📝 Story Preview:
प्रेम और अनिता हाल ही में शादीशुदा जोड़ा हैं। कपड़े खरीदने को लेकर दोनों में तीखी बहस हो जाती है। प्रेम अनिता के अलमारी से कपड़े निकालकर दिखाता है कि उसके पास काफी कपड़े हैं, लेकिन अनिता कहती है कि वे भारी और असुविधाजनक हैं। बातों-बातों में प्रेम चुनौती स्वीकार कर लेता है कि वह एक दिन अनिता का कपड़ा पहनकर दिखाएगा।

अनिता उसे आँखों पर पट्टी बाँधकर दो घंटे में पूरा ब्राइडल लुक (साड़ी, जेवर, मेकअप, चूड़ियाँ) पहना देती है। जब पट्टी खुलती है तो प्रेम खुद को एक सुंदर दुल्हन की तरह देखता है। अनिता उसे उसी भारी साड़ी और जेवरों में घर के सारे काम (चाय बनाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना) करवाती है। प्रेम हार मानकर माफी माँगता है। अनिता माफी इस शर्त पर स्वीकार करती है कि वह उसी रूप में बाहर जाकर फोटो खिंचवाएगा, ताकि यह घटना याद रहे।
यही घटना आगे चलकर उनके रिश्ते में एक नए पावर डायनामिक्स, नियंत्रण, रोमांस और गहरी भावनाओं की शुरुआत बन जाती है।
अध्याय 1: बहस जो सब कुछ बदल गई

प्रेम और अनिता की शादी को अभी सिर्फ आठ महीने हुए थे। दोनों पुणे के एक शांत सोसाइटी में दो बेडरूम के मध्यम वर्गीय फ्लैट में रहते थे। घर छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा और अपने हिसाब से सजाया हुआ। दीवारों पर हल्के पीले रंग की पेंटिंग, एक पुरानी लकड़ी की अलमारी, और खिड़की से आने वाली सुबह की रोशनी कमरे को हमेशा नरम बना देती थी।
प्रेम तीस साल का था। गेहुआं रंग, साफ-सुथरा चेहरा, छोटी-छोटी मूंछें और हमेशा थोड़ी सी हंसी उसकी आँखों में रहती थी। वह एक प्राइवेट कंपनी में अकाउंट्स का काम करता था। अनिता उससे दो साल छोटी थी। गेहुआं चमकदार त्वचा, लंबे काले बाल जो अक्सर एक साधारण वेणी में बंधे रहते, और आँखें जो शांत रहते हुए भी बहुत कुछ कह जातीं। वह घर संभालती थी और कभी-कभी पास के ब्यूटी पार्लर में पार्ट-टाइम काम भी कर लिया करती थी।
उस दिन रविवार था। सुबह के लगभग दस बज रहे थे। प्रेम बिस्तर पर बैठा हुआ अपने फोन पर कुछ देख रहा था, और अनिता रसोई से चाय लेकर आई। उसने प्रेम के पास बैठते हुए प्याला उसके हाथ में दिया।
“लो, गुनगुनी है,” अनिता ने मुस्कुराते हुए कहा।
प्रेम ने चाय लेते हुए उसकी तरफ देखा। अनिता की वेणी थोड़ी सी बिखरी हुई थी, और उसके गले में पतला सोने का चेन चमक रहा था। प्रेम ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया और हल्के से अपनी हथेली पर रख लिया।
“क्या हुआ?” अनिता ने पूछा।
“कुछ नहीं,” प्रेम ने धीरे से कहा, “बस ऐसा लग रहा है कि शादी के बाद पहली बार कोई रविवार सही से कट रहा है।”
अनिता हल्के से हंसी। उसने प्रेम के कंधे पर सिर टिका दिया। दोनों चुपचाप चाय पीते रहे। कमरे में पंखे की हल्की आवाज और बाहर किसी बच्चे के खेलने की आवाज आ रही थी। यही उनके प्यार का अंदाज था—बड़े-बड़े शब्दों वाले नहीं, बल्कि छोटे-छोटे पल वाले।
थोड़ी देर बाद अनिता उठी और अलमारी की तरफ गई। वह कपड़े निकालने लगी। प्रेम ने पीछे से देखा तो बोला, “क्या कर रही हो?”
“सोचा था दोपहर में थोड़ा बाजार चली जाऊं। सर्दियों के लिए एक हल्की सी साड़ी देखनी थी,” अनिता ने जवाब दिया।
प्रेम की भौंहें थोड़ी सिकुड़ गईं। वह बिस्तर से उतरा और अनिता के पास जाकर अलमारी खोल दी। अंदर कई साड़ियाँ टंगी हुई थीं—रेशमी, कॉटन, कुछ भारी कांच के काम वाली, कुछ सादी।
“ये सब क्या हैं फिर?” प्रेम ने थोड़ा ऊँचे स्वर में कहा। “इतनी साड़ियाँ पड़ी हैं और तुम नई खरीदने की बात कर रही हो?”
अनिता ने शांति से साड़ी को वापस लटकाया और उसकी तरफ मुड़ी।
“प्रेम, ये ज्यादातर शादी और फंक्शन वाली हैं। रोज पहनने लायक नहीं। भारी हैं, और घर के काम में असुविधा होती है।”
“असुविधा?” प्रेम ने हल्का सा व्यंग्य किया। “तुम लोग हमेशा यही कहती हो। जितने कपड़े हैं उतने भी नहीं पहनती, फिर भी नई की डिमांड।”
अनिता की आँखों में हल्की सी नाराजगी आई, लेकिन उसने आवाज नहीं उठाई। वह जानती थी कि प्रेम पैसे के मामले में थोड़ा सतर्क रहता है। दोनों मध्यम वर्गीय परिवार से आए थे। अनावश्यक खर्च दोनों को पसंद नहीं था। लेकिन आज अनिता का मूड कुछ और था।
“मैं तुम्हें बेवकूफ नहीं बना रही,” उसने धीरे लेकिन साफ शब्दों में कहा। “अगर तुम्हें लगता है कि मैं झूठ बोल रही हूँ, तो एक दिन खुद पहनकर देख लो। पता चल जाएगा कि भारी साड़ी में घर का काम करना कितना आसान होता है।”
प्रेम हँस पड़ा। “मैं पहनूं? तुम्हारी साड़ी?”
“हाँ,” अनिता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा। “अगर मुंह से इतनी बड़ी बात निकाल ही दी है, तो एक दिन पहनकर दिखाओ। वरना मान जाओ कि मैं सही कह रही हूँ।”
प्रेम अभी भी हँस रहा था, लेकिन अनिता का चेहरा गंभीर था। वह मजाक नहीं कर रही थी। प्रेम ने सोचा कि बात यहीं खत्म हो जाएगी, लेकिन अनिता ने आगे कहा—
“अगर तुम नहीं पहनोगे, तो मैं आज ही मायके चली जाऊंगी। और वहाँ जाकर बताऊंगी कि मेरे पति को मेरी बात का मजाक उड़ाना अच्छा लगता है।”
प्रेम का चेहरा अचानक बदल गया। वह जानता था कि अनिता जिद्दी हो सकती है। और मायके वाली बात उसने हल्के में नहीं कही थी। पड़ोसियों और रिश्तेदारों तक बात पहुँचना वह बिल्कुल नहीं चाहता था।
“अनिता… मैंने मजाक में कहा था,” प्रेम ने आवाज थोड़ी नरम करते हुए कहा।
“मजाक में कहा या नहीं, मुंह से निकल चुका है,” अनिता ने शांत स्वर में जवाब दिया। “अब या तो एक दिन मेरी साड़ी पहनो, या मैं अपनी बात पर अटल हूँ।”
कमरे में कुछ पल तक सन्नाटा रहा। प्रेम अनिता की आँखों में देखता रहा। उसमें गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी। वैसी दृढ़ता जो वह शादी के बाद पहली बार देख रहा था।
अंत में प्रेम ने भारी सांस लेते हुए सिर झुका लिया।
“…ठीक है।”
अनिता की आँखों में हल्की सी जीत की चमक आई, लेकिन उसने मुस्कान को होठों तक नहीं आने दिया। उसने बस धीरे से कहा—
“तो फिर तैयार हो जाओ। आज का दिन लंबा होने वाला है।”
अध्याय 2: आँखों पर पट्टी और परिवर्तन

प्रेम ने जब “ठीक है” कहा था, तो उसे लग रहा था कि अनिता बस थोड़ा डराकर छोड़ देगी। लेकिन अनिता ने तुरंत कमरे का दरवाजा बंद कर दिया और पर्दे खींच दिए। कमरे में हल्की सी अंधेरी छा गई।
“अनिता… अब क्या कर रही हो?” प्रेम की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी।
अनिता ने अलमारी खोली और एक लाल रंग की भारी बनारसी साड़ी निकाली। उसके साथ सोने जैसी चमक वाला पूरा जेवर सेट, चूड़ियाँ, मांगटीका, नथ और एक रेशमी रूमाल भी निकाल लिया। प्रेम की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“तुम सच में करने वाली हो?” उसने कहा।
अनिता ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में न गुस्सा था, न हंसी। बस एक शांत लेकिन पक्का इरादा था।
“तुमने चुनौती स्वीकार की है, प्रेम। अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं।”
प्रेम ने हाथ उठाकर विरोध करना चाहा, लेकिन अनिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“हिलना मत। और आँखें बंद रखो।”
“अनिता सुन तो—”
“आँखें बंद करो।”
प्रेम की सांस तेज चलने लगी। अनिता ने रेशमी रूमाल लिया और उसकेeyes पर कसकर बांध दिया। अंधेरा हो गया। अब सिर्फ अनिता की हल्की सांस और कपड़ों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।
प्रेम बोलने की कोशिश करता रहा, “ये पागलपन है… मैं मर्द हूँ… ये सब मुझे शोभा नहीं देगा…”
अनिता ने जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप काम में व्यस्त हो गई। पहले उसने प्रेम की शर्ट के बटन खोले। प्रेम का शरीर सख्त हो गया।
“अनिता… मत कर…” उसकी आवाज अब पहले जैसी जोरदार नहीं रही थी।
“तुमने कहा था न कि मैं झूठ बोलती हूँ,” अनिता ने धीरे से कहा। “आज खुद अनुभव करोगे।”
उसने प्रेम के कंधों से शर्ट उतार दी। फिर पायजामा। प्रेम का पूरा शरीर अजीब सी शर्म और असहायता से कांप रहा था। अनिता ने पहले उसे एक सॉफ्ट कॉटन का पेटिकोट पहनाया। गांठ बांधते समय उसका हाथ प्रेम की कमर पर गया तो प्रेम की सांस रुक सी गई।
फिर ब्लाउज। अनिता ने ब्लाउज के हुक लगाते हुए कहा, “मैंने ब्यूटीशियन कोर्स किया है। नेशनल लेवल पर अवॉर्ड भी जीता है। तुम्हें पता भी नहीं था न?”
प्रेम चुप था। उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी।
इसके बाद असली काम शुरू हुआ। अनिता ने मेकअप किट निकाली। पहले फाउंडेशन। ठंडी क्रीम प्रेम के चेहरे पर फैलते ही वह थोड़ा सिमट गया। फिर आईब्रो, आईलाइनर, काजल। ब्रश की हर हरकत पर प्रेम की पलकें कांप रही थीं। अनिता ने उसके होठों पर गहरा लाल लिपस्टिक लगाया। फिर गालों पर हल्का ब्लाश।
दो घंटे तक अनिता लगातार काम करती रही। बीच-बीच में प्रेम बोलता, “अब बहुत हो गया… खोल दो पट्टी…” लेकिन अनिता बिना जवाब दिए काम जारी रखती।
साड़ी draping का समय आया। अनिता ने भारी लाल साड़ी को बड़े ही कुशल तरीके से लपेटा। पल्लू को ठीक से सेट किया, प्लीट्स संभाले। फिर पूरा जेवर—हर, झुमके, नथ, चूड़ियाँ, मांगटीका, बिछिया तक। आखिर में उसने प्रेम के बालों को थोड़ा संभालकर एक हल्का सा जूड़ा जैसा बना दिया और उस पर मांगटीका लगा दिया।
जब सब कुछ पूरा हो गया, तो अनिता ने एक लंबी सांस ली। फिर धीरे से बोली—
“अब पट्टी खोलती हूँ। आँखें खोलते ही आईने में देखना।”
रूमाल खुला।
प्रेम की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। सामने बड़े आईने में जो तस्वीर दिखाई दी, उसे देखकर वह हिल गया।
वहाँ एक दुल्हन खड़ी थी। लाल बनारसी साड़ी, पूरा सोने का जेवर, परफेक्ट मेकअप, लाल होंठ, और आँखों में काजल की गहरी रेखा। चेहरा उसका ही था, लेकिन अब वह पहचाना नहीं जा रहा था।
प्रेम का गला सूख गया। वह अपनी तरफ देखता रहा। हाथों में चूड़ियाँ खनक उठीं। साड़ी का वजन कंधों पर महसूस हो रहा था। गले में हार की ठंडक थी।
अनिता उसके पीछे खड़ी मुस्कुरा रही थी।
“क्या खूब लग रहे हो,” उसने धीरे से कहा। “मेरी दुल्हन।”
प्रेम का चेहरा लाल हो गया। वह कुछ बोलना चाहता था, लेकिन शब्द नहीं निकल रहे थे। शर्म, गुस्सा, असहायता और एक अजीब सी घबराहट सब एक साथ उसके अंदर घूम रहे थे।
वह आईने में अपनी तस्वीर से नज़रें नहीं हटा पा रहा था।
अनिता ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए धीरे से कहा, “अब समझ में आया न? ये सिर्फ कपड़ा नहीं होता। ये वजन होता है… नज़रों का, शर्म का, और अपनी पहचान का।”
प्रेम अभी भी चुप था। उसकी आँखें नम थीं, लेकिन वह रो नहीं रहा था। बस खड़ा था—एक ऐसी तस्वीर बनकर, जिसे उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
अध्याय 3: एक दिन की गृहिणी

प्रेम अभी भी आईने के सामने खड़ा था। साड़ी का भारी पल्लू उसके बाएँ कंधे पर रखा था, चूड़ियाँ हर छोटे आंदोलन पर खनक उठतीं, और गले में हार की ठंडक लगातार महसूस हो रही थी। अनिता उसके पीछे खड़ी थी। उसने प्रेम के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोली—
“अब बस खड़े-खड़े देखने से कुछ नहीं होगा। चलो, काम शुरू करो।”
प्रेम की आवाज में अभी भी विरोध था, “अनिता… ये बहुत भारी है। मैं इससे चल भी नहीं पा रहा ठीक से।”
अनिता हल्के से मुस्कुराई। “ठीक से चलना तो बाद में सीखना। पहले चाय बनाओ। मेरे लिए।”
प्रेम ने उसकी तरफ देखा। अनिता का चेहरा शांत था, लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे वह पूरे नाटक का मजा ले रही हो। प्रेम ने सांस रोककर रसोई की तरफ कदम बढ़ाया। साड़ी के प्लीट्स उसके पैरों में उलझने लगे। हर कदम पर चूड़ियों की आवाज घर में गूंज रही थी। उसे लग रहा था जैसे पूरा घर सुन रहा हो।
रसोई में पहुँचकर उसने गैस ऑन की। हाथ कांप रहे थे। ब्लाउज की आस्तीन थोड़ी तंग थी, और साड़ी का पल्लू बार-बार कंधे से सरकने लगती। जब वह दूध का बर्तन उठा रहा था, तो हार उसकी छाती से रगड़ खा रहा था। एक अजीब सी सनसनाहट उसके शरीर में दौड़ गई। उसने आँखें बंद कर लीं।
अनिता दरवाजे पर खड़ी देख रही थी। “क्या हुआ? दूध गिरा दोगे क्या?”
“नहीं…” प्रेम की आवाज कमजोर निकल गई।
चाय बनाते समय उसकी हालत और बिगड़ती गई। साड़ी का वजन कमर पर दबाव डाल रहा था। पेटिकोट की गांठ हर बार हिलने पर याद दिला रही थी कि उसके नीचे अब मर्दाना कपड़ा नहीं है। जब वह चाय के प्याले में चाय डाल रहा था, तो अनिता पास आकर खड़ी हो गई। उसने प्रेम की कमर में हाथ रखकर साड़ी को थोड़ा ठीक किया।
“इतने कसे हुए खड़े हो क्यों? साड़ी में आराम से रहना सीखो,” अनिता ने धीरे से कान के पास कहा। उसकी सांस प्रेम के कान से टकराई।
प्रेम का शरीर अकड़ गया। नीचे एक हल्की सी हरकत हुई, जिसे वह रोक नहीं पाया। शर्म से उसका चेहरा जलने लगा। अनिता ने देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली। बस हल्के से मुस्कुरा दी।
चाय लेकर जब प्रेम अनिता के पास गया, तो अनिता ने प्याला लेते हुए कहा, “अब बर्तन धोओ।”
“बर्तन?” प्रेम की आँखें फटी रह गईं।
“हाँ। सिंक में पड़े हैं। धो दो।”
प्रेम सिंक के पास गया। हाथों में चूड़ियाँ थीं। बर्तन धोते समय चूड़ियाँ बार-बार सिंक से टकराकर आवाज कर रही थीं। पानी के छींटे साड़ी पर पड़ रहे थे। गीली साड़ी उसकी टाँगों से चिपकने लगी। हर बार झुकने पर पल्लू सरक जाता, और अनिता तुरंत पीछे आकर उसे ठीक कर देती। कभी-कभी उसका हाथ प्रेम की पीठ पर या कमर पर रुक जाता।
“तुम्हारी कमर अच्छी है,” अनिता ने एक बार धीरे से कहा। “साड़ी में और निखर रही है।”
प्रेम ने जवाब नहीं दिया। वह बर्तन धोता रहा। लेकिन उसका मन बर्तनों पर नहीं था। उसका पूरा ध्यान अपनी देह पर था—जो हर पल साड़ी और जेवरों के वजन तले दब रही थी। और सबसे बुरी बात यह थी कि उसके शरीर का निचला हिस्सा अब पूरी तरह शांत नहीं था। एक अजीब सी गर्मी और अकड़न पैदा हो रही थी, जिसे वह हर कीमत पर छुपाना चाहता था।
जब बर्तन खत्म हुए, तो अनिता ने कहा, “अब कपड़े धो लो। बाल्टी में भीगे पड़े हैं।”
प्रेम की हालत खराब हो गई। कपड़े धोने के लिए झुकना पड़ता। झुकते ही साड़ी का पल्लू आगे आने लगता, और जेवर उसकी छाती से रगड़ खाते। हर बार झुकने पर उसके अंदर की उत्तेजना और बढ़ जाती। वह जानबूझकर धीरे-धीरे काम कर रहा था, ताकि अनिता को पता न चले कि उसके शरीर में क्या हो रहा है।
लेकिन अनिता सब समझ रही थी।
वह पास आकर खड़ी हो गई। “इतने धीरे क्यों धो रहे हो? हाथ कांप क्यों रहे हैं?”
“कुछ नहीं…” प्रेम ने मुंह फेर लिया।
अनिता ने उसका चेहरा पकड़कर अपनी तरफ मोड़ा। “देखो मुझे। तुम्हारे गाल लाल हो रहे हैं। और…” उसकी नजर नीचे गई, फिर धीरे से मुस्कुराई, “लगता है सिर्फ साड़ी का वजन नहीं महसूस हो रहा तुम्हें।”
प्रेम की सांस रुक गई। शर्म से उसकी आँखें नम हो गईं। “अनिता… मत करो मजाक…”
अनिता ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपनी हथेली पर रखा। “मैं मजाक नहीं कर रही। मैं देख रही हूँ कि तुम कितने बेबस हो गए हो। और बेबसी तुम्हें सुंदर बना रही है।”
प्रेम का गला सूख गया। वह कुछ नहीं बोल पाया। अनिता ने उसका हाथ छोड़ दिया और पीछे हटते हुए कहा—
“काम खत्म करो। उसके बाद माफी मांगना। लेकिन याद रखना… माफी इतनी आसानी से नहीं मिलेगी।”
प्रेम ने सिर झुका लिया। पानी में हाथ डाले वह कपड़े रगड़ता रहा। चूड़ियों की खनक, साड़ी की सरसराहट, और अपने ही शरीर की धड़कन—सब कुछ मिलकर उसे पागल किए दे रहे थे। वह चाहकर भी उस अजीब सी उत्तेजना को रोक नहीं पा रहा था। हर पल उसके अंदर शर्म और इच्छा एक साथ उलझ रहे थे।
और अनिता दूर खड़ी यह सब देख रही थी—शांत आँखों से, जैसे वह जानती हो कि आज का दिन अभी खत्म नहीं हुआ है।
अध्याय 4: शर्त और फोटो

कपड़े धोते-धोते प्रेम की बाँहें कांपने लगी थीं। साड़ी पूरी तरह शरीर से चिपक चुकी थी। पल्लू बार-बार सरक रहा था, और हर सरकन के साथ उसकी शर्म और उत्तेजना दोनों बढ़ रहे थे। आखिरकार वह रुक गया। उसने सिर झुका लिया और धीमी आवाज में बोला—
“माफ कर दो, अनिता… अब और नहीं हो पा रहा।”
अनिता उसके पास आई। उसने प्रेम की ठुड्डी पकड़कर चेहरा ऊपर उठाया। प्रेम की आँखें नम थीं, गाल लाल थे, और सांसें तेज चल रही थीं।
“माफी?” अनिता ने धीरे से दोहराया। “इतनी जल्दी हार मान गए?”
प्रेम ने आँखें बंद कर लीं। “हाँ… हार मान ली। तुम सही कहती थीं। ये सब… बहुत मुश्किल है।”
अनिता कुछ पल तक उसे देखती रही। फिर धीरे से मुस्कुराई।
“ठीक है। माफी स्वीकार है। लेकिन एक शर्त पर।”
प्रेम की आँखें खुल गईं। “क्या शर्त?”
अनिता ने अपना रेशमी रूमाल हाथ में लिया जो पहले उसकी आँखों पर बंधा था। “इस रूप में मेरे साथ नीचे जाओगे। सोसाइटी के गार्डन में। और मैं तुम्हारी फोटो खींचूंगी।”
प्रेम जैसे बिजली से हैरान हो गया। “बाहर? इस हालत में? अनिता… पागल हो गई हो क्या? कोई देख लेगा तो—”
“देख लेगा तो क्या होगा?” अनिता ने शांत स्वर में काटा। “तुमने चुनौती स्वीकार की थी। अब उसका पूरा हिसाब चुकता करो। वरना माफी रद्द।”
प्रेम का चेहरा सफेद पड़ गया। उसके पेट के अंदर कुछ बैठता जा रहा था। बाहर जाना… इस लाल साड़ी में, पूरे जेवरों में, मेकअप में… सिर्फ सोचना ही उसके रोम-रोम को कांपाने के लिए काफी था। लेकिन अनिता की आँखों में वह दृढ़ता फिर से आ गई थी, जो सुबह बहस के समय थी।
“…कितनी देर?” प्रेम की आवाज लगभग टूट रही थी।
“दस मिनट। बस दस मिनट। फोटो खींच लूंगी, वापस आ जाएंगे।”
प्रेम ने भारी सांस भरी। फिर धीरे से सिर हिलाया।
अनिता ने तुरंत रूमाल लिया और प्रेम के दोनों हाथों को उसके सामने लाकर हल्के से बांध दिया। गाँठ मजबूत थी, लेकिन दर्द देने वाली नहीं। प्रेम ने हाथ हिलाकर देखा। छूटने का कोई रास्ता नहीं था।
“ये क्यों?” उसकी आवाज कांप उठी।
“ताकि तुम भाग न सको,” अनिता ने सरल स्वर में कहा। “और… तुम्हें और बेबस देखने में मजा आ रहा है।”
प्रेम का गला सूख गया। हाथ बंधे होने की वजह से साड़ी का पल्लू संभालना भी मुश्किल हो गया था। अनिता ने खुद पल्लू को ठीक से उसके कंधे पर रखा, मांगटीका संभाला, और फिर उसका हाथ पकड़कर दरवाजे की तरफ ले चली।
लिफ्ट तक का रास्ता प्रेम को कई किलोमीटर जैसा लगा। हर कदम पर चूड़ियाँ खनक रही थीं। साड़ी का वजन और बंधे हाथों की बेबसी मिलकर उसके शरीर में अजीब सी गर्मी पैदा कर रहे थे। नीचे कुछ हिस्सा पहले से ही अकड़ा हुआ था, और अब वह और सख्त होता जा रहा था। वह चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रहा था।
गार्डन सूना था। शाम का समय था, ज्यादा लोग नहीं थे। अनिता उसे एक कोने में नीम के पेड़ के नीचे ले गई। प्रेम की हालत खराब थी। वह इधर-उधर देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
अनिता ने फोन निकाला। “थोड़ा मुस्कुराओ।”
“अनिता… प्लीज…” प्रेम की आवाज लगभग गिड़गिड़ाहट जैसी हो गई थी।
“मुस्कुराओ,” अनिता ने दोहराया। “वरना और देर खड़े रहना पड़ेगा।”
प्रेम ने जबरदस्ती होठों को थोड़ा सा खींचा। अनिता ने कई एंगल से फोटो खींची। कभी पास से, कभी थोड़ा दूर से। एक फोटो में उसने प्रेम के बंधे हाथों को साफ दिखाया। दूसरी में साड़ी के पल्लू को थोड़ा सा खिसका दिया ताकि उसकी गर्दन और हार साफ दिखें।
हर क्लिक के साथ प्रेम के अंदर की उत्तेजना और शर्म एक साथ चरम पर पहुँच रही थी। बंधे हाथ, बाहर की हवा में साड़ी की सरसराहट, अनिता की ठंडी आवाज—सब कुछ मिलकर उसे पागल किए दे रहे थे। उसका शरीर अब पूरी तरह गद्दार हो चुका था। पेटिकोट के अंदर सब कुछ तना हुआ था, और वह जानता था कि अनिता को अंदाजा हो गया होगा।
फोटो खत्म होने के बाद अनिता पास आई। उसने धीरे से प्रेम के कान के पास कहा—
“देखा? तुम डर के मारे कांप रहे हो… लेकिन नीचे तो कुछ और ही हो रहा है।”
प्रेम की आँखें शर्म से बंद हो गईं। अनिता ने उसका बंधा हुआ हाथ पकड़ा और हल्के से अपनी हथेली पर दबाया।
“चलो घर,” उसने धीरे से कहा। “अब असली माफी तो रात को लेनी होगी।”
प्रेम की सांस अटक गई।
हाथ बंधे, साड़ी में लिपटा, पूरे जेवरों में सजा वह चुपचाप अनिता के पीछे-पीछे चलने लगा। हर कदम पर उसका शरीर और भारी होता जा रहा था—शर्म से नहीं, एक ऐसी भूख से जिसे वह पहली बार महसूस कर रहा था।
ये तो बस ट्रेलर है…
अभी तो सिर्फ शुरुआत हुई है।
प्रेम की शर्म, अनिता का कंट्रोल, साड़ी में बंधी बेबसी… ये सब अभी झलक मात्र है।
असली मजा तो अब शुरू होने वाला है।
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