती में — वो असहज रूप से भारी और संवेदनशील लग रही थी।
मुझे पेशाब की तेज़ इच्छा हुई। इतनी तेज कि सहा नहीं जा रहा था।
मैं उठने की कोशिश की। तभी मेरे पैर में धातु की खनक सुनाई दी।
चेन।
मेरे दाएँ पैर में एक मजबूत स्टील की चेन बंधी हुई थी, जो बेड के सिरहाने से जुड़ी थी। चेन काफी लंबी थी — मुझे बेडरूम और अटैच्ड वॉशरूम तक जाने की इजाजत देती थी, लेकिन घर के बाकी हिस्सों में नहीं।
मैं लड़खड़ाते हुए उठा और बाथरूम की तरफ भागा।
लाइट जलाई।
अंडरवियर नीचे किया।
और मेरा खून एक पल में जम गया।
मेरा लिंग… पूरी तरह गायब था।
एक चमकदार, ठंडा, टाइटेनियम चेस्टिटी केज उसे पूरी तरह कैद किए हुए था। सिर्फ एक छोटा-सा छेद था — पेशाब करने के लिए। बाकी सब — लिंग, गेंदें, हर संवेदनशील हिस्सा — बेरहम, चमकदार स्टील के नीचे दबा हुआ था। केज इतना टाइट और परफेक्ट था कि हिलाने पर भी कुछ नहीं हिलता था।
मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से खींचा। घुमाया। मोड़ा। नाखून गड़ाए। पूरा जोर लगा दिया।
लेकिन वो बिल्कुल escape-proof था। एक इंच भी नहीं हिला।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। साँस फूल गई। हाथ बुरी तरह काँप रहे थे। पेशाब की इच्छा अब भी थी, लेकिन शॉक में मैं कुछ पल तक बस केज को घूरता रहा।
“ये… ये कैसे…?”
मैंने दर्पण में खुद को देखा। छाती अब थोड़ी फूली हुई लग रही थी। चेहरा पीला, आँखें सूजी हुईं।
मैं भागकर बेडरूम में आया और मोबाइल उठाया।
बैटरी चार्ज थी। और सबसे ऊपर शितल का मैसेज इंतजार कर रहा था।
रात के दो बजकर चालीस मिनट हो चुके थे।
मैं बेड पर बैठा था, शरीर पसीने से तर, हाथ काँप रहे थे। टाइटेनियम केज मेरे बीच में ठंडा और भारी महसूस हो रहा था। मैंने फोन उठाया और शितल का मैसेज खोला।
स्क्रीन की रोशनी मेरे सूजे हुए चेहरे पर पड़ी।
“गोपाल (या अब गंगू ?),
अब तक तुमने अपना नया गिफ्ट देख लिया होगा। ये titanium chastity cage है — दुनिया का सबसे मजबूत और महंगा। मैंने अपनी सारी सेविंग्स और पापा की मदद से स्पेशल ऑर्डर किया था। तुम्हारे साइज़ के हिसाब से परफेक्ट बनवाया गया है।
तुमने मुझे मेरी सारी सहेलियों के सामने, मेरी इज्जत को कुचलकर, अपमानित करके छोड़ा था। अब मेरी बारी है।
तुमने मुझे 2 साल की सगाई दी थी, सपनों का धोखा दिया था। इसलिए तुम इस केज में 2 साल + 30 हफ्ते रहोगे। हर बार जब तुम गुस्सा दिखाओगे, दम्की दोगे, या अनीता का नाम ज़ुबान पर लाओगे — 5 हफ्ते और जुड़ जाएँगे।
चाभी मेरे पास है। हमेशा। मेरी नेकलेस में, मेरी छाती के बीच। जहाँ तुम कभी नहीं पहुँच सकते।
पुलिस जाना चाहते हो? जाओ। मैं सब वीडियो (तुम्हारा दुल्हन बनना, रोना, चीखना, घुटनों पर भीख माँगना, सब) एक क्लिक में रिलीज कर दूँगी। तुम्हारा परिवार, ऑफिस के लोग, अनीता, उसके परिवार, पूरे शहर — सब देखेंगे।
आज दोपहर 12 बजे ठीक उसी रेस्टोरेंट में मिलते हैं जहाँ तुमने अनीता को प्रपोज किया था। देर हुई तो 10 हफ्ते और जुड़ जाएँगे।
Enjoy your new locked life, गंगू।
— तुम्हारी मालकिन, शितल”
मैसेज पढ़ते-पढ़ते मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।
मैंने फोन गिरा दिया। हाथों में सिर पकड़ लिया। आँखों से आँसू फूट पड़े।
“दो… दो साल…?”
मेरा गला भर्रा गया। छाती में दर्द हो रहा था। नया इंजेक्शन वाली भारीपन अब और ज्यादा महसूस हो रहा था। मैंने नीचे देखा — चमकदार टाइटेनियम केज मेरे लिंग को बेरहमी से जकड़े हुए था। कोई उम्मीद नहीं थी। कोई escape नहीं था।
मैं बिस्तर पर लेट गया और फर्श की तरफ देखने लगा। पाँव में बंधी चेन हल्की-हल्की खनक रही थी। हर हलचल पर याद दिला रही थी कि मैं अब कैदी हूँ।
“गंगू…”
मैंने खुद को फुसफुसाते हुए सुना। शितल ने मुझे नया नाम भी दे दिया था।
दिमाग में अनीता की रोती हुई आवाज़ गूँज रही थी। उस रेस्टोरेंट की याद आ रही थी जहाँ मैंने उसे प्रपोज किया था — वो खुशी, वो उम्मीद, वो प्यार… सब कुछ अब जह्र बन गया था।
मैंने घड़ी देखी — सुबह के चार बज रहे थे।
दोपहर 12 बजे तक सिर्फ़ कुछ घंटे बचे थे। अगर मैं देर किया तो 10 हफ्ते और जुड़ जाएँगे।
शितल का मैसेज पढ़कर मेरे हाथ से फोन छूटकर बिस्तर पर गिर गया।
कुछ पल तो मैं बस स्तब्ध बैठा रहा। फिर अचानक मेरे अंदर एक आग सी सुलग उठी। नहीं। मैं अभी हार नहीं मान सकता। सबसे पहले इस चेन को खोलना होगा, वरना रेस्टोरेंट तक पहुँचना ही नामुमकिन है।
मैं तेजी से बाथरूम गया। दराज खोले। सामान उलट-पुलट किया। कपड़ों के नीचे, एक पुराने शेविंग किट के अंदर — आखिरकार एक छोटी-सी चाबी मिल गई।
मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था। मैं घुटनों के बल बैठ गया और पैर की चेन में लगे ताले में चाबी घुसाई।
क्लिक।
चेन खुल गई।
मैंने राहत की साँस ली, लेकिन राहत सिर्फ़ आधी थी। अब सबसे मुश्किल काम बाकी था।
मुझे पेशाब करना था। बहुत जोर से।
मैं स्टैंड होकर अंडरवियर नीचे किया। लेकिन टाइटेनियम केज की वजह से लिंग पूरी तरह अंदर कैद था। चाहे जितना कोशिश करूँ, खड़ा होकर पेशाब करना असंभव था। निशाना नहीं लग रहा था।
मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया।
आखिरकार मुझे लड़कियों की तरह बैठना पड़ा। टॉयलेट सीट पर बैठकर, घुटने मोड़कर, केज को नीचे की तरफ दबाते हुए।
पेशाब की धार निकली, लेकिन वो भी असहज, छींटे पड़ रहे थे।
आँखों से आँसू बहने लगे।
“ये… ये सपना है…” मैं फुसफुसाया, “ये सच नहीं हो सकता… मैं गोपाल हूँ… ये मेरे साथ नहीं हो रहा…”
लेकिन वो ठंडा, भारी टाइटेनियम केज मेरे बीच में चिपका हुआ था। हर हलचल पर उसकी धातु की ठंडक मुझे याद दिला रही थी कि अब मेरा शरीर भी मेरा नहीं रहा।
बहुत शर्म, बहुत घुटन महसूस हो रही थी।
मैंने जल्दी से तैयार होकर घर से निकला। घड़ी में ठीक 11:50 पर मैं उस रेस्टोरेंट के अंदर दाखिल हुआ।
वही रेस्टोरेंट। जहाँ कुछ दिन पहले मैंने अनीता को घुटनों पर बैठकर प्रपोज किया था।
शितल पहले से वहाँ बैठी थी। काली साड़ी में, लाल लिपस्टिक लगाए, बालों में स्लीक बन। उसके बगल में नंदिनी और शिवानी भी बैठी थीं। तीनों की नजरें मुझे देखते ही चमक उठीं।
मैं उनके टेबल पर जाकर बैठ गया।
शितल ने घड़ी देखी और मुस्कुराई।
“वाह… 10 मिनट पहले आ गए? अच्छा लड़का। लेकिन तुमने मुझे 2 साल इंतज़ार कराया था, गोपाल। इसलिए आज से तुम्हारी सजा 2 साल + 40 हफ्ते हो गई।”
मेरा खून खौल गया।
मैंने दाँत पीसते हुए कहा, आवाज़ दबी हुई लेकिन गुस्से से भरी हुई,
“शितल, ये बहुत हो गया। अभी इस चीज को खोलो। मैं तुमसे शादी कर लूँगा, लेकिन ये केज… ये मत रखो।”
शितल ने धीरे-धीरे अपना हाथ टेबल के नीचे डाला और मेरी जाँघ पर रख दिया। फिर धीरे से दबाया। उसकी उँगलियाँ मेरी जाँघ को मसल रही थीं।
“आवाज़ नीची रखो, गंगू,” उसने मीठे लेकिन खतरनाक स्वर में कहा। “वरना मैं अभी यहाँ सबको बता दूँगी कि तुम्हारा लंड लॉक है… और उसकी चाभी मेरे ब्लाउज के अंदर, मेरी छाती के बीच में लटक रही है।”
मेरा गुस्सा एक पल में हवा हो गया।
मैं चुप हो गया। गर्दन झुक गई। हाथ मुठ्ठी में बंद थे, लेकिन अब उनमें ताकत नहीं बची थी।
शितल ने मेरी जाँघ पर हाथ फेरते हुए और नज़दीक आकर फुसफुसाया,
“समझ गए ना? अब खाना ऑर्डर करो… और मुस्कुराते रहो। मेरी सहेलियाँ देख रही हैं।”
नंदिनी और शिवानी दोनों हल्के से हँस पड़ीं।
मैं बस चुपचाप बैठा रहा। मेरे बीच में वो बेरहम केज हर साँस के साथ मुझे याद दिला रहा था कि अब मेरी जिंदगी शितल के कंट्रोल में है।
शितल ने कॉफी का कप साइड में रखा और मेरी आँखों में देखते हुए शांत, लेकिन दृढ़ स्वर में बोली,
“अब सुन लो ध्यान से, गंगू।
हर हफ्ते तुम मुझे रिपोर्ट दोगे — लिखकर। क्या किया, क्या सोचा, कितना दर्द सहा, सब।
हर रात मेरे सामने वीडियो कॉल पर खुद को पूरा दुल्हन बनाकर दिखाओगे — चोली, चुननी, मेकअप, घूंघट, सब।
हर महीने एक बार मेरे घर आकर मेरी चरण पूजा करोगे… सच्ची भक्ति से।
और कभी-कभी… जब मेरा मन करेगा, मैं तुम्हें अपनी सहेलियों के सामने इस्तेमाल करूँगी। जैसे कोई खिलौना।”
मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। गला इतना भर गया कि बोलते हुए भी आवाज़ टूट रही थी।
“शितल… प्लीज… मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। माफ कर दो मुझे। मैं सब कुछ मानने को तैयार हूँ… बस ये सजा… ये बहुत है।”
मैं रो पड़ा। टेबल पर सिर रखकर फफक-फफक कर रोने लगा। शर्म, दर्द, बेबसी — सब एक साथ उबल रहा था।
शितल ने आगे बढ़कर मेरे आँसू अपनी उँगलियों से पोंछे। उसके स्पर्श में नरमी थी, लेकिन आँखों में वही क्रूर संतोष था।
“अब रोने का समय खत्म हो गया, मेरी जान।
अब सहने का समय शुरू हुआ है।”
उसके बाद मेरी ज़िंदगी नर्क बन गई।
हर दिन नया यातनाकांड शुरू होता।
वे कभी-कभी बिना बताए मेरे घर आ जातीं। कभी शाम को, कभी आधी रात को। दरवाज़ा खुलते ही शितल की मुस्कान और उसकी सहेलियों की हँसी कमरे में भर जाती।
वे मुझे पूरा दिन दुल्हन बनाकर रखतीं। लाल या गुलाबी चोली-चुननी, भारी मेकअप, विग, नथनी, पायल — सब। घर के अंदर घूमते वक्त पायलों की घंटियाँ हर कदम पर बजतीं, मुझे हर पल याद दिलातीं कि मैं अब गोपाल नहीं हूँ।
शितल ने मेरे चेस्टिटी केज के अंदर एक vibrating plug डाल दिया। वो छोटा, लेकिन बहुत पावरफुल। शितल उसे अपने फोन से कंट्रोल करती।
ऑफिस में मीटिंग के दौरान अचानक वो कंपन शुरू हो जाता। मैं प्रेजेंटेशन देते हुए बीच में रुक जाता, पसीना छूटने लगता, आवाज़ काँपने लगती। सहेलियाँ वीडियो कॉल पर देखकर हँसतीं।
जब भी मेरा लिंग केज के अंदर खड़ा होने की कोशिश करता, वो बेरहम स्टील उस पर दबाव डालता। तेज दर्द होता, लेकिन राहत नाम की कोई चीज नहीं मिलती। बस तड़प और बढ़ती जाती।
रातें सबसे भयानक होतीं।
वे मुझे blindfold करके बिस्तर से बाँध देतीं। हाथ-पैर फैलाकर। फिर शुरू होता सिलसिला —
निप्पल्स पर मेटल क्लैंप्स लगाए जाते, जो हर हलचल पर खींचते।
जाँघों पर गर्म मोम डाला जाता, फिर एक-एक करके छीला जाता।
कभी-कभी शितल या नंदिनी strapon बाँधकर आतीं और pegging करतीं।
मैं चीखता, रोता, भीख माँगता…
“प्लीज शितल… बस कर दो… मैं मर जाऊँगा… माफ कर दो…”
लेकिन शितल सिर्फ़ ठंडे स्वर में हँसती।
“चीखो गंगू… जितना चीखना है चीख लो।
ये तो सिर्फ़ शुरुआत है। अभी तो 2 साल और 40 हफ्ते बाकी हैं।”
उसकी हँसी कमरे में गूँजती, जबकि मैं दर्द और अपमान से तड़पता रहता।
एक रात, जब मैं blindfold के अंधेरे में तड़प रहा था, नंदिनी मेरे कान के बहुत पास आई। उसकी गर्म साँस मेरे कान में पड़ रही थी। उसने धीरे से, लगभग प्यार से फुसफुसाया:
“याद है गोपाल… कॉलेज में हमने तुम्हें गंगू बनाया था? सब हँसते थे।
अब वो खेल हमेशा के लिए है, baby। अब तुम सचमुच गंगू हो। हमारी गंगू।”
उसकी हँसी मेरे कानों में गूँजी और दिल में चुभ गई।
एक दिन शितल ने मुझे मजबूर किया।
“अनीता को फोन करो। उसे अंतिम बार मिलने के लिए बुलाओ। अभी।”
मैंने रो-रोकर मना किया, लेकिन शितल ने चेस्टिटी केज में शॉक डिवाइस ऑन कर दिया। दो-तीन झटकों के बाद मैं टूट गया।
मैंने अनीता को फोन किया।
हम उसी पार्क में मिले जहाँ हम पहले घंटों बातें करते थे।
अनीता आई तो उसकी आँखें पहले से ही लाल थीं। जैसे कई रातों से रो रही हो। मुझे देखते ही वो फूट-फूट कर रो पड़ी।
“गोपाल… क्या हुआ है तुम्हें? प्लीज बताओ ना… मैं कुछ भी कर सकती हूँ।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
गला रुंध गया था। होंठ काँप रहे थे। आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। मैं बस उसे देखता रहा और रोता रहा। मेरे अंदर जितना दर्द था, वो शब्दों में नहीं आ रहा था।
अनीता ने आगे बढ़कर मेरे हाथ पकड़े, लेकिन मैं पीछे हट गया।
पीछे कहीं छिपकर शितल सब कुछ वीडियो में रिकॉर्ड कर रही थी।
घर लौटकर शितल ने मुझे बताया,
“अगर तुमने अनीता से कभी फिर संपर्क किया — मैसेज, कॉल, या मिलने की कोशिश भी की… तो मैं उसे वो वीडियो भेज दूँगी जिसमें तुम मेरे पैर चाट रहे हो। घुटनों पर, जीभ निकालकर। समझ गए?”
मैं पूरी तरह टूट चुका था।
अंदर कुछ नहीं बचा था। न उम्मीद, न हिम्मत, न मर्दानगी। सिर्फ़ डर और बेबसी रह गई थी।
आज…
मैं शितल के पैरों के पास घुटनों पर बैठा हूँ।
लाल चोली-चुननी पहने हुए। भारी पायलें पैरों में। चेस्टिटी का टाइटेनियम केज बीच में बेरहमी से जकड़ा हुआ। आँखों में आँसू भरे हुए।
शितल सोफे पर आराम से बैठी थी। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगी — जैसे कोई पालतू कुत्ता हो।
“अब बोलो गंगू…”
उसकी आवाज़ मीठी थी, लेकिन उसमें मालकिन वाली ताकत थी, “तुम किसके हो?”
मैंने आँखें नीचे कीं। आँसू गिरते रहे। काँपती, टूटी हुई आवाज़ में बोला,
“आपका…
सिर्फ़ आपका।”
शितल ने संतोष से मुस्कुराते हुए मेरे सिर को और सहलाया। फिर मेरी ठोड़ी उठाकर अपनी आँखों में देखा।
“बहुत अच्छे… मेरी गंगू।”
उसकी मुस्कान और भी गहरी हो गई। आँखों में एक नई चमक थी।
फोन पर आज्ञा

मैं घर के बेडरूम में अकेला बैठा काँप रहा था। शरीर में अभी भी डर की ठंडक दौड़ रही थी। टाइटेनियम केज मेरे बीच में भारी और ठंडा लग रहा था। हर साँस के साथ याद दिला रहा था कि मैं अब आजाद नहीं हूँ।
तभी फोन बजा।
शितल।
मेरा दिल जोर से उछला। काँपते हाथों से मैंने कॉल उठाया।
“ह… हेलो…”
“गंगू,” शितल की आवाज़ शांत लेकिन बेहद ठंडी और authoritative थी, “अब ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें instructions दे रही हूँ। हर एक बात माननी पड़ेगी। बिल्कुल वैसी जैसी मैं कह रही हूँ। वरना मैं चाभी फेंक दूँगी… और तुम जिंदगी भर इस केज में सड़ते रहोगे। समझ गए?”
मेरी आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी,
“हाँ… समझ गया…”
“अच्छा। सबसे पहले — सारे कपड़े उतार दो। शर्ट, पैंट, अंडरवियर… सब। बिल्कुल नंगा हो जाओ।”
मैंने फोन को स्पीकर पर रखा और काँपते हाथों से एक-एक करके सारे कपड़े उतार दिए। अब मैं पूरी तरह नंगा खड़ा था। बीच में सिर्फ वो चमकदार टाइटेनियम केज।
“हो गया?” शितल ने पूछा।
“जी… हो गया।”
“अच्छे। अब बेड पर जो सामान रखा है — लाल पैंटी, व्हाइट नेट पैंटीहोज़, ब्रा, और हाई हील्स — सब पहन लो। जल्दी।”
मैं बेड की तरफ मुड़ा। वहाँ सब कुछ सजा कर रखा हुआ था। मेरे हाथ बुरी तरह काँप रहे थे। मैंने पहले लाल पैंटी पहनी — वो बहुत टाइट थी। फिर व्हाइट नेट पैंटीहोज़ को अपनी टाँगों पर चढ़ाया। ब्रा को पीछे से हुक किया। आखिर में हाई हील्स पहने।
मैं अब पूरी तरह feminine कपड़ों में खड़ा था। शर्म से मेरा चेहरा जल रहा था।
“पहन लिया?” शितल की आवाज़ में हल्की हँसी थी।
“हाँ…” मैंने फुसफुसाकर कहा।
“बहुत अच्छे। अब बेड पर लेट जाओ। दोनों पैर बेड के पोस्ट से रस्सी से कसकर बाँध दो।”
मैं बेड पर लेट गया। काँपते हाथों से अपनी टाँगों को बेड के दोनों सिरों से रस्सी से बाँधा। रस्सी कस गई।
“हो गया?”
“हाँ…”
“अब मुँह में गैग लगाओ। अच्छे से कसकर। जब लग जाए तो मोबाइल पर 0 दबाना।”
मैंने बेड पर पड़ा गैग उठाया। मुँह में ठूँसकर पट्टा सिर के पीछे कस दिया।
“Mmmph…”
मैंने 0 दबाया।
शितल हँसी।
“अब दोनों हाथ सिर के ऊपर करके बेड के पोस्ट से हैंडकफ में लॉक कर दो। पहले एक हाथ, फिर दूसरा। जब दोनों लॉक हो जाएँ तो हैंडकफ हिलाकर आवाज़ करो।”
मेरा दिमाग चीख रहा था —
“मत कर गोपाल… एक बार हाथ लॉक हो गए तो तू पूरी तरह उसकी दया पर हो जाएगा… मत कर…!”
लेकिन डर और चाभी की धमकी मेरे ऊपर भारी पड़ गई।
मैंने पहला हाथ लॉक किया। फिर दूसरा।
क्लिक… क्लिक!
दोनों हाथ सिर के ऊपर बेड से कसकर लॉक हो गए।
मैं हैंडकफ हिलाकर आवाज़ करने लगा — “Mmmph… Mmmphhh!”
शितल जोर से हँस पड़ी।
“बहुत अच्छे… मेरी गंगू। अब तुम पूरी तरह बंधे हुए हो — लाल पैंटी, ब्रा, नेट पैंटीहोज़, हाई हील्स, मुँह में गैग… और बीच में मेरा केज।”
उसकी आवाज़ में संतोष था।
“मैं आ रही हूँ।
अगर कुछ गलत पाया — रस्सी ढीली, गैग ढीला, या कोई और चालाकी — तो मैं सीधा वापस चली जाऊँगी और चाभी साथ ले जाऊँगी। फिर जिंदगी भर केज में सड़ना।”
उसने एक पल रुककर कहा,
“रुको… मैं आ रही हूँ।”
कॉल कट गई।
अब कमरे में सिर्फ मेरी तेज़ साँसें और पायलों की हल्की खनक रह गई थी।
मैं पूरी तरह बंधा हुआ, स्त्री वेश में, लाचार पड़ा था… और शितल के आने का इंतजार कर रहा था।
गंगू का जन्म
आधे घंटे बाद दरवाजे की चाभी घूमने की आवाज आई।
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैं बिस्तर पर पूरी तरह बंधा हुआ था — लाल पैंटी, व्हाइट नेट पैंटीहोज़, ब्रा, हाई हील्स, मुँह में गैग। हाथ सिर के ऊपर हैंडकफ में लॉक, टाँगें बेड के पोस्ट से कसी हुईं।
शितल कमरे में आई।
उसने दरवाजा बंद किया और धीरे-धीरे मेरे पास आई। उसकी नजरें मेरे शरीर पर घूम रही थीं। वो कुछ पल चुपचाप मुझे देखती रही, फिर उसके होंठों पर एक संतुष्ट, क्रूर मुस्कान फैल गई।
“ओह माय गॉड…”
उसने हल्के से हँसते हुए कहा, “कितनी प्यारी लग रही हो गंगू… सच में।”

वो बेड के किनारे बैठ गई। उसकी साड़ी मेरी जाँघ को छू रही थी। उसने आगे झुककर मेरे गाल पर हाथ फेरा, फिर मेरी ब्रा के स्ट्रैप को उँगली से खींचकर छोड़ दिया।
“अब ध्यान से सुनो,” उसकी आवाज़ मीठी थी, लेकिन उसमें छिपा हुक्म साफ़ महसूस हो रहा था।
“आज से तुम्हारा नाम गंगू है। गोपाल मर गया। तुमने अपना manhood मुझे सौंप दिया है, इसलिए अब तुम लड़की हो। समझी?”
मैं गैग के कारण सिर्फ़ कराह सका — “Mmmph… mmmph…”
शितल ने मेरी ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई और मेरी आँखों में देखा।
“घर पर हमेशा फीमेल अटायर रहेगा। ड्रेस, स्कर्ट, ब्रा, पैंटीहोज़, पूरा मेकअप, नाखूनों पर लाल पॉलिश, हील्स। रात को नाइटी या सेक्सी लिंगरी। पूरे शरीर के बाल — हमेशा क्लीन शेव। एक भी बाल नहीं चाहिए।”
उसने मेरे गाल पर थपकी दी।
“मैंने पूरे घर में CCTV लगवा दिए हैं। बेडरूम, बाथरूम, किचन, लिविंग रूम — हर जगह। लाइव स्ट्रीम मेरे फोन पर 24 घंटे चलेगा। मैं जब चाहूँ, तुम्हें देखूँगी।”
मेरा शरीर काँप उठा।
“ऑफिस से ठीक 6 बजे घर आना। रात 10 बजे बेड पर। सुबह 5 बजे उठना। समझी?”
“Mmmph…”
शितल का चेहरा एकदम सख्त हो गया। उसने जोर का थप्पड़ मेरे गाल पर मारा।
चड़ाक!
“जवाब दो — Yes Mistress!”
मेरी आँखों में आँसू आ गए। गाल जल रहा था।
“Mmmph… Yes Mistress…” मैंने गैग के अंदर से काँपती हुई आवाज़ में कहा।
शितल संतुष्ट नहीं हुई।
उसने मेरे दाएँ गाल पर 10 जोरदार थप्पड़ मारे, फिर बाएँ गाल पर 10।
चड़ाक! चड़ाक! चड़ाक!
हर थप्पड़ के साथ मेरा सिर हिल रहा था। गाल लाल होकर जलने लगे। आँखों से आँसू बहने लगे।
शितल ने मेरे बाल पकड़े और सिर ऊपर किया।
“रोना मत। लड़कियों को रोना आता है, लेकिन मेरी गंगू को अभी सीखना है।”
उसने मेरी लाल पैंटी के ऊपर से केज पर हाथ फेरा और धीरे से दबाया।
Chapter 34: शॉपिंग का अपमान
शितल ने मेरे दोनों हाथों की हैंडकफ खोल दी।
“5 मिनट,” उसने घड़ी देखते हुए ठंडे स्वर में कहा। “कपड़े चेंज करके नीचे मेरी गाड़ी में आ जाना। देर हुई तो सजा बढ़ेगी।”
वो मुड़ी और कमरे से बाहर चली गई।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने जल्दी से ब्रा और हाई हील्स उतारे, लेकिन पैंटी और नेट पैंटीहोज़ उतारने में काफी समय लग गया। वो बहुत टाइट थे और पसीने से चिपक गए थे। आखिरकार मैंने उनके ऊपर ही ढीला जीन और टी-शर्ट पहन ली। अंदर अभी भी वही लाल पैंटी और नेट पैंटीहोज़ थे।
मैं सीढ़ियाँ उतरकर नीचे भागा।
शितल अपनी कार में बैठी थी। उसने टाइमर रोका और मुस्कुराई।
“2 मिनट लेट।”
उसने फोन पर कुछ नोट किया, “10 हफ्ते बढ़ गए। अब कुल 2 साल + 50 हफ्ते।”
मेरा दिल बैठ गया।
शितल ने मुझे सीधा nearest mall की एक novelty lingerie shop में ले गई। दुकान का नाम “Ruchi’s Secret” था। अंदर हल्का गुलाबी लाइटिंग और महँगी लिंगरी हर तरफ सजी हुई थी।
“Ruchi!” शितल ने मुस्कुराते हुए पुकारा।
एक 28-30 साल की आकर्षक लड़की मुस्कुराती हुई आगे आई।
“ये मेरा boyfriend गोपाल है,” शितल ने मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, “इसे अपनी लिंगरी खरीदनी है। अच्छे-अच्छे सेट दिखाओ। खासकर सेक्सी वाली।”
Ruchi ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और मुस्कुरा दी। उसकी आँखों में हैरानी और मज़ा दोनों थे।
मैं शर्म से ज़मीन में समाना चाहता था।
शितल ने मुझे दुकान के कोने में ले जाकर खड़ा कर दिया — दीवार की तरफ मुँह करके। फिर मेरी जीन का बटन खोला और जीन को घुटनों तक सरका दिया। अंदर की लाल पैंटी और नेट पैंटीहोज़ अब पूरी तरह दिख रहे थे।
“पैंटीहोज़ और पैंटी नीचे करो,” उसने कान में फुसफुसाया।
मैंने काँपते हाथों से दोनों को घुटनों तक सरका दिया। अब मेरी नंगी गांड और टाइटेनियम केज सब कुछ दिख रहा था।
“अगर हिला भी तो 50 थप्पड़,” शितल ने ठंडे स्वर में चेतावनी दी। “समझ गए?”
मैंने सिर हिलाया।
Ruchi मुस्कुरा रही थी। वो बार-बार मेरी तरफ देखकर हँसी रोक रही थी।
अगले दो घंटे नरक थे।
शितल ने मुझे दर्जनों ब्रा, पैंटी, क्यूट नाइटी, सेक्सी बेबीडॉल, स्टॉकिंग्स, गार्टर बेल्ट — सब पहनाए। हर सेट में Ruchi मेरे माप ले रही थी। शितल फोटो खींच रही थी — कभी सामने से, कभी पीछे से, कभी झुककर।
“ये वाली बहुत प्यारी लग रही है गंगू…”
“Ruchi, इसके cup size को note कर लो।”
हर नया सेट पहनते वक्त मुझे शर्म से मरने जैसा लग रहा था। Ruchi बार-बार “बहुत सुंदर” कह रही थी, जिससे मेरा गाल जल उठता।
आखिर में तीन बड़े-बड़े बैग भर गए — ब्रा-पैंटी के सेट, नाइटी, स्टॉकिंग्स, हील्स, मेकअप किट, और कुछ और चीजें जिन्हें देखकर मेरा चेहरा सफेद पड़ गया था।
जब हम दुकान से बाहर निकले तो मेरे हाथों में तीन भारी बैग थे। शितल मेरे बगल में चल रही थी, चेहरे पर विजयी मुस्कान।
“अब घर चलो गंगू… आज रात इन सारे नए कपड़ों को ट्राई करके मुझे वीडियो कॉल पर दिखाना पड़ेगा।”
मैं चुपचाप सिर झुकाए चल रहा था।
अंदर से एक आवाज़ बार-बार पूछ रही थी —
“कितना और सहना पड़ेगा…?”
24x7 नजर और नियम
घर लौटते ही शितल ने अपना काम शुरू कर दिया।
उसने दो टेक्नीशियन बुलाए और पूरे घर में CCTV कैमरे लगवा दिए। बेडरूम, बाथरूम, किचन, लिविंग रूम, यहां तक कि बालकनी में भी। हर कोना अब उसके फोन पर लाइव दिख रहा था।
“24 घंटे,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “कहीं भी, कुछ भी किया तो मैं देख लूँगी।”
टेक्नीशियन चले गए तो शितल ने मुझे घूरा।
“अब 10 बजे तक सब तैयार करना है। पूरे शरीर के बाल हेयर रिमूवल क्रीम से साफ करो। नाखूनों पर पिंक पॉलिश लगाओ। नई नाइटी पहनो। समय का ध्यान रखना।”
शितल चली गई, लेकिन मैं जानता था — वो अब भी अपने फोन पर मुझे देख रही होगी।
मैं बाथरूम में गया। हेयर रिमूवल क्रीम पूरे शरीर पर लगाई — छाती, हाथ, टाँगें, पीठ, निजी हिस्से — हर जगह। क्रीम जलने लगी। कई जगहों पर त्वचा इतनी संवेदनशील हो गई कि क्रीम उतारते वक्त चाकू की तरह कट लग गए। खून की बूँदें निकलने लगीं। जलन असहनीय थी।
फिर नहाया, शरीर को साफ किया। बाल रहित, चिकना शरीर अब और भी अजीब लग रहा था।
नाखूनों पर हल्का पिंक पॉलिश लगाया। हाथ काँप रहे थे, फिर भी मैंने कोशिश की।
आखिर में शितल द्वारा खरीदी गई एक पारदर्शी काली नाइटी पहनी। वो इतनी छोटी और transparent थी कि अंदर का टाइटेनियम केज साफ़ दिख रहा था।
ठीक 10 बजे मैं तैयार हो गया।
11 बजे शितल का वीडियो कॉल आया।
मैंने काँपते हाथों से कॉल उठाया। स्क्रीन पर उसका चेहरा आया — आराम से बिस्तर पर लेटी हुई, मुस्कुराती हुई।
“दिखाओ गंगू…” उसने आदेश दिया, “पहले नाखून… फिर पूरा शरीर… फिर नाइटी।”
मैंने एक-एक करके सब दिखाया। हाथ आगे किए, नाखून दिखाए। फिर नाइटी ऊपर करके बाल रहित शरीर, छाती, और बीच में चमकता हुआ केज दिखाया।
शितल ने संतोष से मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
“बहुत अच्छी… सच में बहुत अच्छी लग रही हो आज।”
उसने एक पल रुककर मुझे घूरा।
“अब सो जाओ। लाइट ऑन रखना। मैं देखूँगी। कल ऑफिस से सीधे घर आना। देर हुई तो पता है क्या होगा। मैं वेट कर रही हूँ।”
“जी… Mistress,” मैंने धीमी आवाज़ में कहा।
कॉल कट गया।
मैं बिस्तर पर लेट गया। बाल रहित चिकना शरीर, पिंक नाखून, transparent नाइटी, और बीच में वो बेरहम टाइटेनियम केज। पूरे घर में छिपे कैमरे — हर कोने से मुझे देख रहे थे।
रोशनी जल रही थी।
मैं करवट बदलते हुए रोने लगा। आँसू तकिये पर गिर रहे थे।
“ये मेरी जिंदगी… कैसे हो गई…”
रोते-रोते ही कब नींद आ गई, पता नहीं।
अब मेरी जिंदगी पूरी तरह शितल की हो चुकी थी।
सुबह का पहला अपमान

रात भर करवटें बदलते-बदलते कब नींद आई, पता ही नहीं चला। सपने में भी वही केज, वही नाइटी, वही शर्म और डर घूम रहे थे।
अचानक आँख खुली।
घड़ी में 5:40 हो चुके थे।
अलार्म बजकर बंद हो चुका था। मेरी रीढ़ की हड्डी में ठंडक दौड़ गई।
ठीक उसी वक्त मेरा फोन बज उठा।
शितल।
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। गला सूख गया। मैंने काँपते हाथों से फोन उठाया और जितना प्यार भरा, जितना submissive स्वर हो सकता था, उसमें बोला:
“Good morning… Mistress.”
कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर शितल की आवाज़ आई — शांत, लेकिन बर्फ की तरह ठंडी और धारदार।
“Good morning, गंगू। 10 मिनट लेट हो गए हो। लेकिन आज सुबह-सुबह मैं तुम्हारा मूड खराब नहीं करना चाहती। इसलिए सिर्फ़ 5 हफ्ते जुड़े। अब फटाफट उठो।”
मैं तुरंत बिस्तर से उठ खड़ा हुआ।
“तुम्हारे वॉशरूम की अलमारी में मेरी पुरानी ग्रे स्लीवलेस ड्रेस और ब्लैक लोअर पड़ी है। उसे पहनो। बालों में रबर बाँधो। येलो रबर ग्लव्स पहनो। और सबसे पहले — अपना टॉयलेट साफ करो। हाथ से।”
मेरा मुंह सूख गया। पेट में मरोड़ उठा।
“शितल… प्लीज… मुझे गंदगी से बहुत एलर्जी है… मैं नहीं कर पाऊँगा… प्लीज कुछ और काम दे दो…”
शितल की आवाज़ एकदम ठंडी हो गई।
“तीन…”
मेरा दिल बैठ गया।
“दो…”
“सॉरी! सॉरी Mistress! मैं कर रहा हूँ! अभी कर रहा हूँ!” मैं घबराकर चीख पड़ा।
मैंने फटाफट नाइटी उतारी, ग्रे स्लीवलेस ड्रेस और ब्लैक लोअर पहन लिया। बालों में रबर बाँधा, येलो रबर ग्लव्स हाथों में चढ़ाए और घुटनों के बल बाथरूम के सामने बैठ गया।
जैसे ही मैंने हाथ बढ़ाया, उबकाई आने लगी।
चार बार उल्टी हो गई। गला जल रहा था। आँखों से पानी बह रहा था। नाक से सलाइवा टपक रहा था। फिर भी मैंने काम जारी रखा।
तभी शितल का वीडियो कॉल आ गया। स्क्रीन पर उसका चेहरा दिख रहा था — वो आराम से कॉफी पीते हुए हँस रही थी।
“कितना ड्रामा है गंगू… अरे वाह! ग्लव्स निकालो। अब नाखूनों से साफ करो।”
मैं रोते हुए ग्लव्स उतार दिए। मेरे पिंक नाखून अब गंदगी में लग गए। हर दाग को नाखून से खुरच-खुरचकर साफ करने लगा। उल्टी आने के बावजूद, आँसू बहते हुए भी मैंने पूरा टॉयलेट चमका दिया।
शितल हँस-हँसकर ताली बजाती रही।
“बहुत अच्छे, गंगू। अब पूरे घर का झाड़ू-पोछा करो। वॉशिंग मशीन यूज नहीं करनी। सब हाथ से। कपड़े भी हाथ से धोना है।”
वो एक पल रुकी, फिर मीठे लेकिन खतरनाक स्वर में बोली,
“और हाँ… काम करते वक्त मुस्कुराते रहना। मैं कैमरे पर देख रही हूँ। अगर चेहरा उदास हुआ तो सजा बढ़ जाएगी।”
मैं घुटनों पर बैठा, आँखों से आँसू गिरते हुए, मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था।
“जी… Mistress…”
ऑफिस में छुपा दर्द
8:45 तक सारा काम खत्म कर चुका था। झाड़ू-पोछा, कपड़े धोना, टॉयलेट साफ करना — सब। शरीर थकान से चूर हो चुका था। मैंने जल्दी से नहाया। गर्म पानी से जलन वाली त्वचा पर थोड़ी राहत मिली।
हाथों के नाखूनों पर लगा पिंक नेल पॉलिश मैंने रिमूवर से अच्छे से साफ कर लिया, लेकिन पैरों के नाखून छोड़ दिए। उन्हें मोजे और जूते पहनकर छुपा लिया। उम्मीद थी कि ऑफिस में किसी को ध्यान नहीं जाएगा।
जैसे ही मैं घर से निकलने लगा, फोन बजा।
शितल।
मैंने तुरंत कॉल उठाया।
“6 बजे ठीक घर,” उसकी आवाज़ में कोई भाव नहीं था, “कोई बहाना, कोई मीटिंग, कोई ट्रैफिक — कुछ भी नहीं चलेगा। समझ गए?”
“जी… Mistress,” मैंने धीरे से कहा।
ऑफिस पहुँचा तो 9:45 हो चुके थे।
मैं केबिन में घुसा ही था कि दरवाजा खुला।
रोशनी अंदर आई।
रेड बैकलेस ड्रेस, जो उसकी पीठ की पूरी काठी दिखा रही थी। स्कर्ट इतनी छोटी कि जाँघें लगभग पूरी दिख रही थीं। हाई हील्स, परफेक्ट मेकअप और चमकती रेड लिपस्टिक। वो सचमुच सेक्स गॉडेस लग रही थी।
“Good morning Gopal” वो मुस्कुराई, “वीकेंड प्लान क्या है?”
मेरा दिल एक पल के लिए उछल पड़ा। पुरानी आदत। लेकिन उसी पल चेस्टिटी केज के अंदर मेरा लिंग खड़ा होने की कोशिश करते ही तेज़, भयानक दर्द हुआ। जैसे कोई सुई अंदर चुभो दी गई हो। मैंने मुँह पर हाथ रख लिया और कराहते हुए कुर्सी पर बैठ गया।
रोशनी ने आगे बढ़कर मेरी टेबल पर हाथ रखा। उसकी खुली पीठ और कर्वी बॉडी मेरी आँखों के सामने थी।
“कल ऑफिस के बाद शॉर्ट ट्रिप चलें? सिर्फ तुम और मैं। पास ही एक रिसॉर्ट है… swimming pool, candlelight dinner… क्या कहते हो?”
उसकी आँखों में वो चमक थी जो पहले मुझे पागल कर देती थी।
मेरा मन खुशी से उछल रहा था, लेकिन शितल की ठंडी आवाज़, उसकी धमकी, CCTV, केज — सब कुछ एक साथ याद आ गया। मेरा चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
मैंने गला साफ किया और काँपती आवाज़ में बोला,
“सॉरी रोशनी… कल मुझे अर्जेंट काम याद आ गया। रिलेटिव्स के घर जाना है।”
रोशनी का चेहरा तुरंत उतर गया। उसकी मुस्कान मुरझा गई। फिर भी उसने हिम्मत करके मुस्कुराने की कोशिश की।
“कोई बात नहीं… अगले वीकेंड?”
मैं बस सिर हिलाकर रह गया। कुछ बोल नहीं पाया।
रोशनी ने एक आखिरी बार मेरी तरफ देखा, फिर धीरे से केबिन से बाहर चली गई। उसके हाई हील्स की आवाज़ दूर होती गई।
मैं टेबल पर सिर रखकर बैठ गया।
केज के अंदर अभी भी हल्का दर्द हो रहा था। आँखों में आँसू आ गए थे।
6:10 की सजा
मैंने पूरा दिन घड़ी की सुइयों को घूरते-घूरते काटा। हर मिनट जैसे घंटा लग रहा था। दिल में बस एक ही धुन थी — 6 बजे तक घर पहुँचना है।
5:25 में मैंने ऑफिस से भागने की कोशिश की, लेकिन शुक्रवार का ट्रैफिक… वो मेरी किस्मत बन गया। गाड़ियाँ जैसे जाम होकर खड़ी थीं। मैं पसीने से तर, बार-बार घड़ी देखता रहा। हाथ काँप रहे थे।
आखिरकार घर पहुँचा — 6:10।
जैसे ही मैंने लाइट जलाई, मेरा फोन बज उठा।
शितल।
मेरा दिल एकदम से बैठ गया। मैंने काँपते हाथों से कॉल उठाया।
“हेलो… Mistress…”
“Gangu…” शितल की आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें छिपा गुस्सा साफ़ महसूस हो रहा था, “तुम लेट हो।”
“मिस्ट्रेस… सॉरी… बॉस ने अचानक मीटिंग पकड़ ली और फिर ट्रैफिक बहुत था… मैंने कोशिश की थी…”
“बहाने मत दो,” उसने बीच में ही काट दिया। “रूल्स रूल्स हैं। तुमने मुझे 10 मिनट इंतज़ार कराया। अब सजा मिलेगी।”
मैं तुरंत घुटनों के बल बैठ गया। फोन को कान से लगाए हुए, गिड़गिड़ाते हुए बोला,
“प्लीज Mistress… और वीक नहीं… थप्पड़ भी मत दीजिए… कुछ और सजा दे दीजिए… मैं कुछ भी कर लूँगा…”
दूसरी तरफ शितल जोर से हँसी।
“ठीक है। इस पूरे वीकेंड — कोई टीवी नहीं, कोई मूवी नहीं, कोई म्यूजिक नहीं। आज का डिनर भी कैंसल। अब फटाफट कपड़े बदलो। सिर्फ ब्रा और पैंटी पहनो। हाई हील्स पहनो। फिर बेड पर लेट जाओ।”
उसने एक-एक करके निर्देश दिए:
“दोनों पैर बेड के पोस्ट से कसकर बाँधो।
हाथ सिर के ऊपर करके हैंडकफ से लॉक करो।
आँखों पर ब्लैक पट्टी बाँध लो।
मुँह में गैग भी लगा लो।”
मैंने रोते हुए सब कुछ किया।
पहले कपड़े उतारे। सिर्फ एक काली ब्रा और मैचिंग पैंटी पहनी। फिर हाई हील्स। बेड पर लेटकर अपने पैर बेड के दोनों सिरों से रस्सी से कसकर बाँधे। हाथ सिर के ऊपर ले जाकर हैंडकफ लगाए।
क्लिक… क्लिक।
फिर आँखों पर मोटी ब्लैक पट्टी बाँध दी। आखिर में मुँह में गैग ठूँसकर पट्टा कस दिया।
“Mmmph…”
अब मैं पूरी तरह अंधेरे में था।
हाथ सिर के ऊपर लॉक, टाँगें चौड़ी करके बँधी हुई, सिर्फ ब्रा-पैंटी और हाई हील्स में। बीच में वो बेरहम टाइटेनियम केज। पूरे घर में लगे CCTV मुझे हर कोण से देख रहे थे।
अंधेरा।
सन्नाटा।
शर्म।
डर।
और बेबसी।
मैं अकेला, बंधा हुआ, लाचार पड़ा था… और शितल मुझे देख रही थी।
अंधेरे में इंतजार
मेरा पूरा शरीर बंधे हुए हालत में बुरी तरह काँप रहा था। अंधेरे में आँखों पर पट्टी बँधी होने के कारण हर छोटी-सी आवाज़ और ज्यादा भयानक लग रही थी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
मैं मन ही मन बार-बार सोच रहा था —
“ये चुदैल… आज मुझे क्या करने वाली है? कितना और सहना पड़ेगा…?”
तभी मुख्य दरवाजे की चाभी घूमने की आवाज आई।
टक-टक-टक…
शितल के हाई हील्स की तेज़, आत्मविश्वास भरी आवाज़ धीरे-धीरे मेरे बेडरूम की तरफ बढ़ रही थी। हर कदम के साथ मेरी साँस और तेज़ हो रही थी।
वो कमरे में आई। दरवाजा बंद होने की आवाज हुई। फिर उसके हाई हील्स की खनक मेरे बिस्तर के बिल्कुल पास आकर रुकी।
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर मैंने महसूस किया — उसके ठंडे, नरम हाथ ने मेरे नंगे पेट पर धीरे से फेरा। उँगलियाँ हल्के-हल्के नीचे की तरफ सरक रही थीं।
“गंगू…”
उसकी आवाज़ मीठी थी, लेकिन उसमें छिपा ज़हर साफ़ महसूस हो रहा था, “आज मैं तुम्हें बहुत प्यार से सजा दूँगी।”
मैं छटपटाया। गैग के अंदर से दबी हुई कराह निकली — “Mmmph… mmmphhh…”
शितल ने हल्के से हँसकर मेरे चेस्टिटी केज के ठीक ऊपर एक vibrating plug रख दिया। फिर अपने फोन पर कुछ टच किया।
बzzz… BZZZZ…
तीव्र, तेज कंपन शुरू हो गया।
प्लग सीधे केज पर दबाव डाल रहा था। कंपन मेरे सबसे संवेदनशील हिस्से तक पहुँच रहा था, लेकिन केज की वजह से कोई राहत नहीं मिल रही थी। बस दर्द और तड़प बढ़ती जा रही थी। जैसे कोई हजार सुइयाँ एक साथ चुभ रही हों।
मेरा पूरा शरीर ऐंठ गया। मैं गैग के अंदर चीख रहा था। “MMMMMPHHHH!!! MMMMPHHHH!!!”
शितल मेरे बिल्कुल कान के पास झुक आई। उसके होंठ मेरे कान को छू रहे थे। उसकी गर्म साँस मेरे गाल पर पड़ रही थी।
“रो…”
उसने धीरे-धीरे फुसफुसाया, “जितना रोना है रो लो गंगू… जितना मन करे चीख लो।
लेकिन याद रखो —
ये सिर्फ़ शुक्रवार की रात है।
पूरे वीकेंड अभी बाकी है।”
उसकी हँसी कमरे में गूँज उठी।
वो vibrating plug का intensity और बढ़ा रही थी, कभी कम कर रही थी, फिर अचानक तेज कर देती। मैं बिस्तर पर तड़प-तड़पकर छटपटा रहा था। रस्सियाँ मेरे हाथ-पैरों में गड़ रही थीं। आँखों पर पट्टी के नीचे आँसू बह रहे थे।
शितल मेरे सिर पर हाथ फेरती रही, जैसे कोई प्यारा पालतू हो।
“आराम से… आराम से मेरी जान।
आज तो सिर्फ शुरुआत है।”
डायपर, दूध और साड़ी की सजा
एक घंटे बाद...
मेरा पूरा शरीर थकान, दर्द और कंपन से चूर हो चुका था। vibrating plug अभी भी बीच-बीच में ऑन हो रहा था, जिससे तड़प और बढ़ जाती। अंधेरे में आँखों पर पट्टी बँधी होने के कारण समय का भी पता नहीं चल रहा था।
तभी मुख्य दरवाजा खुला।
शितल के हाई हील्स की तेज़ खनक कमरे में गूँजी।
मेरा चेहरा डर से पीला पड़ गया। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था — आँखों पर काली पट्टी, मुँह में गैग, हाथ सिर के ऊपर लॉक, पैर बेड से बंधे, सिर्फ काली ब्रा और पैंटी में।
शितल मेरे बिस्तर के पास आई। कुछ पल तक चुपचाप खड़ी रही। फिर उसने मेरे पेट पर हाथ रखा और नीचे सरकाते हुए मेरे डायपर को छुआ।
“ओह…” वो हल्के से हँसी, “डरो मत गंगू… मैं इतनी बुरी नहीं हूँ। सबसे पहले तुम्हारा डायपर चेंज कर देती हूँ।”
मुझे शर्म से आग लग गई। मैं छटपटाया, लेकिन बंधे होने के कारण कुछ नहीं कर पाया।
शितल ने पुराना गीला डायपर खोल दिया। केज की वजह से मेरे प्राइवेट पार्ट्स को साफ करते वक्त वो जानबूझकर धीरे-धीरे कर रही थी। हर स्पर्श शर्मनाक और अपमानजनक था। उसने गीले वाइप्स से साफ किया, पाउडर लगाया और नया डायपर पहना दिया।
“देखा? कितनी अच्छी लड़की हो तुम,” उसने पाउडर लगाते हुए कहा।
फिर उसने बैग से दूध की बोतल निकाली। गैग हटाया और बोतल का निप्पल मेरे मुँह में ठूँस दिया।
“चूस-चूस कर पियो। लड़कियों को ये काम अच्छे से आना चाहिए। दोनों बोतल खत्म करो।”
मैं चूसता रहा। गर्म दूध गले से नीचे उतर रहा था। आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। शर्म, गुस्सा और बेबसी का मिश्रण था।
शितल ने कुर्सी खींचकर बेड के पास बैठ गई। उसकी आवाज़ अचानक गुस्से से भर गई।
“तो तुमने अपने दोस्त अमित यादव को बताया कि मैंने तुम्हें धोखा दिया? मैंने ब्रेकअप किया? तुम जानते हो न कि मैं रिलेशन में सच और विश्वास चाहती हूँ?”
मेरा खून ठंडा हो गया।
“अब तुम बताओ — इस समस्या को हम कैसे सॉल्व करें?”
फिर खुद ही बोली, “एक काम करती हूँ — मैं ही अमित को कॉल करती हूँ और सब सच बता देती हूँ। या फिर उसे यहीं बुला लेती हूँ। तीनों बैठकर सॉल्व कर लेंगे।”
मेरा दिल बैठ गया। मैं बुरी तरह छटपटाने लगा।
“Mmmmmph! Mmmmmphhh!!”
शितल मेरे फोन में अमित का नंबर ढूँढ रही थी।
“मिल गया।”
जैसे ही उसने डायल बटन दबाया, मैं पागलों की तरह छटपटाने लगा — “MMMMMPHHH!!! MMMMMPHHHH!!!”
शितल हँसी।
“एक मिनट अमित… लगता है किसना कुछ कहना चाहता है।”
उसने बोतल निकाली, गैग हटाया और फोन मेरे कान से लगा दिया।
मैं घबराकर, रोते हुए, टूटी हुई आवाज़ में बोला,
“हाय अमित… गोपाल बोल रहा हूँ। मैंने तुमसे जो कहा था वो गलत था यार… शीतल ने मुझे धोखा नहीं दिया… मैंने ही उसे धोखा दिया था। मैं कायर था… बहुत बड़ा कायर। सॉरी यार… सच में सॉरी।”
अमित ने कुछ समझे बिना बस “ठीक है” कहा और कॉल काट दिया।
शितल फोन रखकर मेरे चेहरे के ऊपर झुक गई। उसकी आँखों में विजयी चमक थी।
“बहुत अच्छे, गंगू…”
उसने मेरे गाल पर प्यार से थपकी दी, “सच बोलना कितना आसान होता है ना?”
फिर उसने मेरे मुँह में दोबारा बोतल ठूँस दी।
“अब चूसो। और याद रखो — झूठ बोलने की सजा बहुत भारी होती है।”
साड़ी वाली दुल्हन

शितल ने मेरे हाथों की हैंडकफ खोली और पैरों की रस्सियाँ ढीली कीं। मैं थोड़ा सा राहत महसूस कर ही रहा था कि उसने मुस्कुराते हुए कहा,
“अब कुछ और मज़ा करते हैं।”
उसने बैग से एक गोल्डन ब्लाउज निकाला। बहुत टाइट और बैकलेस। मैं चुपचाप उठकर बैठ गया और उसे पहनने लगा। हुक लगाने में हाथ काँप रहे थे, पीछे तक नहीं पहुँच पा रहा था।
शितल मेरे पीछे आई। उसने धीरे-धीरे हुक लगाने शुरू किए। हर हुक के साथ ब्लाउज मेरी छाती पर और कसता जा रहा था।
“पीठ काफी खुली है…” उसने मेरी नंगी पीठ पर उँगली फेरते हुए कहा, “बहुत अच्छा लग रहा है।”
फिर उसने पेटीकोट पहनाया। उसके बाद हल्की पिंक-येलो प्रिंटेड साड़ी। साड़ी को उसने बेहद खूबसूरती से लपेटा। पल्लू को कंधे पर पिन से फिक्स कर दिया।
अब वो मुझे मेकअप टेबल के सामने ले गई।
मेरे बालों में सिंगल ब्रेड बनाई, बीच में मोटी मोती वाली मांगटिका लगाई। लाल लिपस्टिक लगाई — इतनी चमकदार कि खुद देखकर शर्म आ रही थी।
“अब खड़े हो।”
मैं काँपते हुए खड़ा हो गया।
शितल ने एक कदम पीछे हटकर मुझे सर से पैर तक देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“बहुत अच्छे लग रहे हो गंगू… सच में।”
उसने मेरे गाल पर हाथ फेरा, “अगर मैं लड़का होती तो तुम्हारा पूरा फायदा उठा लेती… लेकिन मैं लड़की हूँ और सीधी हूँ।”
फिर उसकी मुस्कान अचानक बदल गई।
उसने मेरे दोनों हाथ पीछे करके कसकर हैंडकफ लगा दिए। आँखों पर मोटी लाल पट्टी बाँध दी। अब मैं अंधेरे में था।
“अब दिन भर ऐसे ही रहोगे। बैठना नहीं है। न बेड पर, न ज़मीन पर। खड़े रहना है या चलते रहना है।”
उसने मेरे पैरों में घुँघरू वाली भारी पायल बाँधी। फिर ब्लैक पेंसिल हील्स पहनाए और स्ट्रैप्स को छोटे तालों से लॉक कर दिया।
“अब चलो… प्रैक्टिस करो।”
मैं लड़खड़ाता हुआ चलने लगा। एड़ियाँ मुड़ रही थीं। हर कदम पर घुँघरू बज रहे थे — छन-छन-छन। साड़ी का पल्लू हिल रहा था। कई बार मैं गिरते-गिरते बचा। शितल जोर-जोर से हँस रही थी।
“प्रैक्टिस खत्म।”
उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा।
“अब असली टाइम। मैं जा रही हूँ। दिन भर खड़े रहना या चलते रहना। बैठना मत। मैं कैमरे पर देख रही हूँ। कोई चालाकी की, या कहीं बैठ गए, तो समझ लो।”
वो मेरे कान के पास आई और धीरे से फुसफुसाई,
“अच्छी लड़की बनकर रहना, गंगू।”
फिर उसके हाई हील्स की आवाज़ दूर होती गई। दरवाजा बंद हुआ।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अब मैं अंधेरे में, साड़ी-ब्लाउज पहने, हाथ पीछे हैंडकफ में, आँखों पर पट्टी, पैरों में घुँघरू और लॉक हील्स के साथ खड़ा था।
हर छोटी सी हलचल पर घुँघरू बज रहे थे। पैरों में दर्द होने लगा था। लेकिन बैठने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
कैमरे… हर कोने से मुझे देख रहे थे।
Chapter 42: खड़े रहने की यातना
शितल चली गई।
दरवाज़े के बंद होने की आवाज़ के बाद पूरे घर में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ मेरी तेज़-तेज़ साँसें और कभी-कभी पायलों के घुँघरुओं की हल्की खनक सुनाई दे रही थी।
मैं अकेला था।
पूरी तरह अंधेरे में — आँखों पर लाल पट्टी बँधी हुई। हाथ पीछे कसकर हैंडकफ में लॉक। शरीर पर गोल्डन ब्लाउज, हल्की पिंक-येलो साड़ी, पल्लू कंधे पर पिन से फिक्स। पैरों में ब्लैक पेंसिल हील्स, जिनके स्ट्रैप्स ताले से लॉक थे।
पूरे घर में कैमरे — हर कोने से मुझे देख रहे थे।
पहले 30 मिनट मैं किसी तरह खड़ा रहा। लेकिन धीरे-धीरे पैर काँपने लगे। एड़ियाँ जलने लगीं। कमर में तेज़ दर्द उठने लगा। पसीना मेरी पीठ पर बह रहा था।
मैं हिल-हिलकर चलने लगा। हर कदम पर घुँघरू बज रहे थे — छन-छन-छन। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था। पेंसिल हील्स की वजह से बैलेंस बनाए रखना मुश्किल हो रहा था।
दो घंटे बाद मेरी टाँगें बुरी तरह लरज रही थीं। घुटनों में दर्द हो रहा था। मैंने दीवार का सहारा ले लिया। सिर दीवार से टिका दिया।
तभी मेरा फोन बजा।
शितल।
मैं डर से काँप उठा।
“दीवार का सहारा लिया?” उसकी आवाज़ में ठंडी नाराज़गी थी। “10 हफ्ते बढ़ गए। फिर से सीधे खड़े हो जाओ।”
मैं फूट-फूट कर रो पड़ा। आवाज़ टूट रही थी।
“मिस्ट्रेस… प्लीज… मेरी टाँगें… बहुत दर्द हो रहा है… मैं खड़ा नहीं रह पा रहा… माफ कर दो…”
“रो,” शितल ने ठंडे स्वर में कहा, “जितना रोना है रो लो। लेकिन खड़े रहो। शाम तक। अगर एक बार भी बैठे या दीवार का सहारा लिया तो और सजा बढ़ जाएगी।”
कॉल कट गया।
मैं रोता रहा। आँसू पट्टी के नीचे से बहकर गालों पर गिर रहे थे। फिर भी मैंने दीवार से अलग होकर खुद को सीधा किया। टाँगें काँप रही थीं, लेकिन मैं खड़ा रहा।
शाम को जब शितल घर आई, तो मैं पूरी तरह टूट चुका था।
पसीने से तर। आँसुओं से भीगा। साड़ी का पल्लू इधर-उधर खिसक गया था। मेकअप बह गया था। टाँगें लरज रही थीं। फिर भी मैं खड़ा था।
शितल मेरे पास आई। उसने मेरी ठोड़ी को अपनी उँगलियों से ऊपर उठाया।
“अब समझ आएगा…”
उसकी आवाज़ धीमी लेकिन बहुत गहरी थी, “धोखा देने की कीमत?”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। सिर्फ़ सिर हिला दिया। आँखों पर पट्टी के नीचे से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
शितल ने मेरी पट्टी खोल दी।
मेरी लाल, सूजी हुई आँखें उसकी आँखों से मिलीं।
वो मुस्कुराई। एक ठंडी, संतुष्ट मुस्कान।
“अभी तो शुरुआत है गंगू…
अभी तो बहुत कुछ बाकी है।”
उसने मेरे गाल पर धीरे से हाथ फेरा और फुसफुसाया,
“स्वागत है तुम्हारा… अपनी नई ज़िंदगी में।”
छुपी चाभी और छुपा बदला
शितल जाते समय मेरी आँखों पर लाल पट्टी को और कसकर बाँध गई थी। उसकी आवाज़ में पूरा यकीन था कि मैं पूरी तरह उसकी दया पर हूँ।
लेकिन मैं भी कम नहीं था।
उसके सैंडल की आवाज़ दूर होती गई। मुख्य दरवाज़ा बंद हुआ। ताला लगने की आवाज़ आई।
जैसे ही सब शांत हुआ, मैंने तुरंत एक्शन लिया।
पट्टी के नीचे से जो थोड़ा-बहुत धुंधला दिख रहा था, उसमें बैलेंस बनाते हुए मैं बेड की तरफ बढ़ा। जानबूझकर लड़खड़ाया और जोर से पेट के बल गिरा। गिरते वक्त मेरे सिर का एक हल्का सा झटका लगा और पट्टी ढीली हो गई।
मैंने फटाफट पट्टी हटाई।
अब हाथ खोलने थे।
मुझे याद आया — जब शितल पट्टी बाँध रही थी, तब वो बीच में वॉशरूम गई थी। मैंने उस वक्त ही चाबी का प्लान बना लिया था।
मैं खड़ा हुआ और वॉशरूम पहुँचा। मुँह से ही दरवाज़ा खोला।
“भगवान… थोड़ी मदद कर दो…” मैंने मन ही मन प्रार्थना की।
कपबोर्ड खोला।
वहाँ थी — मेरी पुरानी हैंडकफ की चाभी।
मैंने गहरी साँस ली। दिल जोरों से धड़क रहा था। डर भी लग रहा था — अगर शितल को पता चल गया तो जो सजा मिलेगी, वो सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते थे।
लेकिन फिर मैंने सोच लिया — बहुत हो चुका।
मैं बेड पर बैठ गया, आँखें बंद कीं, शांत दिमाग से कोशिश की।
क्लिक!
हैंडकफ खुल गया।
मेरे हाथ आजाद हो गए।
मैं तुरंत उठा। किचन में भागा। कल रात से कुछ नहीं खाया था। भूख से पेट चिपक रहा था। फ्रिज खोला, ब्रेड निकाली, मोटा-मोटा बटर-जैम लगाया और दो मिनट में तीन स्लाइस ठूँस ली।
अब असली काम।
चेस्टिटी केज।
मुझे याद आया — मैंने शितल को एक बार अपना सीक्रेट लॉकर बताया था। स्टोररूम में।
मैं डरते-डरते स्टोररूम गया। लॉकर खोला। दस्तावेजों के नीचे, एक छोटे बॉक्स में — वो गोल्डन चाभी चमक रही थी।
मेरा हाथ काँप रहा था।
मैंने केज का ताला खोला।
क्लिक।
केज खुल गया।
मैं वॉशरूम भागा। चार बार पूरी ताकत से राहत ली। इतनी राहत कि आँखें बंद हो गईं। शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ गई।
जब शांत हुआ तो घड़ी देखी — सिर्फ़ 30 मिनट हुए थे शितल के जाने को।
मैंने गहरी साँस ली।
मेरा दिमाग अब तेजी से चलने लगा था।
बदला।
अब मुझे बदला लेना है।
शितल ने मुझे जो यातनाएँ दी हैं, वो मैं उसे लौटाऊँगा। लेकिन सोच-समझकर। चुपके से। बिना जल्दबाजी के।
मैंने आईने में खुद को देखा — साड़ी में, मेकअप बिखरा हुआ, आँखों में आग।
मैं फुसफुसाया,
“अब खेल उलटने वाला है, शितल…”
Chapter 44: बीमार होने का नाटक
शितल के जाते ही मैंने तेजी से काम शुरू किया।
साड़ी ठीक की, पल्लू को सही जगह पर फिक्स किया। आँखों पर लाल पट्टी दोबारा कसकर बाँध ली। हाथ पीछे करके सोफे पर बैठ गया — बिल्कुल वैसी ही मुद्रा में जैसे मैं बंधा हुआ था। सिर झुकाए, कमजोर दिखने की कोशिश की।
ठीक 45 मिनट बाद मेरा फोन बजा।
शितल।
मैंने कमजोर, रुआँसी आवाज़ में कॉल उठाया।
स्क्रीन पर उसकी आवाज़ गुस्से से भरी हुई आई, “गंगू! तुम सोफे पर कैसे बैठ गए?! उठो! अभी उठो!!”
मैंने बहुत कमजोर, टूटी हुई आवाज़ में कहा,
“मिस्ट्रेस… मुझे बहुत तेज चक्कर आ रहे हैं… कुछ दिख नहीं रहा… सिर घूम रहा है… कमजोरी हो रही है… पूरा शरीर जल रहा है… बुखार भी लग रहा है… प्लीज… जल्दी आ जाओ… डॉक्टर के पास ले चलो… मैं गिरने वाला हूँ…”
दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर शितल की आवाज़ अचानक नरम पड़ गई।
“मेरा मन नहीं कर रहा था… लेकिन मैं अभी भी तुमसे प्यार करती हूँ। ठीक है… मैं आ रही हूँ।”
45 मिनट बाद दरवाज़ा खुला।
शितल तेजी से अंदर आई। उसके हाथ में सेब का पैकेट था।
“रोको… मैं काटकर लाती हूँ,” उसने चिंतित स्वर में कहा।
वो मेरे पास आई, मेरी आँखों की पट्टी धीरे से खोली।
जैसे ही उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं, उसके चेहरे पर भाव बदल गए। उसकी आँखें भर आईं।
“I am sorry गोपाल ”
उसकी आवाज़ काँप रही थी, “मैंने बहुत गलत किया। बहुत ज्यादा गलत किया। मैं तुमसे सचमुच बहुत प्यार करती हूँ।”
उसने मुझे जोर से गले लगा लिया। उसके आँसू मेरी गर्दन पर गिर रहे थे।
मैंने भी उसे दोनों हाथों से कसकर गले लगा लिया। उसके बालों में अपना चेहरा छुपाया और धीरे से फुसफुसाया,
“Sorry शीतल मैंने भी बहुत गलत किया।
I love you.”
हम दोनों कुछ पल ऐसे ही चुपचाप रोते रहे। फिर एक साथ हँस पड़े। फिर दोबारा जोर से गले लग गए।
शितल मेरे चेहरे को दोनों हाथों में थामकर बोली, “तुम्हें पता है… ये पूरा प्लान मैंने और अनीता ने मिलकर बनाया था। तुम्हें सबक सिखाने के लिए।”
मैं मुस्कुराया, आँखों में अभी भी आँसू थे।
“और मैंने आखिरी 30 मिनट में तुम्हें सबक सिखाने का प्लान बना लिया था।”
हम दोनों फिर हँस पड़े।
उसने मेरे माथे पर किस किया और फुसफुसाया,
“अब सच में नई शुरुआत?”
मैंने उसका हाथ थामा और कहा,
“अब सच में… नई शुरुआत।”
चोली-चुननी वाली डेट

शितल ने अपनी उँगलियों से मेरे आँसू पोंछे। उसके होंठों पर एक शरारती मुस्कान थी।
“तो तुमने खुद को पहले ही खोल लिया था… चीटर कहीं के!”
हम दोनों एक साथ हँस पड़े। हँसी इतनी जोर की थी कि आँखों में फिर से आँसू आ गए — इस बार खुशी के।
फिर शितल ने मेरे गाल पर हाथ रखा और नरम स्वर में कहा,
“चलो, मूवी देखने चलते हैं।”
मैं कपड़े चेंज करने के लिए उठा ही था कि उसने मेरी कलाई पकड़ ली।
“कहाँ जा रहे हो? इतनी जल्दी क्या है? अभी तो तुम्हारे इस अवतार के साथ कुछ अच्छे पल जीने दो।”
उसने बैग से एक हल्की गुलाबी कॉटन चोली-चुननी निकाली। बहुत सॉफ्ट और feminine।
“जल्दी पहनो।”
मैंने उसके सामने ही साड़ी उतारी और चोली-चुननी पहन ली। शितल ने मेरे हाथ में डायमंड ब्रेसलेट डाला, बालों को सेट किया, गालों पर हल्का ब्लश और होंठों पर हल्की पिंक लिपस्टिक लगाई।
“परफेक्ट,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मूवी हॉल के बाहर हम दोनों पहुँचे।
मैं गुलाबी चोली-चुननी में, पायलें पैरों में, हल्का मेकअप लगाए, और शितल मेरे हाथ को कसकर पकड़े हुए थी। लोग घूर रहे थे। कुछ हैरान, कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ फुसफुसाते हुए। लेकिन शितल को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वो मेरे हाथ को और भी मजबूती से थामे हुए थी।
अंदर हॉल में अंधेरा हुआ तो उसने मेरी जाँघ पर अपना हाथ रख दिया। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे सहला रही थीं। फिर उसने मेरे कान में फुसफुसाया, उसकी गर्म साँस मेरे कान को छू रही थी —
“आज रात घर जाकर… तुम फिर से मेरी गंगू बनोगे… लेकिन इस बार प्यार से।”
मैंने सिर्फ़ सिर हिला दिया। गले में कुछ अटक रहा था।
सारी दर्द, सारी यातनाएँ, सारा अपमान, वो भयानक केज, वो घंटों खड़े रहना — सब एक पल में जैसे धुंधला पड़ गया।
क्योंकि शितल अब भी मुझसे प्यार करती थी।
और मैं… अब भी पूरा का पूरा उसका था।
मूवी चल रही थी, लेकिन हम दोनों की नजरें स्क्रीन पर नहीं, एक-दूसरे पर थीं।
शितल ने मेरे हाथ को और कसकर दबाया।
मैंने भी उसके हाथ को थामा और मन ही मन कहा —
“चाहे जितनी सजाएँ दो… बस अंत में तुम्हारे पास ही लौट आऊँ।”
मेरा नाम गोपाल जांभुलकर है।
उस शाम शितल मेरे पास आई। उसकी आँखों में एक अजीब-सी नरमी थी।
“गोपाल… बस एक आखिरी बार। मुझे एक बार फिर तुम्हें पूरी तरह राधा बनाकर देखना है। सिर्फ एक बार। उसके बाद कभी नहीं कहूँगी।”
मैंने चुपचाप सिर हिला दिया।
उसने beauty parlor बुक कर लिया। शाम को जब हम वहाँ पहुँचे, तो उसकी सारी सहेलियाँ पहले से मौजूद थीं — शिवानी, नंदिनी, अंजलि, रीना, आश्विनी और प्रतिक्षा।
सबने मुझे घेर लिया।
अगले तीन घंटे...
वे मुझे नया नवेली दुल्हन बनाने में लगी रहीं।
लंबे, घने विग लगाए गए। कंधों से कमर तक लहराते बाल। ब्राइडल बन बनाया गया। नकली ब्रेस्ट्स चिपकाए गए। नाक में बड़ी नथनी, कानों में भारी झुमके।
फिर शितल ने खुद मेरे चेस्टिटी केज के ऊपर एक soft, realistic artificial vagina चिपका दी। अब बाहर से देखने पर कुछ भी नजर नहीं आता था।
लाल-गुलाबी ब्राइडल साड़ी, भारी ब्लाउज, पेटीकोट। हाथों में मेहंदी, काँच की चूड़ियाँ, कमर में कटार, गले में हार, माथे पर मांगटिका। पैरों में मेहंदी और हाई हील्स।
पूर्ण मेकअप — गाढ़ी लिपस्टिक, आइलाइनर, ब्लश, आँखों में काजल।
जब आईना दिखाया गया, तो मैं खुद को देखकर स्तब्ध रह गया।
सामने एक खूबसूरत, शर्माती, नवेली दुल्हन खड़ी थी।
शितल मेरे पीछे आई, मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोली,
वे मुझे मूवी थिएटर ले जाएंगे ,मैंने तुम्हारे लिए एक सप्राइज़ प्लान किया है
मैं साड़ी में, घूंघट में, भारी ज्वेलरी में, हील्स में चल रहा था। लोग घूर रहे थे, फुसफुसा रहे थे, लेकिन शितल मेरा हाथ थामे हुए थी।
अंदर अंधेरे में हम बैठे। शितल ने मेरा हाथ अपनी गोद में रख लिया। पूरी फिल्म भर वो मेरे हाथ को सहलाती रही।
फिल्म खत्म होने के बाद बाहर निकलते वक्त शितल ने कहा,
“तुम यहीं खड़े रहो। मैं गाड़ी ले आती हूँ।”
और वो चली गई।
मैं अकेला खड़ा था — पूर्ण दुल्हन बनकर, सड़क पर, भीड़ के बीच।
तभी...
“गोपाल...”
एक नरम, परिचित आवाज़।
मैं मुड़ा।
अनीता।
वही साधारण, दो चोटी वाली, सरल, प्यारी अनीता। सफेद सलवार कमीज में। कोई मेकअप नहीं। सिर्फ आँखों में आँसू।
वो मेरे पास आई। उसका हाथ काँप रहा था। उसने मेरे घूंघट को हल्का-सा हटाया और मेरे चेहरे को छुआ।
“ये... सब... मेरे लिए ही किया ना?”
उसकी आवाज़ टूट गई।
मेरी आँखों से भी आँसू बहने लगे।
“हाँ...”
अनीता फूट-फूट कर रो पड़ी।
“शितल की सहेलियों ने मुझे सब बता दिया। मैं जानती हूँ... तुमने मेरे लिए कितना सहा।”
हम दोनों एक-दूसरे को गले लगाए खड़े थे। सड़क के बीच, रोते हुए।
“अब... हमेशा के लिए अलविदा,” उसने फुसफुसाया। “तुम शितल के हो... और वो तुम्हारी है। मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं करूँगी।”
मैंने उसे और कसकर गले लगा लिया।
“अनीता... sorry... और थैंक यू।”
वो पीछे हटी। एक आखिरी बार मेरे चेहरे को देखा। फिर मुड़ी और चली गई।
हमेंशा के लिए।
दूर खड़ी शितल सब देख रही थी।
उसके चेहरे पर न जलन थी, न नफरत। सिर्फ गहरी शांति और प्यार।
धीरे-धीरे वो और उसकी सारी सहेलियाँ मेरे पास आईं।
एक-एक करके सबने मुझे गले लगाया।
तभी आसमान में जोरदार आतिशबाजी शुरू हो गई।
रंग-बिरंगी रोशनी पूरे आकाश में फैल गई।
शितल मेरे सामने आई। मेरे घूंघट को हटाया। मेरी आँखों में देखा।
“अब... तुम हमेशा के लिए मेरे हो।”
मैंने सिर झुकाकर कहा,
“हाँ... हमेशा।”
उसने मेरे होंठों पर हल्का-सा किस किया।
आतिशबाजी की रोशनी में हम दोनों एक-दूसरे को गले लगाए खड़े थे।
राधा अब पूरी तरह शितल की हो चुकी थी।
और गोपाल... अब हमेशा के लिए शितल का।
शादी हो गई।
शितल और मैं शादी के मंडप पर खड़े थे। मैं लाल ब्राइडल साड़ी में, भारी मेकअप, नथनी, झुमके, मेहंदी भरे हाथ, और बीच में वो टाइटेनियम केज। शितल ने मेरा घूंघट उठाया, मंगलसूत्र पहनाया और फेरे लिए।
सब कुछ वैसा ही था… लेकिन अब ये कोई खेल नहीं था।
ये मेरी असली जिंदगी बन गई थी।
शादी के तुरंत बाद शितल ने कोई रिस्क नहीं लिया।
उसने मेरे सारे बैंक अकाउंट्स अपने नाम ट्रांसफर करवा लिए। मेरे सारे सोशल मीडिया अकाउंट्स के नंबर बदल दिए, अपना नंबर लिंक कर दिया। हर जगह पासवर्ड, सिक्योरिटी, OTP — सब उसके कंट्रोल में।
मेरे पुराने अकाउंट्स अब “Gangu_Jambhulkar” नाम से चल रहे थे।
मैं उनमें कुछ भी पोस्ट नहीं कर सकता था। न फोटो, न स्टोरी, न कमेंट, न लाइक। बस स्क्रोल कर सकता था। देख सकता था।
कभी-कभी शितल मेरा female form का वीडियो — चोली-चुननी में, घुटनों पर, या मुर्गा बनकर — पोस्ट कर देती। अनीता या मेरे परिवार के लोग देख लेते। फिर कुछ घंटों बाद डिलीट कर देती।
बस मुझे याद दिलाने के लिए।
कि मैं अब हमेशा के लिए उसका हूँ।
अब मैं पूरी तरह गंगू बनकर जी रहा हूँ।
सुबह 5 बजे उठना, घर साफ करना, डायपर चेंज करना, चोली-चुननी पहनना, मेकअप करना, खाना बनाना, शितल के पैर दबाना… सब कुछ।
शितल और उसकी सहेलियाँ — शिवानी, नंदिनी, अंजलि, रीना, आश्विनी, प्रतिक्षा — अब भी कभी-कभी मुझे रैगिंग देती हैं।
मैं हँसते हुए मुर्गा बनता हूँ। हँसते हुए उनके पैर चाटता हूँ। हँसते हुए “मैं गंगू हूँ” बोलता हूँ।
क्योंकि अब डर नहीं रहा।
बस स्वीकार कर लिया है।
कभी-कभी रात में अनीता याद आ जाती है।
वो साधारण, प्यारी, दो चोटी वाली अनीता।
मेरी आँखें नम हो जाती हैं।
लेकिन मैं जानता हूँ — शितल हर पल मुझे देख रही है।
तो मैं आँसू पोंछ लेता हूँ, मुस्कुराता हूँ और फुसफुसाता हूँ…
“मैं गंगू हूँ… और हमेशा गंगू रहूँगा।”
शितल बेड पर लेटी होती है। मैं उसके पैर दबाता हूँ।
वो मेरे सिर पर हाथ फेरती है और धीरे से कहती है,
“अब तुम सचमुच मेरे हो… हमेशा के लिए।”
मैं सिर झुकाकर उसके पैरों को चूम लेता हूँ।